संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
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| * अध्याय ४६ * | २३९ |
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| पिञ्जरस्य गिरेः शृङ्गे गणेशानां पुरत्रयम्।<br>नन्दीश्वरस्य कपिले तत्रास्ते सुयशा यतिः॥ ४९॥<br><br>तथा च जारुधेः शृङ्गे देवदेवस्य धीमतः।<br>दीप्तमायतनं पुण्यं भास्करस्यामितौजसः॥ ५०॥<br><br>तस्यैवोत्तरदिग्भागे चन्द्रस्थानमनुत्तमम्।<br>रमते तत्र रम्योऽसौ भगवान् शीतदीधितिः॥ ५१॥<br><br>अन्यच्च भवनं दिव्यं हंसशैले महर्षयः।<br>सहस्रयोजनायामं सुवर्णमणितोरणम्॥ ५२॥<br><br>तत्रास्ते भगवान् ब्रह्मा सिद्धसङ्घैरभिष्टुतः।<br>सावित्र्या सह विश्वात्मा वासुदेवादिभिर्युतः॥ ५३॥<br><br>तस्य दक्षिणदिग्भागे सिद्धानां पुरमुत्तमम्।<br>सनन्दनादयो यत्र वसन्ति मुनिपुंगवाः॥ ५४॥<br><br>पञ्चशैलस्य शिखरे दानवानां पुरत्रयम्।<br>नातिदूरेण तस्याथ दैत्याचार्यस्य धीमतः॥ ५५॥<br><br>सुगन्धशैलशिखरे सरिद्भिरुपशोभितम्।<br>कर्दमस्याश्रमं पुण्यं तत्रास्ते भगवानृषिः॥ ५६॥<br><br>तस्यैव पूर्वदिग्भागे किञ्चिद् वै दक्षिणाश्रिते।<br>सनत्कुमारो भगवांस्तत्रास्ते ब्रह्मवित्तमः॥ ५७॥<br><br>सर्वेष्वेतेषु शैलेषु तथान्येषु मुनीश्वराः।<br>सरांसि विमला नद्यो देवानामाल्यानि च॥ ५८॥<br><br>सिद्धलिङ्गानि पुण्यानि मुनिभिः स्थापितानि तु।<br>वन्यान्याश्रमवर्याणि संख्यातुं नैव शक्नुयाम्॥ ५९॥<br><br>एष संक्षेपतः प्रोक्तो जम्बूद्वीपस्य विस्तरः।<br>न शक्यं विस्तराद् वक्तुं मया वर्षशतैरपि॥ ६०॥ | पिञ्जर गिरिके शिखरपर गणेशोंके तीन पुर तथा (वहीं) कपिल(शिखर)-पर नन्दीश्वरकी पुरी है, वहाँ उत्तम यशवाले यतिगण निवास करते हैं। इसी प्रकार जारुधि पर्वतके शिखरपर अमित तेजस्वी बुद्धिमान् देवाधिदेव भास्करका दीप्तियुक्त पवित्र भवन है। उसीके उत्तर दिग्भागमें चन्द्रमाका उत्तम स्थान है, वहाँ शीत किरणोंवाले ये रम्य भगवान् (चन्द्रमा) रहते हैं॥ ४९-५१॥<br><br>हे महर्षियो! हंसशैलपर एक दूसरा दिव्य भवन है, जो एक हजार योजन विस्तारवाला है और सुवर्ण तथा मणिसे निर्मित तोरणवाला है। वहाँ सिद्धोंके समूहसे सेवित और वासुदेव आदिसे युक्त विश्वात्मा भगवान् ब्रह्मा सावित्रीके साथ रहते हैं। उसके दक्षिण दिग्भागमें सिद्धोंका श्रेष्ठ पुर है, जहाँ सनन्दन आदि श्रेष्ठ मुनि रहते हैं॥ ५२-५४॥<br><br>पञ्चशैलके शिखरपर दानवोंके तीन पुर हैं। उसके समीप ही सुगन्ध शैलके शिखरपर दैत्योंके आचार्य बुद्धिमान् भगवान् कर्दम ऋषिका नदियोंसे सुशोभित एक पवित्र आश्रम है॥ ५५-५६॥<br><br>उसीके पूर्व दिग्भागमें कुछ दक्षिण दिशाकी ओर ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ भगवान् सनत्कुमार रहते हैं। हे मुनीश्वरो! इन सभी शैलों तथा अन्य शैलोंमें भी अनेक सरोवर, स्वच्छ जलवाली नदियाँ और देवताओंके भवन हैं। वहाँ जो मुनियोंद्वारा स्थापित पवित्र सिद्ध लिङ्ग, वन तथा श्रेष्ठ आश्रम हैं, उनकी गणना मैं नहीं कर सकता। यह संक्षेपमें जम्बूद्वीपका विस्तार बतलाया गया, सैकड़ों वर्षोंमें भी मैं इसके विस्तारका वर्णन नहीं कर सकता॥ ५७-६०॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे षट्चत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४६॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें छियालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४६॥