संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय ४७ * | २४३ |
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| सर्वे चतुर्भुजाकाराः शङ्खचक्रगदाधराः।<br>सुपीतवाससः सर्वे श्रीवत्साङ्कितवक्षसः॥ ४६॥ | ये सभी चार भुजाओंवाले, शंख, चक्र तथा गदा धारण करनेवाले, सुन्दर पीताम्बर धारण करनेवाले एवं श्रीवत्ससे अङ्कित वक्षःस्थलवाले हैं॥ ४६॥ |
| अन्ये महेश्वरपरास्त्रिपुण्ड्राङ्कितमस्तकाः।<br>स्वयोगोद्भूतकिरणा महागरुडवाहनाः॥ ४७॥ | अन्य (कुछ) लोग महेश्वरके भक्त हैं। वे मस्तकपर त्रिपुण्ड्र धारण करते हैं। वे अपने योगसे उत्पन्न रश्मियोंसे लोकको प्रकाशित करते हैं और महागरुड उनके वाहन हैं। सभी शक्तियोंसे सम्पन्न, नित्य आनन्दसे पूर्ण, शुद्धान्तःकरण तथा विष्णुके अन्तरमें विचरण करनेवाले पुरुष वहाँ रहते हैं॥ ४७-४८॥ |
| सर्वशक्तिसमायुक्ता नित्यानन्दाश्च निर्मलाः।<br>वसन्ति तत्र पुरुषा विष्णोरन्तरचारिणः॥ ४८॥<br>तत्र नारायणस्यान्यद् दुर्गमं दुरतिक्रमम्।<br>नारायणं नाम पुरं व्यासाद्यैरुपशोभितम्॥ ४९॥ | वहाँ व्यास आदिसे सुशोभित नारायणका दूसरा दुर्गम तथा दुर्लङ्घ्य नारायण नामक एक पुर है। वह पुर सोनेके परकोटेसे युक्त, स्फटिकके मण्डपोंसे समन्वित, हजारों प्रकारकी प्रभाओंसे अलंकृत, अत्यन्त सुन्दर और दुराधर्ष है तथा सोनेके प्रासादोंसे युक्त एवं अनेक बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओंसे व्याप्त है। वह पुर स्वर्णसे बने हजारों विचित्र गोपुरों* और नाना प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित है, साथ ही वह स्वच्छ आसनोंसे युक्त एवं विविध प्रकारसे अलंकृत है। वह पुर विविध प्रकारके उद्यानों और नदियोंसे शोभित है। सब ओरसे सरोवरोंसे युक्त और वीणा तथा वेणुकी ध्वनिसे निनादित है। विचित्र प्रकारकी अनेक पताकाओंसे शोभित है। सब ओरसे वीथियों और रत्नसे विभूषित सीढ़ियोंसे युक्त है॥ ४९-५३॥ |
| हेमप्राकारसंयुक्तं स्फाटिकैर्मण्डपैर्युतम्।<br>प्रभासहस्रकलिलं दुराधर्षं सुशोभनम्।<br>हर्म्यप्राकारसंयुक्तमट्टालकसमाकुलम् ॥५०॥ | |
| हेमगोपुरसाहस्रैर्नानारत्नोपशोभितैः ।<br>शुभ्रास्तरणसंयुक्तं विचित्रैः समलंकृतम्॥ ५१॥ | |
| नन्दनैर्विविधाकारैः स्रवन्तीभिश्च शोभितम्।<br>सरोभिः सर्वतो युक्तं वीणावेणुनिनादितम्॥ ५२॥ | |
| पताकाभिर्विचित्राभिरनेकाभिश्च शोभितम्।<br>वीथीभिः सर्वतो युक्तं सोपानै रत्नभूषितैः॥ ५३॥ | |
| नारीशतसहस्राढ्यं दिव्यगेयसमन्वितम्।<br>हंसकारण्डवाकीर्णं चक्रवाकोपशोभितम्।<br>चतुर्द्वारमनौपम्यमगम्यं देवविद्विषाम्॥ ५४॥ | सैकड़ों, हजारों स्त्रियोंसे सम्पन्न तथा दिव्य गानसे समन्वित है। हंस एवं सारस पक्षियोंसे व्याप्त है, चक्रवाकोंसे सुशोभित है। उसमें अनुपमेय चार द्वार हैं तथा वह सुरद्वेषी असुरोंके लिये अगम्य है। (वह पुर) विविध प्रकारके गीतोंको जाननेवाले देवताओंके लिये भी दुर्लभ, नाना विलासोंसे सम्पन्न, कामके अभिलाषी, अतिकोमल, पूर्ण चन्द्रमाके समान मुखवाले, नूपुरकी ध्वनिसे युक्त, मन्द मुसकानवाले, सुन्दर बिम्बके समान ओठवाले, मुग्ध मृगशावकके समान नेत्रवाले, सम्पूर्ण ऐश्वर्योंसे सम्पन्न, अलंकृत, क्षीण कटिभागवाले, राजहंसके समान सुन्दर चालवाले, अच्छे वेषवाले, मधुर स्वरवाले, बोल-चालमें प्रवीण, दिव्य अलङ्कारोंसे |
| तत्र तत्राप्सरःसङ्घैर्नृत्यद्भिरुपशोभितम्।<br>नानागीतविधानज्ञैर्देवानापि दुर्लभैः॥ ५५॥ | |
| नानाविलाससम्पन्नैः कामुकैरतिकोमलैः।<br>प्रभूतचन्द्रवदनैर्नूपुरारावसंयुतैः ॥५६॥ | |
| ईषत्स्मितैः सुबिम्बोष्ठैर्बालमुग्धमृगेक्षणैः।<br>अशेषविभवोपेतैर्भूषितैस्तनुमध्यमैः ॥ ५७॥ | |
| सुराजहंसचलनैः सुवेषैर्मधुरस्वनैः।<br>संलापालापकुशलैर्दिव्याभरणभूषितैः ॥ ५८॥ |
* गोपुर—नगरका बड़ा फाटक अथवा फाटक मात्र।