संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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२५२ * कूर्मपुराण *
| सामवेदं सहस्रेण शाखानां प्रबिभेद सः।<br>अथर्वाणमथो वेदं बिभेद नवकेन तु॥ १९॥ | इसी प्रकार उन्होंने सामवेदको हजार शाखाओंमें विभक्त किया तथा अथर्ववेदको नौ भागों (शाखाओं)-में बाँटा॥ १९॥ |
| भेदैरष्टादशैर्व्यासः पुराणं कृतवान् प्रभुः।<br>सोऽयमेकश्चतुष्पादो वेदः पूर्वं पुरातनात्॥ २०॥ | प्रभु व्यासने पुराणसंहिताके अठारह भेद किये। पूर्वकालमें सभी दोषोंको दूर करनेवाला पुरातन वही चतुष्पाद प्रणवरूप एक वेद ब्रह्मासे आविर्भूत हुआ। |
| ओङ्कारो ब्रह्मणो जातः सर्वदोषविशोधनः।<br>वेदवेद्यो हि भगवान् वासुदेवः सनातनः॥ २१॥ | सनातन भगवान् वासुदेव वेदोंद्वारा जानने योग्य हैं। वेदोंद्वारा उन्हीं परम (पुरुष)-का गान किया जाता है। |
| स गीयते परो वेदे यो वेदेनं स वेदवित्।<br>एतत् परतरं ब्रह्म ज्योतिरानन्दमुत्तमम्॥ २२॥ | जो इन्हें (परम पुरुषको) जानता है, वही वेदको जाननेवाला है। ये ही परात्पर ब्रह्म, ज्योतिरूप और श्रेष्ठ आनन्द हैं। वेदवाक्योंद्वारा प्रतिपादित तत्त्व वासुदेव ही |
| वेदवाक्योदितं तत्त्वं वासुदेवः परं पदम्।<br>वेदवेद्यमिमं वेत्ति वेदं वेदपरो मुनिः॥ २३॥ | परमपद हैं। वेदपरायण मुनि वेदोंद्वारा जानने योग्य इन्हीं (वासुदेवरूप) वेदको जानते हैं॥ २०—२३॥ |
| अवेदं परमं वेत्ति वेदनिष्ठः सदेश्वरः।<br>स वेदवेद्यो भगवान् वेदमूर्तिमहेश्वरः।<br>स एव वेदो वेद्यश्च तमेवाश्रित्य मुच्यते॥ २४॥ | जो परम अवेद्यको जानते हैं तथा वेदनिष्ठ, सदेश्वर, वेदमूर्ति, महेश्वर हैं, वे भगवान् वेदोंद्वारा ज्ञात होने योग्य हैं। वे ही भगवान् वेद हैं, वे ही (वेदसे) जानने योग्य हैं और उन्हींका आश्रय ग्रहण करनेसे मुक्ति मिलती है। |
| इत्येदक्षरं वेद्यमोङ्कारं वेदमव्ययम्।<br>अवेद्यं च विजानाति पाराशर्यो महामुनिः॥ २५॥ | पराशरके पुत्र महामुनि वेदव्यास (ही) इस अविनाशी, जानने योग्य, प्रणवस्वरूप अव्यय वेद और अवेद्य अर्थात् ज्ञात न हो सकने योग्य (परमतत्त्व)-को भी जानते हैं॥ २४-२५॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे पञ्चाशोऽध्यायः॥ ५०॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें पचासवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ५०॥