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संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
* अध्याय ५ *२७१

| उमापतिं विरूपाक्षं योगानन्दमयं परम्।<br>ज्ञानवैराग्यनिलयं ज्ञानयोगं सनातनम्॥ १४॥<br>शाश्वतैश्वर्यविभवं धर्माधारं दुरासदम्।<br>महेन्द्रोपेन्द्रनमितं महर्षिगणवन्दितम्॥ १५॥<br>आधारं सर्वशक्तीनां महायोगेश्वरेश्वरम्।<br>योगिनां परमं ब्रह्म योगिनां योगवन्दितम्।<br>योगिनां हृदि तिष्ठन्तं योगमायासमावृतम्॥ १६॥<br>क्षणेन जगतो योनिं नारायणमनामयम्।<br>ईश्वरेणैकतापन्नमपश्यन् ब्रह्मवादिनः॥ १७॥<br>दृष्ट्वा तदैश्वरं रूपं रुद्रनारायणात्मकम्।<br>कृतार्थं मेनिरे सन्तः स्वात्मानं ब्रह्मवादिनः॥ १८॥<br>सनत्कुमारः सनको भृगुश्च<br>सनातनश्चैव सनन्दनश्च।<br>रुद्रोऽङ्गिरा वामदेवोऽथ शुक्नो<br>महर्षिरत्रिः कपिलो मरीचिः॥ १९॥<br>दृष्ट्वाथ रुद्रं जगदीशितारं<br>तं पद्मनाभाश्रितवामभागम्।<br>ध्यात्वा हृदिस्थं प्रणिपत्य मूर्ध्ना<br>बद्ध्वाञ्जलिं स्वेषु शिरःसु भूयः॥ २०॥<br>ओङ्कारमुच्चार्य विलोक्य देव-<br>मन्तःशरीरे निहितं गुहायाम्।<br>समस्तुवन् ब्रह्ममयैर्वचोभि-<br>रानन्दपूर्णायतमानसास्ते ॥ २१॥ | उमापति, विरूपाक्ष, परम योगानन्दमय, ज्ञान-वैराग्यके<br>निधान, सनातन ज्ञानयोग, शाश्वत ऐश्वर्य एवं विभवरूप,<br>धर्मके आधार, दुरासद (दुष्प्राप्य), महेन्द्र तथा उपेन्द्र<br>(विष्णु)-द्वारा नमस्कृत, महर्षिगणोंद्वारा वन्दित, सभी<br>शक्तियोंके आधार, महायोगेश्वरोंके भी ईश्वर, योगियोंके<br>परम ब्रह्म, योगियोंके योगद्वारा वन्दित, योगियोंके हृदयमें<br>स्थित, योगमायासे समावृत, जगत्के योनिरूप तथा<br>अनामय नारायणको क्षणमात्रमें ईश्वर अर्थात् शंकरके साथ<br>एकाकार होते हुए देखा॥ १२—१७॥<br>रुद्रके उस ऐश्वर्यमय नारायणात्मक रूपको देखकर<br>ब्रह्मवादी संतोंने अपने-आपको कृतार्थ माना। सनत्कुमार,<br>सनक, भृगु, सनातन, सनन्दन, रुद्र, अंगिरा, वामदेव,<br>शुक्र, महर्षि अत्रि, कपिल तथा मरीचि—इन ऋषियोंने<br>पद्मनाभ विष्णुको वामभागमें विराजित किये हुए उन<br>जगत्के नियामक रुद्रका दर्शन किया और हृदयमें<br>स्थित उनका ध्यान करके सिरसे विनयपूर्वक प्रणामकर<br>पुनः अपने मस्तकपर अञ्जलि बाँधकर प्रणाम<br>किया॥ १८–२०॥<br>ओंकारका उच्चारण करनेके उपरान्त अपने शरीरके<br>भीतर (हृदयरूपी) गुहामें निहित उन देवका दर्शन<br>करके आनन्दसे परिपूर्ण विस्तृत आत्मावाले वे (मुनिगण)<br>वैदिक मन्त्रोंके द्वारा (उन देवकी) स्तुति करने लगे॥ २१॥ | | <div align="center">मुनय ऊचुः</div>त्वामेकमीशं पुरुषं पुराणं<br>प्राणेश्वरं रुद्रमनन्तयोगम्।<br>नमाम सर्वे हृदि संनिविष्टं<br>प्रचेतसं ब्रह्ममयं पवित्रम्॥ २२॥<br>त्वां पश्यन्ति मुनयो ब्रह्मयोनिं<br>दान्ताः शान्ता विमलं रुक्मवर्णम्।<br>ध्यात्वात्मस्थमचलं स्वे शरीरे<br>कविं परेभ्यः परमं तत्परं च॥ २३॥<br>त्वत्तः प्रसूता जगतः प्रसूतिः<br>सर्वात्मभूस्त्वं परमाणुभूतः।<br>अणोरणीयान् महतो महीयां-<br>स्त्वामेव सर्वं प्रवदन्ति सन्तः॥ २४॥ | **मुनियोंने कहा—**आप एकमात्र ईश्वर, पुराणपुरुष,<br>प्राणेश्वर, अनन्त योगरूप, हृदयमें संनिविष्ट, प्रचेता,<br>पवित्र एवं ब्रह्ममय रुद्रको हम सभी प्रणाम करते हैं।<br>इन्द्रियोंका दमन करनेवाले तथा शान्त मुनिगण ध्यानके<br>द्वारा अपने ही शरीरमें अचल, निर्मल, स्वर्णके समान<br>वर्णवाले, ब्रह्मयोनि, उत्कृष्टसे भी अत्यन्त उत्कृष्ट<br>(प्राणिमात्रके हृदयमें विद्यमान) आप कविका दर्शन<br>करते हैं। संसारकी सृष्टि आपसे ही हुई है। आप<br>सभीके आत्मरूप और परम अणुरूप हैं। महापुरुष<br>आपको ही सब कुछ और सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म तथा<br>महान्‌से भी महान् कहते हैं॥ २२-२४॥ |

२७२ * कूर्मपुराण *


हिरण्यगर्भो जगदन्तरात्मा
त्वत्तोऽधिजातः पुरुषः पुराणः।
संजायमानो भवता विसृष्टो
यथाविधानं सकलं ससर्ज॥ २५॥

त्वत्तो वेदाः सकलाः सम्प्रसूता-
स्त्वय्येवान्ते संस्थितिं ते लभन्ते।
पश्यामस्त्वां जगतो हेतुभूतं
नृत्यन्तं स्वे हृदये संनिविष्टम्॥ २६॥

त्वयैवेदं भ्राम्यते ब्रह्मचक्रं
मायावी त्वं जगतामेकनाथः।
नमामस्त्वां शरणं सम्प्रपन्ना
योगात्मानं चित्पतिं दिव्यनृत्यम्॥ २७॥

पश्यामस्त्वां परमाकाशमध्ये
नृत्यन्तं ते महिमानं स्मरामः।
सर्वात्मानं बहुधा संनिविष्टं
ब्रह्मानन्दमनुभूयानुभूय ॥ २८॥

जगत्के अन्तरात्मा-स्वरूप हिरण्यगर्भ पुराणपुरुष आपसे उत्पन्न हुए हैं। आपद्वारा उत्पन्न किये गये उस (पुराणपुरुष)-ने उत्पन्न होते ही यथाविधि सम्पूर्ण संसारकी सृष्टि की। आपसे ही सभी वेद उत्पन्न हुए हैं और अन्तमें आपमें ही वे स्थिति पाते हैं। हम अपने हृदयमें स्थित जगत्के कारणरूप आपको नृत्य करते हुए देख रहे हैं। आपके द्वारा ही इस ब्रह्मचक्रको चलाया जाता है, आप मायावी और जगत्के एकमात्र स्वामी हैं। हम दिव्य नृत्य करनेवाले आप योगात्मा चित्पतिकी शरणमें आये हैं, आपको हम नमस्कार करते हैं। परम आकाशके मध्यमें नृत्य कर रहे आपका हम दर्शन करते हैं और आपकी महिमाका स्मरण करते हैं। अनेक रूपोंमें स्थित सर्वात्मा ब्रह्मानन्दका हम बार-बार अनुभव कर रहे हैं॥ २५-२८॥


ॐकारस्ते वाचको मुक्तिबीजं
त्वमक्षरं प्रकृतौ गूढरूपम्।
तत्त्वां सत्यं प्रवदन्तीह सन्तः
स्वयम्प्रभं भवतो यत्प्रकाशम्॥ २९॥

स्तुवन्ति त्वां सततं सर्ववेदा
नमन्ति त्वामृषयः क्षीणदोषाः।
शान्तात्मानः सत्यसंधा वरिष्ठं
विशन्ति त्वां यतयो ब्रह्मनिष्ठाः॥ ३०॥

आपका वाचक ओङ्कार मुक्तिका बीज है, आप अक्षर तथा प्रकृतिमें गूढरूपसे स्थित हैं। इसीलिये संतजन आपको सत्यस्वरूप और आपके प्रकाशको स्वयं प्रकाशित बताते हैं। सभी वेद सतत आपकी स्तुति करते हैं। दोषरहित ऋषिगण आपको नमस्कार करते हैं तथा शान्त-चित्त, सत्यसंध ब्रह्मनिष्ठ यतिजन आप सर्वश्रेष्ठमें प्रवेश करते हैं॥ २९-३०॥


एको वेदो बहुशाखो ह्यनन्त-
स्त्वामेवैकं बोधयत्येकरूपम्।
वेद्यं त्वां शरणं ये प्रपन्ना-
स्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम्॥ ३१॥

भवानीशोऽनादिमांस्तेजोराशि-
र्ब्रह्मा विश्वं परमेष्ठी वरिष्ठः।
स्वात्मानन्दमनुभूयाधिशेते
स्वयं ज्योतिरचलो नित्यमुक्तः॥ ३२॥

बहुत शाखाओंवाला एक अनन्त वेद आपके अद्वितीय एवं एकरूपका बोध कराता है। जो लोग जानने योग्य आपकी शरण ग्रहण करते हैं, उन्हींको शाश्वत शान्ति प्राप्त होती है, अन्य किसीको नहीं। आप ईश, अनादि, तेजोराशि, ब्रह्मा, विश्वरूप, परमेष्ठी और वरिष्ठ हैं। नित्य मुक्त और स्वयं ज्योतिरूप अचल (योगी) स्वात्मानन्दका अनुभव कर (आपमें) प्रविष्ट होते हैं॥ ३१-३२॥


एको रुद्रस्त्वं करोषीह विश्वं
त्वं पालयस्यखिलं विश्वरूपः।
त्वामेवान्ते निलयं विन्दतीदं
नमामस्त्वां शरणं सम्प्रपन्नाः॥ ३३॥

आप अद्वितीय रुद्र ही इस विश्वकी सृष्टि करते हैं। विश्वरूप आप सबका पालन करते हैं और यह (विश्व) अन्तमें आपमें ही विलीन हो जाता है। हम आपको नमस्कार करते हैं और आपके शरणागत हैं॥ ३३॥

* अध्याय ५ *२७३
त्वामेकमाहुः कविमेकरुद्रं<br>  प्राणं बृहन्तं हरिमग्निमीशम्।<br>इन्द्रं मृत्युमनिलं चेकितानं<br>  धातारमादित्यमनेकरूपम् ॥ ३४ ॥<br>त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं<br>  त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।<br>त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता<br>  सनातनस्त्वं पुरुषोत्तमोऽसि ॥ ३५ ॥<br>त्वमेव विष्णुश्चतुराननस्त्वं<br>  त्वमेव रुद्रो भगवानधीशः।<br>त्वं विश्वनाभिः प्रकृतिः प्रतिष्ठा<br>  सर्वेश्वरस्त्वं परमेश्वरोऽसि ॥ ३६ ॥आपको अद्वितीय, कवि, एक रुद्र, प्राण, बृहत्, हरि, अग्नि, ईश, इन्द्र, मृत्यु, अनिल, चेकितान, धाता, आदित्य, और अनेकरूप कहा जाता है। आप अविनाशी और परम जानने योग्य हैं। आप ही इस विश्वके परम आश्रय हैं। आप अव्यय, शाश्वत धर्मरक्षक, सनातन और पुरुषोत्तम हैं। आप ही विष्णु और आप ही चतुर्मुख ब्रह्मा हैं। आप ही प्रधान स्वामी भगवान् रुद्र हैं। आप विश्वकी नाभि, प्रकृति, प्रतिष्ठा, सर्वेश्वर और परम ईश्वर हैं॥ ३४–३६॥
त्वामेकमाहुः पुरुषं पुराण-<br>  मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्।<br>चिन्मात्रमव्यक्तमचिन्त्यरूपं<br>  खं ब्रह्म शून्यं प्रकृतिं निर्गुणं च ॥ ३७ ॥<br>यदन्तरा सर्वमिदं विभाति<br>  यदव्ययं निर्मलमेकरूपम्।<br>किमप्यचिन्त्यं तव रूपमेतत्<br>  तदन्तरा यत्प्रतिभाति तत्त्वम् ॥ ३८ ॥आपको अद्वितीय, पुराणपुरुष, आदित्यके समान वर्णवाला, तमोगुणसे अतीत, चिन्मात्र, अव्यक्त, अचिन्त्यरूप, आकाश, ब्रह्म, शून्य, प्रकृति और निर्गुण कहते हैं। जिसके भीतर यह सम्पूर्ण (जगत्) प्रकाशित होता है तथा जो विकाररहित निर्मल और अद्वितीय रूप है, वह आपका रूप अचिन्त्य है और उसके भीतर समस्त तत्त्व प्रतीत होते हैं॥ ३७-३८॥
योगेश्वरं रुद्रमनन्तशक्तिं<br>  परायणं ब्रह्मतनुं पवित्रम्।<br>नमाम सर्वे शरणार्थिनस्त्वां<br>  प्रसीद भूताधिपते महेश ॥ ३९ ॥<br>त्वत्पादपद्मस्मरणादशेष-<br>  संसारबीजं विलयं प्रयाति।<br>मनो नियम्य प्रणिधाय कायं<br>  प्रसादयामो वयमेकमीशम् ॥ ४० ॥<br>नमो भवायास्तु भवोद्भवाय<br>  कालाय सर्वाय हराय तुभ्यम्।<br>नमोऽस्तु रुद्राय कपर्दिने ते<br>  नमोऽग्नये देव नमः शिवाय ॥ ४१ ॥<br><br>ततः स भगवान् देवः कपर्दी वृषवाहनः।<br>संहृत्य परमं रूपं प्रकृतिस्थोऽभवद् भवः ॥ ४२ ॥हम सभी योगेश्वर, अनन्तशक्ति रुद्र, उत्कृष्ट आश्रयस्वरूप पवित्र ब्रह्ममूर्ति (आप)-को नमस्कार करते हैं। भूतोंके अधिपति महेश! प्रसन्न होइये, हम आपकी शरणमें हैं। आपके चरणकमलका स्मरण करनेसे सम्पूर्ण संसारका बीज (अर्थात् कर्म) नष्ट हो जाता है। मनका नियमन कर, शरीरको संयमित कर हम सभी अद्वितीय ईश्वर आपको प्रसन्न करते हैं। भव, भवोद्भव, काल, सर्व तथा हर आपको नमस्कार है। जटाधारी आप रुद्रको नमस्कार है। अग्निरूप देव शिव! आपको नमस्कार है, इस प्रकार स्तुति करनेपर उन भगवान् कपर्दी वृषवाहन देव भवने (अपने उस) उत्कृष्ट (विराट्)-रूपको समेट लिया और वे अपनी प्रकृतिमें स्थित हो गये॥ ३९–४२॥
२७४* कूर्मपुराण *
ते भवं भूतभव्येशं पूर्ववत् समवस्थितम्।<br>दृष्ट्वा नारायणं देवं विस्मिता वाक्यमब्रुवन्॥ ४३ ॥मुनियोंने पहलेके समान स्थित भूतभव्येश भव और नारायणदेवको देखकर आश्चर्यचकित होकर यह वाक्य कहा— ॥ ४३ ॥
भगवन् भूतभव्येश गोवृषाङ्कितशासन।<br>दृष्ट्वा ते परमं रूपं निर्वृताः स्म सनातन॥ ४४ ॥भगवन्! भूतभव्येश! गोवृषाङ्कितशासन! सनातन! आपके परम रूपका दर्शन कर हमलोग संतुष्टचित्त हो गये हैं। आपकी कृपासे हम सभीको निर्मल, परात्पर, परमेश्वरस्वरूप आपकी अव्यभिचारिणी भक्ति उत्पन्न हुई है। शंकर! इस समय हमलोग आप परमेष्ठीके उस माहात्म्यको एवं जो नित्य यथार्थस्वरूप है (उसे) पुनः सुनना चाहते हैं॥ ४४–४६ ॥
भवत्प्रसादादमले परस्मिन् परमेश्वरे।<br>अस्माकं जायते भक्तिस्त्वय्येवाव्यभिचारिणी॥ ४५ ॥
इदानीं श्रोतुमिच्छामो माहात्म्यं तव शंकर।<br>भूयोऽपि तव यन्नित्यं याथात्म्यं परमेष्ठिनः॥ ४६ ॥
स तेषां वाक्यमाकर्ण्य योगिनां योगसिद्धिदः।<br>प्राह गम्भीरया वाचा समालोक्य च माधवम्॥ ४७ ॥योगसिद्धियोंको प्रदान करनेवाले उन्होंने (महेश्वरने) उन योगियोंका वचन सुनकर तथा विष्णुकी ओर देखकर गम्भीर वाणीमें कहा— ॥ ४७ ॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्‌साहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे (ईश्वरगीतासु) पञ्चमोऽध्यायः॥ ५॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें (ईश्वरगीताका) पाँचवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ५॥


छठा अध्याय

ईश्वर (शंकर)-द्वारा ऋषिगणोंको अपना सर्वव्यापी स्वरूप बतलाना तथा अपनी भगवत्ताका और इस ज्ञानसे मुक्तिकी प्राप्तिका निरूपण करना

ईश्वर उवाच<br>शृणुध्वमृषयः सर्वे यथावत् परमेष्ठिनः।<br>वक्ष्यामीशस्य माहात्म्यं यत्तद्वेदविदो विदुः॥ १॥ईश्वरने कहा—हे ऋषिगणो! आप सभी सुनें। मैं परमेष्ठी ईशके उस माहात्म्यका यथावत् वर्णन कर रहा हूँ, जिसे वेदज्ञ लोग जानते हैं॥ १॥
सर्वलोकैकनिर्माता सर्वलोकैकरक्षिता।<br>सर्वलोकैकसंहर्ता सर्वात्माहं सनातनः॥ २॥मैं सनातन सर्वात्मा सभी लोकोंका एकमात्र निर्माण करनेवाला, सभी लोकोंका एक अद्वितीय रक्षक और सभी लोकोंका एकमात्र संहार करनेवाला हूँ। सभी वस्तुओंका अन्तर्यामी पिता मैं ही हूँ। मध्य तथा अन्त सब कुछ मुझमें स्थित है, किंतु मैं सर्वत्र स्थित नहीं हूँ अर्थात् मेरी कोई सीमा नहीं है॥ २-३॥
सर्वेषामेव वस्तूनामन्तर्यामी पिता ह्यहम्।<br>मध्ये चान्तः स्थितं सर्वं नाहं सर्वत्र संस्थितः॥ ३॥
भवद्द्भिरद्भुतं दृष्टं यत्स्वरूपं तु मामकम्।<br>ममैषा ह्युपमा विप्रा मायया दर्शिता मया॥ ४॥विप्रो! आप लोगोंने मेरे जिस अद्भुत रूपको देखा है, वह केवल मेरी उपमा (प्रतीक) है, जिसे मैंने (अपनी) मायाद्वारा दिखलाया। मैं सभी पदार्थोंके भीतर स्थित (व्यास) रहते हुए सम्पूर्ण जगत्‌को प्रेरित करता हूँ। यह मेरी क्रियाशक्ति है। यह विश्व जिसके द्वारा चेष्टा करता है और जिसके स्वभावका अनुसरण करता है, कालरूप वही मैं सम्पूर्ण कलात्मक (अपने अंशरूप) जगत्‌को प्रेरित करता हूँ॥ ४–६॥
सर्वेषामेव भावानामान्तरा समवस्थितः।<br>प्रेरयामि जगत् कृत्स्नं क्रियाशक्तिरियं मम॥ ५॥
ययेदं चेष्टते विश्वं तत्स्वभावानुवर्ति च।<br>सोऽहं कालो जगत् कृत्स्नं प्रेरयामि कलात्मकम्॥ ६॥
  • अध्याय ६ * | २७५ ---|---

| एकांशेन जगत् कृत्स्नं करोमि मुनिपुंगवाः।<br>संहराम्येकरूपेण द्विधावस्था ममैव तु॥ ७ ॥<br><br>आदिमध्यान्तनिर्मुक्तो मायातत्त्वप्रवर्तकः।<br>क्षोभयामि च सर्गादौ प्रधानपुरुषावुभौ॥ ८ ॥<br><br>ताभ्यां संजायते विश्वं संयुक्ताभ्यां परस्परम्।<br>महदादिक्रमेणैव मम तेजो विजृम्भते॥ ९ ॥<br><br>यो हि सर्वजगत्साक्षी कालचक्रप्रवर्तकः।<br>हिरण्यगर्भो मार्तण्डः सोऽपि मद्देहसम्भवः॥ १० ॥<br><br>तस्मै दिव्यं स्वमैश्वर्यं ज्ञानयोगं सनातनम्।<br>दत्तवानात्मजान् वेदान् कल्पादौ चतुरो द्विजाः॥ ११ ॥<br><br>स मन्नियोगतो देवो ब्रह्मा मद्भावभावितः।<br>दिव्यं तन्मामकैश्वर्यं सर्वदा वहति स्वयम्॥ १२ ॥<br><br>स सर्वलोकनिर्माता मन्नियोगेन सर्ववित्।<br>भूत्वा चतुर्मुखः सर्गं सृजत्येवात्मसम्भवः॥ १३ ॥<br><br>योऽपि नारायणोऽनन्तो लोकानां प्रभवाव्ययः।<br>ममैव परमा मूर्तिः करोति परिपालनम्॥ १४ ॥<br><br>योऽन्तकः सर्वभूतानां रुद्रः कालात्मकः प्रभुः।<br>मदाज्ञयासौ सततं संहरिष्यति मे तनुः॥ १५ ॥<br><br>हव्यं वहति देवानां कव्यं कव्याशिनामपि।<br>पाकं च कुरुते वह्निः सोऽपि मच्छक्तिचोदितः॥ १६ ॥<br><br>भुक्तमाहारजातं च पचते तदहर्निशम्।<br>वैश्वानरोऽग्निर्भगवानीश्वरस्य नियोगतः॥ १७ ॥<br><br>योऽपि सर्वाम्भसां योनिर्वरुणो देवपुंगवः।<br>सोऽपि संजीवयेत् कृत्स्नमीशस्यैव नियोगतः॥ १८ ॥<br><br>योऽन्तस्तिष्ठति भूतानां बहिर्देवः प्रभञ्जनः।<br>मदाज्ञयासौ भूतानां शरीराणि बिभर्ति हि॥ १९ ॥<br><br>योऽपि संजीवनो नृणां देवानाममृताकरः।<br>सोमः स मन्नियोगेन चोदितः किल वर्तते॥ २० ॥ | मुनिश्रेष्ठो! मैं एक अंशसे सम्पूर्ण संसारकी रचना करता हूँ और दूसरे रूप (अंश)-से संहार करता हूँ—इस प्रकारकी ये दोनों अवस्थाएँ मेरी ही हैं। आदि, मध्य और अन्तरहित माया-तत्त्वका प्रवर्तन करनेवाला मैं सृष्टिके आरम्भमें प्रधान तथा पुरुष—दोनोंको क्षुब्ध (प्रेरित) करता हूँ। उन दोनोंके परस्पर संयोगसे विश्व उत्पन्न होता है। महत्-तत्त्वादिके क्रमसे मेरा ही तेज विस्तारको प्राप्त होता है। जो सारे संसारके साक्षी और कालचक्रको चलानेवाले हिरण्यगर्भ मार्तण्ड (सूर्य) हैं, वे भी मेरे ही शरीरसे उत्पन्न हुए हैं॥ ७-१०॥<br><br>द्विजो! कल्पके आदिमें मैंने ही उन्हें अपना दिव्य, ऐश्वर्यमय सनातन ज्ञानयोग और अपनेसे उत्पन्न चारों वेद प्रदान किये। वे मेरे भावसे भावित देव ब्रह्मा मेरे आदेशसे मेरे उस दिव्य ऐश्वर्यको स्वयं सदा वहन करते हैं। सभी लोकोंका निर्माण करनेवाले और सब कुछ जाननेवाले आत्मसम्भव (मुझसे ही उत्पन्न) वे (ब्रह्मा) मेरे निर्देशसे चार मुखवाले होकर सृष्टिकी रचना करते हैं। जो लोकोंको उत्पन्न करनेवाले अव्यय अनन्त नारायण हैं और जगत्का परिपालन करते हैं, वे भी मेरी ही परम मूर्ति हैं॥ ११-१४॥<br><br>सभी प्राणियोंका संहार करनेवाले जो प्रभु कालात्मक रुद्र हैं, वे मेरी ही आज्ञासे निरन्तर संहार करते रहते हैं, वे भी मेरी मूर्ति हैं॥ १५॥<br><br>जो देवताओंको हव्य (हवनीय द्रव्य) पहुँचाते हैं और कव्य ग्रहण करनेवाले पितरोंको कव्य पहुँचाते हैं तथा जो पाकमें (सब कुछ पचा लेनेमें) समर्थ हैं, वे अग्निदेव भी मेरी ही शक्तिसे प्रेरित होकर यह सब करते हैं। ईश्वर (शंकर)-के निर्देशसे ही भगवान् वैश्वानर अग्नि रात-दिन ग्रहण किये गये आहारको पचाते रहते हैं॥ १६-१७॥<br><br>सम्पूर्ण जलके मूल कारण जो देवश्रेष्ठ वरुण हैं, वे भी ईश्वरके ही निर्देशसे सम्पूर्ण विश्वको जीवन (जल) प्रदान करते हैं, जो प्राणियोंके भीतर और बाहर वर्तमान रहनेवाले वायुदेव हैं, वे भी मेरी आज्ञासे प्राणियोंके शरीरोंको धारण करते हैं। मनुष्योंको जीवित रखनेवाले जो देवताओंके अमृतके निधान सोमदेव (चन्द्रमा) हैं, वे भी मेरे ही निर्देशसे प्रेरित होकर कार्य करते हैं॥ १८—२०॥ |

२७६ * कूर्मपुराण *


यः स्वभासा जगत् कृत्स्नं प्रकाशयति सर्वदा।
सूर्यो वृष्टिं वितनुते शास्त्रेणैव स्वयम्भुवः॥ २१॥

योऽप्यशेषजगच्छास्ता शक्रः सर्वामरेश्वरः।
यज्वनां फलदो देवो वर्ततेऽसौ मदाज्ञया॥ २२॥

यः प्रशास्ता ह्यसाधूनां वर्तते नियमादिह।
यमो वैवस्वतो देवो देवदेवनियोगतः॥ २३॥

योऽपि सर्वधनाध्यक्षो धनानां सम्प्रदायकः।
सोऽपीश्वरनियोगेन कुबेरो वर्तते सदा॥ २४॥

यः सर्वरक्षसां नाथस्तामसानां फलप्रदः।
मन्नियोगादसौ देवो वर्तते निर्ऋतिः सदा॥ २५॥

वेतालगणभूतानां स्वामी भोगफलप्रदः।
ईशानः किल भक्तानां सोऽपि तिष्ठन्ममाज्ञया॥ २६॥

यो वामदेवोऽङ्गिरसः शिष्यो रुद्रगणाग्रणीः।
रक्षको योगिनां नित्यं वर्ततेऽसौ मदाज्ञया॥ २७॥

यश्च सर्वजगत्पूज्यो वर्तते विघ्नकारकः।
विनायको धर्मनेता सोऽपि मद्वचनात् किल॥ २८॥

योऽपि ब्रह्मविदां श्रेष्ठो देवसेनापतिः प्रभुः।
स्कन्दोऽसौ वर्तते नित्यं स्वयम्भूविधिचोदितः॥ २९॥

ये च प्रजानां पतयो मरीच्याद्या महर्षयः।
सृजन्ति विविधं लोकं परस्यैव नियोगतः॥ ३०॥

या च श्रीः सर्वभूतानां ददाति विपुलां श्रियम्।
पत्नी नारायणस्यासौ वर्तते मदनुग्रहात्॥ ३१॥

वाचं ददाति विपुलां या च देवी सरस्वती।
सापीश्वरनियोगेन चोदिता सम्प्रवर्तते॥ ३२॥

याशेषपुरुषान् घोरान्निरकात् तारयिष्यति।
सावित्री संस्मृता देवी देवाज्ञानुविधायिनी॥ ३३॥

पार्वती परमा देवी ब्रह्मविद्याप्रदायिनी।
यापि ध्याता विशेषेण सापि मद्वचनानुगा॥ ३४॥

योऽनन्तमहिमानन्तः शेषोऽशेषामरप्रभुः।
दधाति शिरसा लोकं सोऽपि देवनियोगतः॥ ३५॥


जो अपने प्रकाशसे सम्पूर्ण संसारको सदा प्रकाशित करते हैं, वे सूर्यदेव भी स्वयम्भू (ईश्वर)-की आज्ञासे वृष्टिका विस्तार करते हैं। जो सारे संसारके शासक, सभी देवताओंके ईश्वर तथा यज्ञ करनेवालोंको फल प्रदान करनेवाले इन्द्रदेव हैं, वे भी मेरी आज्ञासे प्रवृत्त होते हैं। जो दुष्टोंके शासक हैं और नियमके अनुसार व्यवहार करनेवाले विवस्वान्‌के पुत्र यमदेव हैं, वे भी देवाधिदेव (शंकर)-के निर्देशसे व्यवहार करते हैं। जो सभी प्रकारके सम्पत्तियोंके स्वामी और धन प्रदान करनेवाले कुबेर हैं, वे भी ईश्वरके नियोगसे ही सदा प्रवृत्त होते हैं। जो सभी राक्षसोंके स्वामी हैं तथा तमोगुणियोंको (अपने कर्मका) फल प्रदान करनेवाले हैं, वे निर्ऋतिदेव मेरे ही निर्देशसे सदा प्रवर्तित होते हैं॥ २१–२५॥

जो बेतालगणों और भूतोंके स्वामी और भक्तोंको भोगरूपी फल प्रदान करनेवाले ईशानदेव हैं, वे भी मेरी आज्ञामें स्थित रहते हैं। जो अङ्गिराके शिष्य, रुद्रदेवके गणोंमें अग्रगण्य और योगियोंके रक्षक हैं, वे वामदेव भी मेरी ही आज्ञाद्वारा नित्य व्यवहार करते हैं। जो सम्पूर्ण संसारके पूज्य, विघ्नकारक धर्मनेता विनायक हैं, वे भी मेरे आदेशसे चलते हैं। जो ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ, देवोंके सेनापति स्वयम्भू प्रभु स्कन्द हैं, वे भी नित्य विधिकी प्रेरणासे प्रेरित होते हैं। जो प्रजाओंके पति मरीचि आदि महर्षि हैं, वे भी परात्पर (परमेश्वर)-की आज्ञासे ही विविध लोकोंकी सृष्टि करते हैं॥ २६–३०॥

जो सभी प्राणियोंकी श्री (शोभा) हैं और विपुल ऐश्वर्य प्रदान करती हैं, वे नारायणकी पत्नी (लक्ष्मी) मेरे ही अनुग्रहसे व्यवहार करती हैं। जो सरस्वतीदेवी विपुल वाणी प्रदान करती हैं, वे भी ईश्वरके नियोगसे प्रेरित होकर प्रवर्तित होती हैं। जो सभी पुरुषोंको घोर नरकोंसे तारनेवाली सावित्रीदेवी कही गयी हैं, वे भी देवकी आज्ञाके अनुसार चलनेवाली हैं। ध्यान करनेपर ब्रह्मविद्याको प्रदान करनेवाली जो श्रेष्ठ पार्वती-देवी हैं, वे भी विशेषरूपसे मेरे ही वचनोंका पालन करती हैं॥ ३१–३४॥

अनन्त महिमावाले और सभी देवताओंके स्वामी जो अनन्त शेष हैं, वे भी देव (शंकर)-के निर्देशसे ही संसारको सिरपर धारण करते हैं॥ ३५॥

* अध्याय ६ * २७७

योऽग्निः संवर्तको नित्यं वडवारूपसंस्थितः।<br>पिबत्यखिलमम्भोधीमीश्वरस्य नियोगतः॥ ३६॥<br>ये चतुर्दश लोकेऽस्मिन् मनवः प्रथितौजसः।<br>पालयन्ति प्रजाः सर्वास्तेऽपि तस्य नियोगतः॥ ३७॥<br>आदित्या वसवो रुद्रा मरुतश्च तथाश्विनौ।<br>अन्याश्च देवताः सर्वा मच्छास्त्रेणैव धिष्ठिताः॥ ३८॥<br>गन्धर्वा गरुडा ऋक्षाः सिद्धाः साध्याश्च चारणाः।<br>यक्षरक्षःपिशाचाश्च स्थिताः शास्त्रे स्वयम्भुवः॥ ३९॥<br>कलाकाष्ठानिमेषाश्च मुहूर्ता दिवसाः क्षपाः।<br>ऋतवः पक्षमासाश्च स्थिताः शास्त्रे प्रजापतेः॥ ४०॥जो संवर्तक अग्नि नित्य वडवाके रूपमें स्थित हैं, वे भी ईश्वरकी आज्ञासे ही सम्पूर्ण समुद्रको पीते रहते हैं। इस संसारमें अत्यन्त तेजस्वी जो चौदह मनु हैं, वे सभी मुझ (ईश्वर)–के आदेशसे सभी प्रजाओंका पालन करते हैं। आदित्य, वसुगण, रुद्र, मरुद्गण, अश्विनीकुमार तथा अन्य सभी देवता मेरी ही आज्ञामें प्रतिष्ठित हैं। गन्धर्व, गरुड, ऋक्ष, सिद्ध, साध्य, चारण, यक्ष, राक्षस तथा पिशाच—ये सभी स्वयम्भूकी आज्ञामें ही स्थित हैं। कला, काष्ठा, निमेष, मुहूर्त, दिन, रात, ऋतुएँ, पक्ष तथा मास—ये मुझ प्रजापति (शिव)–के शासनमें स्थित हैं॥ ३६—४०॥
युगमन्वन्तराण्येव मम तिष्ठन्ति शासने।<br>पराश्चैव परार्धाश्च कालभेदास्तथा परे॥ ४१॥<br>चतुर्विधानि भूतानि स्थावराणि चराणि च।<br>नियोगादेव वर्तन्ते देवस्य परमात्मनः॥ ४२॥<br>पातालानि च सर्वाणि भुवनानि च शासनात्।<br>ब्रह्माण्डानि च वर्तन्ते सर्वाण्येव स्वयम्भुवः॥ ४३॥<br>अतीतान्यप्यसंख्यानि ब्रह्माण्डानि ममाज्ञया।<br>प्रवृत्तानि पदार्थौघैः सहितानि समन्ततः॥ ४४॥<br>ब्रह्माण्डानि भविष्यन्ति सह वस्तुभिरात्मगैः।<br>वहिष्यन्ति सदैवाज्ञां परस्य परमात्मनः॥ ४५॥<br>भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।<br>भूतादिरादिप्रकृतिर्नियोगे मम वर्तते॥ ४६॥युग, मन्वन्तर, पर तथा परार्ध—ये सभी तथा अन्य कालके सभी भेद मेरे ही शासनमें स्थित रहते हैं। (स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज तथा जरायुज—ये) चार प्रकारके प्राणी और स्थावर–जंगमात्मक जगत् मुझ परमात्मा देवके निर्देशसे ही प्रवर्तित होते हैं। सभी पाताल और भुवन, सभी ब्रह्माण्ड स्वयम्भू परमेश्वरकी आज्ञासे प्रवर्तित हैं। बीते हुए भी जो पदार्थोंके समूहोंसहित असंख्य ब्रह्माण्ड थे, वे मेरी ही आज्ञासे सर्वत्र प्रवृत्त थे। आगे भी जो ब्रह्माण्ड होंगे, वे भी सदैव परात्पर परमात्माकी आज्ञाका आत्मगत (अपने अधीन) वस्तुओंके^१ द्वारा पालन करेंगे। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि, भूतादि^२ (तामस अहंकार) और आदि प्रकृति—ये सभी मेरी आज्ञासे कार्य करते हैं॥ ४१—४६॥
याशेषजगतो योनिर्मोहिनी सर्वदेहिनाम्।<br>माया विवर्तते नित्यं सापीश्वरनियोगतः॥ ४७॥<br>यो वै देहभृतां देवः पुरुषः पठ्यते परः।<br>आत्मासौ वर्तते नित्यमीश्वरस्य नियोगतः॥ ४८॥जो सम्पूर्ण संसारकी योनि और सभी देहधारियोंको मोहित करनेवाली माया है, वह भी ईश्वरके निर्देशसे ही नित्य (विभिन्न रूपोंमें) विवर्तित होती रहती है। जो देहधारियोंके आत्मस्वरूप परात्पर पुरुष देव कहे जाते हैं, वे भी नित्य ईश्वरके नियोगसे ही कार्य करते हैं॥ ४७-४८॥
विधूय मोहकलिलं यया पश्यति तत् पदम्।<br>सापि विद्या महेशस्य नियोगवशवर्तिनी॥ ४९॥<br>बहुनात्र किमुक्तेन मम शक्त्यात्मकं जगत्।<br>मयैव प्रेर्यते कृत्स्नं मय्येव प्रलयं व्रजेत्॥ ५०॥जिसके द्वारा मोहरूपी कल्मषको धोकर उस परमपदका दर्शन होता है, वह विद्या भी महेशकी आज्ञाके वशमें रहनेवाली है। इस विषयमें और अधिक क्या कहा जाय, यह संसार मेरी ही शक्तिसे शक्तिमान् है। मेरे द्वारा ही सम्पूर्ण (जगत्) प्रेरित किया जाता है और मुझमें ही उसका लय भी हो जाता है॥ ४९-५०॥

१-अपने अधीन जो भी सामग्री होगी, उसमें पूर्ण समर्पणभावसे आज्ञापालन करना यहाँ अभिप्रेत है।
२-तामस अहंकारकी भूतादि संज्ञा सांख्यशास्त्रमें प्रसिद्ध है—‘भूतादेस्तन्मात्र........’। (सांख्यकारिका २५)

२७८ * कूर्मपुराण *

अहं हि भगवानीशः स्वयं ज्योतिः सनातनः ।<br>परमात्मा परं ब्रह्म मत्तो ह्यन्यन्न विद्यते ॥ ५१ ॥मैं ही भगवान्, ईश, स्वयं प्रकाश, सनातन और परमात्मा परम ब्रह्म हूँ, मुझसे अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है॥ ५१ ॥
इत्येतत् परमं ज्ञानं युष्माकं कथितं मया।<br>ज्ञात्वा विमुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात् ॥ ५२ ॥इस प्रकार यह परम ज्ञान मैंने आप लोगोंसे कहा, इसे जान लेनेसे प्राणी जन्म तथा संसारके बन्धनसे मुक्त हो जाता है॥ ५२ ॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे (ईश्वरगीतासु) षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥ इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें (ईश्वरगीताका) छठा अध्याय समाप्त हुआ॥ ६॥


सातवाँ अध्याय

ईश्वर (शंकर)-द्वारा अपनी विभूतियोंका वर्णन तथा प्रकृति, महत् आदि चौबीस तत्त्वों, तीन गुणों एवं पशु, पाश और पशुपति आदिका विवेचन

ईश्वर उवाचईश्वर बोले—
शृणुध्वमृषयः सर्वे प्रभावं परमेष्ठिनः ।<br>यं ज्ञात्वा पुरुषो मुक्तो न संसारे पतेत् पुनः ॥ १ ॥ऋषियो! आप सभी परमेष्ठीके प्रभावको सुनें, जिसे जानकर पुरुष मुक्त हो जाता है और फिर संसारमें नहीं गिरता ॥ १ ॥
परात् परतरं ब्रह्म शाश्वतं निष्कलं ध्रुवम्।<br>नित्यानन्दं निर्विकल्पं तद्धाम परमं मम॥ २ ॥<br>अहं ब्रह्मविदां ब्रह्मा स्वयम्भूविश्वतोमुखः ।<br>मायाविनामहं देवः पुराणो हरिरव्ययः ॥ ३ ॥<br>योगिनामस्म्यहं शम्भुः स्त्रीणां देवी गिरीन्द्रजा।<br>आदित्यानामहं विष्णुर्वसूनामस्मि पावकः ॥ ४ ॥<br>रुद्राणां शंकरश्चाहं गरुडः पततामहम् ।<br>ऐरावतो गजेन्द्राणां रामः शस्त्रभृतामहम् ॥ ५ ॥जो परसे परतर, शाश्वत, निष्कल, ध्रुव, नित्यानन्द, निर्विकल्प ब्रह्म है, वह मेरा परम धाम है। मैं ब्रह्मज्ञानियोंमें सर्वतोमुख स्वयम्भू ब्रह्मा हूँ। मायावियोंमें मैं अव्यय पुराण देव हरि हूँ। योगियोंमें मैं शम्भु और स्त्रियोंमें गिरिराज पुत्री पार्वती हूँ। मैं (द्वादश) आदित्योंमें विष्णु तथा (अष्ट) वसुओंमें पावक हूँ। मैं रुद्रोंमें शंकर, उड़नेवाले पक्षियोंमें गरुड, गजेन्द्रोंमें ऐरावत तथा शस्त्रधारियोंमें परशुराम हूँ॥ २-५॥
ऋषीणां च वसिष्ठोऽहं देवानां च शतक्रतुः ।<br>शिल्पिनां विश्वकर्माहं प्रह्लादोऽस्म्यमरद्विषाम् ॥ ६ ॥<br>मुनीनामप्यहं व्यासो गणानां च विनायकः ।<br>वीराणां वीरभद्रोऽहं सिद्धानां कपिलो मुनिः ॥ ७ ॥<br>पर्वतानामहं मेरुर्नक्षत्राणां च चन्द्रमाः ।<br>वज्रं प्रहरणानां च व्रतानां सत्यमस्म्यहम् ॥ ८ ॥<br>अनन्तो भोगिनां देवः सेनानीनां च पावकः ।<br>आश्रमाणां च गार्हस्थ्यमीश्वराणां महेश्वरः ॥ ९ ॥<br>महाकल्पश्च कल्पानां युगानां कृतमस्म्यहम् ।<br>कुबेरः सर्वयक्षाणां गणेशानां च वीरकः ॥ १० ॥ऋषियोंमें मैं वसिष्ठ, देवताओंमें इन्द्र, शिल्पियोंमें विश्वकर्मा और सुरद्वेषी राक्षसोंमें प्रह्लाद हूँ। मैं मुनियोंमें व्यास, गणोंमें विनायक, वीरोंमें वीरभद्र और सिद्धोंमें कपिल मुनि हूँ। मैं पर्वतोंमें सुमेरु, नक्षत्रोंमें चन्द्रमा, प्रहार करनेवाले शस्त्रोंमें वज्र और व्रतोंमें सत्य व्रत हूँ। मैं सर्पोंमें अनन्तदेव, सेनानियोंमें कार्तिकेय, आश्रमोंमें गृहस्थाश्रम और ईश्वरोंमें महेश्वर हूँ। मैं कल्पोंमें महाकल्प, युगोंमें सत्ययुग, सभी यक्षोंमें कुबेर और गणेश्वरोंमें वीरक हूँ॥ ६-१०॥
प्रजापतीनां दक्षोऽहं निर्ऋतिः सर्वरक्षसाम् ।<br>वायुर्बलवतामस्मि द्वीपानां पुष्करोऽस्म्यहम् ॥ ११ ॥मैं प्रजापतियोंमें दक्ष, सभी राक्षसोंमें निर्ऋति, बलवानोंमें वायु और द्वीपोंमें पुष्कर द्वीप हूँ॥ ११॥
  • अध्याय ७ * २७१

| मृगेन्द्राणां च सिंहोऽहं यन्त्राणां धनुरेव च।<br>वेदानां सामवेदोऽहं यजुषां शतरुद्रियम्॥ १२॥<br>सावित्री सर्वजप्यानां गुह्यानां प्रणवोऽस्म्यहम्।<br>सूक्तानां पौरुषं सूक्तं ज्येष्ठसाम च सामसु॥ १३॥<br>सर्ववेदार्थविदुषां मनुः स्वायम्भुवोऽस्म्यहम्।<br>ब्रह्मावर्तस्तु देशानां क्षेत्राणामविमुक्तकम्॥ १४॥<br>विद्यानामात्मविद्याहं ज्ञानानामैश्वरं परम्।<br>भूतानामस्म्यहं व्योम सत्त्वानां मृत्युरेव च॥ १५॥<br>पाशानामस्म्यहं माया कालः कलयतामहम्।<br>गतीनां मुक्तिरेवाहं परेषां परमेश्वरः॥ १६॥<br>यच्चान्यदपि लोकेऽस्मिन् सत्त्वं तेजोबलाधिकम्।<br>तत्सर्वं प्रतिजानीध्वं मम तेजोविजृम्भितम्॥ १७॥<br>आत्मानः पशवः प्रोक्ताः सर्वे संसारवर्तिनः।<br>तेषां पतिरहं देवः स्मृतः पशुपतिर्बुधैः॥ १८॥<br>मायापाशेन बध्नामि पशूनेतान् स्वलीलया।<br>मामेव मोचकं प्राहुः पशूनां वेदवादिनः॥ १९॥<br>मायापाशेन बद्धानां मोचकोऽन्यो न विद्यते।<br>मामृते परमात्मानं भूताधिपतिमव्ययम्॥ २०॥<br>चतुर्विंशतितत्त्वानि माया कर्म गुणा इति।<br>एते पाशाः पशुपतेः क्लेशाश्च पशुबन्धनाः॥ २१॥<br>मनो बुद्धिरहंकारः खानिलाग्निजलानि भूः।<br>एता प्रकृतयस्त्वष्टौ विकाराश्च तथापरे॥ २२॥<br>श्रोत्रं त्वक् चक्षुषी जिह्वा घ्राणं चैव तु पञ्चमम्।<br>पायूपस्थं करौ पादौ वाक् चैव दशमी मता॥ २३॥<br>शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धस्तथैव च।<br>त्रयोविंशतिरेतानि तत्त्वानि प्राकृतानि तु॥ २४॥<br>चतुर्विंशकमव्यक्तं प्रधानं गुणलक्षणम्।<br>अनादिमध्यनिधनं कारणं जगतः परम्॥ २५॥<br>सत्त्वं रजस्तमश्चेति गुणत्रयमुदाहृतम्।<br>साम्यावस्थितिमेतेषामव्यक्तं प्रकृतिं विदुः॥ २६॥ | मैं मृगेन्द्रोंमें सिंह, यन्त्रोंमें धनुष, वेदोंमें सामवेद और यजुर्मन्त्रोंमें शतरुद्रिय हूँ, मैं जपनीय सभी मन्त्रोंमें सावित्री मन्त्र, गोपनीयोंमें प्रणव, (वैदिक) सूक्तोंमें पुरुषसूक्त, साममन्त्रोंमें ज्येष्ठसाम हूँ। मैं सभी वेदके अर्थको जाननेवाले विद्वानोंमें स्वायम्भुव मनु, देशोंमें ब्रह्मावर्त और क्षेत्रोंमें अविमुक्त (वाराणसी) क्षेत्र हूँ। मैं विद्याओंमें आत्मविद्या, ज्ञानोंमें परम ईश्वरीय ज्ञान, (पञ्च) भूतोंमें आकाश और सत्त्वोंमें मृत्यु¹ हूँ॥ १२–१५॥<br>मैं (बन्धनकारक) पाशोंमें माया, संहार करनेवालोंमें काल, गतियोंमें मुक्ति और उत्कृष्टोंमें परमेश्वर हूँ। इस संसारमें अन्य जो कुछ भी अधिक तेज और बलसे सम्पन्न सत्त्व पदार्थ हैं, उन सबको मेरे ही तेजसे सम्पन्न जानना चाहिये। संसारमें रहनेवाले सभी जीवोंको पशु² कहा गया है, मैं देव उनका पति (स्वामी) हूँ, इसलिये विद्वानोंद्वारा 'पशुपति' कहा जाता हूँ। मैं मायारूपी पाशके द्वारा अपनी लीलासे इन पशुओं (जीवों)-को बन्धनमें डालता हूँ। वेदज्ञ लोग मुझे ही पशुओंको मुक्त करनेवाला मोचक कहते हैं। मायाके पाशसे आबद्ध जीवोंको मुक्त करनेवाला मुझ भूतोंके अधिपति अव्यय परमात्माको छोड़कर अन्य कोई नहीं है॥ १६–२०॥<br>(प्रकृति-महत्-अहंकार आदि) चौबीस तत्त्व, माया, कर्म तथा गुण—ये पशुपतिके पाश और पशुओं (जीवों)-को बन्धनमें डालनेवाले क्लेश हैं। मन, बुद्धि, अहंकार, पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—ये आठ प्रकृति हैं और दूसरे सभी पदार्थ विकार या विकृति हैं। कान, त्वचा, नेत्र, जीभ तथा पाँचवीं नासिका, गुदा, जननेन्द्रिय, हाथ, पैर तथा दसवीं इन्द्रिय वाणी और शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध—ये तेईस तत्त्व प्राकृत अर्थात् प्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाले हैं॥ २१–२४॥<br>चौबीसवाँ तत्त्व अव्यक्त किंवा प्रधान है, वह गुणोंसे लक्षित होनेवाला आदि, मध्य तथा अन्तसे रहित और जगत्‌का परम कारण है। सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण कहे गये हैं। इन तीनों गुणोंकी साम्यावस्थाको अव्यक्त प्रकृति जानना चाहिये॥ २५–२६॥ |


१-यहाँ मृत्युसे यमराज या धर्मराजको समझना चाहिये, जो प्राणीमात्रकी अन्तिम गतिके कारण एवं निर्णायक हैं।
२-अज्ञानसे आवृत होनेके कारण जीव पशु हैं।

२८० * कूर्मपुराण *


सत्त्वं ज्ञानं तमोऽज्ञानं रजो मिश्रमुदाहृतम्।
गुणानां बुद्धिवैषम्याद् वैषम्यं कवयो विदुः॥ २७॥

सत्त्वगुणको ज्ञानस्वरूप, तमोगुणको अज्ञानस्वरूप और रजोगुणको मिश्ररूप अर्थात् ज्ञान और अज्ञान दोनोंका मिश्रित रूप कहा गया है। बुद्धिकी विषमतासे गुणोंका भी वैषम्य होता है, ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं॥ २७॥

धर्माधर्माविति प्रोक्तौ पाशौ द्वौ बन्धसंज्ञितौ।
मय्यर्पितानि कर्माणि निबन्धाय विमुक्तये॥ २८॥

अविद्यामस्मितां रागं द्वेषं चाभिनिवेशकम्।
क्लेशाख्यानचलान् प्राहुः पाशानात्मनिबन्धनान्॥ २९॥

एतेषामेव पाशानां माया कारणमुच्यते।
मूलप्रकृतिरव्यक्ता सा शक्तिर्मयि तिष्ठति॥ ३०॥

बन्ध नामवाले दो पाशोंको धर्म और अधर्म कहा गया है। मुझे अर्पित किये गये कर्म बन्धनसे मुक्तिके लिये होते हैं। आत्माका बन्धन करनेवाले अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष तथा अभिनिवेश—इन क्लेश नामवाले पाँच अचल (दीर्घकालतक स्थायी-सा रहनेवाले) तत्त्वोंको पाश कहा गया है। मायाको इन (गाँठों) पाशोंका कारण कहा जाता है। अव्यक्त मूलप्रकृतिरूप शक्ति मुझमें प्रतिष्ठित रहती है॥ २८—३०॥

स एव मूलप्रकृतिः प्रधानं पुरुषोऽपि च।
विकारा महदादीनि देवदेवः सनातनः॥ ३१॥
स एव बन्धः स च बन्धकर्ता
स एव पाशः पशवः स एव।
स वेद सर्वं न च तस्य वेत्ता
तमाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम्॥ ३२॥

यह मूल प्रकृति, प्रधान, पुरुष, महत्, अहंकार आदि विकारयुक्त तत्त्व—ये सब देवाधिदेव सनातनके ही रूप हैं। यही (सनातन पुरुष) बन्धन है, यही बन्धनमें डालनेवाला है। यही पाश और यही पशु है। यही सब कुछ जानता है, परंतु इसे जाननेवाला कोई नहीं है। इसे ही आदि पुराणपुरुष कहा जाता है*॥ ३१-३२॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे (ईश्वरगीतासु) सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें (ईश्वरगीताका) सातवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ७॥


आठवाँ अध्याय

महेश्वरका अद्वितीय परमेश्वरके रूपमें निरूपण, सांख्य-सिद्धान्तसे तत्त्वोंका सृष्टिक्रम, महेश्वरके छः अङ्ग, महेश्वरके स्वरूपके ज्ञानसे परमपदकी प्राप्ति

ईश्वर उवाच
अन्यद् गुह्यतमं ज्ञानं वक्ष्ये ब्राह्मणपुंगवाः।
येनासौ तरते जन्तुर्घोरं संसारसागरम्॥ १॥

ईश्वर बोले— श्रेष्ठ ब्राह्मणो! मैं दूसरे गुह्यतम ज्ञानको बताता हूँ, जिससे यह प्राणी घोर संसार-सागरको पार कर लेता है॥ १॥

अहं ब्रह्ममयः शान्तः शाश्वतो निर्मलोऽव्ययः।
एकाकी भगवानुक्तः केवलः परमेश्वरः॥ २॥

मम योनिर्महद् ब्रह्म तत्र गर्भं दधाम्यहम्।
मूलं मायाभिधानं तु ततो जातमिदं जगत्॥ ३॥

प्रधानं पुरुषो ह्यात्मा महान् भूतादिरेव च।
तन्मात्राणि महाभूतानीन्द्रियाणि च जज्ञिरे॥ ४॥

मैं ब्रह्ममय, शान्त, शाश्वत, निर्मल, अव्यय, एकाकी, अद्वितीय परमेश्वर तथा भगवान् कहलाता हूँ। महद्ब्रह्म मेरी योनिरूप है, मैं उसमें मूल माया नामक गर्भ धारण करता हूँ और उससे यह संसार उत्पन्न हुआ है। (उसीसे) प्रधान, पुरुष, आत्मा, महत्तत्त्व, भूतादि (तामस अहंकार), तन्मात्राएँ, पञ्चमहाभूत तथा इन्द्रियाँ उत्पन्न हुईं॥ २—४॥


* यहाँ बन्धन आदिको सनातनपुरुषमें कल्पितमात्र बताकर अद्वैतभावकी प्रतिष्ठा की गयी है।

* अध्याय ८ *

२८१

ततोऽण्डमभवद्धैमं सूर्यकोटिसमप्रभम्।<br>तस्मिन् जज्ञे महाब्रह्मा मच्छक्त्या चोपबृंहितः॥ ५ ॥तदनन्तर करोड़ों सूर्यके समान प्रकाशमान हिरण्मय अण्ड उत्पन्न हुआ। उस अण्डमें मेरी शक्तिसे उपबृंहित महाब्रह्मा उत्पन्न हुए। अन्य भी जो बहुतसे प्राणी हैं, वे सभी मेरे ही स्वरूप हैं। मेरी मायासे मोहित होनेके कारण वे पितामह-स्वरूपको नहीं देख पाते। सभी योनियोंमें जो मूर्तियाँ उत्पन्न होती हैं, उनकी योनि परा माया है और मुझे ही पितृस्वरूप विद्वान् लोग जानते हैं। इस प्रकार जो मुझे ही बीजरूप पितृस्वरूप प्रभु जानता है, वह सभी लोकोंमें धीर होता है और मोहको प्राप्त नहीं होता॥ ५-८॥
ये चान्ये बहवो जीवा मन्मयाः सर्व एव ते।<br>न मां पश्यन्ति पितरं मायया मम मोहिताः॥ ६ ॥
याश्च योनिषु सर्वासु सम्भवन्ति हि मूर्तयः।<br>तासां माया परा योनिर्मामेव पितरं विदुः॥ ७ ॥
यो मामेवं विजानाति बीजिनं पितरं प्रभुम्।<br>स धीरः सर्वलोकेषु न मोहमधिगच्छति॥ ८ ॥
ईशानः सर्वविद्यानां भूतानां परमेश्वरः।<br>ओङ्कारमूर्तिर्भगवानहं ब्रह्मा प्रजापतिः॥ ९ ॥मैं ही सभी विद्याओंका स्वामी, प्राणियोंका परम ईश्वर, ओङ्कारमूर्ति, प्रजापति भगवान् ब्रह्मा हूँ। जो पुरुष विनष्ट होनेवाले सभी (चराचर) भूतोंमें परमेश्वरको नाशरहित और समभावसे देखता है, वही यथार्थ देखता है। जो पुरुष सबमें समभावसे स्थित परमेश्वरको समानरूपसे देखता है, वह स्वयंद्वारा स्वयंको नष्ट नहीं करता; इस कारण वह परम गति प्राप्त करता है। सात सूक्ष्म तत्त्वों एवं छः अङ्गोंवाले महेश्वरको जानकर प्रधान तथा विनियोगको जाननेवाला परम ब्रह्मको प्राप्त करता है॥ ९-१२॥
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।<br>विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥ १० ॥
समं पश्यन् हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्।<br>न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्॥ ११ ॥
विदित्वा सप्त सूक्ष्माणि षडङ्गं च महेश्वरम्।<br>प्रधानविनियोगज्ञः परं ब्रह्माधिगच्छति॥ १२ ॥
सर्वज्ञता तृप्तिरनादिबोधः<br>स्वतन्त्रता नित्यमलुप्तशक्तिः।<br>अनन्तशक्तिश्च विभोर्विदित्वा<br>षडाहुरङ्गानि महेश्वरस्य॥ १३॥सर्वज्ञता, तृप्ति, अनादि ज्ञान, स्वतन्त्रता, नित्य अलुप्त-शक्ति तथा अनन्तशक्ति—ये विभु महेश्वरके छः अङ्ग कहे गये हैं। पाँच तन्मात्राएँ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध), मन और आत्मा—ये सात सूक्ष्म तत्त्व कहे गये हैं। जो हेतुरूप प्रकृति है, वह प्रधान है और उससे होनेवाले बन्धनको ही विनियोग कहा जाता है। प्रकृतिमें लीन रहनेवाली जो शक्ति है, उसे वेदोंमें ब्रह्मयोनि और कारणरूप कहा गया है। अद्वितीय, परमेष्ठी, परात्पर, सत्यरूप महेश्वर उसके पुरुष हैं॥ १३-१५॥
तन्मात्राणि मन आत्मा च तानि<br>सूक्ष्माण्याहुः सप्त तत्त्वात्मकानि।<br>या सा हेतुः प्रकृतेः सा प्रधानं<br>बन्धः प्रोक्तो विनियोगोऽपि तेन॥ १४॥
या सा शक्तिः प्रकृतौ लीनरूपा<br>वेदेषूक्ता कारणं ब्रह्मयोनिः।<br>तस्या एकः परमेष्ठी परस्ता-<br>न्महेश्वरः पुरुषः सत्यरूपः॥ १५॥
ब्रह्मा योगी परमात्मा महीयान्<br>व्योमव्यापी वेदवेद्यः पुराणः।<br>एको रुद्रो मृत्युरव्यक्तमेकं<br>बीजं विश्वं देव एकः स एव॥ १६॥वे ही अद्वितीय देव ब्रह्मा, योगी, परमात्मा, महीयान्, व्योमव्यापी, वेदोंद्वारा ज्ञात होने योग्य, पुराण, पुरुष अद्वितीय रुद्र, मृत्यु, अव्यक्त, एक बीज और विश्वरूप हैं॥ १६॥

२८२ * कूर्मपुराण *


तमेवैकं प्राहुरन्येऽप्यनेकं
त्वेकात्मानं केचिदन्यत्तथाहुः।
अणोरणीयान् महतोऽसौ महीयान्
महादेवः प्रोच्यते वेदविद्भिः॥ १७॥
एवं हि यो वेद गुहाशयं परं
प्रभुं पुराणं पुरुषं विश्वरूपम्।
हिरण्मयं बुद्धिमतां परां गतिं
स बुद्धिमान् बुद्धिमतीत्य तिष्ठति॥ १८॥

उन्हें ही कोई एक और कोई अनेक कहते हैं। दूसरे कुछ लोग उन्हें ही अद्वितीय आत्मा कहते हैं। वेदज्ञ लोग उन्हें अणुसे अणुतर और महान्‌से भी महत्तर महादेव कहते हैं। हृदयरूप गुहामें स्थित, परात्पर, पुराणपुरुष, विश्वरूप, हिरण्मय और बुद्धिमानोंकी परमगति प्रभुको जो इस प्रकार जानता है, वह बुद्धिमान् पुरुष बुद्धिको पार कर जाता है अर्थात् परमपद प्राप्त करता है॥ १७-१८॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे (ईश्वरगीतासु) अष्टमोऽध्यायः॥ ८॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिभागमें (ईश्वरगीताका) आठवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ८॥


नवाँ अध्याय

महादेवके विश्वरूपत्वका वर्णन तथा ईश्वर-सम्बन्धी ज्ञानका प्रतिपादन

ऋषय ऊचुः
निष्कलो निर्मलो नित्यो निष्क्रियः परमेश्वरः।
तन्नो वद महादेव विश्वरूपः कथं भवान्॥ १॥

**ऋषियोंने पूछा—**महादेव! आप परमेश्वर निष्कल, निर्मल, नित्य तथा निष्क्रिय होनेपर भी विश्वरूप कैसे हैं, इसे हम लोगोंको बतलायें॥ १॥

ईश्वर उवाच
नाहं विश्वो न विश्वं च मामृते विद्यते द्विजाः।
मायानिमित्तमत्रास्ति सा चात्मानमपाश्रिता॥ २॥

अनादिनिधना शक्तिर्मायाव्यक्तसमाश्रया।
तन्निमित्तः प्रपञ्चोऽयमव्यक्तादभवत् खलु॥ ३॥

अव्यक्तं कारणं प्राहुरानन्दं ज्योतिरक्षरम्।
अहमेव परं ब्रह्म मत्तो ह्यन्यन्न विद्यते॥ ४॥

तस्मान्मे विश्वरूपत्वं निश्चितं ब्रह्मवादिभिः।
एकत्वे च पृथक्त्वे च प्रोक्तमेतन्निदर्शनम्॥ ५॥

अहं तत् परं ब्रह्म परमात्मा सनातनः।
अकारणं द्विजाः प्रोक्तो न दोषो ह्यात्मनस्तथा॥ ६॥

**ईश्वर बोले—**द्विजो! मैं विश्व नहीं हूँ और मुझसे अतिरिक्त विश्व भी नहीं है। यह सब मायाके निमित्तसे है और वह माया भी आत्माको आश्रित कर रहती है। आदि और अन्तसे रहित शक्तिरूप माया अव्यक्त (परमात्मा)-के आश्रित है, उसी (माया)-के कारण अव्यक्तसे यह प्रपञ्चरूप संसार उत्पन्न हुआ है। (मुझ) अव्यक्तको कारण कहा जाता है। मैं ही आनन्दस्वरूप, प्रकाशरूप, अक्षर परम ब्रह्म हूँ। मुझसे अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। इसी कारण ब्रह्मवादियोंने मेरा विश्वरूपत्व निश्चित किया है। एक रूप तथा भिन्नरूपके विषयमें इस उदाहरणका* वर्णन किया गया है। द्विजो! मैं कारणरहित, सनातन, परम ब्रह्म परमात्मा हूँ, अतः मुझमें कोई दोष नहीं है। तात्पर्य यह है कि जगत्‌में विषमता, क्रूरता आदि दोषोंका असाधारण कारण मनुष्यकृत कर्म है, ईश्वर नहीं। ईश्वर तो सामान्य कारण है, अतः वह दोषरहित है॥ २-६॥


* विवर्त विश्वकी दृष्टिसे महादेव अनेक रूप हैं तथा परमार्थतः एक होनेसे एक रूप हैं।

  • अध्याय ९ * २४३
अनन्ता शक्तयोऽव्यक्ते मायाद्याः संस्थिता ध्रुवाः।<br>तस्मिन् दिवि स्थितं नित्यमव्यक्तं भाति केवलम्॥ ७ ॥<br><br>याभिस्तल्लक्ष्यते भिन्नमभिन्नं तु स्वभावतः।<br>एकया मम सायुज्यमनादिनिधनं ध्रुवम्॥ ८ ॥<br><br>पुंसोऽभूदन्यया भूतिरन्यया तत्तिरोहितम्।<br>अनादिमध्यं तिष्ठन्तं युज्यतेऽविद्यया किल॥ ९ ॥<br><br>तदेतत् परं व्यक्तं प्रभामण्डलमण्डितम्।<br>तदक्षरं परं ज्योतिस्तद् विष्णोः परमं पदम्॥ १०॥<br><br>तत्र सर्वमिदं प्रोतमोतं चैवाखिलं जगत्।<br>तदेव च जगत् कृत्स्नं तद् विज्ञाय विमुच्यते॥ ११॥<br>यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह।<br>आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् बिभेति न कुतश्चन॥ १२॥<br>वेदाहमेतं पुरुषं महान्त-<br>मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्।<br>तद् विज्ञाय परिमुच्येत विद्वान्<br>नित्यानन्दी भवति ब्रह्मभूतः॥ १३॥<br>यस्मात् परं नापरमस्ति किञ्चित्<br>यज्ज्योतिषां ज्योतिरेकं दिविस्थम्।<br>तदेवात्मानं मन्यमानोऽथ विद्वा-<br>नात्मानन्दी भवति ब्रह्मभूतः॥ १४॥<br>तदव्ययं कलिलं गूढदेहं<br>ब्रह्मानन्दममृतं विश्वधाम।<br>वदन्त्येवं ब्राह्मणा ब्रह्मनिष्ठा<br>यत्र गत्वा न निवर्तन्त भूयः॥ १५॥<br>हिरण्मये परमाकाशतत्त्वे<br>यदर्चिषि प्रभातीव तेजः।<br>तद्विज्ञाने परिपश्यन्ति धीरा<br>विभ्राजमानं विमलं व्योम धाम॥ १६॥<br><br>ततः परं परिपश्यन्ति धीरा<br>आत्मन्यात्मानमनुभूयानुभूय ।<br>स्वयम्प्रभः परमेष्ठी महीयान्<br>ब्रह्मानन्दी भगवानीश एषः॥ १७॥अव्यक्तमें ही माया आदि अनन्त ध्रुव शक्तियाँ प्रतिष्ठित हैं और वह अव्यक्त अकेले ही विशुद्ध शब्दतन्मात्रारूप आकाशतत्त्वमें स्थित रहते हुए सदा प्रकाशित रहता है। स्वभावतः वह अभिन्न (अव्यक्त) तत्त्व जिनके द्वारा अनेक रूपोंमें प्रतिभासित होता है, उनकी मूल एक (परम) शक्तिसे आदि और अन्तरहित मेरा ध्रुव सायुज्य प्राप्त होता है। पुरुषकी दूसरी शक्तिसे भूति (ऐश्वर्य)-की उत्पत्ति तथा अन्य शक्तिसे उसका (भूतिका) लोप होता है। आदि एवं मध्यरहित सर्वत्र विद्यमान (पुरुष) ही अविद्यासे (स्वेच्छाया) युक्त होता है। प्रभामण्डलसे मण्डित वह परम व्यक्त, अक्षर, परम ज्योतिरूप है और वह विष्णुका परमपद है। उसमें ही यह सारा जगत् ओतप्रोत है। वही सम्पूर्ण जगत् है। उसे जान लेनेसे मुक्ति प्राप्त हो जाती है॥ ७-११॥<br><br>मनके साथ वाणी जिसे न पाकर लौट आती है, उस आनन्दस्वरूप ब्रह्माको जाननेवाला कहीं भयभीत नहीं होता। मैं इस तमोगुणसे परे आदित्यके समान वर्णवाले अर्थात् प्रकाशयुक्त महान् पुरुषको जानता हूँ, इसे जानकर विद्वान् मुक्त हो जाता है और नित्य आनन्दस्वरूप तथा ब्रह्ममय हो जाता है॥ १२-१३॥<br><br>जिससे परे और भिन्न कुछ भी नहीं है और जो द्युलोकमें स्थित सभी ज्योतियोंका एकमात्र प्रकाशक है, उसीको आत्मा माननेवाला विद्वान् नित्य आनन्द-स्वरूप ब्रह्ममय हो जाता है। ब्रह्मनिष्ठ ब्राह्मण उसे अविनाशी, कलिल, गूढदेह, ब्रह्मानन्द, अमृत तथा विश्वधाम कहते हैं। वहाँ पहुँचनेपर फिर लौटना नहीं पड़ता॥ १४-१५॥<br><br>हिरण्मय प्रकाशयुक्त परम आकाशतत्त्वमें जो तेजके समान प्रतिभासित होता है, धीर जन (आत्मस्थ) विज्ञानमें उस प्रकाशमान निर्मल व्योम (ब्रह्म) एवं धाम (परम प्राप्तव्य)-का दर्शन करते हैं। तदनन्तर अपने आत्मामें आत्माका बार-बार अनुभव करके धीर पुरुष परम तत्त्वका दर्शन करते हैं और उन्हें यह ज्ञान होता है—यही (आत्मतत्त्व) स्वयं प्रकाशमान, परमेष्ठी, महान् ब्रह्मानन्दस्वरूप भगवान् ईशके रूपमें है॥ १६-१७॥

२८४ * कूर्मपुराण *


एको देवः सर्वभूतेषु गूढः<br>सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।<br>तमेवैकं येऽनुपश्यन्ति धीरा-<br>स्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥ १८ ॥सभी प्राणियोंके अन्तरात्मा, सर्वव्यापी एक देव ही सभी प्राणियोंमें छिपे हुए हैं। जो धीर पुरुष उन एक अद्वितीयका दर्शन करते हैं, उन्हें ही शाश्वत शान्ति प्राप्त होती है, दूसरोंको नहीं। वे भगवान् सभी ओर मुख, सिर तथा ग्रीवावाले, सभी प्राणियोंके (हृदयरूपी) गुहामें स्थित और सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले हैं। उनसे भिन्न कुछ नहीं है॥ १८-१९॥
सर्वाननशिरोग्रीवः सर्वभूतगुहाशयः।<br>सर्वव्यापी च भगवान् न तस्मादन्यदिष्यते ॥ १९ ॥
इत्येतदैश्वरं ज्ञानमुक्तं वो मुनिपुंगवाः।<br>गोपनीयं विशेषेण योगिनामपि दुर्लभम् ॥ २० ॥मुनिश्रेष्ठो! इस प्रकार यह आपको ईश्वर-सम्बन्धी ज्ञान बतलाया। यह विशेषरूपसे गोपनीय है और योगियोंके लिये भी दुर्लभ है॥ २०॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे (ईश्वरगीतासु) नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें (ईश्वरगीताका) नवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ९ ॥


दसवाँ अध्याय

ईश्वरद्वारा परम तत्त्व तथा परम ज्ञानके स्वरूपका निरूपण और उसकी प्राप्तिके साधनका वर्णन

ईश्वर उवाचईश्वरने कहा—
अलिङ्गमेकमव्यक्तं लिङ्गं ब्रह्मेति निश्चितम्।<br>स्वयंज्योतिः परं तत्त्वं परे व्योम्नि व्यवस्थितम् ॥ १ ॥अलिङ्ग (चिह्नरहित), अद्वितीय, अव्यक्त, लिङ्गको ब्रह्म कहा गया है। वह स्वयं प्रकाशरूप परम तत्त्व परम व्योममें अवस्थित है। जो निर्गुण, विशुद्ध विज्ञानरूप, अक्षर और अव्यक्त कारण-रूप है, उस परमपदका विद्वान् लोग साक्षात्कार करते हैं। जिसे वेदमें तल्लिङ्ग अर्थात् हेतुरूप कहा गया है, उस परम ब्रह्मका शान्तसंकल्पवाले, तत्परायण और नित्य उनके भावसे भावित लोग साक्षात्कार करते हैं॥ १–३॥
अव्यक्तं कारणं यत्तदक्षरं परमं पदम्।<br>निर्गुणं शुद्धविज्ञानं तद् वै पश्यन्ति सूरयः ॥ २ ॥
तन्निष्ठाः शान्तसंकल्पा नित्यं तद्भावभाविताः।<br>पश्यन्ति तत् परं ब्रह्म यत्तल्लिङ्गमिति श्रुतिः ॥ ३ ॥
अन्यथा नहि मां द्रष्टुं शक्यं वै मुनिपुंगवाः।<br>नहि तद् विद्यते ज्ञानं यतस्तज्ज्ञायते परम् ॥ ४ ॥मुनिश्रेष्ठो! अन्य किसी प्रकार मेरा दर्शन नहीं हो सकता। ऐसा कोई भी ज्ञान नहीं है, जिससे उस परम तत्त्वको जाना जा सके। इस परम ज्ञानको केवल विद्वान् ही जानते हैं। इसके अतिरिक्त सभी कुछ अज्ञानस्वरूप है, जिससे यह मायामय जगत् (उत्पन्न) है॥ ४-५॥
एतत्त्परमं ज्ञानं केवलं कवयो विदुः।<br>अज्ञानमितरत् सर्वं यस्मान्मायामयं जगत् ॥ ५ ॥
यज्ज्ञानं निर्मलं सूक्ष्मं निर्विकल्पं यदव्ययम्।<br>ममात्मासौ तदेवेदमिति प्राहुर्विपश्चितः ॥ ६ ॥जो निर्मल, सूक्ष्म, निर्विकल्प तथा अव्यय ज्ञान है, वही मेरा आत्मरूप है—ऐसा विद्वानोंका कहना है। जो उसे (उस परम तत्त्वको) अनेक रूपसे देखते हैं, वे भी परम निष्ठा (भक्ति)-का आश्रय ग्रहणकर अद्वितीय अविनाशी तत्त्वका ज्ञान प्राप्तकर उसी परम तत्त्वको देखते हैं ॥ ६-७ ॥
येऽप्यनेकं प्रपश्यन्ति तेऽपि पश्यन्ति तत्परम्।<br>आश्रिताः परमां निष्ठां बुद्ध्वैकं तत्त्वमव्ययम् ॥ ७ ॥
* अध्याय १० *२८५
ये पुनः परमं तत्त्वमेकं वानेकमिश्वरम्।<br>भक्त्या मां सम्प्रपश्यन्ति विज्ञेयास्ते तदात्मकाः ॥ ८ ॥और जो दूसरे लोग पुनः एक या अनेक रूपोंमें परम तत्त्वरूप ईश्वरका भक्तिद्वारा साक्षात्कार करते हैं, उन्हें तदात्मक अर्थात् उस ब्रह्मका स्वरूप ही जानना चाहिये ॥ ८ ॥
साक्षादेव प्रपश्यन्ति स्वात्मानं परमेश्वरम्।<br>नित्यानन्दं निर्विकल्पं सत्यरूपमिति स्थितिः ॥ ९ ॥वे वस्तुतः नित्यानन्दस्वरूप, निर्विकल्प तथा सत्यस्वरूप साक्षात् परमेश्वरको अपनी आत्मामें देखते हैं यह वस्तुस्थिति है। अपने अव्यक्त परम आत्मामें अवस्थित शान्त (योगीजन), श्रेष्ठ परम तत्त्वके परमानन्दस्वरूप, सर्वव्यापी तदात्मक तत्त्वकी उपासना करते हैं। यही परम मुक्ति है, विद्वान् इसे मेरा उत्तम सायुज्य (नामक मोक्ष), निर्वाण ब्रह्मके साथ ऐक्य और कैवल्यरूपसे जानते हैं। ये परम शिव आदि, मध्य और अन्तसे रहित अद्वितीय तत्त्व हैं। ये ही महादेव हैं, ईश्वर हैं, इसलिये इन्हें जाननेसे मुक्ति मिल जाती है ॥ ९—१२ ॥
भजन्ते परमानन्दं सर्वगं यत्तदात्मकम्।<br>स्वात्मन्यवस्थिताः शान्ताः परेऽव्यक्ते परस्य तु ॥ १० ॥
एषा विमुक्तिः परमा मम सायुज्यमुत्तमम्।<br>निर्वाणं ब्रह्मणा चैक्यं कैवल्यं कवयो विदुः ॥ ११ ॥
तस्मादनादिमध्यान्तं वस्त्वेकं परमं शिवम्।<br>स ईश्वरो महादेवस्तं विज्ञाय विमुच्यते ॥ १२ ॥
न तत्र सूर्यः प्रविभातीह चन्द्रो<br>न नक्षत्राणि तपनो नोत विद्युत्।<br>तद्भासेदमखिलं भाति नित्यं<br>तन्नित्यभासमचलं सद्दिभाति ॥ १३ ॥वहाँ (परम तत्त्व परमेश्वरमें) न सूर्य प्रकाशित होता है, न चन्द्रमा, न नक्षत्र, न अग्नि और न ही विद्युत्। उसीके प्रकाशसे सम्पूर्ण (विश्व) प्रकाशित होता है। वह नित्य प्रकाश अचल एवं सद्रूपसे प्रकाशित होता है। जो परम बृहत् विशुद्ध तत्त्व निर्विकल्प ज्ञानस्वरूप और नित्य उदित हुआ ज्ञानसे ही प्रकाशित होता है, उसीमें ब्रह्मज्ञानी लोग जिस नित्य अचल तत्त्वका दर्शन करते हैं, वही ईश हैं ॥ १३–१४ ॥
नित्योदितं संविदा निर्विकल्पं<br>शुद्धं बृहन्तं परमं यदिभाति।<br>अत्रान्तरं ब्रह्मविदोऽथ नित्यं<br>पश्यन्ति तत्त्वमचलं यत् स ईशः ॥ १४ ॥
नित्यानन्दममृतं सत्यरूपं<br>शुद्धं वदन्ति पुरुषं सर्ववेदाः।<br>तमोमिति प्रणवेनेशितारं<br>ध्यायन्ति वेदार्थविनिश्चितार्थाः ॥ १५ ॥सभी वेद पुरुषको नित्य आनन्दरूप, अमृतरूप और विशुद्ध सत्यस्वरूप कहते हैं। वेदार्थका निश्चय किये हुए लोग 'ॐ' इस प्रणवके द्वारा उस नियामकका ध्यान करते हैं। परम आकाशके मध्यमें एकमात्र अद्वितीय देव शिव ही प्रकाशित होते हैं; वहाँ न भूमि है, न जल है, न मन है और न अग्नि ही है। इसी प्रकार प्राण, वायु, आकाश, बुद्धि तथा अन्य कोई चेतन-तत्त्व वहाँ नहीं है ॥ १५-१६ ॥
न भूमिरापो न मनो न वह्निः<br>प्राणोऽनिलो गगनं नोत बुद्धिः।<br>न चेतनोऽन्यत् परमाकाशमध्ये<br>विभाति देवः शिव एव केवलः ॥ १६ ॥
इत्येतदुक्तं परमं रहस्यं<br>ज्ञानामृतं सर्ववेदेषु गूढम्।<br>जानाति योगी विजनेऽथ देशे<br>युञ्जीत योगं प्रयतो ह्यजस्रम् ॥ १७ ॥यह मैंने सभी वेदोंमें निहित परम रहस्यमय ज्ञानरूपी अमृतका वर्णन किया। किसी निर्जन प्रदेशमें निरन्तर प्रयत्नपूर्वक साधना करनेवाला योगी ही इस ज्ञानको जानता है ॥ १७ ॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे (ईश्वरगीतासु) दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥

इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें (ईश्वरगीताका) दसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १० ॥

२८६ * कूर्मपुराण *


ग्यारहवाँ अध्याय

योगकी महिमा, अष्टाङ्गयोग, यम, नियम आदि योगसाधनोंका लक्षण, प्राणायामका विशेष प्रतिपादन, ध्यानके विविध प्रकार, पाशुपत-योगका वर्णन, वाराणसीमें प्राणत्यागकी महिमा, शिव-आराधनकी विधि, शिव और विष्णुके अभेदका प्रतिपादन, शिवज्ञान-योगकी परम्पराका वर्णन, ईश्वरगीताकी फलश्रुति तथा उपसंहार

ईश्वर उवाच**ईश्वरने कहा—**इसके अनन्तर उस परम दुर्लभ योगको कहता हूँ, जिससे सूर्यके समान ईश्वररूप आत्माका दर्शन होता है अर्थात् सूर्यका जैसे प्रत्यक्ष हो रहा है, वैसे ही ईश्वरका प्रत्यक्ष होता है॥ १ ॥
अतः परं प्रवक्ष्यामि योगं परमदुर्लभम्।<br>येनात्मानं प्रपश्यन्ति भानुमन्तमिवेश्वरम्॥ १ ॥<br>योगाग्निर्दहति क्षिप्रमशेषं पापपञ्जरम्।<br>प्रसन्नं जायते ज्ञानं साक्षान्निर्वाणसिद्धिदम्॥ २ ॥<br><br>योगात् संजायते ज्ञानं ज्ञानाद् योगः प्रवर्तते।<br>योगज्ञानाभियुक्तस्य प्रसीदति महेश्वरः॥ ३ ॥<br><br>एककालं द्विकालं वा त्रिकालं नित्यमेव वा।<br>ये युञ्जन्तीह मद्योगं ते विज्ञेया महेश्वराः॥ ४ ॥योगरूपी अग्नि शीघ्र ही सम्पूर्ण पापपञ्जरको भस्म कर देता है और (उसके बाद) साक्षात् मुक्तिरूप सिद्धि प्रदान करनेवाला प्रसन्न (निर्मल) ज्ञान उत्पन्न हो जाता है। योगसे ज्ञान उत्पन्न होता है और ज्ञानसे योग प्रवर्तित होता है। योग तथा ज्ञानसे सम्पन्न व्यक्तिपर महेश्वर प्रसन्न होते हैं। जो नित्य एक समय, दो समय या तीनों समय मेरे योगका साधन करते हैं, उन्हें महेश्वर समझना चाहिये॥ २—४॥
योगस्तु द्विविधो ज्ञेयो ह्यभावः प्रथमो मतः।<br>अपरस्तु महायोगः सर्वयोगोत्तमोत्तमः॥ ५ ॥<br><br>शून्यं सर्वनिर्भासं स्वरूपं यत्र चिन्त्यते।<br>अभावयोगः स प्रोक्तो येनात्मानं प्रपश्यति॥ ६ ॥<br><br>यत्र पश्यति चात्मानं नित्यानन्दं निरञ्जनम्।<br>मयैक्यं स महायोगो भाषितः परमेश्वरः॥ ७ ॥योग दो प्रकारका समझना चाहिये, पहला अभावयोग है और दूसरा सभी योगोंमें उत्तमोत्तम महायोग कहलाता है। जिसमें सभी आभासोंसे रहित शून्यमय (निर्विकल्पक) स्वरूपका चिन्तन होता है और जिसके द्वारा आत्माका साक्षात्कार होता है, वह अभावयोग कहा गया है। जिसमें नित्यानन्दस्वरूप निरञ्जन आत्माका दर्शन होता है और मेरे साथ एकता होती है, वह परमेश्वररूप महायोग कहा गया है॥ ५—७॥
ये चान्ये योगिनां योगाः श्रूयन्ते ग्रन्थविस्तरे।<br>सर्वे ते ब्रह्मयोगस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ ८ ॥<br><br>यत्र साक्षात् प्रपश्यन्ति विमुक्ता विश्वमीश्वरम्।<br>सर्वेषामेव योगानां स योगः परमो मतः॥ ९ ॥<br><br>सहस्रशोऽथ शतशो ये चेश्वरबहिष्कृताः।<br>न ते पश्यन्ति मामेकं योगिनो यतमानसाः॥ १० ॥अन्य जिन योगियोंके योगोंका ग्रन्थोंमें विस्तार हुआ है, वे सभी ब्रह्मयोगकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हैं। जिस योगमें मुक्त पुरुष विश्वको साक्षात् ईश्वरके रूपमें देखते हैं, वह सभी योगोंमें श्रेष्ठ योग माना जाता है। जो सैकड़ों, हजारों अन्य प्रकारके मनको संयमित करनेवाले ईश्वरबहिष्कृत (वेदबाह्य) योगी हैं, वे मुझ अद्वितीयका दर्शन नहीं करते॥ ८—१०॥
  • अध्याय ११ * | २८७ ---|---

प्राणायामस्तथा ध्यानं प्रत्याहारोऽथ धारणा ।<br>समाधिश्च मुनिश्रेष्ठा यमो नियम आसनम् ॥ ११ ॥<br>मय्येकचित्ततायोगो वृत्त्यन्तरनिरोधतः ।<br>तत्साधनान्यष्टधा तु युष्माकं कथितानि तु ॥ १२ ॥<br>अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यापरिग्रहौ<br>यमाः संक्षेपतः प्रोक्ताश्चित्तशुद्धिप्रदा नृणाम् ॥ १३ ॥<br><br>कर्मणा मनसा वाचा सर्वभूतेषु सर्वदा ।<br>अक्लेशजननं प्रोक्तं त्वहिंसा परमर्षिभिः ॥ १४ ॥<br><br>अहिंसायाः परो धर्मो नास्त्यहिंसा परं सुखम् ।<br>विधिना या भवेद्धिंसा त्वहिंसैव प्रकीर्तिता ॥ १५ ॥<br><br>सत्येन सर्वमाप्नोति सत्ये सर्वं प्रतिष्ठितम् ।<br>यथार्थकथनाचारः सत्यं प्रोक्तं द्विजातिभिः ॥ १६ ॥<br><br>परद्रव्यापहरणं चौर्याद् वाथ बलेन वा ।<br>स्तेयं तस्यानाचरणादस्तैयं धर्मसाधनम् ॥ १७ ॥<br><br>कर्मणा मनसा वाचा सर्वावस्थासु सर्वदा ।<br>सर्वत्र मैथुनत्यागं ब्रह्मचर्यं प्रचक्षते ॥ १८ ॥<br>द्रव्याणामप्यनादानमापद्यपि यथेच्छया ।<br>अपरिग्रह इत्याहुस्तं प्रयत्नेन पालयेत् ॥ १९ ॥<br><br>तपःस्वाध्यायसंतोषाः शौचमीश्वरपूजनम् ।<br>समासान्नियमाः प्रोक्ता योगसिद्धिप्रदायिनः ॥ २० ॥<br><br>उपवासपराकादिकृच्छ्रचान्द्रायणादिभिः ।<br>शरीरशोषणं प्राहुस्तापसास्तप उत्तमम् ॥ २१ ॥<br>वेदान्तशतरुद्रीयप्रणवादिजपं बुधाः ।<br>सत्त्वशुद्धिकरं पुंसां स्वाध्यायं परिचक्षते ॥ २२ ॥<br><br>स्वाध्यायस्य त्रयो भेदा वाचिकोपांशुमानसाः ।<br>उत्तरोत्तरवैशिष्ट्यं प्राहुर्वेदार्थवेदिनः ॥ २३ ॥<br><br>यः शब्दबोधजननः परेषां शृण्वतां स्फुटम् ।<br>स्वाध्यायो वाचिकः प्रोक्त उपांशोरथ लक्षणम् ॥ २४ ॥ | मुनिश्रेष्ठो ! अन्य वृत्तियोंका निरोधकर मेरेमें एकचित्तता ही योग है और इस योगके जो आठ साधन मैंने आप लोगोंको बताये हैं वे ये हैं—प्राणायाम, ध्यान, प्रत्याहार, धारणा, समाधि, यम, नियम तथा आसन* ॥ ११-१२ ॥<br>अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह—संक्षेपमें इन्हें यम कहा गया है। ये मनुष्योंके चित्तकी शुद्धि करनेवाले हैं। मन, वाणी तथा कर्मसे सभी प्राणियोंको सर्वदा किसी भी प्रकारका क्लेश प्रदान न करना—इसे श्रेष्ठ ऋषियोंने अहिंसा कहा है। अहिंसासे श्रेष्ठ (कोई) धर्म नहीं है और अहिंसासे बढ़कर कोई सुख नहीं है। वेदविहित हिंसाको अहिंसा ही कहा गया है। सत्यके द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है, सत्यमें ही सब कुछ प्रतिष्ठित है। द्विजातियोंके द्वारा यथार्थ कथनके आचारको सत्य कहा गया है। चोरीसे अथवा बलपूर्वक दूसरेके द्रव्यका अपहरण करना स्तेय है, उसका (स्तेयका) आचरण न करना अस्तेय है, यह धर्मका साधन है। मन, वाणी तथा कर्मद्वारा सभी अवस्थाओंमें सर्वदा सर्वत्र मैथुनका त्याग करना ब्रह्मचर्य कहलाता है ॥ १३—१८ ॥<br>आपत्तिकालमें भी इच्छापूर्वक द्रव्योंका ग्रहण न करना 'अपरिग्रह' कहा गया है। प्रयत्नपूर्वक उस अपरिग्रहका पालन करना चाहिये। तप, स्वाध्याय, संतोष, शौच तथा ईश्वरका पूजन—संक्षेपमें नियम बतलाये गये हैं, ये योगसिद्धि प्रदान करनेवाले हैं। तपस्वियोंने पराक आदि उपवासों तथा कृच्छ्रचान्द्रायणादि (व्रतों)-के द्वारा शरीरके शोषणको उत्तम तप कहा है ॥ १९—२१ ॥<br>विद्वान् लोगोंने वेदान्तशास्त्र, शतरुद्रिय और प्रणव आदिके जपको पुरुषोंके लिये सत्त्वकी शुद्धि करनेवाला 'स्वाध्याय' कहा है। स्वाध्यायके तीन भेद हैं—वाचिक, उपांशु और मानस। वेदार्थ जाननेवालोंने इन तीनोंमें उत्तरोत्तरका वैशिष्ट्य कहा है अर्थात् वाचिक स्वाध्यायसे उपांशु स्वाध्याय श्रेष्ठ और उपांशु स्वाध्यायसे मानस स्वाध्याय श्रेष्ठ है। दूसरे सुननेवालेको स्पष्टरूपसे शब्दका ज्ञान उत्पन्न करानेवाला स्वाध्याय 'वाचिक' कहलाता है। (अर्थात् वह स्वाध्याय वाचिक है जो दूसरोंको स्पष्ट सुनायी पड़े।) अब उपांशुका लक्षण बतलाया जाता है ॥ २२—२४ ॥


* यद्यपि अष्टाङ्गयोगके साधन ऊपर निर्दिष्ट क्रमसे ही मूलमें वर्णित हैं, पर यह वर्णन छन्दकी दृष्टिसे है। वास्तवमें साधनोंका क्रम इस प्रकार है—यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान एवं समाधि।

२८८* कूर्मपुराण *

ओष्ठयोः स्पन्दमात्रेण परस्याशब्दबोधकः ।
उपांशुरेष निर्दिष्टः साहस्त्रो वाचिकाज्जपः ॥ २५ ॥

यत्पदाक्षरसङ्ग‌त्या परिस्पन्दनवर्जितम् ।
चिन्तनं सर्वशब्दानां मानसं तं जपं विदुः ॥ २६ ॥

यदृच्छालाभतो नित्यमलं पुंसो भवेदिति ।
या धीस्तामृषयः प्राहुः संतोषं सुखलक्षणम् ॥ २७ ॥

बाह्याभ्यन्तरं शौचं द्विधा प्रोक्तं द्विजोत्तमाः ।
मृज्जलाभ्यां स्मृतं बाह्यं मनःशुद्धिरथान्तरम् ॥ २८ ॥

स्तुतिस्मरणपूजाभिर्वाङ्मनःकायकर्मभिः ।
सुनिश्चला शिवे भक्तिरेतदीश्वरपूजनम् ॥ २९ ॥

यमाः सनियमाः प्रोक्ताः प्राणायामं निबोधत ।
प्राणः स्वदेहजो वायुरायामस्तन्निरोधनम् ॥ ३० ॥

उत्तमाधममध्यत्वात् त्रिधायं प्रतिपादितः ।
स एव द्विविधः प्रोक्तः सगर्भोऽगर्भ एव च ॥ ३१ ॥

मात्राद्वादशको मन्दश्चतुर्विंशतिमात्रिकः ।
मध्यमः प्राणसंरोधः षट्त्रिंशन्मात्रिकोत्तमः ॥ ३२ ॥

प्रस्वेदकम्पनोत्थानजनकत्वं यथाक्रमम् ।
मन्दमध्यममुख्यानामानन्दादुत्तमोत्तमः ॥ ३३ ॥

सगर्भमाहुः सजपमगर्भं विजपं बुधाः ।
एतद् वै योगिनामुक्तं प्राणायामस्य लक्षणम् ॥ ३४ ॥

सव्याहृतिं सप्रणवां गायत्रीं शिरसा सह ।
त्रिर्जपेदायतप्राणः प्राणायामः स उच्यते ॥ ३५ ॥

रेचकः पूरकश्चैव प्राणायामोऽथ कुम्भकः ।
प्रोच्यते सर्वशास्त्रेषु योगिभिर्यतमानसैः ॥ ३६ ॥

ओठोंमें केवल स्पन्दन होनेके कारण दूसरेको शब्दका बोध न करानेवाला स्वाध्याय 'उपांशु' कहा गया है। यह वाचिक जपसे हजार गुना श्रेष्ठ है। (अर्थात् वही स्वाध्याय उपांशु है जिसमें ओठोंमें मात्र स्पन्दन हो, शब्दोंका उच्चारण न हो।) स्पन्दनरहित अक्षर एवं उस पदकी संगतिके अनुसार सभी शब्दोंके चिन्तनको विद्वान् मानस जप कहते हैं (अर्थात् मानस जप (स्वाध्याय) वही है जिसमें स्वाध्यायके शब्दोंपर केवल मन केन्द्रित हो बाकी सर्वथा व्यापारशून्य हो)। पुरुषको जो यदृच्छापूर्वक मिल जाता है, उसे ही पर्याप्त समझने-वाली बुद्धिको ऋषिलोग नित्य सुख लक्षणवाला संतोष कहते हैं॥ २५-२७॥ <br><br> द्विजश्रेष्ठो! बाह्य और आभ्यन्तर-भेदसे शौच दो प्रकारका कहा गया है। मिट्टी और जलसे होनेवाला शौच बाह्य शौच और मनकी शुद्धि आभ्यन्तर शौच है। मन, वाणी तथा कर्मद्वारा स्तुति, स्मरण तथा पूजा करते हुए शिवमें अचल भक्ति रखना—यह ईश्वरका पूजन है। नियमोंके साथ यमोंको बतलाया गया, अब प्राणायामके विषयमें सुनो—अपनी देहसे उत्पन्न वायुको प्राण कहते हैं और उस वायुका निरोध करना आयाम है। उत्तम, मध्यम तथा अधमके भेदसे यह तीन प्रकारका कहा गया है। वही सगर्भ और अगर्भ-भेदसे दो प्रकारका है। द्वादश मात्रा (अर्थात् प्रणवका बारह बार जप करनेतक)-के कालको मन्द प्राणायाम, चौबीस मात्रा (-के प्राणनिरोध)-को मध्यम और छत्तीस मात्रातकके कालतक प्राणनिरोधको उत्तम प्राणायाम कहा जाता है॥ २८-३२॥ <br><br> मन्द, मध्यम तथा मुख्य अर्थात् उत्तम नामके प्राणायामोंमें क्रमसे प्रस्वेद (पसीना) कम्पन तथा उत्थान होता है। इनसे तत्त्व-प्राप्तिमें क्रमशः आनन्दातिशयकी अनुभूति होती है। विद्वान् जपयुक्त प्राणायामको सगर्भ और जप-रहितको अगर्भ कहते हैं। योगियोंके प्राणायामका यही लक्षण कहा गया है। प्राणधारणपूर्वक व्याहृति (भूः, भुवः स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम्), प्रणव और शीर्षमन्त्रसहित गायत्रीका तीन बार जप (सगर्भ) प्राणायाम कहा जाता है। मनको संयत करनेवाले योगियोंने सभी शास्त्रोंमें रेचक, पूरक और कुम्भक प्राणायामका वर्णन किया है॥ ३३-३६॥

अध्याय ११ २८९


रेचकोऽजस्रनिःश्वासात् पूरकस्तन्निरोधतः ।<br>साम्येन संस्थितिर्या सा कुम्भकः परिगीयते ॥ ३७॥वायुके सतत बाहर निकालनेको रेचक और उसके रोकनेको पूरक तथा बादकी सम अवस्थाकी जो स्थिति है, उसे कुम्भक कहा गया है। श्रेष्ठ मुनियो ! सज्जनोंने
इन्द्रियाणां विचरतां विषयेषु स्वभावतः ।<br>निग्रहः प्रोच्यते सद्भिः प्रत्याहारस्तु सत्तमाः ॥ ३८ ॥स्वभावतः विषयोंमें विचरण करनेवाली इन्द्रियोंके निग्रहको प्रत्याहार कहा है। हृदयकमल, नाभिदेश, मूर्धा तथा
हृत्पुण्डरीके नाभ्यां वा मूर्ध्नि पर्वतमस्तके ।<br>एवमादिषु देशेषु धारणा चित्तबन्धनम् ॥ ३९ ॥पर्वतशिखर आदि स्थानोंमें चित्तके बन्धनको धारणा कहा जाता है। किसी देश (स्थान)-विशेषका अवलम्बनकर
देशावस्थितिमालम्ब्य बुद्धेर्या वृत्तिसंततिः ।<br>वृत्त्यन्तरैरसंमृष्टा तद्ध्यानं सूरयो विदुः ॥ ४० ॥उसमें बुद्धिकी जो एकतान वृत्ति बनी रहती है और दूसरी वृत्तियोंसे कोई भी सम्बन्ध नहीं रहता है, उसे
एकाकारः समाधिः स्याद् देशालम्बनवर्जितः ।<br>प्रत्ययो ह्यर्थमात्रेण योगसाधनमुत्तमम् ॥ ४१ ॥विद्वानोंने ध्यान कहा है। किसी देश या अन्य आलम्बनसे रहित चित्तकी एकाकारता समाधि है। इसमें ध्येयमात्रका भान होता है। यह योगका उत्तम साधन है। बारह
धारणा द्वादशायामा ध्यानं द्वादश धारणाः ।<br>ध्यानं द्वादशकं यावत् समाधिरभिधीयते ॥ ४२ ॥प्राणायामपर्यन्त धारणा, बारह धारणापर्यन्त ध्यान और बारह ध्यानपर्यन्त समाधि कही जाती है ॥ ३७-४२ ॥
आसनं स्वस्तिकं प्रोक्तं पद्ममर्धासनं तथा ।<br>साधनानां च सर्वेषामेतत्साधनमुत्तमम् ॥ ४३ ॥स्वस्तिकासन, पद्मासन तथा अर्धासन-भेदसे आसन (तीन प्रकारका) कहा गया है। सभी साधनोंमें यह साधन उत्तम है। विप्रेन्द्रो ! अपने दोनों ऊरुओंके ऊपर
ऊर्वोरुपरि विप्रेन्द्राः कृत्वा पादतले उभे ।<br>समासीतात्मनः पद्ममेतदासनमुत्तमम् ॥ ४४ ॥दोनों पादतलोंको रखकर बैठनेको उत्तम पद्म नामक आसन कहा गया है। श्रेष्ठ मुनियो ! एक पैरको दूसरे
एकं पादमथैकस्मिन् विन्यस्योरुणि सत्तमाः ।<br>आसीतार्धासनमिदं योगसाधनमुत्तमम् ॥ ४५ ॥जाँघके ऊपर रखकर बैठनेको अर्धासन कहा जाता है। यह योगका उत्तम साधन है। दोनों पैरोंको जानुओं
उभे कृत्वा पादतले जानूर्वोरन्तरेण हि ।<br>समासीतात्मनः प्रोक्तमासनं स्वस्तिकं परम् ॥ ४६ ॥एवं ऊरुओंके भीतर करके बैठनेको श्रेष्ठ स्वस्तिक नामक आसन कहा जाता है ॥ ४३-४६ ॥
अदेशकाले योगस्य दर्शनं हि न विद्यते ।<br>अग्न्यभ्याशे जले वापि शुष्कपर्णचये तथा ॥ ४७ ॥विपरीत देश (स्थान) और विपरीत कालमें योगतत्त्वका दर्शन भी नहीं होता। अग्निके समीप, जलमें, सूखे पत्तोंके ढेरके मध्य, जन्तुओंसे भरे स्थानमें, श्मशानमें,
जन्तुव्याप्ते श्मशाने च जीर्णगोष्ठे चतुष्पथे ।<br>सशब्दे सभये वापि चैत्यवल्मीकसंचये ॥ ४८ ॥पुराने गोष्ठमें, चौराहेमें, कोलाहल और भययुक्त स्थानमें, चैत्यके समीप, दीमकोंसे पूर्ण स्थान, अशुभ
अशुभे दुर्जनाक्रान्ते मशकादिसमन्विते ।<br>नाचरेद् देहबाधे वा दौर्मनस्यादिसम्भवे ॥ ४९ ॥स्थान, दुर्जनोंसे व्याप्त और मच्छर आदिसे भरे स्थान तथा देह-सम्बन्धी कष्ट और मनकी अस्वस्थताकी दशामें योग-साधन नहीं करना चाहिये। अच्छी प्रकार
सुगुप्ते सुशुभे देशे गुहायां पर्वतस्य तु ।<br>नद्यास्तीरे पुण्यदेशे देवतायतने तथा ॥ ५० ॥रक्षित, शुभ स्थान, पर्वतकी गुफा, नदीके किनारे, पुण्यदेश, देवमन्दिर, घर, शुभ, रमणीय, जनशून्य,
गृहे वा सुशुभे रम्ये विजने जन्तुवर्जिते ।<br>युञ्जीत योगी सततमात्मानं मत्परायणः ॥ ५१ ॥जन्तुओंसे रहित स्थानोंमें योगीको सतत अपनेको मेरे परायण रखते हुए योग-साधना करनी चाहिये।
नमस्कृत्य तु योगीन्द्रान् सशिष्यांश्च विनायकम् ।<br>गुरुं चैवाथ मां योगी युञ्जीत सुसमाहितः ॥ ५२ ॥योगीको चाहिये कि वह शिष्योंसहित श्रेष्ठ योगियों, विनायक, गुरु तथा मुझे प्रणाम करके समाहित-मन होकर योग-साधना करे ॥ ४७-५२ ॥

२९० * कूर्मपुराण *


आसनं स्वस्तिकं बद्ध्वा पद्ममर्धमथापि वा।<br>नासिकाग्रे समां दृष्टिमीषदन्मीलितेक्षणः॥ ५३॥<br><br>कृत्वाथ निर्भयः शान्तस्त्यक्त्वा मायामयं जगत्।<br>स्वात्मन्यवस्थितं देवं चिन्तयेत् परमेश्वरम्॥ ५४॥स्वस्तिक, पद्म अथवा अर्धासन बाँधकर नासिकाके अग्रभागमें कुछ-कुछ खुली हुई आँखोंसे दृष्टिको स्थिर करके निर्भय तथा शान्त होकर मायामय संसार (-के चिन्तन)-का परित्यागकर अपने आत्मामें स्थित परमेश्वर देवका चिन्तन करना चाहिये॥ ५३-५४॥
शिखाग्रे द्वादशाङ्गुल्ये कल्पयित्वाथ पङ्कजम्।<br>धर्मकन्दसमुद्भूतं ज्ञाननालं सुशोभनम्॥ ५५॥<br><br>ऐश्वर्याष्टदलं श्वेतं परं वैराग्यकर्णिकम्।<br>चिन्तयेत् परमं कोशं कर्णिकायां हिरण्मयम्॥ ५६॥<br><br>सर्वशक्तिमयं साक्षाद् यं प्राहुर्दिव्यमव्ययम्।<br>ओंकारवाच्यमव्यक्तं रश्मिजालसमाकुलम्॥ ५७॥<br><br>चिन्तयेत् तत्र विमलं परं ज्योतिर्यदक्षरम्।<br>तस्मिन् ज्योतिषि विन्यस्य स्वात्मानं तदभेदतः॥ ५८॥<br><br>ध्यायीताकाशमध्यस्थमीशं परमकारणम्।<br>तदात्मा सर्वगो भूत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत्॥ ५९॥शिखाके अग्रभागमें बारह अंगुलके प्रदेशमें धर्मस्वरूप कन्दसे प्रादुर्भूत, ज्ञानरूप नालवाले, ऐश्वर्यरूप आठ दलोंवाले, वैराग्यरूपी कर्णिकासे युक्त अत्यन्त श्वेत एवं सुन्दर कमलकी कल्पना करे और उस कमलकी कर्णिकामें हिरण्मय श्रेष्ठ कोशका ध्यान करे। उस (कोश)-में विशुद्ध अविनाशी साक्षात् परम ज्योतिका ध्यान करे, जिसे सर्वशक्तिसम्पन्न, दिव्य, अव्यय, ओंकारसे वाच्य, अव्यक्त और प्रकाशकी किरण-मालाओंसे व्यास कहा गया है। उस ज्योतिमें अपने आत्माकी अभेदभावना कर आकाशके मध्यमें स्थित परम कारणस्वरूप परमेश्वरका ध्यान करे और परमेश्वररूप एवं सर्वव्यापी होकर किसी भी अन्य वस्तुका चिन्तन न करे॥ ५५-५९॥
एतद् गुह्यतमं ध्यानं ध्यानान्तरमथोच्यते।<br>चिन्तयित्वा तु पूर्वोक्तं हृदये पद्ममुत्तमम्॥ ६०॥<br><br>आत्मानमथ कर्तारं तत्रानलसमत्विषम्।<br>मध्ये वह्निशिखाकारं पुरुषं पञ्चविंशकम्॥ ६१॥<br><br>चिन्तयेत् परमात्मानं तन्मध्ये गगनं परम्।<br>ओंकारबोधितं तत्त्वं शाश्वतं शिवमच्युतम्॥ ६२॥यह अत्यन्त गुह्य ध्यान है। अब दूसरा ध्यान कहा जाता है। अपने हृदयदेशमें पूर्वमें कहे गये उत्तम कमलका चिन्तनकर उस कमलमें अग्निके समान तेजस्वी, कर्तारूप, पचीसवें तत्त्व पुरुषात्मक परमात्मरूप आत्माका चिन्तन करना चाहिये। उस परमात्माके भीतर परम आकाश (अवकाश) है (क्योंकि परमेश्वर विभु विराट् हैं)। ओंकारसे बोधित सनातन तत्त्व अच्युत शिव कहलाता है॥ ६०-६२॥
अव्यक्तं प्रकृतौ लीनं परं ज्योतिरनुत्तमम्।<br>तदन्तः परमं तत्त्वमात्माधारं निरञ्जनम्॥ ६३॥<br><br>ध्यायीत तन्मयो नित्यमेकरूपं महेश्वरम्।<br>विशोध्य सर्वतत्त्वानि प्रणवेनाथवा पुनः॥ ६४॥<br><br>संस्थाप्य मयि चात्मानं निर्मले परमे पदे।<br>प्लावयित्वात्मनो देहं तेनैव ज्ञानवारिणा॥ ६५॥<br><br>मदात्मा मन्मयो भस्म गृहीत्वा ह्यग्निहोत्रजम्।<br>तेनोद्धृत्य तु सर्वाङ्गमग्निरित्यादिमन्त्रतः।<br>चिन्तयेत् स्वात्मनीशानं परं ज्योतिःस्वरूपिणम्॥ ६६॥उसके भीतर अव्यक्त, प्रकृतिमें लीन, उत्तम परम ज्योति, परम तत्त्व, आत्माधार, निरञ्जन, नित्य, एकरूप महेश्वरका तन्मय होकर ध्यान करना चाहिये। अथवा प्रणवके द्वारा पुनः सभी तत्त्वोंका शोधनकर विशुद्ध परमपदरूप मुझमें अपने आत्माको स्थापित करे और उसी ज्ञानरूपी जलसे अपनी देहको आप्लावित करके मुझमें चित्त आसक्त करे तथा मेरे परायण होकर अग्निहोत्रका भस्म ग्रहण करे और 'अग्नि०' इत्यादि मन्त्रके द्वारा भस्मसे अपने सम्पूर्ण शरीरको उपलिप्त कर अपने आत्मामें परम ज्योतिस्वरूप ईशानका चिन्तन करे॥ ६३-६६॥