भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 263, कुल 506 में से

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पृष्ठ 263
  • अध्याय ५१ * २५३

इक्‍यावनवाँ अध्याय

कलियुगमें महादेवके अवतारों तथा उनके शिष्योंका वर्णन, भविष्यमें होनेवाले सात मन्वन्तरोंका नाम-परिगणन, कूर्मपुराणके पूर्वविभागका उपसंहार

सूत उवाच**सूतजी बोले—**सुव्रतो! द्वापरमें (होनेवाले) वेदव्यासके अवतारोंको कहा गया, अब (आपलोग) कलियुगमें होनेवाले महादेवके अवतारोंको सुनें—वैवस्वत मन्वन्तरके पहले कलियुगमें विप्रोंके हितार्थ अतितेजस्वी देवाधिदेव (शंकर) श्वेत नामसे पर्वतोंमें श्रेष्ठ हिमालयके रमणीय छगल नामक शिखरपर अवतरित हुए। उनके शिष्य शिखायुक्त और अमित प्रभाववाले हुए। श्वेत, श्वेतशिख, श्वेतास्य तथा श्वेतलोहित—ये चार वेदके पारंगत महात्मा ब्राह्मण (प्रथम कलियुगमें) थे॥ १–४॥
वेदव्यासावताराणि द्वापरे कथितानि तु।<br>महादेवावताराणि कलौ शृणुत सुव्रताः॥ १ ॥<br>आद्ये कलियुगे श्वेतो देवदेवो महाद्युतिः।<br>नाम्ना हिताय विप्राणामभूद् वैवस्वतेऽन्तरे॥ २ ॥<br>हिमवच्छिखरे रम्ये छगले पर्वतोत्तमे।<br>तस्य शिष्याः शिखायुक्ता बभूवुरमितप्रभाः॥ ३ ॥<br>श्वेतः श्वेतशिखश्चैव श्वेतास्यः श्वेतलोहितः।<br>चत्वारस्ते महात्मानो ब्राह्मणा वेदपारगाः॥ ४ ॥
सुभानो दमनश्चाथ सुहोत्रः कङ्कणस्तथा।<br>लोकाक्षिरथ योगीन्द्रो जैगीषव्यस्तु सप्तमे॥ ५ ॥सुभान, दमन, सुहोत्र, कङ्कण और योगीन्द्र लोकाक्षिके रूपमें क्रमशः दूसरेसे छठे कलियुगतक महादेवका अवतार हुआ तथा सातवें (कलियुग)-में जैगीषव्य नामसे महादेवका अवतार हुआ। आठवेंमें दधिवाह, नवेंमें प्रभु वृषभ, दसवेंमें भृगु और उसके आगे (ग्यारहवें कलियुगमें) उग्रके रूपमें महादेवका अवतार हुआ। बारहवेंमें अत्रि, तेरहवेंमें बली, चौदहवेंमें गौतम और उसके बाद (पंद्रहवें कलियुगमें) वेदशीर्षके रूपमें महादेव अवतरित हुए॥ ५–७॥
अष्टमे दधिवाहः स्यान्नवमे वृषभः प्रभुः।<br>भृगुस्तु दशमे प्रोक्तस्तस्मादुग्रः परः स्मृतः॥ ६ ॥
द्वादशेऽत्रिः समाख्यातो बली चाथ त्रयोदशे।<br>चतुर्दशे गौतमस्तु वेदशीर्षा ततः परम्॥ ७ ॥
गोकर्णश्चाभवत् तस्माद् गुहावासः शिखण्ड्यथ।<br>जटामाल्यट्टहासश्च दारुको लाङ्गली क्रमात्॥ ८ ॥<br>श्वेतस्तथा परः शूली डिण्डी मुण्डी च वै क्रमात्।<br>सहिष्णुः सोमशर्मा च नकुलीशोऽन्तिमे प्रभुः॥ ९ ॥तदनन्तर क्रमशः गोकर्ण, गुहावास, शिखण्डी, जटामाली, अट्टहास, दारुक, लाङ्गली और इनके बाद श्वेत, शूली, डिण्डी, मुण्डी, सहिष्णु, सोमशर्मा तथा अन्तिम प्रभु नकुलीशके रूपमें महादेवका अवतार हुआ॥ ८–९॥
वैवस्वतेऽन्तरे शम्भोरवतारास्त्रिशूलिनः।<br>अष्टाविंशतिराख्याता ह्यन्ते कलियुगे प्रभोः।<br>तीर्थे कायावतारे स्याद् देवेशो नकुलीश्वरः॥ १० ॥वैवस्वत मन्वन्तरमें त्रिशूल धारण करनेवाले प्रभु शम्भुके अट्ठाईस अवतार कहे गये हैं। अन्तिम कलियुगेमें कायावतार नामक तीर्थमें देवेश्वर नकुलीश्वरके रूपमें महादेवका अवतार होगा। मुनिपुंगवो! उस समय देवोंके आदिदेव (महादेव)-के तीव्र तपस्याके धनी चार शिष्य हुए। अन्य अवतारोंमें भी प्रत्येकके (चार) शिष्य हुए। वे सभी प्रसन्न मनवाले, इन्द्रियनिग्रही और ईश्वरकी भक्ति करनेवाले थे। उन श्रेष्ठ योग जाननेवाले योगियोंका मैं क्रमशः वर्णन करता हूँ—॥ १०–१२॥
तत्र देवादिदेवस्य चत्वारः सुतपोधनाः।<br>शिष्या बभूवुश्चान्येषां प्रत्येकं मुनिपुंगवाः॥ ११ ॥
प्रसन्नमनसो दान्ता ऐश्वरीं भक्तिमाश्रिताः।<br>क्रमेण तान् प्रवक्ष्यामि योगिनो योगवित्तमान्॥ १२ ॥
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