भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 267

[ उपरिविभाग ]

पहला अध्याय

ईश्वर (शिव) तथा ऋषियोंके संवादमें ईश्वरगीताका उपक्रम

(ईश्वरगीता प्रारम्भ)

ऋषय ऊचुः<br><br>भवता कथितः सम्यक् सर्गः स्वायम्भुवस्ततः।<br>ब्रह्माण्डस्यास्य विस्तारो मन्वन्तरविनिश्चयः॥ १ ॥<br><br>तत्रेश्वरेश्वरो देवो वर्णिभिर्धर्मतत्परैः।<br>ज्ञानयोगरतैर्नित्यमाराध्यः कथितस्त्वया॥ २ ॥<br><br>तद्गदाशेषसंसारदुःखनाशनमुत्तमम् ।<br>ज्ञानं ब्रह्मैकविषयं येन पश्येम तत्परम्॥ ३ ॥<br><br>त्वं हि नारायणात् साक्षात् कृष्णद्वैपायनात् प्रभो।<br>अवाप्ताखिलविज्ञानस्तत्त्वां पृच्छामहे पुनः॥ ४ ॥ऋषियोंने कहा—(सूतजी!) आपने स्वायम्भुव मन्वन्तरकी सृष्टि तदुपरान्त इस ब्रह्माण्डका विस्तार और (अन्य विभिन्न) मन्वन्तरोंके विषयमें भलीभाँति बतलाया तथा उन (मन्वन्तरों)-में धर्मपरायण ज्ञानयोगी वर्णधर्मके अनुयायियोंके नित्य आराध्य ईश्वरोंके ईश्वर देवका भी वर्णन आपने किया। इसीके साथ ही आपने सम्पूर्ण संसारके दुःखोंको नष्ट करनेवाले एकमात्र ब्रह्मविषयक उस उत्तम ज्ञानका भी वर्णन किया, जिसके द्वारा हम उस परम तत्त्वको देख सकते हैं। प्रभो! आपने साक्षात् नारायण कृष्णद्वैपायन (व्यासजी)-से सम्पूर्ण तत्त्वज्ञान प्राप्त किया है, इसलिये हम आपसे पुनः पूछते हैं॥ १-४॥
श्रुत्वा मुनीनां तद् वाक्यं कृष्णद्वैपायनं प्रभुम्।<br>सूतः पौराणिकः स्मृत्वा भाषितुं ह्युपचक्रमे॥ ५ ॥<br><br>अथास्मिन्नन्तरे व्यासः कृष्णद्वैपायनः स्वयम्।<br>आजगाम मुनिश्रेष्ठा यत्र सत्रं समासते॥ ६ ॥<br><br>तं दृष्ट्वा वेदविद्वांसं कालमेघसमद्युतिम्।<br>व्यासं कमलपत्राक्षं प्रणेमुर्द्विजपुंगवाः॥ ७ ॥मुनियोंके उस वाक्यको सुनकर पौराणिक सूतजीने प्रभु कृष्ण-द्वैपायनका स्मरणकर कहना प्रारम्भ किया। इसी बीच कृष्ण-द्वैपायन व्यास स्वयं वहाँ पहुँच गये जहाँ श्रेष्ठ मुनिजन यज्ञ कर रहे थे। कृष्ण मेघके समान द्युतिवाले तथा कमलपत्रके समान नेत्रवाले उन वेदके विद्वान् व्यासजीको देखकर श्रेष्ठ द्विजोंने उन्हें प्रणाम किया॥ ५-७॥
पपात दण्डवद् भूमौ दृष्ट्वासौ रोमहर्षणः।<br>प्रदक्षिणीकृत्य गुरुं प्राञ्जलिः पार्श्वगोऽभवत्॥ ८ ॥रोमहर्षण सूतजीने भी उन्हें देखकर भूमिपर गिरकर दण्डवत् प्रणाम किया और गुरुकी प्रदक्षिणाकर हाथ जोड़ते हुए उनके पार्श्वभागमें खड़े हो गये। महामुनि (व्यास)-के द्वारा आरोग्यके विषयमें प्रश्न पूछे जानेपर उसका यथोचित उत्तर देकर शौनक आदि महामुनियोंने व्यासजीको आश्वस्त किया तथा उनके योग्य आसन उन्हें प्रदान किया॥ ८-९॥
पृष्टास्तेऽनामयं विप्राः शौनकाद्या महामुनिम्।<br>समाश्र्वास्यासनं तस्मै तद्योग्यं समकल्पयन्॥ ९ ॥
अथैतानब्रवीद् वाक्यं पराशरसुतः प्रभुः।<br>कच्चिन्न तपसो हानिः स्वाध्यायस्य श्रुतस्य च॥ १०॥तदनन्तर पराशरजीके पुत्र प्रभु (व्यास)-ने उनसे पूछा—क्या आप लोगोंके तप, स्वाध्याय तथा श्रवण किये गये वेदादिकी हानि तो नहीं हो रही है?

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