संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय ४९ * | २४९ |
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| रैवतेऽप्यन्तरे चैव सम्भूत्यां मानसोऽभवत्।<br>सम्भूतौ मानसैः सार्धं देवैः सह महाद्युतिः॥ ३१ ॥<br><br>चाक्षुषेऽप्यन्तरे चैव वैकुण्ठः पुरुषोत्तमः।<br>विकुण्ठायामसो जज्ञे वैकुण्ठैर्देवैः सह॥ ३२॥<br><br>मन्वन्तरेऽत्र सम्प्राप्ते तथा वैवस्वतेऽन्तरे।<br>वामनः कश्यपाद् विष्णुरदित्यां सम्बभूव ह॥ ३३॥<br><br>त्रिभिः क्रमैरिमाँल्लोकाञ्जित्वा येन महात्मना।<br>पुरन्दराय त्रैलोक्यं दत्तं निहतकण्टकम्॥ ३४॥<br><br>इत्येतास्तनवस्तस्य सप्त मन्वन्तरेशु वै।<br>सप्त चैवाभवन् विप्रा याभिः संरक्षिताः प्रजाः॥ ३५ ॥<br><br>यस्माद् विष्टमिदं कृत्स्नं वामनेन महात्मना।<br>तस्मात् स वै स्मृतो विष्णुर्विशेर्धातोः प्रवेशनात्॥ ३६॥<br><br>एष सर्वं सृजत्यादौ पाति हन्ति च केशवः।<br>भूतान्तरात्मा भगवान् नारायण इति श्रुतिः॥ ३७॥<br><br>एकांशेन जगत् सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः।<br>चतुर्धा संस्थितो व्यापी सगुणो निर्गुणोऽपि च॥ ३८॥<br><br>एका भगवतो मूर्त्तिर्ज्ञानरूपा शिवामला।<br>वासुदेवाभिधाना सा गुणातीता सुनिष्कला॥ ३९॥<br><br>द्वितीया कालसंज्ञान्या तामसी शेषसंज्ञिता।<br>निहन्ति सकलं चान्ते वैष्णवी परमा तनुः॥ ४०॥<br><br>सत्त्वोद्रिक्ता तथैवान्या प्रद्युम्नेति च संज्ञिता।<br>जगत् स्थापयते सर्वं स विष्णुः प्रकृतिर्ध्रुवा॥ ४१॥<br><br>चतुर्थी वासुदेवस्य मूर्त्तिर्ब्राह्मीति संज्ञिता।<br>राजसी चानिरुद्धाख्या प्रद्युम्नः सृष्टिकारिका॥ ४२॥<br><br>यः स्वपित्यखिलं भूत्वा प्रद्युम्नेन सह प्रभुः।<br>नारायणाख्यो ब्रह्माऽसौ प्रजासर्गं करोति सः॥ ४३॥<br><br>या सा नारायणतनुः प्रद्युम्नाख्या मुनीश्वराः।<br>तया सम्मोहयेद् विश्वं सदेवासुरमानुषम्॥ ४४॥ | रैवत मन्वन्तरमें भी मानस नामक देवताओंके साथ महान् द्युतिमान् हरि सम्भूतिसे मानस नामसे उत्पन्न हुए। चाक्षुष मन्वन्तरमें भी वे पुरुषोत्तम वैकुण्ठ नामक देवताओंके साथ विकुण्ठासे वैकुण्ठ नामसे उत्पन्न हुए और वैवस्वत नामक मन्वन्तर आनेपर वे विष्णु कश्यप और अदितिसे वामन नामसे उत्पन्न हुए। इन्हीं महात्माने अपने तीन पगोंसे समस्त लोकोंको जीतकर पुरन्दर इन्द्रको निष्कण्टक त्रैलोक्य (-का राज्य) प्रदान किया॥ ३१-३४॥<br><br>हे विप्रो! सात मन्वन्तरोंमें ये ही सात उन (विष्णु)-के विग्रह हुए, जिनसे प्रजाओंकी रक्षा हुई। महात्मा वामनने इस सम्पूर्ण विश्वको व्याप्त किया था, इसीलिये 'विश्' धातुका प्रवेश अर्थ होनेके कारण वे (वामन) विष्णु कहलाये। ये केशव प्रारम्भमें समस्त प्रपञ्चकी सृष्टि करते हैं, उसकी रक्षा करते हैं और (अन्तमें) उसका संहार करते हैं। भगवान् नारायण सभी प्राणियोंकी अन्तरात्मा हैं—ऐसा वेदका कथन है॥ ३५-३७॥<br><br>ये नारायण अपने एक अंशसे सम्पूर्ण संसारको व्याप्तकर प्रतिष्ठित रहते हैं। ये निर्गुण होते हुए भी सगुण रूपसे चार भागोंमें विभक्त होकर सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले हैं। (ये ही चार भाग भगवान् नारायणकी चार मूर्तियाँ हैं। इनमें) भगवान्की वासुदेव नामवाली पहली मूर्ति ज्ञानरूप, कल्याणकारिणी, निर्मल, गुणातीत और कलारहित है। दूसरी काल और शेष नामवाली वह तामसी मूर्ति विष्णुकी परम विग्रहरूपा मूर्ति है। यही अन्तमें सबका संहार करती है। इसी प्रकार सत्त्वगुणमयी प्रद्युम्न नामवाली अन्य (तीसरी) मूर्ति सम्पूर्ण जगत्की स्थापना (पालन) करती है, यही विष्णुकी ध्रुवा प्रकृति है। इन तीनों मूर्तियोंके अतिरिक्त वासुदेवकी ब्राह्मी तथा अनिरुद्ध नामवाली चौथी राजसी मूर्ति है, यह प्रद्युम्न नामक मूर्ति सृष्टि करनेवाली है॥ ३८-४२॥<br><br>जो प्रभु सम्पूर्ण (सृष्टि)-के रूपमें होकर प्रद्युम्नके साथ शयन करते हैं, नारायण नामवाले वे ही ब्रह्मा प्रजाकी सृष्टि करते हैं। मुनीश्वरो! वह जो प्रद्युम्न नामवाली नारायणकी मूर्ति है, उसके द्वारा वे (नारायण) देवता, असुर तथा मनुष्योंसे युक्त विश्वको मोहित करते हैं॥ ४३-४४॥ |