भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२६८ * कूर्मपुराण *

मां पश्यन्तीह विद्वांसो धार्मिका वेदवादिनः।<br>तेषां संनिहितो नित्यं ये भक्त्या मामुपासते॥ ९॥धार्मिक वेदनिष्ठ विद्वान् मेरा दर्शन करते हैं। जो भक्तिपूर्वक मेरी उपासना करते हैं, मैं नित्य उनके समीपमें रहता हूँ। धार्मिक ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य मेरी उपासना करते हैं। मैं उन्हें आनन्दस्वरूप परमपद नामक स्थान प्रदान करता हूँ॥ ९-१०॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या धार्मिका मामुपासते।<br>तेषां ददामि तत् स्थानमानन्दं परमं पदम्॥ १०॥<br>अन्येऽपि ये विकर्मस्थाः शूद्राद्या नीचजातयः।<br>भक्तिमन्तः प्रमुच्यन्ते कालेन मयि संगताः॥ ११॥अन्य भी जो विपरीत कर्म करनेके कारण शूद्र आदि निम्न जातियोंमें हैं, भक्तिपरायण होनेपर वे भी मुक्त हो जाते हैं और यथासमय मुझमें लीन हो जाते हैं। मेरे भक्त विनाशको प्राप्त नहीं होते, मेरे भक्त पापोंसे रहित हो जाते हैं। मैंने प्रारम्भमें ही यह प्रतिज्ञा कर रखी है कि मेरे भक्तका विनाश नहीं होता। जो उस (भक्त)-की निन्दा करता है, वह मूढ देवाधिदेव (शंकर)-की ही निन्दा करता है और जो उस (भक्त)-की भक्तिपूर्वक पूजा करता है, (समझो कि) वह सदा मेरी ही पूजा करता है। मेरी आराधनाके लिये जो नियमपूर्वक पत्र, पुष्प, फल तथा जल मुझे प्रदान करता है, वह मेरा प्रिय भक्त है, ऐसा समझना चाहिये॥ ११-१४॥
न मद्भक्ता विनश्यन्ति मद्भक्ता वीतकल्मषाः।<br>आदावेतत् प्रतिज्ञातं न मे भक्तः प्रणश्यति॥ १२॥
यो वै निन्दति तं मूढो देवदेवं स निन्दति।<br>यो हि तं पूजयेद् भक्त्या स पूजयति मां सदा॥ १३॥
पत्रं पुष्पं फलं तोयं मदाराधनकारणात्।<br>यो मे ददाति नियतः स मे भक्तः प्रियो मतः॥ १४॥<br>अहं हि जगतामादौ ब्रह्माणं परमेष्ठिनम्।<br>विधाय दत्तवान् वेदानशेषानात्मनिःसृतान्॥ १५॥मैंने ही संसारकी सृष्टिके प्रारम्भमें परमेष्ठी ब्रह्माकी सृष्टिकर अपनेसे प्रादुर्भूत सम्पूर्ण वेदोंको उन्हें प्रदान किया। मैं ही सभी योगियोंका अव्यय गुरु, धार्मिक जनोंका रक्षक तथा वेदसे द्वेष रखनेवालोंको विनष्ट करनेवाला हूँ॥ १५-१६॥
अहमेव हि सर्वेषां योगिनां गुरुरव्ययः।<br>धार्मिकाणां च गोप्ताहं निहन्ता वेदविद्विषाम्॥ १६॥<br>अहं वै सर्वसंसारान्मोचको योगिनामिह।<br>संसारहेतुरेवाहं सर्वसंसारवर्जितः॥ १७॥मैं ही योगियोंको समस्त संसारसे मुक्त करनेवाला हूँ। मैं ही संसारका कारण और सम्पूर्ण संसारसे विवर्जित (असंसृष्ट) हूँ। मैं ही संहार करनेवाला और मैं ही सृष्टि तथा पालन करनेवाला मायावी हूँ। मेरी शक्ति माया है, वह संसारको मोहित करनेवाली है॥ १७-१८॥
अहमेव हि संहर्ता स्रष्टाहं परिपालकः।<br>मायावी मामिका शक्तिर्माया लोकविमोहिनी॥ १८॥<br>ममैव च परा शक्तिर्या सा विद्येति गीयते।<br>नाशयामि तया मायां योगिनां हृदि संस्थितः॥ १९॥मेरी ही जो पराशक्ति है, वह 'विद्या' इस नामसे कही जाती है। योगियोंके हृदयमें रहते हुए मैं उस मायाको नष्ट कर देता हूँ। सभी शक्तियोंका प्रवर्तन करनेवाला तथा निवर्तन करनेवाला मैं ही हूँ। मैं सभीका आधार और अमृतका आश्रय-स्थान हूँ। मुझमें अधिष्ठित और मेरी स्वरूपभूता जो सबके अन्तरमें स्थित अद्वितीय शक्ति है, वह ब्रह्माका रूप धारणकर विविध प्रकारके संसारकी सृष्टि करती है और जो मेरी दूसरी विपुल शक्ति है, वह अनन्त, जगन्नाथ, जगन्मय और नारायणका रूप धारणकर संसारकी स्थापना (पालन आदि कार्य) करती है॥ १९-२२॥
अहं हि सर्वशक्तीनां प्रवर्तकनिवर्तकः।<br>आधारभूतः सर्वासां निधानममृतस्य च॥ २०॥
एका सर्वान्तरा शक्तिः करोति विविधं जगत्।<br>आस्थाय ब्रह्मणो रूपं मन्मयी मदधिष्ठिता॥ २१॥
अन्या च शक्तिर्विपुला संस्थापयति मे जगत्।<br>भूत्वा नारायणोऽनन्तो जगन्नाथो जगन्मयः॥ २२॥