भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२४० * कूर्मपुराण *

सैंतालीसवाँ अध्याय

प्लक्ष आदि महाद्वीपों, वहाँके पर्वतों, नदियों तथा निवासियोंका वर्णन, श्वेतद्वीपमें स्थित नारायणपुरका वर्णन, वहाँ वैकुण्ठमें रहनेवाले लक्ष्मीपति शेषशायी नारायणकी महिमाका ख्यापन

सूत उवाचसूतजी बोले—
जम्बूद्वीपस्य विस्ताराद् द्विगुणेन समन्ततः।<br>संवेष्टयित्वा क्षारोदं प्लक्षद्वीपो व्यवस्थितः॥ १ ॥<br>प्लक्षद्वीपे च विप्रेन्द्राः समासन् कुलपर्वताः।<br>ऋज्वायताः सुपर्वाणः सिद्धसङ्घनिषेविताः॥ २ ॥<br>गोमेदः प्रथमस्तेषां द्वितीयश्चन्द्र उच्यते।<br>नारदो दुन्दुभिश्चैव सोमश्च ऋषभस्तथा।<br>वैभ्राजः सप्तमः प्रोक्तो ब्रह्मणोऽत्यन्तवल्लभः॥ ३ ॥<br>तत्र देवर्षिगन्धर्वैः सिद्धैश्च भगवानजः।<br>उपास्यते स विश्वात्मा साक्षी सर्वस्य विश्वसृक्॥ ४ ॥जम्बूद्वीपके विस्तारसे दुगुने विस्तारमें चारों ओरसे क्षार सागरको आवृतकर प्लक्षद्वीप स्थित है। श्रेष्ठ विप्रो! प्लक्षद्वीपमें सीधे विस्तारवाले, सुन्दर पर्वोंवाले तथा सिद्धोंके समूहोंसे सेवित सात कुलपर्वत हैं। उनमें गोमेद पहला है, दूसरा चन्द्र पर्वत कहलाता है। इसी प्रकार नारद, दुन्दुभि, सोम, ऋषभ तथा सातवाँ वैभ्राज नामक पर्वत कहा गया है, जो ब्रह्माको अत्यन्त प्रिय है। वहाँ देवर्षियों, गन्धर्वों तथा सिद्धोंके द्वारा सबके साक्षी, विश्वकी सृष्टि करनेवाले विश्वात्मा भगवान् अज (ब्रह्मा)-की उपासना की जाती है॥ १-४॥
तेषु पुण्या जनपदा नाधयो व्याधयो न च।<br>न तत्र पापकर्तारः पुरुषा वा कथञ्चन॥ ५ ॥उन (पर्वतों)-में पवित्र जनपद हैं। वहाँ न कोई आधि है, न कोई व्याधि। वहाँ रहनेवाले पुरुष किसी भी प्रकारका पाप नहीं करते हैं।
तेषां नद्यश्च सप्तैव वर्षाणां तु समुद्रगाः।<br>तासु ब्रह्मर्षयो नित्यं पितामहमुपासते॥ ६ ॥<br>अनुतप्ता शिखी चैव विपापा त्रिदिवा कृता।<br>अमृता सुकृता चैव नामतः परिकीर्तिताः॥ ७ ॥समुद्रकी ओर जानेवाली उन वर्षपर्वतोंकी सात नदियाँ हैं, उनमें ब्रह्मर्षि नित्य पितामहकी उपासना करते हैं। (वे नदियाँ) अनुतप्ता, शिखी, विपापा, त्रिदिवा, कृता, अमृता और सुकृता नामवाली कही गयी हैं॥ ५-७॥
क्षुद्रनद्यस्त्वसंख्याताः सरांसि सुबहून्यपि।<br>न चैतेषु युगावस्था पुरुषा वै चिरायुषः॥ ८ ॥<br>आर्यकाः कुरवाश्चैव विदशा भाविनस्तथा।<br>ब्रह्मक्षत्रियविट्शूद्रास्तस्मिन् द्वीपे प्रकीर्तिताः॥ ९ ॥इनके अतिरिक्त असंख्य छोटी-छोटी नदियाँ तथा बहुतसे सरोवर भी वहाँपर हैं। यहाँ (सत्य, त्रेता आदि रूपमें) युगोंकी व्यवस्था नहीं है और सभी पुरुष दीर्घायु होते हैं। इस द्वीपमें आर्यक, कुरव, विदश तथा भावी नामक ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र कहे गये हैं॥ ८-९॥
इज्यते भगवान् सोमो वर्णैस्तत्र निवासिभिः।<br>तेषां च सोमसायुज्यं सारूप्यं मुनिपुंगवाः॥ १०॥हे मुनिश्रेष्ठो! यहाँ रहनेवाले विभिन्न वर्णवालोंके द्वारा भगवान् सोमकी पूजा की जाती है, उन्हें सोमका सायुज्य और सारूप्य (नामक मोक्ष) प्राप्त होता है।
सर्वे धर्मपरा नित्यं नित्यं मुदितमानसाः।<br>पञ्चवर्षसहस्राणि जीवन्ति च निरामयाः॥ ११॥वहाँके सभी लोग नित्य धर्मपरायण और नित्य प्रसन्नचित्त रहते हैं तथा रोगरहित होकर पाँच हजार वर्षतक जीवित रहते हैं।
प्लक्षद्वीपप्रमाणं तु द्विगुणेन समन्ततः।<br>संवेष्ट्येक्षुरसाम्भोधिं शाल्मलिः संव्यवस्थितः॥ १२॥<br>सप्त वर्षाणि तत्रापि सप्तैव कुलपर्वताः।<br>ऋज्वायताः सुपर्वाणः सप्त नद्यश्च सुव्रताः॥ १३॥प्लक्षद्वीपके दुगुने प्रमाणमें चारों ओर इक्षुरसके समुद्रको आवेष्टितकर शाल्मलि नामक द्वीप स्थित है। वहाँ भी सात वर्ष और सात ही कुलपर्वत हैं, (वे पर्वत) सीधे फैले हुए और सुन्दर पर्वोंवाले हैं। हे सुव्रतो! (वहाँ) सात नदियाँ भी हैं॥ १०-१३॥