भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय २ *२६१
गुह्याद् गुह्यतमं साक्षाद् गोपनीयं प्रयत्नतः।<br>वक्ष्ये भक्तिमतामद्य युष्माकं ब्रह्मवादिनाम्॥ ३॥प्राप्त करनेके अनन्तर पुनः संसारमें आगमन नहीं होता)।<br>यह ज्ञान गुह्यसे भी गुह्यतम है, इस साक्षात् ज्ञानको<br>प्रयत्नपूर्वक गोपनीय रखना चाहिये। आप भक्तिसम्पन्न<br>ब्रह्मवादियोंको आज मैं यह ज्ञान बतलाऊँगा॥ १-३॥
आत्मा यः केवलः स्वस्थः शान्तः सूक्ष्मः सनातनः।<br>अस्ति सर्वान्तरः साक्षाच्चिन्मात्रस्तमसः परः॥ ४॥जो आत्मा अद्वितीय, स्वस्थ, शान्त, सूक्ष्म, सनातन,<br>सभीका अन्तरतम साक्षात् चिन्मात्र और तमोगुणसे परे<br>है, वही (आत्मा) अन्तर्यामी है, पुरुष है, वही प्राण है,<br>वही महेश्वर है, वही काल तथा अग्नि है और वही<br>अव्यक्त है—ऐसा श्रुतिका कथन है॥ ४-५॥
सोऽन्तर्यामी स पुरुषः स प्राणः स महेश्वरः।<br>स कालोऽग्निस्तदव्यक्तं स एवेदमिति श्रुतिः॥ ५॥<br>अस्माद् विजायते विश्वमत्रैव प्रविलीयते।<br>स मायी मायया बद्धः करोति विविधास्तनूः॥ ६॥इसीसे संसार उत्पन्न होता है और इसीमें विलीन हो<br>जाता है। वह मायाका नियामक मायासे आबद्ध होकर<br>अपनी इच्छासे मायाको अङ्गीकार कर विविध शरीरोंको<br>उत्पन्न करता है। यह प्रभु आत्मा न तो गतिशील है और<br>न गतिप्रेरक है। न यह पृथ्वी है, न जल है, न तेज है, न<br>वायु है और न आकाश ही है॥ ६-७॥
न चाप्ययं संसरति न च संसारयेत् प्रभुः।<br>नायं पृथ्वी न सलिलं न तेजः पवनो नभः॥ ७॥<br>न प्राणो न मनोऽव्यक्तं न शब्दः स्पर्श एव च।<br>न रूपरसगन्धाश्च नाहं कर्ता न वागपि॥ ८ ॥यह न प्राण है, न मन है, न अव्यक्त है, न शब्द है, न<br>स्पर्श है, न रूप, न रस और न गन्ध ही है। न अभिमानी*<br>है, न वाणी ही है। द्विजोत्तमो ! यह न हाथ, न पैर, न पायु<br>(शौचेन्द्रिय) और न उपस्थ (मूत्रेन्द्रिय), न कर्ता, न भोक्ता<br>तथा प्रकृति-पुरुष भी नहीं है। माया भी नहीं है, प्राण भी<br>नहीं है, अपितु परमार्थतः चैतन्यमात्र है॥ ८-९॥
न पाणिपादौ नो पायुर्न चोपस्थं द्विजोत्तमाः।<br>न कर्ता न च भोक्ता वा न च प्रकृतिपूरुषौ।<br>न माया नैव च प्राणश्चैतन्यं परमार्थतः॥ ९ ॥जिस प्रकार प्रकाश और अन्धकारका कोई सम्बन्ध<br>नहीं हो सकता, उसी प्रकार (सांसारिक) प्रपञ्च और परमात्माका<br>भी कोई ऐक्य (अभेद आदि) सम्बन्ध नहीं हो सकता॥ १०॥
यथा प्रकाशतमसोः सम्बन्धो नोपपद्यते।<br>तद्वदैक्यं न सम्बन्धः प्रपञ्चपरमात्मनोः॥ १०॥जिस प्रकार संसारमें धूप और छाया एक-दूसरेसे<br>विलक्षण हैं, वैसे ही पुरुष तथा प्रपञ्च भी तत्त्वतः<br>एक-दूसरेसे भिन्न हैं। यदि आत्मा स्वभावसे मलिन,<br>अस्वस्थ तथा विकारयुक्त होता तो उसकी मुक्ति सैकड़ों<br>जन्मोंमें भी नहीं होती। योगयुक्त मुनिजन परमार्थतः<br>अपने विकाररहित, दुःखशून्य, आनन्दस्वरूप, अव्यय<br>आत्माका दर्शन करते हैं॥ ११-१३॥
छायातपौ यथा लोके परस्परविलक्षणौ।<br>तद्वत् प्रपञ्चपुरुषौ विभिन्नौ परमार्थतः॥ ११॥<br>यद्यात्मा मलिनोऽस्वस्थो विकारी स्यात् स्वभावतः।<br>नहि तस्य भवेन्मुक्तिर्जन्मान्तरशतैरपि॥ १२॥<br>पश्यन्ति मुनयो युक्ताः स्वात्मानं परमार्थतः।<br>विकारहीनं निर्दुःखमानन्दात्मानमव्ययम्॥ १३॥मैं कर्ता हूँ, सुखी, दुःखी, कृश एवं स्थूल हूँ—<br>इस प्रकारकी जो बुद्धि है, वह मनुष्योंके द्वारा अहंकारके<br>कारण ही अपनी आत्मामें आरोपित है। वेदके विद्वान्<br>लोग (आत्माको) साक्षी, प्रकृतिसे परे, भोक्ता, अक्षर,<br>शुद्ध तथा सर्वत्र सम रूपसे व्याप्त बतलाते हैं। अतएव
अहं कर्ता सुखी दुःखी कृशः स्थूलेति या मतिः।<br>सा चाहंकारकर्तृत्वादात्मन्यारोप्यते जनैः॥ १४॥<br>वदन्ति वेदविद्वांसः साक्षिणं प्रकृतेः परम्।<br>भोक्तारमक्षरं शुद्धं सर्वत्र समवस्थितम्॥ १५॥

* 'अहम्' इस शब्दका प्रयोक्ता नहीं है, न 'अहम्' यह शब्द ही है।