संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
पृष्ठ 269, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 269
| * अध्याय १ * | २५९ |
|---|
| कः संसारयतीशानः को वा सर्वं प्रपश्यति।<br>किं तत् परतरं ब्रह्म सर्वं नो वक्तुमर्हसि ॥ २७॥<br>एवमुक्ते तु मुनयः प्रापश्यन् पुरुषोत्तमम्।<br>विहाय तापसं रूपं संस्थितं स्वेन तेजसा॥ २८॥<br><br>विभ्राजमानं विमलं प्रभामण्डलमण्डितम्।<br>श्रीवत्सवक्षसं देवं तप्तजाम्बूनदप्रभम्॥ २९॥<br><br>शङ्खचक्रगदापाणिं शार्ङ्गहस्तं श्रियावृतम्।<br>न दृष्टस्तत्क्षणादेव नरस्तस्यैव तेजसा॥ ३०॥<br>तदन्तरे महादेवः शशाङ्काङ्कितशेखरः।<br>प्रसादाभिमुखो रुद्रः प्रादुरासीन्महेश्वरः ॥ ३१॥<br>निरीक्ष्य ते जगन्नाथं त्रिनेत्रं चन्द्रभूषणम्।<br>तुष्टुवुर्हृष्टमनसो भक्त्या तं परमेश्वरम् ॥ ३२॥<br>जयेश्वर महादेव जय भूतपते शिव।<br>जयाशेषमुनीशान तपसाभिप्रपूजित ॥ ३३॥<br><br>सहस्रमूर्ते विश्वात्मन् जगद्यन्त्रप्रवर्तक।<br>जयानन्त जगज्जन्मत्राणसंहारकारण ॥ ३४॥<br><br>सहस्रचरणेशान शम्भो योगीन्द्रवन्दित।<br>जयाम्बिकापते देव नमस्ते परमेश्वर ॥ ३५॥<br>संस्तुतो भगवानीशस्त्र्यम्बको भक्तवत्सलः।<br>समालिङ्ग्य हृषीकेशं प्राह गम्भीरया गिरा ॥ ३६॥<br>किमर्थं पुण्डरीकाक्ष मुनीन्द्रा ब्रह्मवादिनः।<br>इमं समागता देशं किं वा कार्यं मयाच्युत ॥ ३७॥<br>आकर्ण्य भगवद्वाक्यं देवदेवो जनार्दनः।<br>प्राह देवो महादेवं प्रसादाभिमुखं स्थितम् ॥ ३८॥<br>इमे हि मुनयो देव तापसाः क्षीणकल्मषाः।<br>अभ्यागता मां शरणं सम्यग् दर्शनकाङ्क्षिणः ॥ ३९॥<br>यदि प्रसन्नो भगवान् मुनीनां भावितात्मनाम्।<br>संनिधौ मम तज्ज्ञानं दिव्यं वक्तुमिहार्हसि ॥ ४०॥<br>त्वं हि वेत्थ स्वमात्मानं न ह्यन्यो विद्यते शिव।<br>ततस्त्वमात्मनात्मानं मुनीन्द्रेभ्यः प्रदर्शय ॥ ४१॥<br>एवमुक्त्वा हृषीकेशः प्रोवाच मुनिपुङ्गवान्।<br>प्रदर्शयन् योगसिद्धिं निरीक्ष्य वृषभध्वजम् ॥ ४२॥<br>संदर्शनान्महेशस्य शंकरस्याथ शूलिनः।<br>कृतार्थं स्वयमात्मानं ज्ञातुमर्हथ तत्त्वतः॥ ४३॥ | अथवा सबका द्रष्टा कौन है ? परात्पर ब्रह्म क्या है ? यह सब आप हमें बतलायें ॥ २३-२७॥<br><br>ऐसा कहे जानेपर मुनियोंने तपस्वी-रूपका परित्याग किये हुए, अपने तेजद्वारा प्रतिष्ठित, प्रकाशमण्डलसे मण्डित, वक्षःस्थलमें श्रीवत्स धारण किये हुए, तप्त स्वर्णके समान आभावाले और हाथोंमें शंख, चक्र, गदा तथा शार्ङ्ग नामका धनुष धारण किये हुए लक्ष्मीसहित विमल एवं द्युतिमान् पुरुषोत्तम देवका दर्शन किया। उस समय उन्हींके तेजके कारण नर (ऋषि) नहीं दिखलायी पड़े ॥ २८-३०॥<br><br>उसी समय चन्द्रमासे अंकित मस्तकवाले महादेव महेश्वर रुद्र प्रसन्नतापूर्वक प्रकट हुए। चन्द्रभूषण जगन्नाथ त्रिलोचनका दर्शनकर प्रसन्न मनवाले वे सभी (मुनि) भक्तिपूर्वक उन परमेश्वरकी स्तुति करने लगे- ॥ ३१-३२॥<br><br>ईश्वरकी जय हो। भूतपति महादेव शिवकी जय हो। सभी मुनियोंके स्वामी तथा तपस्याद्वारा भलीभाँति प्रपूजित होनेवाले आपकी जय हो। सहस्रमूर्ति! विश्वात्मन् ! संसाररूपी यन्त्रके प्रवर्तक और संसारके जन्म, रक्षा और संहारके कारण हे अनन्त! आपकी जय हो। हजारों चरणवाले, ईशान, शम्भु, योगीन्द्रोंद्वारा वन्दित अम्बिकापति ! आपकी जय हो। परमेश्वरदेव ! आपको नमस्कार है॥ ३३-३५॥<br><br>इस प्रकार स्तुति किये जानेपर भक्तवत्सल भगवान् त्र्यम्बक ईशने हृषीकेशका आलिंगनकर गम्भीर वाणीमें कहा— हे अच्युत ! पुण्डरीकाक्ष ! ये ब्रह्मवादी मुनीन्द्र किस कारणसे इस स्थानपर आये हैं अथवा मुझे क्या करना है ? भगवान्के वाक्यको सुनकर देवाधिदेव जनार्दनदेवने कृपा करनेके लिये उद्यत सामने स्थित महादेवसे कहा-देव ! ये सभी मुनिगण तपस्वी और निष्पाप हैं, ये लोग भलीभाँति तत्त्वदर्शनकी इच्छासे मेरी शरणमें आये हैं। हे भगवन् ! यदि आप प्रसन्न हैं तो मेरे समीप इन भावनामय मुनियोंको वह दिव्य ज्ञान प्रदान करें ॥ ३६-४०॥<br><br>शिव ! केवल आप ही अपने-आपको जानते हैं दूसरा कोई आपको जाननेवाला नहीं है। अतः आप स्वयं इन मुनीन्द्रोंको अपना स्वरूप दिखलायें। ऐसा कहकर हृषीकेशने योगसिद्धियोंको दिखाते हुए वृषभध्वजकी ओर देखकर श्रेष्ठ मुनियोंसे कहा- (हे मुनिगणो!) त्रिशूल धारण करनेवाले शंकर महेशके दर्शनसे आपलोग अपने-आपको कृतार्थ समझें। आपलोग यथार्थरूपसे |