संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६० * कूर्मपुराण *
| प्रष्टुमर्हथ विश्वेशं प्रत्यक्षं पुरतः स्थितम्।<br>ममैव संनिधावेष यथावद् वक्तुमीश्वरः॥ ४४ ॥<br><br>निशम्य विष्णुवचनं प्रणम्य वृषभध्वजम्।<br>सनत्कुमारप्रमुखाः पृच्छन्ति स्म महेश्वरम्॥ ४५ ॥<br><br>अथास्मिन्नन्तरे दिव्यमासनं विमलं शिवम्।<br>किमप्यचिन्त्यं गगनादीश्वरार्हं समुद्बभौ॥ ४६ ॥<br><br>तत्राससाद योगात्मा विष्णुना सह विश्वकृत्।<br>तेजसा पूरयन् विश्वं भाति देवो महेश्वरः॥ ४७ ॥<br><br>तं ते देवादिदेवेशं शंकरं ब्रह्मवादिनः।<br>विभ्राजमानं विमले तस्मिन् ददृशुरासने॥ ४८ ॥<br><br>यं प्रपश्यन्ति योगस्थाः स्वात्मन्यात्मानमीश्वरम्।<br>अनन्यतेजसं शान्तं शिवं ददृशिरे किल॥ ४९ ॥<br><br>यतः प्रसूतिर्भूतानां यत्रैतत् प्रविलीयते।<br>तमासनस्थं भूतानामीशं ददृशिरे किल॥ ५० ॥<br><br>यदन्तरा सर्वमेतद् यतोऽभिन्नमिदं जगत्।<br>स वासुदेवमासीनं तमीशं ददृशुः किल॥ ५१ ॥<br><br>प्रोवाच पृष्टो भगवान् मुनीनां परमेश्वरः।<br>निरीक्ष्य पुण्डरीकाक्षं स्वात्मयोगमनुत्तमम्॥ ५२ ॥<br><br>तच्छृणुध्वं यथान्यायमुच्यमानं मयानघाः।<br>प्रशान्तमानसाः सर्वे ज्ञानमीश्वरभाषितम्॥ ५३ ॥ | ज्ञान प्राप्त करने योग्य हैं, सामने प्रत्यक्ष स्थित विश्वेशसे (उस तत्त्वज्ञानके विषयमें) पूछें। मेरी संनिधिमें ये यथार्थरूपसे वर्णन करनेमें समर्थ हैं। विष्णुका (यह) वचन सुनकर तथा वृषभध्वजको प्रणामकर सनत्कुमार आदि (ऋषियों)-ने महेश्वरसे पूछा-॥ ४१-४५॥<br><br>इसी बीच आकाशसे ईश्वरके योग्य एक अचिन्त्य दिव्य निर्मल आसन प्रकट हुआ। विश्वकर्ता वे योगात्मा (महेश्वर) विष्णुसहित उस आसनपर बैठ गये। अपने तेजसे विश्वको पूरित करते हुए महेश्वर देव वहाँ सुशोभित हो रहे थे। उन ब्रह्मवादियोंने उन प्रकाशमान देवाधिदेव शंकरका उस निर्मल आसनपर सुशोभित होते हुए दर्शन किया। योगमें स्थित लोग अपनी आत्मामें जिन आत्मस्वरूप ईश्वरका दर्शन करते हैं, उन्हीं अनन्य तेजस्वी शान्तस्वरूप शिवको उन ब्रह्मवादियोंने देखा, जिनसे समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है और जिनमें यह सब विलीन हो जाता है, उन प्राणियोंके ईशको ब्रह्मवादियोंने आसनपर विराजमान देखा। जिनके भीतर यह सम्पूर्ण संसार है और यह जगत् जिनसे अभिन्न है, उन परमेश्वरको वासुदेवके साथ आसनपर विराजमान देखा॥ ४६-५१॥<br><br>मुनियोंके पूछनेपर परमेश्वर (महेश्वर) भगवान् पुण्डरीकाक्ष (विष्णु)-की ओर देखकर अपने श्रेष्ठ योगका वर्णन करने लगे। शान्त मनवाले अनघ मुनियो! आप सभी लोग सुनें-मैं ईश्वरद्वारा कहे गये ज्ञानका वर्णन यथोचितरूपसे कर रहा हूँ॥ ५२-५३॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे (ईश्वरगीतासु) प्रथमोऽध्यायः॥ १ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें (ईश्वरगीताका) प्रथम अध्याय समाप्त हुआ॥ १ ॥
दूसरा अध्याय
आत्मतत्त्वके स्वरूपका निरूपण, सांख्य एवं योगके ज्ञानका अभेद, आत्मसाक्षात्कारके साधनोंका वर्णन
| ईश्वर उवाच | ईश्वरने कहा— |
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| अवाच्यमेतद् विज्ञानमात्मगुह्यं सनातनम्।<br>यन्न देवा विजानन्ति यतन्तोऽपि द्विजातयः॥ १ ॥<br><br>इदं ज्ञानं समाश्रित्य ब्रह्मभूता द्विजोत्तमाः।<br>न संसारं प्रपद्यन्ते पूर्वेऽपि ब्रह्मवादिनः॥ २ ॥ | द्विजो! देवता लोग प्रयत्न करनेपर भी जिसे नहीं जान पाते हैं, मेरा यह विज्ञान अत्यन्त गुह्य है, सनातन है एवं बतलाने योग्य (भी) नहीं है। इस ज्ञानका आश्रय ग्रहणकर श्रेष्ठ द्विजगणोंने ब्रह्मभावको प्राप्त किया है। (इस ज्ञानके कारण) पूर्वकालमें भी ब्रह्मवादियोंको पुनः संसारमें आना नहीं पड़ा (अर्थात् इस ज्ञानसे ब्रह्मभाव अवश्य प्राप्त होता है और ब्रह्मभाव |