संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय ४ * | २६९ |
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| तृतीया महती शक्तिर्निहन्ति सकलं जगत्।<br>तामसी मे समाख्याता कालाख्या रुद्ररूपिणी॥ २३॥<br>ध्यानेन मां प्रपश्यन्ति केचिज्ज्ञानेन चापरे।<br>अपरे भक्तियोगेन कर्मयोगेन चापरे॥ २४॥<br><br>सर्वेषामेव भक्तानामिष्टः प्रियतरो मम।<br>यो हि ज्ञानेन मां नित्यमाराधयति नान्यथा॥ २५॥<br><br>अन्ये च ये त्रयो भक्ता मदाराधनकाङ्क्षिणः।<br>तेऽपि मां प्राप्नुवन्त्येव नावर्तन्ते च वै पुनः॥ २६॥<br><br>मया ततमिदं कृत्स्नं प्रधानपुरुषात्मकम्।<br>मय्येव संस्थितं विश्वं मया सम्प्रेर्यते जगत्॥ २७॥ | मेरी तीसरी जो रुद्ररूपिणी काल नामक महती तामसी शक्ति है, वह समस्त जगत्का संहार करती है कुछ लोग ध्यानद्वारा, कुछ दूसरे लोग ज्ञानद्वारा, कुछ भक्तियोगके द्वारा और कुछ कर्मयोगके द्वारा मेरा दर्शन करते हैं। जो किसी अन्य प्रकारसे नहीं, अपितु केवल ज्ञानद्वारा नित्य मेरी आराधना करता है, वह सभी भक्तोंमें मुझे प्रिय है, प्रियतर है अर्थात् अत्यन्त प्रिय है। अन्य भी जो मेरी आराधना करनेके अभिलाषी तीन (प्रकारके) भक्त हैं, वे भी मुझे ही प्राप्त करते हैं और उनका पुनर्जन्म नहीं होता। मेरे द्वारा ही यह सम्पूर्ण प्रधान और पुरुषरूप संसार व्याप्त है। यह विश्व मुझमें ही स्थित है और मेरे द्वारा ही संसार प्रेरित किया जाता है॥ २३—२७॥ |
| नाहं प्रेरयिता विप्राः परमं योगमाश्रितः।<br>प्रेरयामि जगत्कृत्स्नमेतद्यो वेद सोऽमृतः॥ २८॥<br><br>पश्याम्यशेषमेवेदं वर्तमानं स्वभावतः।<br>करोति कालो भगवान् महायोगेश्वरः स्वयंम्॥ २९॥<br><br>योगः सम्प्रोच्यते योगी माया शास्त्रेषु सूरिभिः।<br>योगेश्वरोऽसौ भगवान् महादेवो महान् प्रभुः॥ ३०॥ | हे विप्रो! परम योगमें ही सदा निरत रहनेवाला मैं प्रेरक नहीं हूँ, तथापि सम्पूर्ण जगत्को मैं प्रेरित करता हूँ, इस (रहस्य)-को जो जानता है, वह अमर हो जाता* है। अपने स्वभाववश प्रवर्तमान समस्त जगत्का मैं साक्षीमात्र हूँ। महायोगेश्वर भगवान् काल स्वयं ही (जगत्की सृष्टि) करते हैं। विद्वानोंने शास्त्रोंमें जिसे योग, योगी और माया कहा है, वह सब प्रभु महादेव भगवान् महायोगेश्वर ही हैं अर्थात् योगेश्वर महादेवमें ही यह सब कल्पित है॥ २८—३०॥ |
| महत्त्वं सर्वतत्त्वानां परत्वात् परमेष्ठिनः।<br>प्रोच्यते भगवान् ब्रह्मा महान् ब्रह्ममयोऽमलः॥ ३१॥<br><br>यो मामेवं विजानाति महायोगेश्वरेश्वरम्।<br>सोऽविकल्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः॥ ३२॥<br><br>सोऽहं प्रेरयिता देवः परमानन्दमाश्रितः।<br>नृत्यामि योगी सततं यस्तद् वेद स वेदवित्॥ ३३॥<br><br>इति गुह्यतमं ज्ञानं सर्ववेदेषु निश्चितम्।<br>प्रसन्नचेतसे देयं धार्मिकायाहिताग्नये॥ ३४॥ | परमेष्ठी सभी तत्त्वोंसे परे हैं अतः सभी तत्त्वोंका महत्त्व ही भगवान् ब्रह्माके रूपमें प्रसिद्ध है और ये भगवान् ब्रह्मा ब्रह्ममय एवं अमल हैं। जो मुझे ही महायोगेश्वरोंका भी ईश्वर समझता है, वह निर्विकल्प (समाधि)-योगसे युक्त होता है, इसमें संदेह नहीं। परमानन्दका आश्रयण करनेवाला वही मैं प्रेरित करनेवाला देवता हूँ। मैं योगी निरन्तर नृत्य करता (प्राणिमात्रके हृदयमें सदा विद्यमान) रहता हूँ, जो ऐसा जानता है वह वेदज्ञ है यह अत्यन्त गुह्य ज्ञान सभी वेदोंमें प्रतिष्ठित है। इसे प्रसन्नचित्त, धार्मिक तथा अग्निहोत्रीको प्रदान करना चाहिये॥ ३१—३४॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे (ईश्वरगीतासु) चतुर्थोऽध्यायः॥४॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकृष्णपुराणसंहिताके उपविभागमें (ईश्वरगीताका) चौथा अध्याय समाप्त हुआ॥ ४॥
* इसका आशय यह है कि महेश्वर प्रेरक होते हुए भी प्रेरणाकी आसक्तिसे सर्वथा रहित हैं। अहैतुकी कृपावश ही प्रेरक बनते हैं।