भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय ३ *२६५
न तेषां पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि।<br>प्रसादान्मम योगीन्द्रा एतद् वेदानुशासनम्॥ ५४॥मेरी कृपासे सैकड़ों-करोड़ों कल्पोंमें भी उनका पुनर्जन्म नहीं होता। योगीन्द्रो! यह वेदोंका अनुशासन है॥ ५१—५४॥
नापुत्रशिष्ययोगिभ्यो दातव्यं ब्रह्मवादिभिः।<br>मदुक्तमेतद् विज्ञानं सांख्ययोगसमाश्रयम्॥ ५५॥ब्रह्मवादियोंको चाहिये कि वे मेरे द्वारा कहे गये इस सांख्य-योग-समन्वित विज्ञानको (अपने) पुत्र*, शिष्य एवं योगियोंके अतिरिक्त और किसी दूसरेको प्रदान न करें॥ ५५॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे (ईश्वरगीतासु) द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें (ईश्वरगीताका) दूसरा अध्याय समाप्त हुआ॥ २॥


तीसरा अध्याय

अव्यक्त शिवतत्त्वसे सृष्टिका कथन, परमात्माके स्वरूपका वर्णन तथा प्रधान, पुरुष एवं महदादि तत्त्वोंसे सृष्टिका क्रम-वर्णन, शिवस्वरूपका निरूपण

ईश्वर उवाचईश्वरने कहा—
अव्यक्तादभवत् कालः प्रधानं पुरुषः परः।<br>तेभ्यः सर्वमिदं जातं तस्माद् ब्रह्ममयं जगत्॥ १॥<br><br>सर्वतः पाणिपादं तत् सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।<br>सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥ २॥अव्यक्त (तत्त्व)-से काल, प्रधान तथा परम पुरुष उत्पन्न हुए। उन (कालादि)-से यह समस्त जगत् उत्पन्न हुआ, इसलिये यह जगत् ब्रह्ममय है। जिसके हाथ और पैरका प्रसार सर्वत्र है, जिसके नेत्र, मस्तक, मुख एवं कर्ण सर्वत्र वर्तमान हैं एवं जो समस्त (विश्व)-को आवृत्तकर स्थित है, वही (ब्रह्म) है॥ १-२॥
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्।<br>सर्वाधारं सदानन्दमव्यक्तं द्वैतवर्जितम्॥ ३॥<br><br>सर्वोपमानरहितं प्रमाणातीतगोचरम्।<br>निर्विकल्पं निराभासं सर्वावासं परामृतम्॥ ४॥<br><br>अभिन्नं भिन्नसंस्थानं शाश्वतं ध्रुवमव्ययम्।<br>निर्गुणं परमं व्योम तज्ज्ञानं सूरयो विदुः॥ ५॥वह सभी इन्द्रियोंके गुणोंके आभासवाला है, अर्थात् सभी इन्द्रियोंके गुण उसमें प्रतीत होते हैं; किंतु सभी इन्द्रियोंसे रहित है। वह सभीका आधार है, सदा आनन्दस्वरूप, अव्यक्त और द्वैतसे रहित (अद्वैत तत्त्व) है। वह सभी उपमानोंसे रहित (निरुपमेय) इन्द्रियोंद्वारा प्रमाणोंसे ज्ञात न होने योग्य, निर्विकल्प, निराभास, सभीका आश्रय, परम अमृतस्वरूप, अभिन्न, भिन्नरूपसे स्थित (प्रतीत), शाश्वत, ध्रुव, अव्यय, निर्गुण और परम व्योमरूप है, उसे विद्वान् लोग जानते हैं॥ ३—५॥
स आत्मा सर्वभूतानां स बाह्याभ्यन्तरः परः।<br>सोऽहं सर्वत्रगः शान्तो ज्ञानात्मा परमेश्वरः॥ ६॥<br><br>मया ततमिदं विश्वं जगद्व्यक्तमूर्तिना।<br>मत्स्थानि सर्वभूतानि यस्तं वेद स वेदवित्॥ ७॥<br><br>प्रधानं पुरुषं चैव तत्त्वद्वयमुदाहृतम्।<br>तयोरनादिरुद्दिष्टः कालः संयोजकः परः॥ ८॥वह सभी प्राणियोंका आत्मा है, वह बाहर-भीतर सर्वत्र व्याप्त रहनेवाला परम तत्त्व है। मैं (भी) वही सर्वव्यापी, शान्त, ज्ञानात्मा परमेश्वर हूँ। मुझ अव्यक्त स्वरूपवालेके द्वारा ही इस विश्वका विस्तार हुआ है। सभी प्राणी मुझमें ही अवस्थित हैं, जो उसे जानता है, वह वेदज्ञ है प्रधान और पुरुष—ये ही दो तत्त्व कहे गये हैं। अनादि उत्कृष्ट कालको ही उन दोनोंका परम संयोजक कहा गया है॥ ६—८॥

* ब्रह्मवादीका पुत्र अनुशासित ही होगा, इसलिये पुत्रको ज्ञानका अधिकारी माना गया है।