संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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२४८ * कूर्मपुराण *
| ज्योतिर्धर्मा पृथुः काव्यश्चैत्रोऽग्निर्वैनकस्तथा ।<br>पीवरस्त्वृषयो ह्येते सप्त तत्रापि चान्तरे ॥ १५ ॥<br>पञ्चमे चापि विप्रेन्द्रा रैवतो नाम नामतः ।<br>मनुर्वसुश्च तत्रेन्द्रो बभूवासुरमर्दनः ॥ १६ ॥<br>अमिताभा भूतरया वैकुण्ठाः स्वच्छमेधसः ।<br>एते देवगणास्तत्र चतुर्दश चतुर्दश ॥ १७ ॥<br>हिरण्यरोमा वेदश्रीरूर्ध्वबाहुस्तथैव च ।<br>वेदबाहुः सुधामा च पर्जन्यश्च महामुनिः ।<br>एते सप्तर्षयो विप्रास्तत्रासन् रैवतेऽन्तरे ॥ १८ ॥<br>स्वारोचिषश्चोत्तमश्च तामसो रैवतस्तथा ।<br>प्रियव्रतान्वया ह्येते चत्वारो मनवः स्मृताः ॥ १९ ॥ | उस मन्वन्तरमें भी ज्योतिर्धर्मा, पृथु, काव्य, चैत्र, अग्नि, वनक और पीवर नामक—ये सात ऋषि हुए। विप्रेन्द्रो! पाँचवें मन्वन्तरमें रैवत नामवाले मनु और असुरोंका मर्दन करनेवाले वसु नामवाले इन्द्र हुए। अमिताभ, भूतरय, वैकुण्ठ और स्वच्छमेधा—ये चौदह-चौदहकी संख्यावाले (चार) गणदेवता थे। हे विप्रो! रैवत मन्वन्तरमें हिरण्यरोमा, वेदश्री, ऊर्ध्वबाहु, वेदबाहु, सुधामा, पर्जन्य और महामुनि—ये सप्तर्षि हुए। स्वारोचिष, उत्तम, तामस तथा रैवत—ये चार मनु प्रियव्रतके वंशज कहे जाते हैं ॥ १५-१९ ॥ |
| षष्ठे मन्वन्तरे चासीच्चाक्षुषस्तु मनुर्द्विजाः ।<br>मनोजवस्तथैवेन्द्रो देवानपि निबोधत ॥ २० ॥<br>आद्याः प्रसूता भाव्याश्च पृथुगाश्च दिवौकसः ।<br>महानुभावा लेख्याश्च पञ्चैते ह्यष्टका गणाः ॥ २१ ॥<br>सुमेधा विरजाश्चैव हविष्मानुत्तमो मधुः ।<br>अतिनामा सहिष्णुश्च समासन्नृषयः शुभाः ॥ २२ ॥ | हे द्विजो! छठे मन्वन्तरके मनु चाक्षुष हैं। इस मन्वन्तरके इन्द्रका नाम मनोजव है। (अब) देवताओंको सुनो—आद्य, प्रसूत, भाव्य, पृथुग और लेख्य—ये पाँच महानुभाव आठ-आठकी संख्यावाले देवताओंके गण हैं। सुमेधा, विरजा, हविष्मान्, उत्तम, मधु, अतिनाम और सहिष्णु—ये सात कल्याणकारी ऋषि हैं ॥ २०-२२ ॥ |
| विवस्वतः सुतो विप्राः श्राद्धदेवो महाद्युतिः ।<br>मनुः स वर्तते धीमान् साम्प्रतं सप्तमेऽन्तरे ॥ २३ ॥ | विप्रो! विवस्वान्के पुत्र बुद्धिमान् एवं महान् तेजस्वी श्राद्धदेव इस समय सातवें मन्वन्तरके मनु हैं। आदित्य, |
| आदित्या वसवो रुद्रा देवास्तत्र मरुद्गणाः ।<br>पुरंदरस्तथैवेन्द्रो बभूव परवीरहा ॥ २४ ॥ | वसुगण, रुद्र तथा मरुद्गण इसमें देवता हैं। इसी प्रकार वीर शत्रुओंका नाश करनेवाले पुरन्दर नामवाले (इस मन्वन्तरके) इन्द्र हैं। वसिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र |
| वसिष्ठः कश्यपश्चात्रिजमदग्निश्च गौतमः ।<br>विश्वामित्रो भरद्वाजः सप्त सप्तर्षयोऽभवन् ॥ २५ ॥ | तथा भरद्वाज—ये सात सप्तर्षि हैं। (इस मन्वन्तरमें) |
| विष्णुशक्तिरनौपम्या सत्त्वोद्रिक्ता स्थिता स्थितौ ।<br>तदंशभूता राजानः सर्वे च त्रिदिवौकसः ॥ २६ ॥ | विष्णुकी अनुपम सत्त्वगुणमयी शक्ति (सृष्टि)-की रक्षाके लिये स्थित है। सभी राजा और सभी देवगण इसी (विष्णुशक्ति)-के अंशसे उत्पन्न हैं। द्विजो! स्वायम्भुव |
| स्वायम्भुवेऽन्तरे पूर्वमाकृत्यां मानसः सुतः ।<br>रुचेः प्रजापतेर्यज्ञस्तदंशेनाभवद् द्विजाः ॥ २७ ॥ | मन्वन्तरमें सर्वप्रथम प्रजापति रुचिका आकूति (नामक पत्नी)-से यज्ञ नामक मानस पुत्र हुआ, यह विष्णुका अंश था। तदनन्तर पुनः वे ही देव (विष्णु) स्वारोचिष |
| ततः पुनरसौ देवः प्राप्ते स्वारोचिषेऽन्तरे ।<br>तुषितायां समुत्पन्नस्तुषितैः सह दैवतैः ॥ २८ ॥ | मन्वन्तरके आनेपर तुषितासे तुषित नामके देवताओंके साथ उत्पन्न हुए ॥ २३-२८ ॥ |
| औत्तमेऽप्यन्तरे विष्णुः सत्यैः सह सुरोत्तमैः ।<br>सत्यायामभवत् सत्यः सत्यरूपो जनार्दनः ॥ २९ ॥ | औत्तम मन्वन्तरमें सत्यरूप जनार्दन विष्णु सत्य नामक श्रेष्ठ देवताओंके साथ सत्य नामधारी सत्यासे उत्पन्न हुए और तामस नामक मन्वन्तर आनेपर |
| तामसस्यान्तरे चैव सम्प्राप्ते पुनरेव हि ।<br>हर्यायां हरिभिर्देवैर्हरिरेवाभवद्धरिः ॥ ३० ॥ | साक्षात् ये हरि ही हरि नामक देवताओंके साथ हर्यासे हरि इस नामसे उत्पन्न हुए ॥ २९-३० ॥ |