भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२४२ * कूर्मपुराण *

अर्चयन्ति महादेवं यज्ञदानसमाधिभिः ।<br>व्रतोपवासैर्विविधैर्होमैः स्वाध्यायतर्पणैः ॥ ३० ॥<br><br>तेषां वै रुद्रसायुज्यं सारूप्यं चातिदुर्लभम् ।<br>सलोकता च सामीप्यं जायते तत्प्रसादतः ॥ ३१ ॥<br>क्रौञ्चद्वीपस्य विस्ताराद् द्विगुणेन समन्ततः ।<br>शाकद्वीपः स्थितो विप्रा आवृत्य दधिसागरम् ॥ ३२ ॥<br>उदयो रैवतश्चैव श्यामाकोऽस्तगिरिस्तथा ।<br>आम्बिकेयस्तथा रम्यः केशरी चेति पर्वताः ॥ ३३ ॥<br>सुकुमारी कुमारी च नलिनी रेणुका तथा ।<br>इक्षुका धेनुका चैव गभस्तिश्चेति निम्नगाः ॥ ३४ ॥<br>आसां पिबन्तः सलिलं जीवन्ते तत्र मानवाः ।<br>अनामया ह्यशोकाश्च रागद्वेषविवर्जिताः ॥ ३५ ॥<br>मगाश्च मगधाश्चैव मानवा मन्दगास्तथा ।<br>ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चात्र क्रमेण तु ॥ ३६ ॥<br>यजन्ति सततं देवं सर्वलोकैकसाक्षिणम् ।<br>व्रतोपवासैर्विविधैर्देवदेवं दिवाकरम् ॥ ३७ ॥<br>तेषां सूर्येण सायुज्यं सामीप्यं च सरूपता ।<br>सलोकता च विप्रेन्द्रा जायते तत्प्रसादतः ॥ ३८ ॥<br>शाकद्वीपं समावृत्य क्षीरोदः सागरः स्थितः ।<br>श्वेतद्वीपश्च तन्मध्ये नारायणपरायणाः ॥ ३९ ॥<br><br>तत्र पुण्या जनपदा नानाश्चर्यसमन्विताः ।<br>श्वेतास्तत्र नरा नित्यं जायन्ते विष्णुतत्पराः ॥ ४० ॥<br>नाधयो व्याधयस्तत्र जरामृत्युभयं न च ।<br>क्रोधलोभविनिर्मुक्ता मायामात्सर्यवर्जिताः ॥ ४१ ॥<br><br>नित्यपुष्टा निरातङ्का नित्यानन्दाश्च भोगिनः ।<br>नारायणपराः सर्वे नारायणपरायणाः ॥ ४२ ॥<br><br>केचिद् ध्यानपरा नित्यं योगिनः संयतेन्द्रियाः ।<br>केचिज्जपन्ति तप्यन्ति केचिद् विज्ञानिनोऽपरे ॥ ४३ ॥<br><br>अन्ये निर्बीजयोगेन ब्रह्मभावेन भाविताः ।<br>ध्यायन्ति तत् परं व्योम वासुदेवं परं पदम् ॥ ४४ ॥<br><br>एकान्तिनो निरालम्बा महाभागवताः परे ।<br>पश्यन्ति परमं ब्रह्म विष्ण्वाख्यं तमसः परम् ॥ ४५ ॥ये यज्ञ, दान, समाधि, व्रत, उपवास, विविध होम, स्वाध्याय एवं तर्पणद्वारा महादेवकी अर्चना करते हैं। इन्हें महादेवकी कृपासे उनका (रुद्रका) अति दुर्लभ सायुज्य, सारूप्य, सालोक्य तथा सामीप्य (मोक्ष) प्राप्त होता है ॥ ३०-३१ ॥<br><br>हे विप्रो! क्रौञ्चद्वीपके दुगुने विस्तारमें चारों ओरसे दधिसमुद्रको आवृतकर शाकद्वीप स्थित है। (यहाँ) उदय, रैवत, श्यामाक, अस्तगिरि, आम्बिकेय, रम्य तथा केशरी—ये पर्वत हैं। यहाँ सुकुमारी, कुमारी, नलिनी, रेणुका, इक्षुका, धेनुका और गभस्ति—ये नदियाँ हैं। इनका जल पीकर यहाँके मनुष्य (सुखमय) जीवन व्यतीत करते हैं। ये रोगरहित, शोकविहीन और राग-द्वेषसे मुक्त रहते हैं ॥ ३२—३५ ॥<br><br>ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—ये क्रमशः मग, मगध, मानव तथा मन्दग कहलाते हैं। ये सभी लोकोंके एकमात्र साक्षी देवाधिदेव सूर्यदेवका विविध व्रत एवं उपवासोंद्वारा निरन्तर यजन करते हैं। हे विप्रेन्द्रो! सूर्यके अनुग्रहसे इन्हें उनकी सायुज्यता, सामीप्यता, सारूप्यता और सालोक्यता प्राप्त होती है ॥ ३६-३८ ॥<br><br>शाकद्वीपको आवृत करके क्षीरोद सागर स्थित है, उसके मध्यमें श्वेतद्वीप है। वहाँ नारायण-परायण लोग रहते हैं। वहाँ नाना आश्चर्योंसे समन्वित अनेक पवित्र जनपद हैं। वहाँके मनुष्य श्वेतवर्णके और नित्य विष्णुकी भक्तिमें तत्पर रहते हैं ॥ ३९-४० ॥<br><br>वहाँ न कोई आधि-व्याधि है, न वृद्धावस्था है तथा न मृत्युका भय ही है। सभी लोग नारायणके भक्त तथा क्रोध-लोभसे रहित, माया एवं मात्सर्यसे मुक्त, नित्य पुष्ट, आतङ्करहित, नित्य आनन्दयुक्त, भोग करनेवाले तथा नारायण-परायण रहते हैं। वहाँके कुछ निवासी जितेन्द्रिय एवं नित्य ध्यानपरायण योगी हैं, कोई जप करते हैं, कोई तप करते हैं और कुछ लोग विशिष्ट ज्ञान-सम्पन्न हैं। दूसरे निर्बीज योगके द्वारा ब्रह्मभावसे भावित होकर उन परम व्योमरूप, परमपद वासुदेवका ध्यान करते हैं। कुछ दूसरे अनन्यचेता, अन्य आश्रयरहित महाभागवत लोग तम (अज्ञान)-से परे विष्णु नामक परम ब्रह्मका दर्शन करते हैं ॥ ४१—४५ ॥