भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय ४७ *२४१
कुमुदश्रोन्नताश्चैव तृतीयश्च बलाहकः।<br>द्रोणः कङ्कस्तु महिषः ककुद्मान् सप्त पर्वताः ॥ १४ ॥<br><br>योनी तोया वितृष्णा च चन्द्रा शुक्ला विमोचिनी।<br>निवृत्तिश्चेति ता नद्यः स्मृता पापहरा नृणाम् ॥ १५ ॥<br><br>न तेषु विद्यते लोभः क्रोधो वा द्विजसत्तमाः।<br>न चैवास्ति युगावस्था जना जीवन्त्यनामयाः ॥ १६ ॥<br><br>यजन्ति सततं तत्र वर्णा वायुं सनातनम्।<br>तेषां तस्याथ सायुज्यं सारूप्यं च सलोकता ॥ १७ ॥<br>कपिला ब्राह्मणाः प्रोक्ता राजानश्चारुणास्तथा।<br>पीता वैश्याः स्मृताः कृष्णा द्वीपेऽस्मिन् वृषला द्विजाः ॥ १८ ॥<br>शाल्मलस्य तु विस्ताराद् द्विगुणेन समन्ततः।<br>संवेष्ट्य तु सुरोदाब्धिं कुशद्वीपो व्यवस्थितः ॥ १९ ॥<br>विद्रुमश्चैव हेमश्च द्युतिमान् पुष्पवांस्तथा।<br>कुशेशयो हरिश्चाथ मन्दरः सप्त पर्वताः ॥ २० ॥<br>धुतपापा शिवा चैव पवित्रा सम्मता तथा।<br>विद्युदम्भा मही चेति नद्यस्तत्र जलावाहाः ॥ २१ ॥<br>अन्याश्च शतशो विप्रा नद्यो मणिजलाः शुभाः।<br>तासु ब्रह्माणमीशानं देवादद्याः पर्युपासते ॥ २२ ॥<br><br>ब्राह्मणा द्रविणो विप्राः क्षत्रियाः शुष्मिणस्तथा।<br>वैश्याः स्नेहास्तु मन्देहाः शूद्रास्तत्र प्रकीर्तिताः ॥ २३ ॥<br><br>सर्वे विज्ञानसम्पन्ना मैत्रादिगुणसंयुताः।<br>यथोक्तकारिणः सर्वे सर्वे भूतहिते रताः ॥ २४ ॥<br><br>यजन्ति विविधैर्यज्ञैर्ब्रह्माणं परमेष्ठिनम्।<br>तेषां च ब्रह्मसायुज्यं सारूप्यं च सलोकता ॥ २५ ॥<br><br>कुशद्वीपस्य विस्ताराद् द्विगुणेन समन्ततः।<br>क्रौञ्चद्वीपस्ततो विप्रा वेष्टयित्वा घृतोदधिम् ॥ २६ ॥<br>क्रौञ्चो वामनकश्चैव तृतीयश्चान्धकारकः।<br>देवावृच्च विविन्दश्च पुण्डरीकस्तथैव च।<br>नाम्ना च सप्तमः प्रोक्तः पर्वतो दुन्दुभिस्वनः ॥ २७ ॥<br>गौरी कुमुद्वती चैव संध्या रात्रिर्मनोजवा।<br>ख्यातिश्च पुण्डरीका च नद्यः प्राधान्यतः स्मृताः ॥ २८ ॥<br>पुष्कराः पुष्कला धन्यास्तिष्यास्तस्य क्रमेण वै।<br>ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चैव द्विजोत्तमाः ॥ २९ ॥कुमुद, उन्नत, तीसरा बलाहक, द्रोण, कङ्क, महिष तथा ककुद्मान्—ये सात (कुल) पर्वत हैं। योनी, तोया, वितृष्णा, चन्द्रा, शुक्ला, विमोचिनी तथा निवृत्ति—ये सात नदियाँ मनुष्योंका पाप हरण करनेवाली कही गयी हैं। हे द्विजश्रेष्ठो! उनमें (यहाँके निवासियोंमें) न लोभ है, न क्रोध है और न (यहाँ) युगकी व्यवस्था ही है। यहाँके सभी लोग रोगरहित होकर जीवित रहते हैं। यहाँके सभी वर्णोंके लोग निरन्तर सनातन वायुदेवका यजन करते हैं, इन्हें उन (वायुदेव)-का सायुज्य, सारूप्य तथा सालोक्य (नामक मोक्ष) प्राप्त होता है ॥ १४–१७ ॥<br><br>हे द्विजो! इस (शाल्मलि) द्वीपमें ब्राह्मण कपिल वर्णके और क्षत्रिय अरुण वर्णके कहे गये हैं। वैश्य पीतवर्णके तथा वृषल (शूद्र) कृष्ण वर्णके बतलाये गये हैं। शाल्मलद्वीपके दुगुने विस्तारमें चारों ओरसे सुरोदसागरको आवेष्टित कर कुशद्वीप स्थित है। विद्रुम, हेम, द्युतिमान्, पुष्पवान्, कुशेशय, हरि तथा मन्दर—ये सात (कुल) पर्वत हैं। यहाँ धुतपापा, शिवा, पवित्रा, संमता, विद्युदम्भा और मही (नामक) जलसे पूर्ण नदियाँ हैं ॥ १८–२१ ॥<br><br>हे विप्रो! यहाँ मणिके समान स्वच्छ जलवाली अन्य भी सैकड़ों नदियाँ हैं। इनमें देवता आदि ईशान ब्रह्माकी उपासना करते हैं। विप्रो! वहाँके ब्राह्मण द्रविण, क्षत्रिय शुष्मिण, वैश्य स्नेह तथा शूद्र मन्देह कहे गये हैं। यहाँके सभी लोग विशिष्ट ज्ञानसे सम्पन्न, मैत्री आदि गुणोंसे समन्वित, विहित कर्मोंको करनेवाले तथा सभी प्राणियोंके हित-चिन्तनमें लगे रहते हैं। ये विविध यज्ञोंद्वारा परमेष्ठी ब्रह्माका यजन करते हैं और उन्हें ब्रह्माका सायुज्य, सारूप्य तथा सालोक्य (मोक्ष) प्राप्त होता है ॥ २२–२५ ॥<br><br>हे विप्रो! कुशद्वीपके दुगुने विस्तारमें चारों ओर घृतसमुद्रको आवेष्टित करके क्रौञ्चद्वीप स्थित है। क्रौञ्च, वामनक, अन्धकारक, देवावृत्, विविन्द, पुण्डरीक तथा दुन्दुभिस्वन नामक सात पर्वत यहाँ कहे गये हैं। गौरी, कुमुद्वती, संध्या, रात्रि, मनोजवा, ख्याति तथा पुण्डरीक—ये प्रधान नदियाँ यहाँ कही गयी हैं। हे द्विजोत्तमो! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र—ये क्रमशः पुष्कर, पुष्कल, धन्य तथा तिष्य नामसे यहाँ कहे जाते हैं ॥ २६–२९ ॥