भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 247
  • अध्याय ४६ * | २३७ ---|--- आत्मन्यात्मानमाधाय शिखान्तान्तरमास्थितम्।<br>ध्यायन्ति देवमीशानं येन सर्वमिदं ततम्॥ २३॥ | (समाधिस्थ रहते हैं)। (वे) स्वयंमें आत्मनिष्ठ होकर शिखाके अन्तिम मूलभाग(ब्रह्मरन्ध्र)-में स्थित ईशान देवका ध्यान करते हैं, जिनसे इस सम्पूर्ण (जगत्)-का विस्तार हुआ है। सुमेघ (नामक पर्वत)-पर हजारों सुमेघे वासवस्थानं सहस्रादित्यसंनिभम्।<br>तत्रास्ते भगवानिन्द्रः शच्या सह सुरेश्वरः॥ २४॥ | सूर्योंके समान प्रकाशमान इन्द्रका एक स्थान है। देवताओंके राजा भगवान् इन्द्र शचीके साथ वहाँ निवास करते हैं। गजशैलपर दुर्गाका मणियोंसे बने तोरणवाला एक भवन है। साक्षात् महेश्वरी भगवती दुर्गा वहाँ गजशैले तु दुर्गाया भवनं मणितोरणम्।<br>आस्ते भगवती दुर्गा तत्र साक्षान्महेश्वरी॥ २५॥ | निवास करती हैं। योगामृतका पान करके अर्थात् योगको आत्मसात् कर लेनेके कारण साक्षात् योगेश्वरी और (ईश्वर अर्धनारीश्वर महेश्वरकी अर्धाङ्गिनी होनेके कारण) ईश्वरका साक्षात् आनन्द प्राप्तकर विविध उपास्यमाना विविधैः शक्तिभेदैरितस्ततः।<br>पीत्वा योगामृतं लब्ध्वा साक्षादानन्दमैश्वरम्॥ २६॥ | प्रकारकी शक्तियोंके रूपमें इतस्ततः उपासित होती रहती हैं॥ २१–२६॥ सुनीलस्य गिरेः शृङ्गे नानाधातुसमुज्ज्वले।<br>राक्षसानां पुराणि स्युः सरांसि शतशो द्विजाः॥ २७॥ | हे द्विजो! विविध धातुओंसे देदीप्यमान सुनील पर्वतके शिखरपर राक्षसोंके नगर तथा सैकड़ों सरोवर हैं। विप्रो! इसी प्रकार शतशृंग नामक महान् पर्वतपर तथा पुरशतं विप्रा शतशृङ्गे महाचले।<br>स्फाटिकस्तम्भसंयुक्तं यक्षाणाममितौजसाम्॥ २८॥ | स्फटिक स्तम्भोंसे बने हुए अमित तेजस्वी यक्षोंके सौ नगर हैं। श्वेतोदर पर्वतके शिखरपर महात्मा सुपर्ण श्वेतोदरगिरेः शृङ्गे सुपर्णस्य महात्मनः।<br>प्राकारगोपुरोपेतं मणितोरणमण्डितम्॥ २९॥ | (गरुड)-का अनेक प्राकार और गोपुरोंसे युक्त तथा मणियोंसे बने तोरणोंसे मण्डित पुर है। वहाँ साक्षात् स तत्र गरुडः श्रीमान् साक्षाद् विष्णुरिवापरः।<br>ध्यात्वास्ते तत् परं ज्योतिरात्मानं विष्णुमव्ययम्॥ ३०॥ | दूसरे विष्णुके समान वे श्रीमान् गरुड उन परम ज्योतिःस्वरूप आत्मरूप अव्यय विष्णुका ध्यान करते रहते हैं॥ २७–३०॥ अन्यच्च भवनं पुण्यं श्रीशृङ्गे मुनिपुंगवाः।<br>श्रीदेव्याः सर्वरत्नाढ्यं हैमं सुमणितोरणम्॥ ३१॥ | मुनिश्रेष्ठो! श्रीशृंगपर श्रीदेवीका दूसरा भी एक पवित्र भवन है, जो सभी रत्नोंसे पूर्ण तथा स्वर्णसे बना हुआ है और सुन्दर मणियोंसे बने तोरणवाला है। वहाँ तत्र सा परमा शक्तिर्विष्णोरतिमनोरमा।<br>अनन्तविभवा लक्ष्मीर्जगत्सम्मोहनोत्सुका॥ ३२॥ | विष्णुकी अति मनोरम परम शक्ति (वे लक्ष्मी) संसारके मूल कारण (विष्णु)-का चिन्तन करती हुई अध्यास्ते देवगन्धर्वसिद्धचारणवन्दिता।<br>विचिन्त्य जगतो योनिं स्वशक्तिकिरणोज्ज्वला॥ ३३॥ | विशेषरूपसे निवास करती हैं। वे लक्ष्मी अनन्त ऐश्वर्यवाली, संसारको मोहित करनेमें उत्सुक, देवताओं, गन्धर्वों, सिद्धों तथा चारणोंसे वन्दित हैं और अपनी तत्रैव देवदेवस्य विष्णोरायतनं महत्।<br>सरांसि तत्र चत्वारि विचित्रकमलाश्रया॥ ३४॥ | शक्तिकी किरणोंसे प्रकाशित हैं। वहीं देवाधिदेव विष्णुका विशाल भवन है तथा वहींपर विचित्र कमलोंवाले चार सरोवर हैं। इसी प्रकार सहस्रशिखर तथा सहस्रशिखरे विद्याधरपुराष्टकम्।<br>रत्नसोपानसंयुक्तं सरोभिश्चोपशोभितम्॥ ३५॥ | (पर्वत)-पर रत्नोंकी सीढ़ियोंसे बने हुए और सरोवरोंसे सुशोभित विद्याधरोंके आठ पुर हैं॥ ३१–३५॥