भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२५८ * कूर्मपुराण *


| ततः स सूतः स्वगुरुं प्रणम्याह महामुनिम्।<br>ज्ञानं तद् ब्रह्मविषयं मुनीनां वक्तुमर्हसि ॥ ११ ॥<br><br>इमे हि मुनयः शान्तास्तापसा धर्मतत्पराः।<br>शुश्रूषा जायते चैषां वक्तुमर्हसि तत्त्वतः ॥ १२ ॥<br><br>ज्ञानं विमुक्तिदं दिव्यं यन्मे साक्षात् त्वयोदितम्।<br>मुनीनां व्याहृतं पूर्वं विष्णुना कूर्मरूपिणा ॥ १३ ॥<br><br>श्रुत्वा सूतस्य वचनं मुनिः सत्यवतीसुतः।<br>प्रणम्य शिरसा रुद्रं वचः प्राह सुखावहम् ॥ १४ ॥<br><br>व्यास उवाच<br><br>वक्ष्ये देवो महादेवः पृष्टो योगीश्वरैः पुरा।<br>सनत्कुमारप्रमुखैः स्वयं यत् समभाषत ॥ १५ ॥<br><br>सनत्कुमारः सनकस्तथैव च सनन्दनः।<br>अङ्गिरा रुद्रसहितो भृगुः परमधर्मवित् ॥ १६ ॥<br><br>कणादः कपिलो योगी वामदेवो महामुनिः।<br>शुक्रो वसिष्ठो भगवान् सर्वे संयतमानसाः ॥ १७ ॥<br><br>परस्परं विचार्यैते संशयाविष्टचेतसः।<br>तप्तवन्तस्तपो घोरं पुण्ये बदरिकाश्रमे ॥ १८ ॥<br><br>अपश्यंस्ते महायोगमृषिं धर्मसुतं शुचिम्।<br>नारायणमनाद्यन्तं नरेण सहितं तदा ॥ १९ ॥<br><br>संस्तूय विविधैः स्तोत्रैः सर्वे वेदसमुद्भवैः।<br>प्रणेमुर्भक्तिसंयुक्ता योगिनो योगवित्तमम् ॥ २० ॥<br><br>विज्ञाय वाञ्छितं तेषां भगवानपि सर्ववित्।<br>प्राह गम्भीरया वाचा किमर्थं तप्यते तपः ॥ २१ ॥<br><br>अब्रुवन् हृष्टमनसो विश्वात्मानं सनातनम्।<br>साक्षान्नारायणं देवमागतं सिद्धिसूचकम् ॥ २२ ॥<br><br>वयं संशयमापन्नाः सर्वे वै ब्रह्मवादिनः।<br>भवन्तमेकं शरणं प्रपन्नाः पुरुषोत्तमम् ॥ २३ ॥<br><br>त्वं हि तद् वेत्थ परमं सर्वज्ञो भगवानृषिः।<br>नारायणः स्वयं साक्षात् पुराणोऽव्यक्तपूरुषः ॥ २४ ॥<br><br>नह्यान्यो विद्यते वेत्ता त्वामृते परमेश्वर।<br>शुश्रूषास्माकमखिलं संशयं छेत्तुमर्हसि ॥ २५ ॥<br><br>किं कारणमिदं कृत्स्नं कोऽनुसंसरते सदा।<br>कश्चिदात्मा च का मुक्तिः संसारः किंनिमित्तकः ॥ २६ ॥ | तब उन सूतने अपने गुरु महामुनि (व्यास)-को प्रणामकर कहा—आप ब्रह्मविषयक ज्ञान मुनियोंको बतलायें। ये मुनि शान्त, तपस्वी तथा धर्मपरायण हैं। इन्हें सुननेकी इच्छा है, आप (कृपया) यथार्थरूपसे ब्रह्मविषयक सर्वोच्च ज्ञानका उपदेश करें। मोक्ष प्रदान करनेवाले जिस दिव्य ज्ञानको आपने मुझे तथा पूर्वकालमें कूर्मरूप धारणकर विष्णुने मुनियोंको बतलाया था (इस समय आप उसी ज्ञानका उपदेश दें)। सूतके वचन सुनकर सत्यवतीके पुत्र मुनि (व्यास)-ने रुद्रको मस्तकद्वारा प्रणामकर सुखदायक वचन कहा— ॥ १०–१४ ॥<br><br>व्यासजी बोले—प्राचीन कालमें सनत्कुमार आदि प्रमुख योगीश्वरोंद्वारा पूछनेपर स्वयं प्रभु महादेवने जो कहा था, उसीको मैं कहता हूँ। सनत्कुमार, सनक, सनन्दन, अंगिरा, रुद्रसहित परम धर्मज्ञ भृगु, कणाद, कपिल, योगी महामुनि वामदेव, शुक्र तथा भगवान् वसिष्ठ—इन सभी संयमित चित्तवाले मुनियोंने संशयान्वित होनेपर परस्पर परामर्श करके पवित्र बदरिकाश्रममें घोर तप किया। तब उन लोगोंने आदि और अन्तसे रहित धर्मपुत्र महायोगी पवित्र नारायण नामक ऋषिका नरके साथ दर्शन किया। उन भक्तिसम्पन्न योगियोंने वेदोंमें वर्णित विविध स्तोत्रोंद्वारा स्तुति करके उन श्रेष्ठ योगीको प्रणाम किया सर्वज्ञ भगवान् (नारायण)-ने उनके अभीष्टको जानकर पुनः गम्भीर वाणीमें उनसे पूछा कि आपलोग किस प्रयोजनसे तपस्या कर रहे हैं? ॥ १५–२१ ॥<br><br>प्रसन्न मनवाले ऋषियोंने जिनका शुभ आगमन अभीष्ट-सिद्धिकी निश्चित सूचना देता है (ऐसे) उन विश्वात्मा, सनातन साक्षात् नारायणदेवसे कहा— ॥ २२ ॥<br><br>(भगवन्!) हम सभी ब्रह्मवादी संशयमें पड़ गये हैं। आप पुरुषोत्तम हैं, हम एकमात्र आपकी शरणमें आये हैं। आप उस परम तत्त्वको जाननेवाले हैं, सर्वज्ञ, भगवान्, ऋषि तथा स्वयं साक्षात् नारायण अव्यक्त पुराणपुरुष हैं। परमेश्वर! आपको छोड़कर अन्य कोई दूसरा जाननेवाला नहीं है, हमें सुननेकी इच्छा है, आप सम्पूर्ण संशयको दूर करनेमें समर्थ हैं। इस सम्पूर्ण (कार्यरूप जगत्)-का कारण क्या है? कौन नित्य गतिशील रहता है? आत्मा कौन है? मुक्ति क्या है और संसार (-की रचना)-का क्या प्रयोजन है? इस संसारका चलानेवाला शासक कौन हैं? |