संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
पृष्ठ 277, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 277
- अध्याय ४ * | २६७ ---|---
| नित्यं हि नास्ति जगति भूतं स्थावरजङ्गमम्।<br>ऋते मामेकमव्यक्तं व्योमरूपं महेश्वरम्॥ २१॥<br><br>सोऽहं सृजामि सकलं संहरामि सदा जगत्।<br>मायी मायामयो देवः कालेन सह सङ्गतः॥ २२॥<br><br>मत्संनिधावेष कालः करोति सकलं जगत्।<br>नियोजयत्यनन्तात्मा ह्येतद् वेदानुशासनम्॥ २३॥ | इस संसारमें एकमात्र मुझ अव्यक्त, व्योमरूप महेश्वरको छोड़कर कोई भी स्थावर-जंगमात्मक तत्त्व नित्य नहीं है अर्थात् महेश्वरको छोड़कर सब कुछ अनित्य है। वही मैं मायावी तथा मायामय देव कालके संसर्गसे सम्पूर्ण (संसार)-की सदा सृष्टि करता हूँ और (फिर) संहार करता हूँ। मेरे सांनिध्यमें ही यह काल (तत्त्व) सम्पूर्ण जगत्की (सृष्टि) करता है। वेदका यह कथन है कि अनन्तात्मा ही उस (काल)-को (इस कार्यमें) नियोजित करता है॥ २१—२३॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे (ईश्वरगीतासु) तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें (ईश्वरगीताका) तीसरा अध्याय समाप्त हुआ॥ ३॥
चौथा अध्याय
शिव-भक्तिका माहात्म्य, शिवोपासनाकी सुगमता, ज्ञानरूप शिवस्वरूपका वर्णन, शिवकी तीन प्रकारकी शक्तियोंका प्रतिपादन, शिवके परम तत्त्वका निरूपण
| ईश्वर उवाच | ईश्वर बोले— |
|---|---|
| वक्ष्ये समाहिता यूयं शृणुध्वं ब्रह्मवादिनः।<br>माहात्म्यं देवदेवस्य येनेदं सम्प्रवर्तते॥ १॥ | हे ब्रह्मवादियो! आपलोग ध्यान लगाकर सुनें। जिससे यह सभी प्रवर्तित होता है, उस देवाधिदेवके माहात्म्यको मैं बताता हूँ॥ १॥ |
| नाहं तपोभिर्विविधैर्न दानेन न चेज्यया।<br>शक्यो हि पुरुषैर्ज्ञातुमृते भक्तिमनुत्तमाम्॥ २॥ | मैं न तो विविध प्रकारके तपसे, न दानसे और न यज्ञोंसे ही जानने योग्य हूँ। बिना उत्तम भक्तिके मनुष्य मुझे जान नहीं सकता। सर्वत्र व्याप्त रहनेवाला मैं सभी भावोंके अन्तःमें प्रविष्ट रहता हूँ। परंतु मुनीश्वरो! मुझ सर्वसाक्षीको संसार जान नहीं पाता। जिसके भीतर यह सब प्रतिष्ठित है और जो परम तत्त्व सभीके अन्तःमें स्थित है, मैं वही धाता, विधाता, काल, अग्नि तथा सभी ओर मुखवाला हूँ। सभी मुनि, देवता, ब्रह्मा, मनु, इन्द्र और जो अत्यन्त तेजस्वी हैं, वे भी मुझे नहीं देख पाते॥ २—५॥ |
| अहं हि सर्वभावानामन्तस्तिष्ठामि सर्वगः।<br>मां सर्वसाक्षिणं लोको न जानाति मुनीश्वराः॥ ३॥ | |
| यस्यान्तरा सर्वमिदं यो हि सर्वान्तरः परः।<br>सोऽहं धाता विधाता च कालोऽग्निर्विश्वतोमुखः॥ ४॥ | |
| न मां पश्यन्ति मुनयः सर्वेऽपि त्रिदिवौकसः।<br>ब्रह्मा च मनवः शक्रो ये चान्ये प्रथितौजसः॥ ५॥ | |
| गृणन्ति सततं वेदा मामेकं परमेश्वरम्।<br>यजन्ति विविधैरग्निं ब्राह्मणा वैदिकैर्मखैः॥ ६॥ | वेद मुझ अद्वितीय परमेश्वरकी निरन्तर स्तुति किया करते हैं। ब्राह्मण अनेक प्रकारके वैदिक यज्ञोंके द्वारा अग्निरूप मेरा यजन करते हैं। सभी लोक तथा लोकपितामह ब्रह्मा मुझे नमस्कार करते हैं। योगी जन सभी प्राणियोंके अधिपति (मुझ) ईश्वर देवका ध्यान करते हैं। सबकी आत्मा और सर्वव्यापी मैं ही सभी देवोंके शरीरोंको धारण कर सम्पूर्ण हवियोंका भोक्ता एवं सभी फलोंका प्रदाता हूँ॥ ६—८॥ |
| सर्वे लोका नमस्यन्ति ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>ध्यायन्ति योगिनो देवं भूताधिपतिमीश्वरम्॥ ७॥ | |
| अहं हि सर्वहविषां भोक्ता चैव फलप्रदः।<br>सर्वदेवतनुर्भूत्वा सर्वात्मा सर्वसंस्थितः॥ ८॥ |