भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 273, कुल 506 में से

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पृष्ठ 273
* अध्याय २ *२६३
यथा संलक्ष्यते रक्तः केवलः स्फटिको जनैः ।<br>रक्तिकाद्युपधानेन तद्वत् परमपूरुषः ॥ २८ ॥उपाधिके कारण लोगोंको लाल वर्णका-सा दिखलायी पड़ता है, वैसे ही परम पुरुष भी (मायाके द्वारा नाम-रूपात्मक उपाधियुक्त प्रतीत होनेके कारण अनेक रूपोंमें दिखलायी पड़ता) है। इस कारण मोक्षके अभिलाषियोंको अक्षर, शुद्ध, नित्य, सर्वव्यापी तथा अव्यय उस आत्माका श्रवण, मनन तथा उपासना करनी चाहिये। (जिससे माया (अज्ञान)-की निवृत्ति हो तथा शुद्ध आत्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त हो) योगीके मनमें जब सर्वत्र व्याप्त रहनेवाला चैतन्य सदा प्रकाशित होता है, तब वह योगी बिना किसी व्यवधानके आत्मभाव प्राप्त कर लेता है ॥ २७-३० ॥
तस्मादात्माक्षरः शुद्धो नित्यः सर्वगतोऽव्ययः ।<br>उपासितव्यो मन्तव्यः श्रोतव्यश्च मुमुक्षुभिः ॥ २९ ॥
यदा मनसि चैतन्यं भाति सर्वत्रगं सदा ।<br>योगिनोऽव्यवधानेन तदा सम्पद्यते स्वयंम् ॥ ३० ॥
यदा सर्वाणि भूतानि स्वात्मन्येवाभिपश्यति ।<br>सर्वभूतेषु चात्मानं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ ३१ ॥(योगी) जब सभी प्राणियोंको अपनी आत्मामें अच्छी प्रकार स्थित देख लेता है और सभी प्राणियोंमें अपनेको स्थित देखता है, तब उसे ब्रह्मभावकी प्राप्ति हो जाती है। जब (योगी) समाधिकी अवस्थामें किसी भी प्राणीको (अपनेसे भिन्न) नहीं देखता (अर्थात् समस्त प्रपञ्चमें आत्मदर्शन करता है), तब वह उस परतत्त्वसे एकात्मभाव प्राप्त कर लेता है और अद्वितीय हो जाता है। उसके हृदयमें स्थित सभी कामनाएँ जब समाप्त हो जाती हैं तब वह पण्डित अमृतस्वरूप होकर (परम) कल्याण प्राप्त कर लेता है। (योगी) जब प्राणियोंके पार्थक्यको एक तत्त्वमें स्थित देखता है और उसी (तत्त्व)-से उनका विस्तार होना समझता है, तब उसे ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है। जब वह परमार्थतः (सर्वत्र) केवल अद्वितीय आत्माको ही देखता है और सम्पूर्ण जगत्को मायामात्र समझता है, तब वह मुक्त हो जाता है ॥ ३१-३५ ॥
यदा सर्वाणि भूतानि समाधिस्थो न पश्यति ।<br>एकीभूतः परेणासौ तदा भवति केवलः ॥ ३२ ॥
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि स्थिताः ।<br>तदासावमृतीभूतः क्षेमं गच्छति पण्डितः ॥ ३३ ॥
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।<br>तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ ३४ ॥
यदा पश्यति चात्मानं केवलं परमार्थतः ।<br>मायामात्रं जगत् कृत्स्नं तदा भवति निर्वृतः ॥ ३५ ॥
यदा जन्मजरादुःखव्याधीनामेकभेषजम् ।<br>केवलं ब्रह्मविज्ञानं जायतेऽसौ तदा शिवः ॥ ३६ ॥जब योगीको जन्म, जरा, दुःख और समस्त व्याधियोंके एकमात्र औषध अद्वितीय ब्रह्मका ज्ञान हो जाता है, तब वह शिवरूप हो जाता है। जिस प्रकार संसारमें नद एवं नदियाँ सागरके साथ एकरूपताको प्राप्त करती हैं, उसी प्रकार यह आत्मा (जीवात्मा) निष्कल अक्षर (ब्रह्म)-के साथ एकत्व प्राप्त करता है ॥ ३६-३७ ॥
यथा नदीनदा लोके सागरेणैकतां ययुः ।<br>तद्वदात्माक्षरेणासौ निष्कलेनैकतां व्रजेत् ॥ ३७ ॥
तस्माद् विज्ञानमेवास्ति न प्रपञ्चो न संसृतिः ।<br>अज्ञानेनावृतं लोको विज्ञानं तेन मुह्यति ॥ ३८ ॥इसलिये विज्ञानका ही अस्तित्व है, प्रपञ्च और संसरणशील संसारका अस्तित्व नहीं है। विज्ञान अज्ञानसे आवृत रहता है, इसीसे संसार (जीव) मोहमें पड़ता है। ज्ञान निर्मल, सूक्ष्म, निर्विकल्पक और अव्यय है, अज्ञानके अतिरिक्त जो कुछ है, वह विज्ञान है—ऐसा मेरा मत है। यह आप लोगोंको सांख्य नामक परमोत्तम ज्ञान बतलाया। यह सम्पूर्ण वेदान्तका सार है। इसमें चित्तकी एकाग्रता ही योग है ॥ ३८-४० ॥
तज्ज्ञानं निर्मलं सूक्ष्मं निर्विकल्पं यदव्ययम् ।<br>अज्ञानमितरत् सर्वं विज्ञानमिति मे मतम् ॥ ३९ ॥
एतद् वः परमं सांख्यं भाषितं ज्ञानमुत्तमम् ।<br>सर्ववेदान्तसारं हि योगस्तत्रैकचित्तता ॥ ४० ॥
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