भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२६४ * कूर्मपुराण *

योगात् सञ्जायते ज्ञानं ज्ञानाद् योगः प्रवर्तते ।<br>योगज्ञानाभियुक्तस्य नावाप्यं विद्यते क्वचित् ॥ ४१ ॥<br><br>यदेव योगिनो यान्ति सांख्यैस्तदधिगम्यते ।<br>एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स तत्त्ववित् ॥ ४२ ॥योगसे ज्ञान उत्पन्न होता है और ज्ञानसे योग प्रवर्तित (स्थिर) होता है। योग तथा ज्ञानसम्पन्न (पुरुष)-के लिये कुछ भी प्राप्त करना शेष नहीं रह जाता। योगी जिसे प्राप्त करते हैं, सांख्यवेत्ताओंके द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। जो सांख्य और योगको एक ही समझता है, वह तत्त्वज्ञानी होता है ॥ ४१-४२ ॥
अन्ये च योगिनो विप्रा ऐश्वर्यासक्तचेतसः ।<br>मज्जन्ति तत्र तत्रैव न त्वात्मैषामिति श्रुतिः ॥ ४३ ॥<br><br>यत्तत् सर्वगतं दिव्यमैश्वर्यमचलं महत् ।<br>ज्ञानयोगाभियुक्तस्तु देहान्ते तदवाप्नुयात् ॥ ४४ ॥<br><br>एष आत्माहमव्यक्तो मायावी परमेश्वरः ।<br>कीर्तितः सर्ववेदेषु सर्वात्मा सर्वतोमुखः ॥ ४५ ॥विप्रो! ऐश्वर्य (आठ प्रकारकी सिद्धियों एवं अन्य वैभव आदि)-में आसक्तचित्त अन्य योगीजन उसीमें डूबे रहते हैं, अतएव उन्हें आत्मतत्त्व प्राप्त नहीं होता—ऐसा श्रुतिवचन है। जो सर्वव्यापी, दिव्य ऐश्वर्यरूप, अचल और महत् (सर्वश्रेष्ठ) है, उसे ज्ञान और योगसम्पन्न पुरुष देहान्त होनेपर प्राप्त करते हैं। सम्पूर्ण वेदोंमें सर्वात्मा, सर्वतोमुखके रूपमें प्रतिपादित, अव्यक्त, मायावी (मायाका अधिष्ठाता) तथा परमेश्वरस्वरूप मैं ही यह आत्मा हूँ ॥ ४३-४५ ॥
सर्वकामः सर्वरसः सर्वगन्धोऽजरोऽमरः ।<br>सर्वतः पाणिपादोऽहमन्तर्यामी सनातनः ॥ ४६ ॥<br><br>अपाणिपादो जवनो ग्रहीता हृदि संस्थितः ।<br>अचक्षुरपि पश्यामि तथाकर्णः शृणोम्यहम् ॥ ४७ ॥<br><br>वेदाहं सर्वमेवेदं न मां जानाति कश्चन ।<br>प्राहुर्महान्तं पुरुषं मामेकं तत्त्वदर्शिनः ॥ ४८ ॥<br><br>पश्यन्ति ऋषयो हेतुमात्मनः सूक्ष्मदर्शिनः ।<br>निर्गुणामलरूपस्य यत्तदैश्वर्यमुत्तमम् ॥ ४९ ॥<br><br>यन्न देवा विजानन्ति मोहिता मम मायया ।<br>वक्ष्ये समाहिता यूयं शृणुध्वं ब्रह्मवादिनः ॥ ५० ॥मैं अन्तर्यामी, सनातन, सर्वकाम, सर्वरस, सर्वगन्ध, अजर, अमर और सभी ओर हाथ-पैरवाला हूँ। हाथ और पैरके बिना भी मैं गति करने एवं ग्रहण करनेवाला हूँ। (सभी प्राणियोंके) हृदयमें स्थित हूँ। बिना नेत्रोंके भी देखता हूँ और बिना कानोंके भी मैं सुनता हूँ। मैं इस समस्त प्रपञ्चको जानता हूँ, परंतु मुझे कोई नहीं जानता। तत्त्वदर्शी लोग मुझे अद्वितीय महान् पुरुष कहते हैं। सूक्ष्मदर्शी ऋषि गुणरहित और विशुद्धरूप आत्माके हेतुस्वरूप उस श्रेष्ठ ऐश्वर्य (सर्वोत्कृष्ट ज्ञान)-का दर्शन (साक्षात्कार) करते हैं। ब्रह्मवादियो! मेरी मायासे मोहित होनेके कारण देवता भी जिस (तत्त्व)-को नहीं जानते उसे मैं कहता हूँ, आप लोग ध्यान लगाकर सुनें— ॥ ४६-५० ॥
नाहं प्रशास्ता सर्वस्य मायातीतः स्वभावतः ।<br>प्रेरयामि तथापीदं कारणं सूरयो विदुः ॥ ५१ ॥मायातीत मैं स्वभावतः सबका अनुशास्ता नहीं हूँ, तथापि इस जगत्को मैं प्रेरित करता हूँ, विद्वान् लोग इसका कारण जानते हैं (वह कारण अहैतुकी कृपा ही है।)।
यन्मे गुह्यतमं देहं सर्वगं तत्त्वदर्शिनः ।<br>प्रविष्टा मम सायुज्यं लभन्ते योगिनोऽव्ययम् ॥ ५२ ॥मेरा जो अत्यन्त गुह्यतम तथा सर्वव्यापी देह है, तत्त्वदर्शी योगीजन उसमें प्रविष्ट होते हैं और मेरे अविनाशी सायुज्य (नामक मोक्ष)-को प्राप्त करते हैं।
तेषां हि वशमापन्ना माया मे विश्वरूपिणी ।<br>लभन्ते परमां शुद्धिं निर्वाणं ते मया सह ॥ ५३ ॥मेरी विश्वरूपिणी माया उनके वशमें रहती है। वे मेरे साथ (मेरा सायुज्य प्राप्तकर) परम शुद्धि और निर्वाणको प्राप्त करते हैं।