भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 276, कुल 506 में से

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पृष्ठ 276

२६६ * कूर्मपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
त्रयमेतदनाद्यन्तमव्यक्ते समवस्थितम्।<br>तदात्मकं तदन्यत् स्यात् तद्रूपं मामकं विदुः॥ ९ ॥(प्रधान, पुरुष और काल—) ये तीनों तत्त्व अनादि, अन्तरहित, अव्यक्त (परम तत्त्व)-में स्थित हैं। वह (परम तत्त्व) तदात्मक (प्रधान आदिका प्रेरक होते हुए भी) तद्भिन्न (उनसे सर्वथा असंसृष्ट) है, वह (परम तत्त्व) मेरा ही रूप है, यह विद्वान् लोग ही जानते हैं।
महदाद्यं विशेषान्तं सम्प्रसूतेऽखिलं जगत्।<br>या सा प्रकृतिरुद्दिष्टा मोहिनी सर्वदेहिनाम्॥ १० ॥<br>पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते यः प्राकृतान् गुणान्।<br>अहंकारविमुक्तत्वात् प्रोच्यते पञ्चविंशकः॥ ११ ॥जो महत् (तत्त्व)-से लेकर विशेषपर्यन्त समस्त संसारको उत्पन्न करती है, वह सभी देहधारियोंको मोहित करनेवाली प्रकृति कही गयी है। जो प्रकृतिस्थ होकर प्रकृतिके गुणोंका उपभोग करता है, वह पुरुष है। अहंकार (अहं-तत्त्व)-से विमुक्त होनेके कारण वह पुरुष पचीसवाँ तत्त्व कहा गया है॥ ९—११॥
आद्यो विकारः प्रकृतेर्महानात्मेति कथ्यते।<br>विज्ञानशक्तिर्विज्ञाता ह्यहंकारस्तदुत्थितः॥ १२ ॥<br>एक एव महानात्मा सोऽहंकारोऽभिधीयते।<br>स जीवः सोऽन्तरात्मेति गीयते तत्त्वचिन्तकैः॥ १३ ॥प्रकृतिके प्रथम विकारको महान् आत्मा (महत्तत्त्व) कहते हैं। उस विज्ञानशक्तिसे सम्पन्न विज्ञाता ('अहम्' अर्थात् अभिमानका मूल कारण) अहंकार उत्पन्न होता है। वही एक महान्* आत्मा 'अहंकार' कहलाता है। तत्त्वचिन्तकोंके द्वारा वह 'जीव' तथा 'अन्तरात्मा' इस नामसे कहा गया है॥ १२-१३॥
तेन वेद्यते सर्वं सुखं दुःखं च जन्मसु।<br>स विज्ञानात्मकस्तस्य मनः स्यादुपकारकम्॥ १४ ॥<br>तेनाविवेकतस्तस्मात् संसारः पुरुषस्य तु।<br>स चाविवेकः प्रकृतौ सङ्गात् कालेन सोऽभवत्॥ १५ ॥<br>कालः सृजति भूतानि कालः संहरति प्रजाः।<br>सर्वे कालस्य वशगा न कालः कस्यचिद् वशे॥ १६ ॥जीवनमें उसीके द्वारा सुख एवं दुःख आदि सभीका अनुभव होता है। वह विज्ञानस्वरूप (विविध सांसारिक ज्ञानका मूल) है। उस (अहंकार)-का उपकारक मन है। उससे अविवेक उत्पन्न होता है और फिर उस अविवेकसे पुरुषका संसार बनता है। 'प्रकृति' से कालका सम्पर्क होनेसे वह अविवेक उत्पन्न होता है। काल ही प्राणियोंकी सृष्टि करता है और काल ही प्रजाओंका संहार करता है। सभी कालके वशीभूत हैं, काल किसीके वशमें नहीं है॥ १४–१६॥
सोऽन्तरा सर्वमेवेदं नियच्छति सनातनः।<br>प्रोच्यते भगवान् प्राणः सर्वज्ञः पुरुषोत्तमः॥ १७ ॥<br>सर्वेन्द्रियेभ्यः परमं मन आहुर्मनीषिणः।<br>मनसश्चाप्यहंकारमहंकारान्महान् परः॥ १८ ॥<br>महतः परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुषः परः।<br>पुरुषाद् भगवान् प्राणस्तस्य सर्वमिदं जगत्॥ १९ ॥<br>प्राणात् परतरं व्योम व्योमातीतोऽग्निरीश्वरः।<br>सोऽहं सर्वत्रगः शान्तो ज्ञानात्मा परमेश्वरः।<br>नास्ति मत्तः परं भूतं मां विज्ञाय विमुच्यते॥ २० ॥वह सनातन (काल) अन्तःप्रविष्ट होकर इस सम्पूर्ण (विश्व)-का नियमन करता है। इस कालको भगवान् प्राण, सर्वज्ञ तथा पुरुषोत्तम कहा जाता है। मनीषियोंने मनको सभी इन्द्रियोंसे उत्कृष्ट एवं मनसे अधिक उत्कृष्ट अहंकारको और अहंकारसे उत्कृष्ट महान्को (महत्तत्त्व) बतलाया है। महत्से उत्कृष्ट अव्यक्त, अव्यक्तसे उत्कृष्ट पुरुष तथा पुरुषसे उत्कृष्ट भगवान् प्राण हैं। यह सम्पूर्ण संसार उसीसे है। प्राणसे परतर व्योम है और व्योमसे अतीत अग्नि ईश्वर है। मैं वही सर्वव्यापी, शान्त, ज्ञानस्वरूप परमेश्वर हूँ। मुझसे उत्कृष्ट और कोई तत्त्व नहीं है। मुझे जान लेनेसे मुक्ति हो जाती है॥ १७–२०॥

* सृष्टिमें अहंकारका महत्त्वपूर्ण स्थान होनेसे उसके लिये 'महान् आत्मा' यह लाक्षणिक प्रयोग है।

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