भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 248, कुल 506 में से

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२३८ * कूर्मपुराण *


नद्यो विमलपानीयाश्चित्रनीलोत्पलाकराः।
कर्णिकारवनं दिव्यं तत्रास्ते शंकरोमया॥ ३६॥

पारियात्रे महाशैले महालक्ष्म्‍याः पुरं शुभम्।
रम्यप्रासादसंयुक्तं घण्टाचामरभूषितम्॥ ३७॥

नृत्यद्भिरप्सरःसङ्घैरितश्चेतश्च शोभितम्।
मृदङ्गमुरजोद्‍घुष्टं वीणावेणुनिनादितम्॥ ३८॥

गन्धर्वकिंनराकीर्णं संवृतं सिद्धपुंगवैः।
भास्वद्‍भित्तिसमाकीर्णं महाप्रासादसंकुलम्॥ ३९॥

गणेश्वराङ्गनाजुष्टं धार्मिकाणां सुदर्शनम्।
तत्र सा वसते देवी नित्यं योगपरायणा॥ ४०॥

महालक्ष्मीर्महादेवी त्रिशूलवरधारिणी।
त्रिनेत्रा सर्वशक्तीभिः संवृता सदसन्मया।
पश्यन्ति तत्र मुनयः सिद्धा ये ब्रह्मवादिनः॥ ४१॥

सुपार्श्वस्योत्तरे भागे सरस्वत्याः पुरोत्तमम्।
सरांसि सिद्धजुष्टानि देवभोग्यानि सत्तमाः॥ ४२॥

पाण्डुरस्य गिरेः शृङ्गे विचित्रद्रुमसंकुले।
गन्धर्वाणां पुरशतं दिव्यस्त्रीभिः समावृतम्॥ ४३॥

तेषु नित्यं मदोत्सिक्ता वरनार्यस्तथैव च।
क्रीडन्ति मुदिता नित्यं विलासैर्भोगतत्पराः॥ ४४॥

अञ्जनस्य गिरेः शृङ्गे नारीणां पुरमुत्तमम्।
वसन्ति तत्राप्सरसो रम्भाद्या रतिलालसाः॥ ४५॥

चित्रसेनादयो यत्र समायान्त्यर्थिनः सदा।
सा पुरी सर्वरत्नाढ्या नैकप्रस्रवणैर्युता॥ ४६॥

अनेकानि पुराणि स्युः कौमुदे चापि सुव्रताः।
रुद्राणां शान्तरजसामीश्वरार्पितचेतसाम्॥ ४७॥

तेषु रुद्रा महायोगा महेशान्तरचारिणः।
समासते परं ज्योतिरारूढाः स्थानमुत्तमम्॥ ४८॥


वहाँ स्वच्छ जलवाली नदियाँ तथा अनेक प्रकारके प्रफुल्लित नीलकमल हैं और कर्णिकारका* एक दिव्य वन है, उमाके साथ शंकर वहाँ विराजमान रहते हैं। पारियात्र नामक महाशैलपर महालक्ष्मीका सुन्दर पुर है, जो रमणीय प्रासादोंसे युक्त, घण्टा एवं चामरसे अलंकृत, इतस्ततः नृत्य करती हुई अप्सराओंके समूहसे सुशोभित, मृदंग एवं मुरजकी ध्वनिसे गुञ्जित, वीणा तथा वेणुकी झंकारसे निनादित, गन्धर्व तथा किंनरोंसे आकीर्ण, श्रेष्ठ सिद्धोंसे आवृत, चमकते हुए दीवालोंसे पूर्ण, बड़े-बड़े महलोंसे घनीभूत, गणेश्वरोंकी अङ्गनाओंसे सेवित और धार्मिक जनोंके द्वारा सरलतापूर्वक प्रत्यक्ष करने योग्य है। वहाँ योगपरायण, श्रेष्ठ त्रिशूल धारण करनेवाली, तीन नेत्रवाली, सभी शक्तियोंसे आवृत और सदसन्मयी देवी महालक्ष्मी महादेवी नित्य निवास करती हैं। वहाँ जो ब्रह्मवादी मुनि और सिद्ध हैं—वे उनका दर्शन करते हैं॥ ३६-४१॥

सुपार्श्वके उत्तरभागमें सरस्वतीका उत्तम पुर है। श्रेष्ठ जनो! वहाँ देवताओंके उपभोग करने योग्य तथा सिद्धोंसे सेवित अनेक सरोवर हैं। पाण्डुर पर्वतके शिखरपर अनेक प्रकारके वृक्षोंसे भरे हुए और दिव्य स्त्रियोंसे परिपूर्ण गन्धर्वोंके सौ पुर हैं। उनमें अनेक प्रकारके भोगोंमें तत्पर और काम-मदसे उन्मत्त श्रेष्ठ स्त्रियाँ तथा पुरुष अनेक प्रकारके विलासोंद्वारा भोगमें तत्पर रहते हैं और प्रसन्नतापूर्वक सदा क्रीडा (मनोविनोद) करते रहते हैं॥ ४२-४४॥

अञ्जनगिरिके शिखरपर स्त्रियोंका श्रेष्ठ पुर है, जिसमें रतिकी इच्छा करनेवाली रम्भा आदि अप्सराएँ निवास करती हैं। चित्रसेन आदि (गन्धर्व) जहाँ सदा अभिलाषीके रूपमें आया करते हैं, वह पुरी सभी रत्नोंसे परिपूर्ण तथा अनेक झरनोंसे सम्पन्न है॥ ४५-४६॥

हे सुव्रतो! कौमुद (पर्वत)-पर भी शान्त रजोगुणवाले (रजोगुणके कारण होनेवाली चंचलतासे रहित) तथा शंकरमें अर्पित चित्तवाले रुद्रोंके अनेक पुर हैं, उनमें परम ज्योति अर्थात् परब्रह्मका प्रत्यक्ष करनेवाले तथा महेशके अन्तरमें विचरण करनेवाले महायोगी रुद्रगण रहते हैं, यह स्थान बहुत उत्तम है॥ ४७-४८॥


* कर्णिकार—वृक्षविशेष, कठचम्पा या कर्णियार नामसे कई जगहोंमें प्रसिद्ध।

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