संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२२६ * कूर्मपुराण *
तेषामधस्तान्नरका मायाद्याः परिकीर्तिताः।
पापिनस्तेषु पच्यन्ते न ते वर्णयितुं क्षमाः॥ २५॥
पातालानामधश्चास्ते शेषाख्या वैष्णवी तनुः।
कालाग्निरुद्रो योगात्मा नारसिंहोऽपि माधवः ॥ २६॥
योऽनन्तः पठ्यते देवो नागरूपी जनार्दनः।
तदाधारमिदं सर्वं स कालाग्निमपाश्रितः ॥ २७॥
तमाविश्य महायोगी कालस्तद्वदनोत्थितः।
विषज्वालामयोऽन्तेऽसौ जगत् संहरति स्वयम्॥ २८॥
सहस्रमायोऽप्रतिमः संहर्ता शंकरोद्भवः।
तामसी शाम्भवी मूर्तिः कालो लोकप्रकालनः॥ २९॥
उन (पातालों)-के नीचे माया आदि नरक कहे गये हैं, उनमें पापी लोग यातना पाते हैं। उनका वर्णन नहीं किया जा सकता। पाताललोकके नीचे शेष नामवाली वैष्णवी मूर्ति विद्यमान है। जिसे कालाग्नि रुद्र, योगात्मा, नारसिंह, माधव, अनन्त, देव और नागरूपी जनार्दन भी कहा जाता है। यह सब उन्हींके आधारपर (टिका) है और वे कालाग्निके आश्रित हैं। उनमें प्रविष्ट होकर और उनके मुखसे प्रकट हुई विषकी ज्वालारूप होकर महायोगी काल स्वयं अन्तमें जगत्का संहार करते हैं॥ २५–२८॥
हजारों मायावाला एवं शंकरसे उत्पन्न अद्वितीय (काल) संहार करनेवाला है। वह शम्भुकी तामसी मूर्ति है। काल ही लोकोंका संहार करता है॥ २९॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे द्विचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४२॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें बयालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४२॥
तैंतालीसवाँ अध्याय
सात महाद्वीपों और सात महासागरोंका परिमाण, जम्बूद्वीप तथा मेरुपर्वतकी स्थिति, भारत तथा किंपुरुष आदि वर्षोंका वर्णन, वर्षपर्वतोंकी स्थिति, जम्बूद्वीपके नाम पड़नेका कारण, जम्बूद्वीपके नदी एवं पर्वतोंका और वहाँके निवासियोंका वर्णन
सूत उवाच
एतद् ब्रह्माण्डमाख्यातं चतुर्दशविधं महत्।
अतः परं प्रवक्ष्यामि भूर्लोकस्यास्य निर्णयम्॥ १॥
जम्बुद्वीपः प्रधानोऽयं प्लक्षः शाल्मल एव च।
कुशः क्रौञ्चश्च शाकश्च पुष्करश्चैव सप्तमः॥ २॥
एते सप्त महाद्वीपाः समुद्रैः सप्तभिर्वृताः।
द्वीपाद् द्वीपो महानुक्तः सागरादपि सागरः ॥ ३॥
क्षारोदेक्षुरसोदश्च सुरोदश्च घृतोदकः।
दध्योदः क्षीरसलिलः स्वादूदश्चेति सागराः ॥ ४॥
पञ्चाशत्कोटिविस्तीर्णा ससमुद्रा धरा स्मृता।
द्वीपेश्च सप्तभिर्युक्ता योजनानां समासतः॥ ५॥
जम्बूद्वीपः समस्तानां द्वीपानां मध्यतः शुभः।
तस्य मध्ये महामेरुर्विश्रुतः कनकप्रभः ॥ ६॥
सूतजी बोले— इस चौदह (सात पाताल तथा सात ऊर्ध्वलोक) प्रकारके महान् ब्रह्माण्डका वर्णन किया गया। इसके बाद इस भूलोकके निर्णयको कहूँगा। (भूलोकमें) जम्बूद्वीप प्रधान है। (इसके अतिरिक्त) प्लक्ष, शाल्मल, कुश, क्रौञ्च, शाक तथा सातवाँ पुष्कर द्वीप है। ये सातों महाद्वीप सात समुद्रोंसे घिरे हैं, एक द्वीपसे दूसरा द्वीप तथा एक सागरसे दूसरा सागर महान् कहा गया है। क्षारोदक, इक्षुरसोदक, सुरोदक, घृतोदक, दध्योदक, क्षीरोदक तथा स्वादूदक—ये (सात) महासागर हैं। संक्षेपमें समुद्रसहित यह पृथ्वी पचास करोड़ योजन विस्तारवाली कही जाती है। यह सात द्वीपोंसे परिवेष्टित है समस्त द्वीपोंके मध्यमें शुभ जम्बूद्वीप स्थित है। उसके बीचमें स्वर्णके समान आभावाला महामेरु कहा गया है॥ १–६॥
| * अध्याय ४३ * | २२७ |
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| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| चतुरशीतिसाहस्रो योजनैस्तस्य चोच्छ्रयः।<br>प्रविष्टः षोडशाधस्ताद् द्वात्रिंशन्मूर्ध्नि विस्तृतः॥ ७ ॥<br>मूले षोडशसाहस्रो विस्तारस्तस्य सर्वतः।<br><br>भूपद्मस्यास्य शैलोऽसौ कर्णिकात्वेन संस्थितः॥ ८ ॥<br><br>हिमवान् हेमकूटश्च निषधश्चास्य दक्षिणे।<br>नीलः श्वेतश्च शृङ्गी च उत्तरे वर्षपर्वताः॥ ९ ॥<br><br>लक्षप्रमाणौ द्वौ मध्ये दशहीनास्तथा परे।<br>सहस्रद्वितयोच्छायास्तावद्विस्तारिणश्च ते॥ १० ॥<br>भारतं दक्षिणं वर्षं ततः किंपुरुषं स्मृतम्।<br>हरिवर्षं तथैवान्यन्मेरोर्दक्षिणतो द्विजाः॥ ११ ॥<br><br>रम्यकं चोत्तरं वर्षं तस्यैवानुहिरण्मयम्।<br>उत्तराः कुरवश्चैव यथैते भरतास्तथा॥ १२ ॥<br>नवसाहस्रमेकैकमेतेषां द्विजसत्तमाः।<br>इलावृतं च तन्मध्ये तन्मध्ये मेरुरुच्छ्रितः॥ १३ ॥<br><br>मेरोश्चतुर्दिशं तत्र नवसाहस्रविस्तृतम्।<br>इलावृतं महाभागाश्चत्वारस्तत्र पर्वताः।<br>विष्कम्भा रचिता मेरोर्योजनायुतमुच्छ्रिताः॥ १४ ॥<br><br>पूर्वेण मन्दरो नाम दक्षिणे गन्धमादनः।<br>विपुलः पश्चिमे पार्श्वे सुपार्श्वश्चोत्तरे स्मृतः॥ १५ ॥<br>कदम्बस्तेषु जम्बूश्च पिप्पलो वट एव च।<br>जम्बूद्वीपस्य सा जम्बूर्नामहेतुर्महर्षयः॥ १६ ॥<br><br>महागजप्रमाणानि जम्ब्वास्तस्याः फलानि च।<br>पतन्ति भूभृतः पृष्ठे शीर्यमाणानि सर्वतः॥ १७ ॥<br><br>रसेन तस्याः प्रख्याता तत्र जम्बूनदीति वै।<br>सरित् प्रवर्तते चापि पीयते तत्र वासिभिः॥ १८ ॥<br><br>न स्वेदो न च दौर्गन्ध्यं न जरा नेन्द्रियक्षयः।<br>तत्पानात् सुस्थमनसां नराणां तत्र जायते॥ १९ ॥<br><br>तीरमृत् तत्र सम्प्राप्य वायुना सुविशोषिता।<br>जाम्बूनदाख्यं भवति सुवर्णं सिद्धभूषणम्॥ २० ॥ | उसकी ऊँचाई चौरासी हजार योजन है। नीचेकी ओर यह सोलह योजनतक प्रविष्ट है और ऊपरकी ओर बत्तीस योजन विस्तृत है। उस पर्वतके मूलमें सभी ओर सोलह हजार योजनका विस्तार है। यह पर्वत इस पृथ्वीरूप कमलकी कर्णिकाके रूपमें अवस्थित है। इसके दक्षिणमें हिमवान्, हेमकूट तथा निषध और उत्तरमें नील, श्वेत एवं शृंगी नामक वर्षपर्वत हैं। इनमें दो (हिमवान् एवं हेमकूट वर्षपर्वत) एक लाख योजन परिमाणवाले हैं और अन्य (वर्षपर्वत) दस योजन कम विस्तारवाले हैं। इनकी ऊँचाई दो हजार योजनकी है और उनका विस्तार भी उतना ही है॥ ७–१०॥<br><br>हे द्विजो! मेरुके दक्षिण भागमें प्रथम भारतवर्ष, तदनन्तर किंपुरुषवर्ष और फिर हरिवर्ष तथा अन्य भी वैसे ही स्थित हैं। उसके उत्तरमें रम्यक, हिरण्मय एवं उत्तरकुरुवर्ष स्थित है। ये सभी भारतवर्षके समान हैं॥ ११–१२॥<br><br>द्विजश्रेष्ठो! इनमेंसे प्रत्येक नौ हजार योजनका है। इनके मध्यमें इलावृतवर्ष है और इसके मध्यमें उन्नत मेरु पर्वत है। हे महाभागो! वहाँ मेरुके चारों ओर नौ हजार योजनका इलावृत नामक वर्ष है। वहाँ चार पर्वत हैं। मेरुके व्यासके रूपमें विरचित इनकी ऊँचाई दस हजार योजन है। इसके पूर्वमें मन्दर, दक्षिणमें गन्धमादन, पश्चिम पार्श्वमें विपुल और उत्तरमें सुपार्श्व नामक पर्वत कहा गया है॥ १३–१५॥<br><br>उसमें (सुपार्श्व पर्वतमें) कदम्ब, जम्बू, पीपल और वट वृक्ष हैं। हे महर्षियो! यही जम्बूवृक्ष जम्बूद्वीप नाम पड़नेका कारण है। उस जम्बूवृक्षके फल महान् हाथीके प्रमाणवाले होते हैं। पर्वतके पृष्ठपर गिरनेसे वे विशीर्ण हो जाते हैं। वहाँ उनके रससे प्रवाहित होनेवाली नदी जम्बूनदीके नामसे विख्यात है। वहाँके निवासी उस रसका पान किया करते हैं। वहाँ उस रस (जल)-का पान करनेसे स्वस्थ मनवाले मनुष्योंको न स्वेद (पसीना) होता है, न उनमें दुर्गन्ध होती है, न वृद्धावस्था आती है और न ही उनकी इन्द्रियाँ क्षीण होती हैं। उस (जम्बू नदी)-के तटपर स्थित मिट्टीके रसका वायु शोषण कर लेता है, जिससे जाम्बूनद नामक सुवर्ण होता है, सिद्धगण उसीका आभूषण धारण करते हैं॥ १६–२०॥ |
२२८ * कूर्मपुराण *
भद्राश्वः पूर्वतो मेरोः केतुमालश्च पश्चिमे।
वर्षे द्वे तु मुनिश्रेष्ठास्तयोर्मध्ये इलावृतम्॥ २१॥
वनं चैत्ररथं पूर्वे दक्षिणे गन्धमादनम्।
वैभ्राजं पश्चिमे विद्यादुत्तरे सवितुर्व॑नम्॥ २२॥
अरुणोदं महाभद्रमसितोदं च मानसम्।
सरांस्येतानि चत्वारि देवभोग्यानि सर्वदा॥ २३॥
सितान्तश्च कुमुद्रांश्च कुररी माल्यवांस्तथा।
वैकङ्को मणिशैलश्च ऋक्षवांश्चाचलोत्तमाः॥ २४॥
महानीलोऽथ रुचकः सबिन्दुर्मन्दरस्तथा।
वेणुमांश्चैव मेघश्च निषधो देवपर्वतः।
इत्येते देवरचिताः सिद्धावासाः प्रकीर्तिताः॥ २५॥
मेरुके पूर्वमें भद्राश्व, पश्चिममें केतुमाल नामक दो वर्ष हैं। मुनिश्रेष्ठो! उन दोनोंके मध्य इलावृत वर्ष है। पूर्वमें चैत्ररथ नामक वन, दक्षिणमें गन्धमादन, पश्चिममें वैभ्राज और उत्तरमें सवितृवन स्थित है। उन (वनों)- में अरुणोद, महाभद्र, असितोद और मानस नामक—ये चार सरोवर हैं। ये सदा देवताओंद्वारा उपभोग किये जाने योग्य हैं। सितान्त, कुमुद्वान्, कुररी, माल्यवान्, वैकङ्क, मणिशैल, ऋक्षवान्, महानील, रुचक, सबिन्दु, मन्दर, वेणुमान्, मेघ, निषध एवं देवपर्वत—इन सभी श्रेष्ठ पर्वतोंकी रचना देवताओंद्वारा हुई है और इन्हें सिद्धोंका आवास कहा जाता है॥ २१—२५॥
अरुणोदस्य सरसः पूर्वतः केसराचलः।
त्रिकूटशिखरश्चैव पतङ्गो रुचकस्तथा॥ २६॥
निषधो वसुधारश्च कलिङ्गस्त्रिशिखः शुभः।
समूलो वसुधारश्च कुरवश्चैव सानुमान्॥ २७॥
ताम्रातश्च विशालश्च कुमुदो वेणुपर्वतः।
एकशृङ्गो महाशैलो गजशैलः पिशाचकः॥ २८॥
पञ्चशैलोऽथ कैलासो हिमवांश्चाचलोत्तमः।
इत्येते देवचरिता उत्कटाः पर्वतोत्तमाः॥ २९॥
अरुणोद सरोवरके पूर्वमें केसराचल, त्रिकूट-शिखर, पतङ्ग, रुचक, निषध, वसुधार, कलिंग, शुभ त्रिशिख, समूल, वसुधार, कुरव, सानुमान्, ताम्रात, विशाल, कुमुद, वेणुपर्वत, एकशृंग, महाशैल, गजशैल, पिशाचक, पञ्चशैल, कैलास और पर्वतोंमें उत्तम हिमवान्—ये सभी देवताओंद्वारा सेवित अत्यन्त श्रेष्ठ पर्वत हैं॥ २६—२९॥
महाभद्रस्य सरसो दक्षिणे केसराचलः।
शिखिवासश्च वैदूर्यः कपिलो गन्धमादनः॥ ३०॥
जारुधिश्च सुगन्धिश्च श्रीशृङ्गश्चाचलोत्तमः।
सुपार्श्वश्च सुपक्षश्च कङ्कः कपिल एव च॥ ३१॥
पिञ्जरो भद्रशैलश्च सुरसश्च महाबलः।
अञ्जनो मधुमांस्तद्वत् कुमुदो मुकुटस्तथा॥ ३२॥
सहस्रशिखरश्चैव पाण्डुरः कृष्ण एव च।
पारिजातो महाशैलस्तथैव कपिलोदकः॥ ३३॥
सुषेणः पुण्डरीकश्च महामेघस्तथैव च।
एते पर्वतराजानः सिद्धगन्धर्वसेविताः॥ ३४॥
महाभद्र सरोवरके दक्षिणमें—केसराचल, शिखिवास, वैदूर्य, कपिल, गन्धमादन, जारुधि, सुगन्धि, उत्तम पर्वत श्रीशृंग, सुपार्श्व, सुपक्ष, कङ्क, कपिल, पिञ्जर, भद्रशैल, सुरस, महाबल, अञ्जन, मधुमान्, कुमुद, मुकुट, सहस्रशिखर, पाण्डुर, कृष्ण, पारिजात, महाशैल, कपिलोदक, सुषेण, पुण्डरीक और महामेघ—ये सभी पर्वतराज सिद्धों और गन्धर्वोंसे सेवित हैं॥ ३०—३४॥
असितोदस्य सरसः पश्चिमे केसराचलः।
शङ्खकूतोऽथ वृषभो हंसो नागस्तथा परः॥ ३५॥
कालाञ्जनः शुक्रशैलो नीलः कमल एव च।
पुष्पकश्च सुमेघश्च वाराहो विरजास्तथा।
मयूरः कपिलश्चैव महाकपिल एव च॥ ३६॥
इत्येते देवगन्धर्वसिद्धसङ्घनिषेविताः।
सरसो मानसस्येह उत्तरे केसराचलः॥ ३७॥
असितोद सरोवरके पश्चिममें केसराचल, शंखकूट, वृषभ, हंस, नाग, कालाञ्जन, शुक्रशैल, नील, कमल, पुष्पक, सुमेघ, वाराह, विरजा, मयूर, कपिल तथा महाकपिल—ये सभी (पर्वत) देव, गन्धर्व और सिद्धोंके समूहोंद्वारा सेवित हैं। मानसरोवरके उत्तरमें केसराचल नामक पर्वत है॥ ३५—३७॥
- अध्याय ४४ * | २२९ ---|---
एतेषां शैलमुख्यानामन्तरेषु यथाक्रमम्।|इन प्रधान शैलोंके मध्य क्रमानुसार घाटियाँ, सरोवर सन्ति चैवान्तरद्रोण्यः सरांसि च वनानि च॥ ३८॥|और अनेक वन हैं। वहाँ प्रसन्न, रजोगुणरहित और सभी वसन्ति तत्र मुनयः सिद्धाश्च ब्रह्मभाविताः।|दुःखोंसे विनिर्मुक्त ब्रह्मवादी मुनि और सिद्ध निवास प्रसन्नाः शान्तरजसः सर्वदुःखविवर्जिताः॥ ३९॥|करते हैं॥ ३८-३९॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४३॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें तैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४३॥
चौवालीसवाँ अध्याय
ब्रह्मा, शंकर, इन्द्र, अग्नि, वरुण आदि देवताओंकी पुरियोंका तथा वहाँके निवासियोंका वर्णन, गङ्गाकी चार धाराओं और आठ मर्यादापर्वतोंका वर्णन
सूत उवाच|**सूतजी बोले—**देवाधिदेव ब्रह्माकी मेरु पर्वतके चतुर्दशसहस्राणि योजनानां महापुरी।|ऊपर चौदह हजार योजन विस्तारवाली महापुरी विख्यात मेरोरुपरि विख्याता देवदेवस्य वेधसः॥ १॥|है। वहाँ विश्वभावन विश्वात्मा भगवान् ब्रह्मा रहते हैं। तत्रास्ते भगवान् ब्रह्मा विश्वात्मा विश्वभावनः।|योगीन्द्र, मुनीन्द्र, उपेन्द्र (विष्णु) और शंकर उनकी उपास्यमानो योगीन्द्रैर्मुनीन्द्रोपेन्द्रशंकरैः॥ २॥|उपासना करते रहते हैं। वहाँ भगवान् सनत्कुमार नित्य तत्र देवेश्वरेशानं विश्वात्मानं प्रजापतिम्।|ही ईशान देवेश्वर विश्वात्मा प्रजापतिकी उपासना करते सनत्कुमारो भगवानुपास्ते नित्यमेव हि॥ ३॥|हैं। वे (सनत्कुमार) योगात्मा सिद्ध, ऋषि, गन्धर्व तथा स सिद्धैर्ऋषिगन्धर्वैः पूज्यमानः सुरैरपि।|देवताओंसे पूजित होते हुए परम अमृतका पान करते समास्ते योगयुक्तात्मा पीत्वा तत्परमामृतम्॥ ४॥|हैं और वहाँ निवास करते हैं॥ १-४॥ तत्र देवादिदेवस्य शम्भोरमिततेजसः।|वहाँ देवोंके आदिदेव अमित तेजस्वी शंकरका शुभ्र दीप्तमायतनं शुभ्रं पुरस्ताद् ब्रह्मणः स्थितम्॥ ५॥|एवं दीप्तियुक्त मन्दिर है, जो ब्रह्माके (आयतनके) सामने ||स्थित है। (यह मन्दिर) दिव्य कान्तिसे सुसम्पन्न, चार दिव्यकान्तिसमायुक्तं चतुर्द्वारं सुशोभनम्।|द्वारोंसे युक्त, अत्यन्त सुन्दर, महर्षियोंसे पूर्ण और ब्रह्मज्ञानियोंद्वारा महर्षिगणसंकीर्णं ब्रह्मविद्भिर्निषेवितम्॥ ६॥|सेवित है। चन्द्रमा, सूर्य एवं अग्निस্বরূপ (तीन) नेत्रोंवाले देव्या सह महादेवः शशाङ्कार्काग्निलोचनः।|प्रमथेश्वर विश्वेश महादेव देवी (पार्वती) एवं प्रमथगणोंके रमते तत्र विश्वेशः प्रमथैः प्रमथेश्वरः॥ ७॥|साथ वहाँ रमण करते हैं॥ ५-७॥ तत्र वेदविदः शान्ता मुनयो ब्रह्मचारिणः।|वहाँ वेदज्ञ शान्तचित्त मुनि, ब्रह्मचारी, तपस्वी और पूजयन्ति महादेवं तापसाः सत्यवादिनः॥ ८॥|सत्यवादी लोग महादेवकी पूजा करते हैं। इन ब्रह्मवादी तेषां साक्षान्महादेवो मुनीनां ब्रह्मवादिनाम्।|मुनियोंकी पूजाको पार्वतीके साथ साक्षात् परमेश्वर गृह्णाति पूजां शिरसा पार्वत्या परमेश्वरः॥ ९॥|महादेव सिरसे आदरपूर्वक स्वीकार करते हैं। वहीं श्रेष्ठ तत्रैव पर्वतवरे शक्रस्य परमा पुरी।|पर्वत (मेरु)-पर पूर्वकी ओर इन्द्रकी सभी शोभाओंसे नाम्नाऽमरावती पूर्वे सर्वशोभासमन्विता॥ १०॥|समन्वित अमरावती नामकी श्रेष्ठ पुरी है॥ ८-१०॥ तमिन्द्रमप्सरःसङ्घा गन्धर्वा गीततत्पराः।|अप्सराओंका समूह, गान-परायण गन्धर्व तथा हजारों उपासते सहस्राक्षं देवास्तत्र सहस्रशः॥ ११॥|देवता हजार नेत्रोंवाले इन्द्रकी वहाँ उपासना करते हैं। जो ये धार्मिका वेदविदो यागहोमपरायणाः।|धार्मिक हैं, वेदज्ञ हैं, यज्ञ एवं होमपरायण हैं, उनका वह तेषां तत् परमं स्थानं देवानामपि दुर्लभम्॥ १२॥|परम स्थान देवताओंके लिये भी दुर्लभ है॥ ११-१२॥
| २३० | * कूर्मपुराण * |
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| तस्य दक्षिणदिग्भागे वह्नेरमिततेजसः।<br>तेजोवती नाम पुरी दिव्याश्चर्यसमन्विता॥ १३॥<br><br>तत्रास्ते भगवान् वह्निर्भ्राजमानः स्वतेजसा।<br>जपिनां होमिनां स्थानं दानवानां दुरासदम्॥ १४॥ | उसके दक्षिण दिशामें अमित तेजस्वी अग्निकी दिव्य आश्चर्योंसे युक्त तेजोवती नामकी पुरी स्थित है। भगवान् वह्नि अपने तेजसे प्रकाशित होते हुए वहाँ रहते हैं। जप करनेवालों तथा होम करनेवालोंका वह स्थान दानवोंके लिये दुष्प्राप्य है॥ १३-१४॥ | | दक्षिणे पर्वतवरे यमस्यापि महापुरी।<br>नाम्ना संयमनी दिव्या सिद्धगन्धर्वसेविता॥ १५॥<br><br>तत्र वैवस्वतं देवं देवाद्याः पर्युपासते।<br>स्थानं तत् सत्यसंधानां लोके पुण्यकृतां नृणाम्॥ १६॥<br><br>तस्यास्तु पश्चिमे भागे निर्ऋतेस्तु महात्मनः।<br>रक्षोवती नाम पुरी राक्षसैः सर्वतो वृता॥ १७॥<br><br>तत्र तं निर्ऋतिं देवं राक्षसाः पर्युपासते।<br>गच्छन्ति तां धर्मरता ये वै तामसवृत्तयः॥ १८॥<br><br>पश्चिमे पर्वतवरे वरुणस्य महापुरी।<br>नाम्ना शुद्धवती पुण्या सर्वकामर्द्धिसंयुता॥ १९॥ | श्रेष्ठ (मेरु) पर्वतपर दक्षिण भागमें यमराजकी भी सिद्धों तथा गन्धर्वोंसे सेवित संयमनी नामक दिव्य महापुरी है। वहाँ देवादिगण विवस्वान्¹ (सूर्य) देवकी उपासना करते रहते हैं। वह स्थान संसारमें पुण्य करनेवाले सत्यव्रती मनुष्योंका है। उसके पश्चिम भागमें महात्मा निर्ऋतिकी रक्षोवती नामक पुरी है, जो चारों ओरसे राक्षसोंसे घिरी है। वहाँ राक्षस निर्ऋतिदेवकी उपासना करते हैं तथा जो तमोगुणी जीविकावाले होते हुए भी धार्मिक होते हैं, वे उसी पुरीमें जाते हैं। पश्चिममें इस श्रेष्ठ पर्वतपर सभी प्रकारकी कामनाओंकी समृद्धिसे समन्वित वरुणकी शुद्धवती नामकी पुण्य महापुरी है॥ १५-१९॥ | | तत्राप्सरोगणैः सिद्धैः सेव्यमानोऽमराधिपः।<br>आस्ते स वरुणो राजा तत्र गच्छन्ति येऽम्बुदाः।<br>तीर्थयात्रापरा नित्यं ये च लोकेऽघमर्षणः॥ २०॥ | यहाँ अप्सराओं तथा सिद्धोंसे सेवित अमराधिप राजा वरुण रहते हैं। यहाँ वे ही मनुष्य जाते हैं, जो संसारमें नित्य जलदान करते हैं, तीर्थयात्रा-परायण रहते हैं और जो अघमर्षण किया करते हैं॥ २०॥ | | तस्या उत्तरदिग्भागे वायोरपि महापुरी।<br>नाम्ना गन्धवती पुण्या तत्रास्तेऽसौ प्रभञ्जनः॥ २१॥<br><br>अप्सरोगणगन्धर्वैः सेव्यमानोऽमरप्रभुः।<br>प्राणायामपरा मर्त्या स्थानं तद् यान्ति शाश्वतम्॥ २२॥ | उस (शुद्धवती पुरी)-के उत्तरभागमें वायु देवताकी भी गन्धवती नामवाली पवित्र महापुरी स्थित है। वहाँ प्रभञ्जन (वायुदेवता) निवास करते हैं। देवोंके स्वामी इन वायुदेवताकी अप्सराओंके समूह और गन्धर्व सेवा करते रहते हैं। जो प्राणायाम-परायण मनुष्य हैं, वे इस शाश्वत स्थानमें जाते हैं॥ २१-२२॥ | | तस्याः पूर्वेण दिग्भागे सोमस्य परमा पुरी।<br>नाम्ना कान्तिमती शुभ्रा तत्र सोमो विराजते॥ २३॥<br><br>तत्र ये भोगनिरता स्वधर्मं पर्युपासते।<br>तेषां तद् रचितं स्थानं नानाभोगसमन्वितम्॥ २४॥<br><br>तस्याश्च पूर्वदिग्भागे शंकरस्य महापुरी।<br>नाम्ना यशोवती पुण्या सर्वेषां सुदुरासदा॥ २५॥<br><br>तत्रेशानस्य भवनं रुद्रविष्णुतनोः शुभम्।<br>गणेश्वरस्य विपुलं तत्रास्ते स गणैर्वृतः॥ २६॥ | उसके पूर्व दिशामें सोम (चन्द्रमा)-की कान्तिमती नामवाली शुभ श्रेष्ठ पुरी है, वहाँ चन्द्रमा विराजमान रहते हैं, जो भोगपरायण रहते हुए अपने धर्मका पालन करते हैं उन्हींके लिये वहाँपर अनेक प्रकारके भोगोंसे युक्त स्थान बना² है। उसके पूर्वकी ओर (भगवान् शंकरकी यशोवती नामक पवित्र महापुरी है, जो सभीके लिये दुर्लभ है, वहाँ रुद्र एवं विष्णुमय शरीरवाले गणाधिपति ईशान (शंकर)-का विशाल भवन है |
१-विवस्वान्—विव=रश्मि=किरणसे युक्त सूर्य।
२-कुछ लोग ऐसे होते हैं जो धर्मनिष्ठ होते हैं, पर जन्म-जन्मान्तरके संस्कारवश उनमें मृत्युके समय भोगवासना शेष रह जाती है, ऐसे लोग चन्द्रलोकको प्राप्त करते हैं।
| * अध्याय ४४ * | २३१ |
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| तत्र भोगाभिलिप्सूनां भक्तानां परमेष्ठिनः।<br>निवासः कल्पितः पूर्वं देवदेवेन शूलिना ॥ २७ ॥<br><br>विष्णुपादाद् विनिष्क्रान्ता प्लावयित्वेन्दुमण्डलम्।<br>समन्ताद् ब्रह्मणः पुर्यां गङ्गा पतति वै दिवः ॥ २८ ॥<br>सा तत्र पतिता दिक्षु चतुर्धा ह्यभवद् द्विजाः।<br>सीता चालकनन्दा च सुचक्षुर्भद्रनामिका ॥ २९ ॥<br><br>पूर्वेण सीता शैलात् तु शैलं यात्यन्तरिक्षतः।<br>ततश्च पूर्ववर्षेण भद्राश्वेनैति चार्णवम् ॥ ३० ॥<br>तथैवालकनन्दा च दक्षिणादेत्य भारतम्।<br>प्रयाति सागरं भित्त्वा सप्तभेदा द्विजोत्तमाः ॥ ३१ ॥<br><br>सुचक्षुः पश्चिमगिरीनतीत्य सकलांस्तथा।<br>पश्चिमं केतुमालाख्यं वर्षं गत्वैति चार्णवम् ॥ ३२ ॥<br><br>भद्रा तथोत्तरगिरीनुत्तरांश्च तथा कुरून्।<br>अतीत्य चोत्तराम्भोधिं समभ्येति महर्षयः ॥ ३३ ॥<br><br>आनीलनिषधायामौ माल्यवान् गन्धमादनः।<br>तयोर्मध्यगतो मेरुः कर्णिकाकारसंस्थितः ॥ ३४ ॥<br><br>भारताः केतुमालाश्च भद्राश्वाः कुरवस्तथा।<br>पत्राणि लोकपद्मस्य मर्यादाशैलबाह्यतः ॥ ३५ ॥<br>जठरो देवकूटश्च मर्यादापर्वतावुभौ।<br>दक्षिणोत्तरमायामावानीलनिषधायतौ ॥ ३६ ॥<br><br>गन्धमादनकैलासौ पूर्वपश्चायतावुभौ।<br>अशीतियोजनायामावर्णवान्तर्व्यवस्थितौ ॥ ३७ ॥<br><br>निषधः पारियात्रश्च मर्यादापर्वताविमौ।<br>मेरोः पश्चिमदिग्भागे यथापूर्वौ तथा स्थितौ ॥ ३८ ॥<br><br>त्रिशृङ्गो जारुधिश्चैतदुत्तरे वर्षपर्वतौ।<br>पूर्वपश्चायतावेतौ अर्णवान्तर्व्यवस्थितौ ॥ ३९ ॥<br><br>मर्यादापर्वताः प्रोक्ता अष्टाविह मया द्विजाः।<br>जठराद्याः स्थिता मेरोश्चतुर्दिक्षु महर्षयः ॥ ४० ॥ | गणोंसे आवृत्त (शंकरदेव) उसमें रहते हैं। पूर्वकालमें देवोंके देव शूल धारण करनेवाले शंकरने वहाँपर परमेष्ठीके भोगाभिलाषी भक्तोंका निवास-स्थान बनाया था। विष्णुके चरणसे निकली हुई गङ्गा चन्द्रमण्डलको आप्लावित कर स्वर्गसे ब्रह्मपुरीके चारों ओर गिरती हैं ॥ २३–२८ ॥<br><br>द्विजो! वे वहाँ गिरकर सीता, अलकनन्दा, सुचक्षु एवं भद्रा नामसे चार भागोंमें (दिशाओंमें) विभक्त हो गयी हैं। अन्तरिक्षसे निकलकर सीता नामक गङ्गा एक शैलसे दूसरे शैलपर जाती हुई पूर्व दिशामें भद्राश्ववर्षमें प्रवाहित होती हुई समुद्रमें जाती हैं ॥ २९-३० ॥<br><br>हे द्विजोत्तमो! इसी प्रकार अलकनन्दा नामक गङ्गा दक्षिण दिशासे भारतवर्षमें आनेके बाद सात भागोंमें विभक्त होकर सागरमें जाती हैं। ऐसे ही सुचक्षु नामक गङ्गा पश्चिम दिशाके सभी पर्वतोंका अतिक्रमण करके पश्चिम दिशाके केतुमाल नामक वर्षमें प्रवाहित होकर समुद्रमें जाती हैं। महर्षियो! भद्रा नामक गङ्गा उत्तर दिशाके पर्वतों और उत्तरकुरुवर्षका अतिक्रमण कर उत्तर समुद्रमें मिलती हैं। माल्यवान् तथा गन्धमादन पर्वत नील तथा निषध पर्वतोंके समान विस्तारवाले हैं। उन दोनोंके मध्यमें कर्णिकाके आकारके समान मेरु (पर्वत) स्थित है। इन मर्यादापर्वतोंके बाहरकी ओर संसाररूपी कमलके पत्रोंके रूपमें भारतवर्ष, केतुमाल, भद्राश्व और कुरुवर्ष स्थित हैं ॥ ३१—३५ ॥<br><br>जठर एवं देवकूट नामक दो मर्यादापर्वत नील और निषध पर्वतोंतक दक्षिणोत्तर-दिशामें फैले हुए हैं। गन्धमादन और कैलास नामक दोनों पर्वत पूर्व-पश्चिममें फैले हुए हैं, (ये) अस्सी योजन विस्तारवाले हैं और समुद्रके अंदरतक स्थित हैं। निषध और पारियात्र नामक दो मर्यादापर्वत मेरुकी पश्चिम दिशामें पूर्वके पर्वतोंके समान स्थित हैं। इसी प्रकार उत्तरमें त्रिशृङ्ग और जारुधि नामक दो वर्षपर्वत हैं। ये पूर्व-पश्चिममें फैले हुए हैं तथा समुद्रके भीतरतक स्थित हैं ॥ ३६—३९ ॥<br><br>हे द्विजो! मैंने यहाँ इन आठ मर्यादापर्वतोंको बतलाया। हे महर्षियो! मेरुके चारों दिशाओंमें जठर आदि (वर्षपर्वत) स्थित हैं ॥ ४० ॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४४ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें चौवालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ४४ ॥
२३२ * कूर्मपुराण *
पैंतालीसवाँ अध्याय
केतुमाल, भद्राश्व, रम्यकवर्ष तथा वहाँके निवासियोंका वर्णन, हरिवर्षमें स्थित विष्णुके विमानका वर्णन, जम्बूद्वीपके वर्णनमें भारतवर्षके कुलपर्वतों, महानदियों, जनपदों और वहाँके निवासियोंका वर्णन, भारतवर्षमें चार युगोंकी स्थितिका प्रतिपादन
सूत उवाच
केतुमाले नराः कालाः सर्वे पनसभाजनाः।
स्त्रियश्चोत्पलपत्राभा जीवन्ति च वर्षायुतम्॥ १ ॥
भद्राश्वे पुरुषाः शुक्लाः स्त्रियश्चन्द्रांशुसंनिभाः।
दश वर्षसहस्राणि जीवन्ते आम्रभोजनाः॥ २ ॥
रम्यके पुरुषा नार्यो रमन्ते रजतप्रभाः।
दशवर्षसहस्राणि शतानि दश पञ्च च।
जीवन्ति चैव सत्त्वस्था न्यग्रोधफलभोजनाः॥ ३ ॥
हिरण्मये हिरण्याभाः सर्वे च लकुचाशनाः।
एकादशसहस्राणि शतानि दश पञ्च च।
जीवन्ति पुरुषा नार्यो देवलोकस्थिता इव॥ ४ ॥
त्रयोदशसहस्राणि शतानि दश पञ्च च।
जीवन्ति कुरुवर्षे तु श्यामाङ्गाः क्षीरभोजनाः॥ ५ ॥
सर्वे ते मैथुनाजाताः नित्यं सुखनिषेविनः।
चन्द्रद्वीपे महादेवं यजन्ति सततं शिवम्॥ ६ ॥
तथा किम्पुरुषे विप्रा मानवा हेमसन्निभाः।
दशवर्षसहस्राणि जीवन्ति प्लक्षभोजनाः॥ ७ ॥
यजन्ति सततं देवं चतुर्मूर्तिं चतुर्मुखम्।
ध्याने मनः समाधाय सादरं भक्तिसंयुताः॥ ८ ॥
तथा च हरिवर्षे तु महारजतसंनिभाः।
दशवर्षसहस्राणि जीवन्तीक्षुरसाशिनः॥ ९ ॥
तत्र नारायणं देवं विश्वयोनिं सनातनम्।
उपासते सदा विष्णुं मानवा विष्णुभाविताः॥ १०॥
सूतजीने कहा—केतुमालवर्षके पुरुष कृष्णवर्णके होते हैं और सभी पनस (कटहल)-का भोजन करनेवाले होते हैं। वहाँकी स्त्रियाँ कमलपत्रके समान वर्णवाली होती हैं। ये सभी दस हजार वर्षतक जीवित रहते हैं।
भद्राश्ववर्षके पुरुष शुक्ल वर्णके होते हैं और स्त्रियाँ चन्द्रमाकी किरणों (चाँदनी)-के समान वर्णवाली होती हैं। ये सब आमका आहार करते हैं तथा दस हजार वर्षतक जीवित रहते हैं। रम्यकवर्षके पुरुष और स्त्रियाँ—सभी चाँदीकी प्रभाके समान दिखायी देते हैं। ये सत्त्वभावमें स्थित रहनेवाले होते हैं तथा वटवृक्षके फलका भोजन करते हैं और ग्यारह हजार पाँच सौ वर्षोतक जीवित रहते हैं। हिरण्मयवर्षमें सोनेकी आभावाले निवास करते हैं, सभी लकुच (बड़हरके फल)-का भोजन करते हैं और बारह हजार पाँच सौ वर्षतक सभी स्त्री-पुरुष उसी प्रकार जीवित रहते हैं, जैसे कि देवलोकमें स्थित हों॥ १–४॥
कुरुवर्षमें दुग्धाहार करनेवाले श्यामवर्णके (स्त्री-पुरुष) चौदह हजार पाँच सौ वर्षतक जीवित रहते हैं। वे सभी मैथुनसे उत्पन्न होते हैं, नित्य सुखोपभोगी होते हैं और चन्द्रद्वीपमें महादेव शिवकी निरन्तर उपासना करते हैं। हे विप्रो! इसी प्रकार किंपुरुषवर्षके मनुष्य स्वर्ण-वर्णके समान होते हैं। पाकड़ वृक्षके फलोंका भोजन करनेवाले ये दस हजार वर्षतक जीवित रहते हैं। ये भक्तियुक्त होकर आदरसहित मनको ध्यानमें समाधिस्थकर चतुर्मूर्ति चतुर्मुख देव (ब्रह्मा)-की निरन्तर उपासना करते रहते हैं। इसी प्रकार हरिवर्षमें रहनेवाले महारजत* (स्वर्ण)-के समान आभावाले होते हैं। वे दस हजार वर्षतक जीवित रहते हैं। ईखके रसका भोजन करते हैं। यहाँ ये मनुष्य विष्णुकी भावनासे भावित होकर विश्वयोनि नारायणदेव विष्णुकी सदा उपासना करते हैं॥ ५–१०॥
* महारजत शब्द स्वर्णका पर्याय है। (अमरकोश २।९।९५)
* अध्याय ४५ * २३३
| तत्र चन्द्रप्रभं शुभ्रं शुद्धस्फटिकनिर्मितम्।<br>विमानं वासुदेवस्य पारिजातवनाश्रितम्॥ ११॥<br><br>चतुर्द्वारमनौपम्यं चतुस्तोरणसंयुतम्।<br>प्राकारैर्दशभिर्युक्तं दुराधर्षं सुदुर्गमम्॥ १२॥<br><br>स्फाटिकैर्मण्डपैर्युक्तं देवराजगृहोपमम्।<br>स्वर्णस्तम्भसहस्रैश्च सर्वतः समलंकृतम्॥ १३॥<br><br>हेमसोपानसंयुक्तं नानारत्नोपशोभितम्।<br>दिव्यसिंहासनोपेतं सर्वशोभासमन्वितम्॥ १४॥<br><br>सरोभिः स्वादुपाानीयैर्नदीभिश्चोपशोभितम्।<br>नारायणपरैः शुद्धैर्वेदाध्ययनतत्परैः॥ १५॥<br><br>योगिभिश्च समाकीर्णं ध्यायद्भिः पुरुषं हरिम्।<br>स्तुवद्भिः सततं मन्त्रैर्नमस्यद्भिश्च माधवम्॥ १६॥<br><br>तत्र देवादिदेवस्य विष्णोरमिततेजसः।<br>राजानः सर्वकालं तु महिमानं प्रकुर्वते॥ १७॥<br><br>गायन्ति चैव नृत्यन्ति विलासिन्यो मनोरमाः।<br>स्त्रियो यौवनशालिन्यः सदा मण्डनतत्पराः॥ १८॥<br><br>इलावृते पद्मवर्णा जम्बूफलरसाशिनः।<br>त्रयोदश सहस्राणि वर्षाणां वै स्थिरायुषः॥ १९॥<br><br>भारते तु स्त्रियः पुंसो नानावर्णाः प्रकीर्तिताः।<br>नानादेवार्चने युक्ता नानाकर्माणि कुर्वते।<br>परमायुः स्मृतं तेषां शतं वर्षाणि सुव्रताः॥ २०॥<br><br>नानाहाराश्च जीवन्ति पुण्यपापनिमित्ततः।<br>नवयोजनसाहस्रं वर्षमेतत् प्रकीर्तितम्।<br>कर्मभूमिरियं विप्रा नराणामधिकारिणाम्॥ २१॥<br><br>महेन्द्रो मलयः सह्यः शुक्तिमानृक्षपर्वतः।<br>विन्ध्यश्च पारियात्रश्च सप्तात्र कुलपर्वताः॥ २२॥<br><br>इन्द्रद्युम्नः कशेरुमांस्ताम्रवर्णो गभस्तिमान्।<br>नागद्वीपस्तथा सौम्यो गन्धर्वस्त्वथ वारुणः॥ २३॥<br><br>अयं तु नवमस्तेषां द्वीपः सागरसंवृतः।<br>योजनानां सहस्रं तु द्वीपोऽयं दक्षिणोत्तरः॥ २४॥<br><br>पूर्वे किरातास्तस्यान्ते पश्चिमे यवनास्तथा।<br>ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या मध्ये शूद्रास्तथैव च॥ २५॥ | वहाँ पारिजातके वनमें शुद्ध स्फटिकका बना हुआ चन्द्रमाकी शुभ्र कान्तिके समान कान्तिवाला वासुदेवका एक विमान है। चार द्वारों, चार तोरणोंसे समन्वित तथा दस प्राकारोंसे युक्त (वह विमान) अनुपम, दुराधर्ष और दुर्गम है। यह स्फटिकके मण्डपोंसे युक्त देवराजके भवनके समान है तथा सभी ओरसे हजारों स्वर्ण-स्तम्भोंसे अलंकृत है। इसमें सोनेकी सीढ़ियाँ हैं। यह दिव्य सिंहासनोंसे समन्वित, सभी प्रकारकी शोभाओंसे सम्पन्न तथा नाना प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित है। स्वादिष्ट जलवाले सरोवरों और नदियोंसे शोभित है। वह स्थान नारायण-परायण, पवित्र, वेदाध्ययनमें तत्पर, पुरुष हरिका ध्यान करनेवाले लोगों तथा निरन्तर मन्त्रोंद्वारा माधवकी स्तुति करनेवाले और उन्हें नमस्कार करनेवाले योगियोंसे व्याप्त रहता है॥ ११-१६॥<br><br>वहाँ राजा लोग देवोंके आदिदेव अमित तेजस्वी विष्णुकी महिमाका सभी कालोंमें कीर्तन करते रहते हैं*। शृंगार करनेमें तत्पर युवावस्थावाली एवं विलासिनी मनोरम स्त्रियाँ यहाँ सदा नृत्य एवं गान करती रहती हैं। इलावृतवर्षमें कमलके समान वर्णवाले जामुनके फलके रसका सेवन करनेवाले तथा तेरह हजार वर्षकी स्थिर आयुवाले व्यक्ति निवास करते हैं। भारतवर्षके स्त्री और पुरुष अनेक वर्णके बताये गये हैं। ये विविध प्रकारके देवताओंकी आराधनामें निरत रहते हैं और अनेक प्रकारके कर्मोंको करते हैं। हे सुव्रतो! इनकी परम आयु सौ वर्षकी कही गयी है। अनेक प्रकारका आहार करनेवाले वे अपने पुण्य-पापके निमित्तसे जीवित रहते हैं। यह वर्ष नौ हजार योजन विस्तारवाला कहा गया है। हे विप्रो! यह अधिकारी पुरुषोंकी कर्मभूमि है॥ १७-२१॥<br><br>महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान्, ऋक्ष, विन्ध्य तथा पारियात्र—ये सात कुलपर्वत यहाँ हैं। इन्द्रद्युम्न, कशेरुमान्, ताम्रवर्ण, गभस्तिमान्, नागद्वीप, सौम्य, गन्धर्व तथा वारुण— (इन आठ द्वीपोंके अतिरिक्त) यह नवाँ द्वीप सागरसे घिरा हुआ है। यह द्वीप दक्षिणोत्तरमें एक हजार योजनमें फैला हुआ है। उसके पूर्वमें किरात, पश्चिममें यवन और मध्यमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र रहते हैं॥ २२-२५॥ |
* देवताओंके विमान एक अति श्रेष्ठ प्रासादके समान ही सभी सुविधाओंसे युक्त होते हैं—जैसे पुष्पक विमान, कपिलके द्वारा देवहूतिको दिया गया कामग विमान आदि।
२३४ * कूर्मपुराण *
| इज्याय युद्धवाणिज्यैरभिवर्तयन्त्यत्र मानवाः।<br>स्रवन्ते पावना नद्यः पर्वतेभ्यो विनिःसृताः ॥ २६ ॥<br>शतद्रुश्चन्द्रभागा च सरयूर्यमुना तथा।<br>इरावती वितस्ता च विपाशा देविका कुहूः ॥ २७॥<br>गोमती धूतपापा च बाहुदा च दृषद्वती।<br>कौशिकी लोहिता चैव हिमवत्पादनिःसृताः ॥ २८ ॥<br>वेदस्मृतिर्वेदवती व्रतघ्नी त्रिदिवा तथा।<br>पर्णाशा वन्दना चैव सदानीरा मनोरमा ॥ २९ ॥<br>चर्मण्वती तथा दूर्वा विदिशा वेत्रवत्यपि।<br>शिगुः स्वशिल्पापि तथा पारियात्राश्रयाः स्मृताः ॥ ३० ॥ | यहाँके मनुष्य यज्ञ, युद्ध और वाणिज्यद्वारा जीवन-निर्वाह करते हैं। (यहाँ) पर्वतोंसे निकली हुई पवित्र नदियाँ प्रवाहित होती हैं। शतद्रु, चन्द्रभागा, सरयू, यमुना, इरावती, वितस्ता, विपाशा, देविका, कुहू, गोमती, धूतपापा, बाहुदा, दृषद्वती, कौशिकी तथा लोहिता—ये सभी नदियाँ हिमालयकी तलहटीसे निकली हैं। वेदस्मृति, वेदवती, व्रतघ्नी, त्रिदिवा, पर्णाशा, वन्दना, सदानीरा, मनोरमा, चर्मण्वती, दूर्वा, विदिशा, वेत्रवती, शिगु तथा स्वशिल्पा—ये नदियाँ पारियात्र पर्वतका आश्रय लेनेवाली कही गयी हैं॥ २६-३०॥ | | नर्मदा सुरसा शोणा दशार्णा च महानदी।<br>मन्दाकिनी चित्रकूटा तामसी च पिशाचिका ॥ ३१ ॥<br>चित्रोत्पला विपाशा च मञ्जुला वालुवाहिनी।<br>ऋक्षवत्पादजा नद्यः सर्वपापहरा नृणाम् ॥ ३२ ॥<br>तापी पयोष्णी निर्विन्ध्या शीघ्रोदा च महानदी।<br>वेण्या वैतरणी चैव बलाका च कुमुद्वती ॥ ३३ ॥<br>तोया चैव महागौरी दुर्गा चान्तःशिला तथा।<br>विन्ध्यपादप्रसूतास्ता नद्यः पुण्यजलाः शुभाः ॥ ३४ ॥<br>गोदावरी भीमरथी कृष्णा वर्णा च मत्सरी।<br>तुङ्गभद्रा सुप्रयोगा कावेरी च द्विजोत्तमाः।<br>दक्षिणापथगा नद्यः सह्यपादविनिःसृताः ॥ ३५ ॥ | नर्मदा, सुरसा, शोणा, दशार्णा, महानदी, मन्दाकिनी, चित्रकूटा, तामसी, पिशाचिका, चित्रोत्पला, विपाशा, मञ्जुला तथा वालुवाहिनी नामक ये ऋक्षवान् पर्वतके नीचेके भागसे निकली हुई नदियाँ मनुष्योंके सभी पापोंका हरण करनेवाली हैं। तापी, पयोष्णी, निर्विन्ध्या, शीघ्रोदा, महानदी, वेण्या, वैतरणी, बलाका, कुमुद्वती, तोया, महागौरी, दुर्गा और अन्तःशिला नामकी ये नदियाँ विन्ध्यके निचले भागसे निकली हैं और शुभ हैं तथा पवित्र जलवाली हैं। हे द्विजोत्तमो! गोदावरी, भीमरथी, कृष्णा, वर्णा, मत्सरी, तुङ्गभद्रा, सुप्रयोगा तथा कावेरी—ये नदियाँ दक्षिणकी ओर जानेवाली तथा सह्यपर्वतके पादमूलसे निकली हैं॥ ३१-३५॥ | | ऋतुमाला ताम्रपर्णी पुष्पवत्युत्पलावती।<br>मलयाद्रिःसृता नद्यः सर्वाः शीतजलाः स्मृताः ॥ ३६ ॥<br><br>ऋषिकुल्या त्रिसामा च मन्दगा मन्दगामिनी।<br>रूपा पालासिनी चैव ऋषिका वंशकारिणी।<br>शुक्तिमत्पादसंजाताः सर्वपापहरा नृणाम् ॥ ३७ ॥ | ऋतुमाला, ताम्रपर्णी, पुष्पवती और उत्पलावती—मलय पर्वतसे निकली ये सभी नदियाँ शीतल जलवाली कही गयी हैं। ऋषिकुल्या, त्रिसामा, मन्दगा, मन्दगामिनी, रूपा, पालासिनी, ऋषिका तथा वंशकारिणी—ये नदियाँ शुक्तिमान् पर्वतके निम्न भागसे उत्पन्न हैं और मनुष्योंके सभी पापोंको हरण करनेवाली हैं॥ ३६-३७॥ | | आसां नद्युपनद्यश्च शतशो द्विजपुंगवाः।<br>सर्वपापहराः पुण्याः स्नानदानादिकर्मसु ॥ ३८ ॥<br>तास्विमे कुरुपाञ्चाला मध्यदेशादयो जनाः।<br>पूर्वदेशादिकाश्चैव कामरूपनिवासिनः ॥ ३९ ॥<br>पुण्ड्राः कलिङ्गा मगधा दाक्षिणात्याश्च कृत्स्नशः।<br>तथापरान्ताः सौराष्ट्राः शूद्राभीरास्तथार्बुदाः ॥ ४० ॥<br>मालका मालवाश्चैव पारियात्रनिवासिनः।<br>सौवीराः सैन्धवा हूणा शाल्वाः कल्पनिवासिनः ॥ ४१ ॥ | हे द्विजश्रेष्ठो! इन सभी (महानदियों)—की सैकड़ों नदियाँ और उपनदियाँ हैं, जो सभी पापोंको हरनेवाली तथा स्नान, दान आदि कर्मोंमें पवित्र हैं। उनमें ये कुरु, पाञ्चाल, मध्यदेश आदिके लोग, पूर्वके देशोंमें रहनेवाले, कामरूपके निवासी, पुण्ड्र, कलिङ्ग तथा मगध देशके लोग, समस्त दाक्षिणात्य तथा (इनके अतिरिक्त) सौराष्ट्रवासी, शूद्र, आभीर, अर्बुद (पर्वतीय जाति-विशेषके लोग), मालक, मालव, पारियात्रमें रहनेवाले, सौवीर, सैन्धव, हूण, शाल्व, कल्पनिवारी, |
| * अध्याय ४६ * | २३५ |
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| मद्रा रामास्तथाम्बष्ठाः पारसीकास्तथैव च।<br>आसां पिबन्ति सलिलं वसन्ति सरितां सदा॥ ४२ ॥ | मद्र, राम, अम्बष्ठ तथा पारसी लोग इन नदियोंके किनारे रहते हैं और इन (नदियों)-का जल पीते हैं॥ ३८–४२॥ |
| चत्वारि भारते वर्षे युगानि कवयोऽब्रुवन्।<br>कृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्चान्यत्र न क्वचित् ॥ ४३ ॥ | कवियों (मनीषियों)-ने भारतवर्षमें—कृत (सत्य), त्रेता, द्वापर तथा कलि—इन चार युगोंको बताया है। ये (युग) अन्यत्र कहीं नहीं होते ॥ ४३ ॥ |
| यानि किंपुरुषाद्यानि वर्षाण्यष्टौ महर्षयः।<br>न तेषु शोको नायासो नोद्वेगः क्षुद्भयं न च॥ ४४॥<br><br>स्वस्थाः प्रजा निरातङ्काः सर्वदुःखविवर्जिताः।<br>रमन्ति विविधैर्भावैः सर्वाश्च स्थिरयौवनाः ॥ ४५ ॥ | हे महर्षियो! किंपुरुष आदि जो आठ वर्ष हैं, उनमें न शोक है, न परिश्रम है, न उद्वेग है और न भूखका भय है। (वहाँ) सारी प्रजा स्वस्थ, आतङ्करहित तथा सभी प्रकारके दुःखोंसे मुक्त रहती है। सभी स्थिर यौवनवाले होते हैं और अनेक प्रकारके भावोंसे रमण करते रहते हैं॥ ४४-४५॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४५ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें पैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ४५ ॥
छियालीसवाँ अध्याय
विभिन्न पर्वतोंपर स्थित देवताओंके पुरोंका वर्णन तथा वहाँके निवासियों, नदियों, सरोवरों और भवनोंका वर्णन, जम्बूद्वीपके वर्णनका उपसंहार
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
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| हेमकूटगिरेः शृङ्गे महाकूटैः सुशोभनम्।<br>स्फाटिकं देवदेवस्य विमानं परमेष्ठिनः ॥ १॥<br>अथ देवादिदेवस्य भूतेशस्य त्रिशूलिनः।<br>देवाः सिद्धगणा यक्षाः पूजां नित्यं प्रकुर्वते ॥ २॥<br>स देवो गिरिशः सार्धं महादेव्या महेश्वरः।<br>भूतैः परिवृतो नित्यं भाति तत्र पिनाकधृक् ॥ ३॥ | हेमकूट पर्वतके शिखरपर बड़े-बड़े गुंबदोंसे सुशोभित स्फटिकसे बना हुआ देवाधिदेव परमेष्ठी (शिव)-का एक विमान है। वहाँ देवता, सिद्धगण तथा यक्ष देवोंके आदिदेव भूतेश त्रिशूलीकी नित्य पूजा करते हैं। वे पिनाक धारण करनेवाले गिरिश महेश्वर महादेवीके साथ भूतगणोंसे आवृत होते हुए नित्य वहाँ सुशोभित होते हैं॥ १–३॥ |
| विभक्तचारुशिखरः कैलासो यत्र पर्वतः।<br>निवासः कोटियक्षाणां कुबेरस्य च धीमतः।<br>तत्रापि देवदेवस्य भवस्यायतनं महत् ॥ ४॥<br>मन्दाकिनी तत्र दिव्या रम्या सुविमलोदका।<br>नदी नानाविधैः पद्मैरनेकैः समलंकृता ॥ ५॥<br>देवदानवगन्धर्वयक्षराक्षसकिंनरैः ।<br>उपस्पृष्टजला नित्यं सुपुण्या सुमनोरमा ॥ ६॥ | जहाँ अलग-अलग सुन्दर शिखरोंवाला कैलास पर्वत है तथा जहाँ करोड़ों यक्षों तथा बुद्धिमान् कुबेरका निवास है, वहींपर देवाधिदेव शंकरका विशाल मन्दिर है। वहाँ नाना प्रकारके अनेक कमलोंसे अलंकृत अत्यन्त स्वच्छ जलवाली दिव्य एवं रमणीय मन्दाकिनी नदी है। देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और किंनर उस अत्यन्त पवित्र तथा मनोरम नदीके जलका नित्य स्पर्श (स्नान, आचमन आदि) करते हैं॥ ४-६॥ |
| अन्याश्च नद्यः शतशः स्वर्णपद्मैरलंकृताः।<br>तासां कूलेषु देवस्य स्थानानि परमेष्ठिनः।<br>देवर्षिगणजुष्टानि तथा नारायणस्य च ॥ ७॥ | अन्य भी स्वर्णकमलोंसे सुशोभित वहाँ सैकड़ों नदियाँ हैं। इनके तटोंपर देवताओं तथा ऋषिगणोंसे सेवित परमेष्ठी देव और नारायणके मन्दिर हैं॥ ७॥ |
| २३६ | * कूर्मपुराण * |
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| सितान्तशिखरे चापि पारिजातवनं शुभम्।<br>तत्र शक्रस्य विपुलं भवनं रत्नमण्डितम्।<br>स्फाटिकस्तम्भसंयुक्तं हेमगोपुरसंयुतम्॥ ८ ॥<br><br>तत्राथ देवदेवस्य विष्णोर्विश्वामरेशितुः।<br>सुपुण्यं भवनं रम्यं सर्वरत्नोपशोभितम्॥ ९ ॥<br><br>तत्र नारायणः श्रीमान् लक्ष्म्या सह जगत्पतिः।<br>आस्ते सर्वामरश्रेष्ठः पूज्यमानः सनातनः॥ १० ॥<br>तथा च वसुधारे तु वसूनां रत्नमण्डितम्।<br>स्थानानामष्टकं पुण्यं दुरार्धर्षं सुरद्विषाम्॥ ११ ॥<br><br>रत्नधारे गिरिवरे सप्तर्षीणां महात्मनाम्।<br>सप्ताश्रमाणि पुण्यानि सिद्धावासयुतानि तु॥ १२ ॥<br><br>तत्र हैमं चतुर्द्वारं वज्रनीलादिमण्डितम्।<br>सुपुण्यं सुमहत् स्थानं ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः॥ १३ ॥<br>तत्र देवर्षयो विप्राः सिद्धा ब्रह्मर्षयोऽपरे।<br>उपासते सदा देवं पितामहमजं परम्॥ १४ ॥<br><br>स तैः सम्पूजितो नित्यं देव्या सह चतुर्मुखः।<br>आस्ते हिताय लोकानां शान्तानां परमा गतिः॥ १५ ॥<br>अथैकशृङ्गशिखरे महापद्मौरलंकृतम्।<br>स्वच्छामृतजलं पुण्यं सुगन्धं सुमहत् सरः॥ १६ ॥<br><br>जैगीषव्याश्रमं तत्र योगीन्द्रैरुपशोभितम्।<br>तत्रासौ भगवान् नित्यमास्ते शिष्यैः समावृतः।<br>प्रशान्तदोषैरक्षुद्रैर्ब्रह्मविद्भिर्महात्मभिः ॥ १७॥<br>शङ्खो मनोहरश्चैव कौशिकः कृष्ण एव च।<br>सुमना वेदनादश्च शिष्यास्तस्य प्रधानतः॥ १८ ॥<br>सर्वे योगरताः शान्ता भस्मोद्धूलितविग्रहाः।<br>उपासते महावीर्या ब्रह्मविद्यापरायणाः॥ १९ ॥<br>तेषामनुग्रहार्थाय यतीनां शान्तचेतसाम्।<br>सांनिध्यं कुरुते भूयो देव्या सह महेश्वरः॥ २०॥<br>अन्यानि चाश्रमाणि स्युस्तस्मिन् गिरिवरोत्तमे।<br>मुनीनां युक्तमनसां सरांसि सरितस्तथा॥ २१॥<br>तेषु योगरता विप्रा जापकाः संयतेन्द्रियाः।<br>ब्रह्मण्यासक्तमनसो रमन्ते ज्ञानतत्पराः॥ २२॥ | (हेमकूटके) अन्तिम शुभ्र शिखरपर पारिजात वृक्षोंका सुन्दर वन है। वहाँ स्फटिकोंसे बने हुए खम्भोंसे युक्त, स्वर्णसे बना गोपुरवाला इन्द्रका रत्नमण्डित एक विशाल भवन है। वहाँपर समस्त देवताओंके नियामक देवाधिदेव विष्णुका एक अत्यन्त पवित्र और रमणीय भवन है, जो सभी रत्नोंसे सुशोभित है। वहाँ संसारके स्वामी, सभी देवताओंमें श्रेष्ठ, पूज्यमान, सनातन श्रीमान् नारायण लक्ष्मीके साथ निवास करते हैं॥ ८-१०॥<br><br>इसी प्रकार वसुधार नामक पर्वतपर (आठ) वसुओंके रत्नोंसे मण्डित, देवताओंसे द्वेष करनेवाले असुरोंके लिये अपराजेय पवित्र आठ स्थान हैं। रत्नधार नामक श्रेष्ठ पर्वतपर सिद्धोंके आवाससे युक्त महात्मा सप्तर्षियोंके पवित्र सात आश्रम हैं। वहाँ अव्यक्तजन्मा ब्रह्माका सोनेसे बना हुआ चार द्वारोंवाला, हीरे एवं नील मणि आदिसे मण्डित अत्यन्त पवित्र विशाल स्थान है॥ ११-१३॥<br><br>हे विप्रो ! वहाँ देवर्षि, ब्रह्मर्षि, सिद्ध तथा दूसरे लोग अजन्मा परम पितामह देवकी सदा उपासना करते हैं। उनके द्वारा नित्य भलीभाँति पूजित शान्तचित्तवालोंके परम गतिरूप वे चतुर्मुख ब्रह्मा देवीके साथ लोकोंके कल्याणके लिये वहाँ रहते हैं॥ १४-१५॥<br><br>(उस हेमकूटके) एक ऊँचे शिखरपर महापद्मोंसे अलंकृत, सुगन्धित, स्वच्छ एवं अमृतके समान जलवाला एक पवित्र विशाल तालाब है। वहाँपर (महर्षि) जैगीषव्यका योगीन्द्रोंसे सुशोभित एक आश्रम है। शान्त दोषोंवाले महान् ब्रह्मविज्ञानी एवं महात्मारूप शिष्योंसे आवृत भगवान् (जैगीषव्य) वहाँ नित्य निवास करते हैं॥ १६-१७॥<br><br>शङ्ख, मनोहर, कौशिक, कृष्ण, सुमना तथा वेदनाद उनके प्रधान शिष्य हैं। योगपरायण, शान्त, भस्मसे उपलिप्त शरीरवाले, महावीर्य (उत्कृष्ट शक्तिसम्पन्न) तथा ब्रह्मविद्या-परायण वे सभी (भगवान्की) उपासना करते हैं। उन शान्तचित्त यतियोंपर अनुग्रह करनेके लिये महेश्वर देवीके साथ (उस स्थानपर) निवास करते हैं॥ १८-२०॥<br><br>उस उत्तम गिरिश्रेष्ठपर योगयुक्त मनवाले मुनियोंके अन्य कई आश्रम तथा सरोवर और नदियाँ हैं। उनमें योग-परायण, जप करनेवाले, संयत इन्द्रियोंवाले एवं ब्रह्मनिष्ठ मनवाले, ज्ञानतत्पर विप्रगण रमण करते हैं |
- अध्याय ४६ * | २३७ ---|--- आत्मन्यात्मानमाधाय शिखान्तान्तरमास्थितम्।<br>ध्यायन्ति देवमीशानं येन सर्वमिदं ततम्॥ २३॥ | (समाधिस्थ रहते हैं)। (वे) स्वयंमें आत्मनिष्ठ होकर शिखाके अन्तिम मूलभाग(ब्रह्मरन्ध्र)-में स्थित ईशान देवका ध्यान करते हैं, जिनसे इस सम्पूर्ण (जगत्)-का विस्तार हुआ है। सुमेघ (नामक पर्वत)-पर हजारों सुमेघे वासवस्थानं सहस्रादित्यसंनिभम्।<br>तत्रास्ते भगवानिन्द्रः शच्या सह सुरेश्वरः॥ २४॥ | सूर्योंके समान प्रकाशमान इन्द्रका एक स्थान है। देवताओंके राजा भगवान् इन्द्र शचीके साथ वहाँ निवास करते हैं। गजशैलपर दुर्गाका मणियोंसे बने तोरणवाला एक भवन है। साक्षात् महेश्वरी भगवती दुर्गा वहाँ गजशैले तु दुर्गाया भवनं मणितोरणम्।<br>आस्ते भगवती दुर्गा तत्र साक्षान्महेश्वरी॥ २५॥ | निवास करती हैं। योगामृतका पान करके अर्थात् योगको आत्मसात् कर लेनेके कारण साक्षात् योगेश्वरी और (ईश्वर अर्धनारीश्वर महेश्वरकी अर्धाङ्गिनी होनेके कारण) ईश्वरका साक्षात् आनन्द प्राप्तकर विविध उपास्यमाना विविधैः शक्तिभेदैरितस्ततः।<br>पीत्वा योगामृतं लब्ध्वा साक्षादानन्दमैश्वरम्॥ २६॥ | प्रकारकी शक्तियोंके रूपमें इतस्ततः उपासित होती रहती हैं॥ २१–२६॥ सुनीलस्य गिरेः शृङ्गे नानाधातुसमुज्ज्वले।<br>राक्षसानां पुराणि स्युः सरांसि शतशो द्विजाः॥ २७॥ | हे द्विजो! विविध धातुओंसे देदीप्यमान सुनील पर्वतके शिखरपर राक्षसोंके नगर तथा सैकड़ों सरोवर हैं। विप्रो! इसी प्रकार शतशृंग नामक महान् पर्वतपर तथा पुरशतं विप्रा शतशृङ्गे महाचले।<br>स्फाटिकस्तम्भसंयुक्तं यक्षाणाममितौजसाम्॥ २८॥ | स्फटिक स्तम्भोंसे बने हुए अमित तेजस्वी यक्षोंके सौ नगर हैं। श्वेतोदर पर्वतके शिखरपर महात्मा सुपर्ण श्वेतोदरगिरेः शृङ्गे सुपर्णस्य महात्मनः।<br>प्राकारगोपुरोपेतं मणितोरणमण्डितम्॥ २९॥ | (गरुड)-का अनेक प्राकार और गोपुरोंसे युक्त तथा मणियोंसे बने तोरणोंसे मण्डित पुर है। वहाँ साक्षात् स तत्र गरुडः श्रीमान् साक्षाद् विष्णुरिवापरः।<br>ध्यात्वास्ते तत् परं ज्योतिरात्मानं विष्णुमव्ययम्॥ ३०॥ | दूसरे विष्णुके समान वे श्रीमान् गरुड उन परम ज्योतिःस्वरूप आत्मरूप अव्यय विष्णुका ध्यान करते रहते हैं॥ २७–३०॥ अन्यच्च भवनं पुण्यं श्रीशृङ्गे मुनिपुंगवाः।<br>श्रीदेव्याः सर्वरत्नाढ्यं हैमं सुमणितोरणम्॥ ३१॥ | मुनिश्रेष्ठो! श्रीशृंगपर श्रीदेवीका दूसरा भी एक पवित्र भवन है, जो सभी रत्नोंसे पूर्ण तथा स्वर्णसे बना हुआ है और सुन्दर मणियोंसे बने तोरणवाला है। वहाँ तत्र सा परमा शक्तिर्विष्णोरतिमनोरमा।<br>अनन्तविभवा लक्ष्मीर्जगत्सम्मोहनोत्सुका॥ ३२॥ | विष्णुकी अति मनोरम परम शक्ति (वे लक्ष्मी) संसारके मूल कारण (विष्णु)-का चिन्तन करती हुई अध्यास्ते देवगन्धर्वसिद्धचारणवन्दिता।<br>विचिन्त्य जगतो योनिं स्वशक्तिकिरणोज्ज्वला॥ ३३॥ | विशेषरूपसे निवास करती हैं। वे लक्ष्मी अनन्त ऐश्वर्यवाली, संसारको मोहित करनेमें उत्सुक, देवताओं, गन्धर्वों, सिद्धों तथा चारणोंसे वन्दित हैं और अपनी तत्रैव देवदेवस्य विष्णोरायतनं महत्।<br>सरांसि तत्र चत्वारि विचित्रकमलाश्रया॥ ३४॥ | शक्तिकी किरणोंसे प्रकाशित हैं। वहीं देवाधिदेव विष्णुका विशाल भवन है तथा वहींपर विचित्र कमलोंवाले चार सरोवर हैं। इसी प्रकार सहस्रशिखर तथा सहस्रशिखरे विद्याधरपुराष्टकम्।<br>रत्नसोपानसंयुक्तं सरोभिश्चोपशोभितम्॥ ३५॥ | (पर्वत)-पर रत्नोंकी सीढ़ियोंसे बने हुए और सरोवरोंसे सुशोभित विद्याधरोंके आठ पुर हैं॥ ३१–३५॥
२३८ * कूर्मपुराण *
नद्यो विमलपानीयाश्चित्रनीलोत्पलाकराः।
कर्णिकारवनं दिव्यं तत्रास्ते शंकरोमया॥ ३६॥
पारियात्रे महाशैले महालक्ष्म्याः पुरं शुभम्।
रम्यप्रासादसंयुक्तं घण्टाचामरभूषितम्॥ ३७॥
नृत्यद्भिरप्सरःसङ्घैरितश्चेतश्च शोभितम्।
मृदङ्गमुरजोद्घुष्टं वीणावेणुनिनादितम्॥ ३८॥
गन्धर्वकिंनराकीर्णं संवृतं सिद्धपुंगवैः।
भास्वद्भित्तिसमाकीर्णं महाप्रासादसंकुलम्॥ ३९॥
गणेश्वराङ्गनाजुष्टं धार्मिकाणां सुदर्शनम्।
तत्र सा वसते देवी नित्यं योगपरायणा॥ ४०॥
महालक्ष्मीर्महादेवी त्रिशूलवरधारिणी।
त्रिनेत्रा सर्वशक्तीभिः संवृता सदसन्मया।
पश्यन्ति तत्र मुनयः सिद्धा ये ब्रह्मवादिनः॥ ४१॥
सुपार्श्वस्योत्तरे भागे सरस्वत्याः पुरोत्तमम्।
सरांसि सिद्धजुष्टानि देवभोग्यानि सत्तमाः॥ ४२॥
पाण्डुरस्य गिरेः शृङ्गे विचित्रद्रुमसंकुले।
गन्धर्वाणां पुरशतं दिव्यस्त्रीभिः समावृतम्॥ ४३॥
तेषु नित्यं मदोत्सिक्ता वरनार्यस्तथैव च।
क्रीडन्ति मुदिता नित्यं विलासैर्भोगतत्पराः॥ ४४॥
अञ्जनस्य गिरेः शृङ्गे नारीणां पुरमुत्तमम्।
वसन्ति तत्राप्सरसो रम्भाद्या रतिलालसाः॥ ४५॥
चित्रसेनादयो यत्र समायान्त्यर्थिनः सदा।
सा पुरी सर्वरत्नाढ्या नैकप्रस्रवणैर्युता॥ ४६॥
अनेकानि पुराणि स्युः कौमुदे चापि सुव्रताः।
रुद्राणां शान्तरजसामीश्वरार्पितचेतसाम्॥ ४७॥
तेषु रुद्रा महायोगा महेशान्तरचारिणः।
समासते परं ज्योतिरारूढाः स्थानमुत्तमम्॥ ४८॥
वहाँ स्वच्छ जलवाली नदियाँ तथा अनेक प्रकारके प्रफुल्लित नीलकमल हैं और कर्णिकारका* एक दिव्य वन है, उमाके साथ शंकर वहाँ विराजमान रहते हैं। पारियात्र नामक महाशैलपर महालक्ष्मीका सुन्दर पुर है, जो रमणीय प्रासादोंसे युक्त, घण्टा एवं चामरसे अलंकृत, इतस्ततः नृत्य करती हुई अप्सराओंके समूहसे सुशोभित, मृदंग एवं मुरजकी ध्वनिसे गुञ्जित, वीणा तथा वेणुकी झंकारसे निनादित, गन्धर्व तथा किंनरोंसे आकीर्ण, श्रेष्ठ सिद्धोंसे आवृत, चमकते हुए दीवालोंसे पूर्ण, बड़े-बड़े महलोंसे घनीभूत, गणेश्वरोंकी अङ्गनाओंसे सेवित और धार्मिक जनोंके द्वारा सरलतापूर्वक प्रत्यक्ष करने योग्य है। वहाँ योगपरायण, श्रेष्ठ त्रिशूल धारण करनेवाली, तीन नेत्रवाली, सभी शक्तियोंसे आवृत और सदसन्मयी देवी महालक्ष्मी महादेवी नित्य निवास करती हैं। वहाँ जो ब्रह्मवादी मुनि और सिद्ध हैं—वे उनका दर्शन करते हैं॥ ३६-४१॥
सुपार्श्वके उत्तरभागमें सरस्वतीका उत्तम पुर है। श्रेष्ठ जनो! वहाँ देवताओंके उपभोग करने योग्य तथा सिद्धोंसे सेवित अनेक सरोवर हैं। पाण्डुर पर्वतके शिखरपर अनेक प्रकारके वृक्षोंसे भरे हुए और दिव्य स्त्रियोंसे परिपूर्ण गन्धर्वोंके सौ पुर हैं। उनमें अनेक प्रकारके भोगोंमें तत्पर और काम-मदसे उन्मत्त श्रेष्ठ स्त्रियाँ तथा पुरुष अनेक प्रकारके विलासोंद्वारा भोगमें तत्पर रहते हैं और प्रसन्नतापूर्वक सदा क्रीडा (मनोविनोद) करते रहते हैं॥ ४२-४४॥
अञ्जनगिरिके शिखरपर स्त्रियोंका श्रेष्ठ पुर है, जिसमें रतिकी इच्छा करनेवाली रम्भा आदि अप्सराएँ निवास करती हैं। चित्रसेन आदि (गन्धर्व) जहाँ सदा अभिलाषीके रूपमें आया करते हैं, वह पुरी सभी रत्नोंसे परिपूर्ण तथा अनेक झरनोंसे सम्पन्न है॥ ४५-४६॥
हे सुव्रतो! कौमुद (पर्वत)-पर भी शान्त रजोगुणवाले (रजोगुणके कारण होनेवाली चंचलतासे रहित) तथा शंकरमें अर्पित चित्तवाले रुद्रोंके अनेक पुर हैं, उनमें परम ज्योति अर्थात् परब्रह्मका प्रत्यक्ष करनेवाले तथा महेशके अन्तरमें विचरण करनेवाले महायोगी रुद्रगण रहते हैं, यह स्थान बहुत उत्तम है॥ ४७-४८॥
* कर्णिकार—वृक्षविशेष, कठचम्पा या कर्णियार नामसे कई जगहोंमें प्रसिद्ध।
| * अध्याय ४६ * | २३९ |
|---|---|
| पिञ्जरस्य गिरेः शृङ्गे गणेशानां पुरत्रयम्।<br>नन्दीश्वरस्य कपिले तत्रास्ते सुयशा यतिः॥ ४९॥<br><br>तथा च जारुधेः शृङ्गे देवदेवस्य धीमतः।<br>दीप्तमायतनं पुण्यं भास्करस्यामितौजसः॥ ५०॥<br><br>तस्यैवोत्तरदिग्भागे चन्द्रस्थानमनुत्तमम्।<br>रमते तत्र रम्योऽसौ भगवान् शीतदीधितिः॥ ५१॥<br><br>अन्यच्च भवनं दिव्यं हंसशैले महर्षयः।<br>सहस्रयोजनायामं सुवर्णमणितोरणम्॥ ५२॥<br><br>तत्रास्ते भगवान् ब्रह्मा सिद्धसङ्घैरभिष्टुतः।<br>सावित्र्या सह विश्वात्मा वासुदेवादिभिर्युतः॥ ५३॥<br><br>तस्य दक्षिणदिग्भागे सिद्धानां पुरमुत्तमम्।<br>सनन्दनादयो यत्र वसन्ति मुनिपुंगवाः॥ ५४॥<br><br>पञ्चशैलस्य शिखरे दानवानां पुरत्रयम्।<br>नातिदूरेण तस्याथ दैत्याचार्यस्य धीमतः॥ ५५॥<br><br>सुगन्धशैलशिखरे सरिद्भिरुपशोभितम्।<br>कर्दमस्याश्रमं पुण्यं तत्रास्ते भगवानृषिः॥ ५६॥<br><br>तस्यैव पूर्वदिग्भागे किञ्चिद् वै दक्षिणाश्रिते।<br>सनत्कुमारो भगवांस्तत्रास्ते ब्रह्मवित्तमः॥ ५७॥<br><br>सर्वेष्वेतेषु शैलेषु तथान्येषु मुनीश्वराः।<br>सरांसि विमला नद्यो देवानामाल्यानि च॥ ५८॥<br><br>सिद्धलिङ्गानि पुण्यानि मुनिभिः स्थापितानि तु।<br>वन्यान्याश्रमवर्याणि संख्यातुं नैव शक्नुयाम्॥ ५९॥<br><br>एष संक्षेपतः प्रोक्तो जम्बूद्वीपस्य विस्तरः।<br>न शक्यं विस्तराद् वक्तुं मया वर्षशतैरपि॥ ६०॥ | पिञ्जर गिरिके शिखरपर गणेशोंके तीन पुर तथा (वहीं) कपिल(शिखर)-पर नन्दीश्वरकी पुरी है, वहाँ उत्तम यशवाले यतिगण निवास करते हैं। इसी प्रकार जारुधि पर्वतके शिखरपर अमित तेजस्वी बुद्धिमान् देवाधिदेव भास्करका दीप्तियुक्त पवित्र भवन है। उसीके उत्तर दिग्भागमें चन्द्रमाका उत्तम स्थान है, वहाँ शीत किरणोंवाले ये रम्य भगवान् (चन्द्रमा) रहते हैं॥ ४९-५१॥<br><br>हे महर्षियो! हंसशैलपर एक दूसरा दिव्य भवन है, जो एक हजार योजन विस्तारवाला है और सुवर्ण तथा मणिसे निर्मित तोरणवाला है। वहाँ सिद्धोंके समूहसे सेवित और वासुदेव आदिसे युक्त विश्वात्मा भगवान् ब्रह्मा सावित्रीके साथ रहते हैं। उसके दक्षिण दिग्भागमें सिद्धोंका श्रेष्ठ पुर है, जहाँ सनन्दन आदि श्रेष्ठ मुनि रहते हैं॥ ५२-५४॥<br><br>पञ्चशैलके शिखरपर दानवोंके तीन पुर हैं। उसके समीप ही सुगन्ध शैलके शिखरपर दैत्योंके आचार्य बुद्धिमान् भगवान् कर्दम ऋषिका नदियोंसे सुशोभित एक पवित्र आश्रम है॥ ५५-५६॥<br><br>उसीके पूर्व दिग्भागमें कुछ दक्षिण दिशाकी ओर ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ भगवान् सनत्कुमार रहते हैं। हे मुनीश्वरो! इन सभी शैलों तथा अन्य शैलोंमें भी अनेक सरोवर, स्वच्छ जलवाली नदियाँ और देवताओंके भवन हैं। वहाँ जो मुनियोंद्वारा स्थापित पवित्र सिद्ध लिङ्ग, वन तथा श्रेष्ठ आश्रम हैं, उनकी गणना मैं नहीं कर सकता। यह संक्षेपमें जम्बूद्वीपका विस्तार बतलाया गया, सैकड़ों वर्षोंमें भी मैं इसके विस्तारका वर्णन नहीं कर सकता॥ ५७-६०॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे षट्चत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४६॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें छियालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४६॥
२४० * कूर्मपुराण *
सैंतालीसवाँ अध्याय
प्लक्ष आदि महाद्वीपों, वहाँके पर्वतों, नदियों तथा निवासियोंका वर्णन, श्वेतद्वीपमें स्थित नारायणपुरका वर्णन, वहाँ वैकुण्ठमें रहनेवाले लक्ष्मीपति शेषशायी नारायणकी महिमाका ख्यापन
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| जम्बूद्वीपस्य विस्ताराद् द्विगुणेन समन्ततः।<br>संवेष्टयित्वा क्षारोदं प्लक्षद्वीपो व्यवस्थितः॥ १ ॥<br>प्लक्षद्वीपे च विप्रेन्द्राः समासन् कुलपर्वताः।<br>ऋज्वायताः सुपर्वाणः सिद्धसङ्घनिषेविताः॥ २ ॥<br>गोमेदः प्रथमस्तेषां द्वितीयश्चन्द्र उच्यते।<br>नारदो दुन्दुभिश्चैव सोमश्च ऋषभस्तथा।<br>वैभ्राजः सप्तमः प्रोक्तो ब्रह्मणोऽत्यन्तवल्लभः॥ ३ ॥<br>तत्र देवर्षिगन्धर्वैः सिद्धैश्च भगवानजः।<br>उपास्यते स विश्वात्मा साक्षी सर्वस्य विश्वसृक्॥ ४ ॥ | जम्बूद्वीपके विस्तारसे दुगुने विस्तारमें चारों ओरसे क्षार सागरको आवृतकर प्लक्षद्वीप स्थित है। श्रेष्ठ विप्रो! प्लक्षद्वीपमें सीधे विस्तारवाले, सुन्दर पर्वोंवाले तथा सिद्धोंके समूहोंसे सेवित सात कुलपर्वत हैं। उनमें गोमेद पहला है, दूसरा चन्द्र पर्वत कहलाता है। इसी प्रकार नारद, दुन्दुभि, सोम, ऋषभ तथा सातवाँ वैभ्राज नामक पर्वत कहा गया है, जो ब्रह्माको अत्यन्त प्रिय है। वहाँ देवर्षियों, गन्धर्वों तथा सिद्धोंके द्वारा सबके साक्षी, विश्वकी सृष्टि करनेवाले विश्वात्मा भगवान् अज (ब्रह्मा)-की उपासना की जाती है॥ १-४॥ |
| तेषु पुण्या जनपदा नाधयो व्याधयो न च।<br>न तत्र पापकर्तारः पुरुषा वा कथञ्चन॥ ५ ॥ | उन (पर्वतों)-में पवित्र जनपद हैं। वहाँ न कोई आधि है, न कोई व्याधि। वहाँ रहनेवाले पुरुष किसी भी प्रकारका पाप नहीं करते हैं। |
| तेषां नद्यश्च सप्तैव वर्षाणां तु समुद्रगाः।<br>तासु ब्रह्मर्षयो नित्यं पितामहमुपासते॥ ६ ॥<br>अनुतप्ता शिखी चैव विपापा त्रिदिवा कृता।<br>अमृता सुकृता चैव नामतः परिकीर्तिताः॥ ७ ॥ | समुद्रकी ओर जानेवाली उन वर्षपर्वतोंकी सात नदियाँ हैं, उनमें ब्रह्मर्षि नित्य पितामहकी उपासना करते हैं। (वे नदियाँ) अनुतप्ता, शिखी, विपापा, त्रिदिवा, कृता, अमृता और सुकृता नामवाली कही गयी हैं॥ ५-७॥ |
| क्षुद्रनद्यस्त्वसंख्याताः सरांसि सुबहून्यपि।<br>न चैतेषु युगावस्था पुरुषा वै चिरायुषः॥ ८ ॥<br>आर्यकाः कुरवाश्चैव विदशा भाविनस्तथा।<br>ब्रह्मक्षत्रियविट्शूद्रास्तस्मिन् द्वीपे प्रकीर्तिताः॥ ९ ॥ | इनके अतिरिक्त असंख्य छोटी-छोटी नदियाँ तथा बहुतसे सरोवर भी वहाँपर हैं। यहाँ (सत्य, त्रेता आदि रूपमें) युगोंकी व्यवस्था नहीं है और सभी पुरुष दीर्घायु होते हैं। इस द्वीपमें आर्यक, कुरव, विदश तथा भावी नामक ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र कहे गये हैं॥ ८-९॥ |
| इज्यते भगवान् सोमो वर्णैस्तत्र निवासिभिः।<br>तेषां च सोमसायुज्यं सारूप्यं मुनिपुंगवाः॥ १०॥ | हे मुनिश्रेष्ठो! यहाँ रहनेवाले विभिन्न वर्णवालोंके द्वारा भगवान् सोमकी पूजा की जाती है, उन्हें सोमका सायुज्य और सारूप्य (नामक मोक्ष) प्राप्त होता है। |
| सर्वे धर्मपरा नित्यं नित्यं मुदितमानसाः।<br>पञ्चवर्षसहस्राणि जीवन्ति च निरामयाः॥ ११॥ | वहाँके सभी लोग नित्य धर्मपरायण और नित्य प्रसन्नचित्त रहते हैं तथा रोगरहित होकर पाँच हजार वर्षतक जीवित रहते हैं। |
| प्लक्षद्वीपप्रमाणं तु द्विगुणेन समन्ततः।<br>संवेष्ट्येक्षुरसाम्भोधिं शाल्मलिः संव्यवस्थितः॥ १२॥<br>सप्त वर्षाणि तत्रापि सप्तैव कुलपर्वताः।<br>ऋज्वायताः सुपर्वाणः सप्त नद्यश्च सुव्रताः॥ १३॥ | प्लक्षद्वीपके दुगुने प्रमाणमें चारों ओर इक्षुरसके समुद्रको आवेष्टितकर शाल्मलि नामक द्वीप स्थित है। वहाँ भी सात वर्ष और सात ही कुलपर्वत हैं, (वे पर्वत) सीधे फैले हुए और सुन्दर पर्वोंवाले हैं। हे सुव्रतो! (वहाँ) सात नदियाँ भी हैं॥ १०-१३॥ |
| * अध्याय ४७ * | २४१ |
|---|---|
| कुमुदश्रोन्नताश्चैव तृतीयश्च बलाहकः।<br>द्रोणः कङ्कस्तु महिषः ककुद्मान् सप्त पर्वताः ॥ १४ ॥<br><br>योनी तोया वितृष्णा च चन्द्रा शुक्ला विमोचिनी।<br>निवृत्तिश्चेति ता नद्यः स्मृता पापहरा नृणाम् ॥ १५ ॥<br><br>न तेषु विद्यते लोभः क्रोधो वा द्विजसत्तमाः।<br>न चैवास्ति युगावस्था जना जीवन्त्यनामयाः ॥ १६ ॥<br><br>यजन्ति सततं तत्र वर्णा वायुं सनातनम्।<br>तेषां तस्याथ सायुज्यं सारूप्यं च सलोकता ॥ १७ ॥<br>कपिला ब्राह्मणाः प्रोक्ता राजानश्चारुणास्तथा।<br>पीता वैश्याः स्मृताः कृष्णा द्वीपेऽस्मिन् वृषला द्विजाः ॥ १८ ॥<br>शाल्मलस्य तु विस्ताराद् द्विगुणेन समन्ततः।<br>संवेष्ट्य तु सुरोदाब्धिं कुशद्वीपो व्यवस्थितः ॥ १९ ॥<br>विद्रुमश्चैव हेमश्च द्युतिमान् पुष्पवांस्तथा।<br>कुशेशयो हरिश्चाथ मन्दरः सप्त पर्वताः ॥ २० ॥<br>धुतपापा शिवा चैव पवित्रा सम्मता तथा।<br>विद्युदम्भा मही चेति नद्यस्तत्र जलावाहाः ॥ २१ ॥<br>अन्याश्च शतशो विप्रा नद्यो मणिजलाः शुभाः।<br>तासु ब्रह्माणमीशानं देवादद्याः पर्युपासते ॥ २२ ॥<br><br>ब्राह्मणा द्रविणो विप्राः क्षत्रियाः शुष्मिणस्तथा।<br>वैश्याः स्नेहास्तु मन्देहाः शूद्रास्तत्र प्रकीर्तिताः ॥ २३ ॥<br><br>सर्वे विज्ञानसम्पन्ना मैत्रादिगुणसंयुताः।<br>यथोक्तकारिणः सर्वे सर्वे भूतहिते रताः ॥ २४ ॥<br><br>यजन्ति विविधैर्यज्ञैर्ब्रह्माणं परमेष्ठिनम्।<br>तेषां च ब्रह्मसायुज्यं सारूप्यं च सलोकता ॥ २५ ॥<br><br>कुशद्वीपस्य विस्ताराद् द्विगुणेन समन्ततः।<br>क्रौञ्चद्वीपस्ततो विप्रा वेष्टयित्वा घृतोदधिम् ॥ २६ ॥<br>क्रौञ्चो वामनकश्चैव तृतीयश्चान्धकारकः।<br>देवावृच्च विविन्दश्च पुण्डरीकस्तथैव च।<br>नाम्ना च सप्तमः प्रोक्तः पर्वतो दुन्दुभिस्वनः ॥ २७ ॥<br>गौरी कुमुद्वती चैव संध्या रात्रिर्मनोजवा।<br>ख्यातिश्च पुण्डरीका च नद्यः प्राधान्यतः स्मृताः ॥ २८ ॥<br>पुष्कराः पुष्कला धन्यास्तिष्यास्तस्य क्रमेण वै।<br>ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चैव द्विजोत्तमाः ॥ २९ ॥ | कुमुद, उन्नत, तीसरा बलाहक, द्रोण, कङ्क, महिष तथा ककुद्मान्—ये सात (कुल) पर्वत हैं। योनी, तोया, वितृष्णा, चन्द्रा, शुक्ला, विमोचिनी तथा निवृत्ति—ये सात नदियाँ मनुष्योंका पाप हरण करनेवाली कही गयी हैं। हे द्विजश्रेष्ठो! उनमें (यहाँके निवासियोंमें) न लोभ है, न क्रोध है और न (यहाँ) युगकी व्यवस्था ही है। यहाँके सभी लोग रोगरहित होकर जीवित रहते हैं। यहाँके सभी वर्णोंके लोग निरन्तर सनातन वायुदेवका यजन करते हैं, इन्हें उन (वायुदेव)-का सायुज्य, सारूप्य तथा सालोक्य (नामक मोक्ष) प्राप्त होता है ॥ १४–१७ ॥<br><br>हे द्विजो! इस (शाल्मलि) द्वीपमें ब्राह्मण कपिल वर्णके और क्षत्रिय अरुण वर्णके कहे गये हैं। वैश्य पीतवर्णके तथा वृषल (शूद्र) कृष्ण वर्णके बतलाये गये हैं। शाल्मलद्वीपके दुगुने विस्तारमें चारों ओरसे सुरोदसागरको आवेष्टित कर कुशद्वीप स्थित है। विद्रुम, हेम, द्युतिमान्, पुष्पवान्, कुशेशय, हरि तथा मन्दर—ये सात (कुल) पर्वत हैं। यहाँ धुतपापा, शिवा, पवित्रा, संमता, विद्युदम्भा और मही (नामक) जलसे पूर्ण नदियाँ हैं ॥ १८–२१ ॥<br><br>हे विप्रो! यहाँ मणिके समान स्वच्छ जलवाली अन्य भी सैकड़ों नदियाँ हैं। इनमें देवता आदि ईशान ब्रह्माकी उपासना करते हैं। विप्रो! वहाँके ब्राह्मण द्रविण, क्षत्रिय शुष्मिण, वैश्य स्नेह तथा शूद्र मन्देह कहे गये हैं। यहाँके सभी लोग विशिष्ट ज्ञानसे सम्पन्न, मैत्री आदि गुणोंसे समन्वित, विहित कर्मोंको करनेवाले तथा सभी प्राणियोंके हित-चिन्तनमें लगे रहते हैं। ये विविध यज्ञोंद्वारा परमेष्ठी ब्रह्माका यजन करते हैं और उन्हें ब्रह्माका सायुज्य, सारूप्य तथा सालोक्य (मोक्ष) प्राप्त होता है ॥ २२–२५ ॥<br><br>हे विप्रो! कुशद्वीपके दुगुने विस्तारमें चारों ओर घृतसमुद्रको आवेष्टित करके क्रौञ्चद्वीप स्थित है। क्रौञ्च, वामनक, अन्धकारक, देवावृत्, विविन्द, पुण्डरीक तथा दुन्दुभिस्वन नामक सात पर्वत यहाँ कहे गये हैं। गौरी, कुमुद्वती, संध्या, रात्रि, मनोजवा, ख्याति तथा पुण्डरीक—ये प्रधान नदियाँ यहाँ कही गयी हैं। हे द्विजोत्तमो! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र—ये क्रमशः पुष्कर, पुष्कल, धन्य तथा तिष्य नामसे यहाँ कहे जाते हैं ॥ २६–२९ ॥ |
२४२ * कूर्मपुराण *
| अर्चयन्ति महादेवं यज्ञदानसमाधिभिः ।<br>व्रतोपवासैर्विविधैर्होमैः स्वाध्यायतर्पणैः ॥ ३० ॥<br><br>तेषां वै रुद्रसायुज्यं सारूप्यं चातिदुर्लभम् ।<br>सलोकता च सामीप्यं जायते तत्प्रसादतः ॥ ३१ ॥<br>क्रौञ्चद्वीपस्य विस्ताराद् द्विगुणेन समन्ततः ।<br>शाकद्वीपः स्थितो विप्रा आवृत्य दधिसागरम् ॥ ३२ ॥<br>उदयो रैवतश्चैव श्यामाकोऽस्तगिरिस्तथा ।<br>आम्बिकेयस्तथा रम्यः केशरी चेति पर्वताः ॥ ३३ ॥<br>सुकुमारी कुमारी च नलिनी रेणुका तथा ।<br>इक्षुका धेनुका चैव गभस्तिश्चेति निम्नगाः ॥ ३४ ॥<br>आसां पिबन्तः सलिलं जीवन्ते तत्र मानवाः ।<br>अनामया ह्यशोकाश्च रागद्वेषविवर्जिताः ॥ ३५ ॥<br>मगाश्च मगधाश्चैव मानवा मन्दगास्तथा ।<br>ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चात्र क्रमेण तु ॥ ३६ ॥<br>यजन्ति सततं देवं सर्वलोकैकसाक्षिणम् ।<br>व्रतोपवासैर्विविधैर्देवदेवं दिवाकरम् ॥ ३७ ॥<br>तेषां सूर्येण सायुज्यं सामीप्यं च सरूपता ।<br>सलोकता च विप्रेन्द्रा जायते तत्प्रसादतः ॥ ३८ ॥<br>शाकद्वीपं समावृत्य क्षीरोदः सागरः स्थितः ।<br>श्वेतद्वीपश्च तन्मध्ये नारायणपरायणाः ॥ ३९ ॥<br><br>तत्र पुण्या जनपदा नानाश्चर्यसमन्विताः ।<br>श्वेतास्तत्र नरा नित्यं जायन्ते विष्णुतत्पराः ॥ ४० ॥<br>नाधयो व्याधयस्तत्र जरामृत्युभयं न च ।<br>क्रोधलोभविनिर्मुक्ता मायामात्सर्यवर्जिताः ॥ ४१ ॥<br><br>नित्यपुष्टा निरातङ्का नित्यानन्दाश्च भोगिनः ।<br>नारायणपराः सर्वे नारायणपरायणाः ॥ ४२ ॥<br><br>केचिद् ध्यानपरा नित्यं योगिनः संयतेन्द्रियाः ।<br>केचिज्जपन्ति तप्यन्ति केचिद् विज्ञानिनोऽपरे ॥ ४३ ॥<br><br>अन्ये निर्बीजयोगेन ब्रह्मभावेन भाविताः ।<br>ध्यायन्ति तत् परं व्योम वासुदेवं परं पदम् ॥ ४४ ॥<br><br>एकान्तिनो निरालम्बा महाभागवताः परे ।<br>पश्यन्ति परमं ब्रह्म विष्ण्वाख्यं तमसः परम् ॥ ४५ ॥ | ये यज्ञ, दान, समाधि, व्रत, उपवास, विविध होम, स्वाध्याय एवं तर्पणद्वारा महादेवकी अर्चना करते हैं। इन्हें महादेवकी कृपासे उनका (रुद्रका) अति दुर्लभ सायुज्य, सारूप्य, सालोक्य तथा सामीप्य (मोक्ष) प्राप्त होता है ॥ ३०-३१ ॥<br><br>हे विप्रो! क्रौञ्चद्वीपके दुगुने विस्तारमें चारों ओरसे दधिसमुद्रको आवृतकर शाकद्वीप स्थित है। (यहाँ) उदय, रैवत, श्यामाक, अस्तगिरि, आम्बिकेय, रम्य तथा केशरी—ये पर्वत हैं। यहाँ सुकुमारी, कुमारी, नलिनी, रेणुका, इक्षुका, धेनुका और गभस्ति—ये नदियाँ हैं। इनका जल पीकर यहाँके मनुष्य (सुखमय) जीवन व्यतीत करते हैं। ये रोगरहित, शोकविहीन और राग-द्वेषसे मुक्त रहते हैं ॥ ३२—३५ ॥<br><br>ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—ये क्रमशः मग, मगध, मानव तथा मन्दग कहलाते हैं। ये सभी लोकोंके एकमात्र साक्षी देवाधिदेव सूर्यदेवका विविध व्रत एवं उपवासोंद्वारा निरन्तर यजन करते हैं। हे विप्रेन्द्रो! सूर्यके अनुग्रहसे इन्हें उनकी सायुज्यता, सामीप्यता, सारूप्यता और सालोक्यता प्राप्त होती है ॥ ३६-३८ ॥<br><br>शाकद्वीपको आवृत करके क्षीरोद सागर स्थित है, उसके मध्यमें श्वेतद्वीप है। वहाँ नारायण-परायण लोग रहते हैं। वहाँ नाना आश्चर्योंसे समन्वित अनेक पवित्र जनपद हैं। वहाँके मनुष्य श्वेतवर्णके और नित्य विष्णुकी भक्तिमें तत्पर रहते हैं ॥ ३९-४० ॥<br><br>वहाँ न कोई आधि-व्याधि है, न वृद्धावस्था है तथा न मृत्युका भय ही है। सभी लोग नारायणके भक्त तथा क्रोध-लोभसे रहित, माया एवं मात्सर्यसे मुक्त, नित्य पुष्ट, आतङ्करहित, नित्य आनन्दयुक्त, भोग करनेवाले तथा नारायण-परायण रहते हैं। वहाँके कुछ निवासी जितेन्द्रिय एवं नित्य ध्यानपरायण योगी हैं, कोई जप करते हैं, कोई तप करते हैं और कुछ लोग विशिष्ट ज्ञान-सम्पन्न हैं। दूसरे निर्बीज योगके द्वारा ब्रह्मभावसे भावित होकर उन परम व्योमरूप, परमपद वासुदेवका ध्यान करते हैं। कुछ दूसरे अनन्यचेता, अन्य आश्रयरहित महाभागवत लोग तम (अज्ञान)-से परे विष्णु नामक परम ब्रह्मका दर्शन करते हैं ॥ ४१—४५ ॥ |
| * अध्याय ४७ * | २४३ |
|---|
| सर्वे चतुर्भुजाकाराः शङ्खचक्रगदाधराः।<br>सुपीतवाससः सर्वे श्रीवत्साङ्कितवक्षसः॥ ४६॥ | ये सभी चार भुजाओंवाले, शंख, चक्र तथा गदा धारण करनेवाले, सुन्दर पीताम्बर धारण करनेवाले एवं श्रीवत्ससे अङ्कित वक्षःस्थलवाले हैं॥ ४६॥ |
| अन्ये महेश्वरपरास्त्रिपुण्ड्राङ्कितमस्तकाः।<br>स्वयोगोद्भूतकिरणा महागरुडवाहनाः॥ ४७॥ | अन्य (कुछ) लोग महेश्वरके भक्त हैं। वे मस्तकपर त्रिपुण्ड्र धारण करते हैं। वे अपने योगसे उत्पन्न रश्मियोंसे लोकको प्रकाशित करते हैं और महागरुड उनके वाहन हैं। सभी शक्तियोंसे सम्पन्न, नित्य आनन्दसे पूर्ण, शुद्धान्तःकरण तथा विष्णुके अन्तरमें विचरण करनेवाले पुरुष वहाँ रहते हैं॥ ४७-४८॥ |
| सर्वशक्तिसमायुक्ता नित्यानन्दाश्च निर्मलाः।<br>वसन्ति तत्र पुरुषा विष्णोरन्तरचारिणः॥ ४८॥<br>तत्र नारायणस्यान्यद् दुर्गमं दुरतिक्रमम्।<br>नारायणं नाम पुरं व्यासाद्यैरुपशोभितम्॥ ४९॥ | वहाँ व्यास आदिसे सुशोभित नारायणका दूसरा दुर्गम तथा दुर्लङ्घ्य नारायण नामक एक पुर है। वह पुर सोनेके परकोटेसे युक्त, स्फटिकके मण्डपोंसे समन्वित, हजारों प्रकारकी प्रभाओंसे अलंकृत, अत्यन्त सुन्दर और दुराधर्ष है तथा सोनेके प्रासादोंसे युक्त एवं अनेक बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओंसे व्याप्त है। वह पुर स्वर्णसे बने हजारों विचित्र गोपुरों* और नाना प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित है, साथ ही वह स्वच्छ आसनोंसे युक्त एवं विविध प्रकारसे अलंकृत है। वह पुर विविध प्रकारके उद्यानों और नदियोंसे शोभित है। सब ओरसे सरोवरोंसे युक्त और वीणा तथा वेणुकी ध्वनिसे निनादित है। विचित्र प्रकारकी अनेक पताकाओंसे शोभित है। सब ओरसे वीथियों और रत्नसे विभूषित सीढ़ियोंसे युक्त है॥ ४९-५३॥ |
| हेमप्राकारसंयुक्तं स्फाटिकैर्मण्डपैर्युतम्।<br>प्रभासहस्रकलिलं दुराधर्षं सुशोभनम्।<br>हर्म्यप्राकारसंयुक्तमट्टालकसमाकुलम् ॥५०॥ | |
| हेमगोपुरसाहस्रैर्नानारत्नोपशोभितैः ।<br>शुभ्रास्तरणसंयुक्तं विचित्रैः समलंकृतम्॥ ५१॥ | |
| नन्दनैर्विविधाकारैः स्रवन्तीभिश्च शोभितम्।<br>सरोभिः सर्वतो युक्तं वीणावेणुनिनादितम्॥ ५२॥ | |
| पताकाभिर्विचित्राभिरनेकाभिश्च शोभितम्।<br>वीथीभिः सर्वतो युक्तं सोपानै रत्नभूषितैः॥ ५३॥ | |
| नारीशतसहस्राढ्यं दिव्यगेयसमन्वितम्।<br>हंसकारण्डवाकीर्णं चक्रवाकोपशोभितम्।<br>चतुर्द्वारमनौपम्यमगम्यं देवविद्विषाम्॥ ५४॥ | सैकड़ों, हजारों स्त्रियोंसे सम्पन्न तथा दिव्य गानसे समन्वित है। हंस एवं सारस पक्षियोंसे व्याप्त है, चक्रवाकोंसे सुशोभित है। उसमें अनुपमेय चार द्वार हैं तथा वह सुरद्वेषी असुरोंके लिये अगम्य है। (वह पुर) विविध प्रकारके गीतोंको जाननेवाले देवताओंके लिये भी दुर्लभ, नाना विलासोंसे सम्पन्न, कामके अभिलाषी, अतिकोमल, पूर्ण चन्द्रमाके समान मुखवाले, नूपुरकी ध्वनिसे युक्त, मन्द मुसकानवाले, सुन्दर बिम्बके समान ओठवाले, मुग्ध मृगशावकके समान नेत्रवाले, सम्पूर्ण ऐश्वर्योंसे सम्पन्न, अलंकृत, क्षीण कटिभागवाले, राजहंसके समान सुन्दर चालवाले, अच्छे वेषवाले, मधुर स्वरवाले, बोल-चालमें प्रवीण, दिव्य अलङ्कारोंसे |
| तत्र तत्राप्सरःसङ्घैर्नृत्यद्भिरुपशोभितम्।<br>नानागीतविधानज्ञैर्देवानापि दुर्लभैः॥ ५५॥ | |
| नानाविलाससम्पन्नैः कामुकैरतिकोमलैः।<br>प्रभूतचन्द्रवदनैर्नूपुरारावसंयुतैः ॥५६॥ | |
| ईषत्स्मितैः सुबिम्बोष्ठैर्बालमुग्धमृगेक्षणैः।<br>अशेषविभवोपेतैर्भूषितैस्तनुमध्यमैः ॥ ५७॥ | |
| सुराजहंसचलनैः सुवेषैर्मधुरस्वनैः।<br>संलापालापकुशलैर्दिव्याभरणभूषितैः ॥ ५८॥ |
* गोपुर—नगरका बड़ा फाटक अथवा फाटक मात्र।
| २४४ | * कूर्मपुराण * |
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| स्तनभारविनम्रैश्च मदघूर्णितलोचनैः।<br>नानावर्णविचित्राङ्गैर्नानाभोगरतिप्रियैः ॥ ५९॥ | विभूषित, स्तनके भारसे कुछ झुके हुए, मदके कारण चञ्चल नेत्रोंवाले, अनेक वर्णोंके अङ्गरागसे सुशोभित अङ्गोंवाले, नाना प्रकारके भोग और रतिमें अनुराग रखनेवालों और जहाँ-तहाँ नृत्य करते हुए अप्सरा-समूहोंसे सुशोभित हैं॥ ५४-५९॥ |
| प्रफुल्लकुसुमोद्यानैरितश्चेतश्च शोभितम्।<br>असंख्येयगुणं शुद्धमगम्यं त्रिदशैरपि॥ ६०॥ | प्रफुल्लित फूलोंवाले इधर-उधर विद्यमान सुन्दर उद्यानोंसे सुशोभित असंख्य गुणोंवाला वह पवित्र पुर देवताओंके लिये भी अगम्य है। अमित तेजस्वी लक्ष्मीपति (विष्णु) देवका वह पुर श्रीसे सम्पन्न और पवित्र है। उसके मध्यमें अत्यन्त तेजसे सम्पन्न, ऊँचे प्राकार तथा तोरणोंसे युक्त और योगियोंके लिये भी दुर्लभ विष्णुका दिव्य स्थान है। उसके मध्यमें कमलदलके समान द्युतिवाले, सम्पूर्ण जगत्के उत्पादक, भगवान् हरि शेषनागकी शय्यापर शयन करते हैं॥ ६०-६२॥ |
| श्रीमत्पवित्रं देवस्य श्रीपतेरमितौजसः।<br>तस्य मध्येऽतितेजस्कमुच्चप्राकारतोरणम्॥ ६१॥ | |
| स्थानं तद् वैष्णवं दिव्यं योगिनामपि दुर्लभम्।<br>तन्मध्ये भगवान्नेकः पुण्डरीकदलद्युतिः।<br>शेतेऽशेषजगत्सूतिः शेषाहिशयने हरिः॥ ६२॥ | |
| विचिन्त्यमानो योगीन्द्रैः सनन्दनपुरोगमैः।<br>स्वात्मानन्दामृतं पीत्वा परं तत् तमसः परम्॥ ६३॥ | स्वात्मानन्दरूपी अमृतका पान करते हुए सनन्दन आदि योगीन्द्रोंद्वारा तमोगुणसे अतीत श्रेष्ठ उन (श्रीहरि)-का चिन्तन किया जाता है। क्षीरसागरकी कन्या लक्ष्मी सुन्दर पीताम्बर धारण करनेवाले, अनन्त, महामायाके अधिपति तथा महान् भुजाओंवाले विष्णुके दोनों चरण नित्य पकड़े रहती हैं। जगत्की वन्दनीया हरिप्रिया वे देवी नारायणामृतका पानकर उन्हींमें मन लगाकर उनके चरणमूलमें नित्य विराजमान रहती हैं॥ ६३-६५॥ |
| सुपीतवसनोऽनन्तो महामायो महाभुजः।<br>क्षीरोदकन्यया नित्यं गृहीतचरणद्वयः॥ ६४॥ | |
| सा च देवी जगद्वन्द्या पादमूले हरिप्रिया।<br>समास्ते तन्मना नित्यं पीत्वा नारायणामृतम्॥ ६५॥ | |
| न तत्राधार्मिका यान्ति न च देवान्तराश्रयाः।<br>वैकुण्ठं नाम तत् स्थानं त्रिदशैरपि वन्दितम्॥ ६६॥ | वहाँ (श्वेतद्वीपके नारायणपुरमें) न अधार्मिक जा पाते हैं और न दूसरे देवका आश्रय ग्रहण करनेवाले। देवताओंसे भी वन्दित वह स्थान वैकुण्ठ नामसे प्रसिद्ध है। उसका सम्पूर्ण रूपसे वर्णन करनेमें मेरी बुद्धि समर्थ नहीं है। उस नारायणपुरका मैं इतना ही वर्णन कर सकता हूँ। परम ब्रह्म सनातन वासुदेव श्रीमान् नारायण अपनी मायाद्वारा संसारको मोहित करते हुए वहाँ शयन करते हैं। यह सब कुछ नारायणसे ही उत्पन्न है, उन्हींमें स्थित है और कल्पान्तमें उन्हींको प्राप्त होता है। वे ही परम गति हैं॥ ६६-६९॥ |
| न मेऽत्र भवति प्रज्ञा कृत्स्नशस्तन्निरूपणे।<br>एतावच्छक्यते वक्तुं नारायणपुरं हि तत्॥ ६७॥ | |
| स एव परमं ब्रह्म वासुदेवः सनातनः।<br>शेते नारायणः श्रीमान् मायया मोहयञ्जगत्॥ ६८॥ | |
| नारायणादिदं जातं तस्मिन्नेव व्यवस्थितम्।<br>तमेवाभ्येति कल्पान्ते स एव परमा गतिः॥ ६९॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४७ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें सैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४७ ॥
- अध्याय ४८ * २४५
अड़तालीसवाँ अध्याय
पुष्करद्वीपकी स्थिति तथा विस्तारका वर्णन, संक्षेपमें अव्यक्तसे सृष्टिका प्रतिपादन
| सूत उवाच | **सूतजी बोले—**शाकद्वीपके दुगुने विस्तारमें क्षीरसागरके आश्रित पुष्कर नामक द्वीप स्थित है। हे विप्रेन्द्रो ! यहाँ मानसोत्तर नामक एक ही पर्वत है। यह साढे पचास हजार योजन ऊँचा है और चारों ओर विस्तारमें इसका परिमण्डल अर्थात् घेरा भी उतने ही परिमाणका है। इस द्वीपके ही पश्चिमकी ओर आधे भागमें मानसोत्तर नामसे एक ही महापर्वत अपनी विशेष स्थितिके कारण दो भागोंमें बँटा है। इस द्वीपमें दो शुभ एवं पवित्र जनपद कहे गये हैं। वे दोनों मानस पर्वतके अनु-मण्डल हैं। (ये) महावीत तथा धातकी खण्ड नामक वर्ष कहे गये हैं। पुष्करद्वीप (स्वादूदक समुद्र) स्वादिष्ट जलवाले समुद्रसे चारों ओरसे घिरा है। उस द्वीपमें देवताओंद्धारा पूजित न्यग्रोध (वट)-का एक महान् वृक्ष है ॥ १-५॥ |
|---|---|
| शाकद्वीपस्य विस्ताराद् द्विगुणेन व्यवस्थितः।<br>क्षीरार्णवं समाश्रित्य द्वीपः पुष्करसंवृतः॥ १ ॥<br>एक एवात्र विप्रेन्द्राः पर्वतो मानसोत्तरः।<br>योजनानां सहस्त्राणि सार्धं पञ्चाशदुच्छ्रितः।<br>तावदेव च विस्तीर्णः सर्वतः परिमण्डलः॥ २ ॥<br>स एव द्वीपः पश्चार्धे मानसोत्तरसंज्ञितः।<br>एक एव महासानुः संनिवेशाद् द्विधा कृतः॥ ३ ॥<br>तस्मिन् द्वीपे स्मृतौ द्वौ तु पुण्यौ जनपदौ शुभौ।<br>अपरौ मानसस्याथ पर्वतस्यानुमण्डलौ।<br>महावीतं स्मृतं वर्षं धातकीखण्डमेव च॥ ४ ॥<br>स्वादूदकेनोदधिना पुष्करः परिवारितः।<br>तस्मिन् द्वीपे महावृक्षो न्यग्रोधोऽमरपूजितः॥ ५ ॥ | |
| तस्मिन् निवसति ब्रह्मा विश्वात्मा विश्वभावनः।<br>तत्रैव मुनिशार्दूलाः शिवनारायणालयः॥ ६ ॥<br><br>वसत्यत्र महादेवो हरोऽर्धहरिरव्ययः।<br>सम्पूज्यमानो ब्रह्माद्यैः कुमाराद्यैश्च योगिभिः।<br>गन्धर्वैः किंनरैर्यक्षैरीश्वरः कृष्णपिङ्गलः॥ ७ ॥<br><br>स्वस्थास्तत्र प्रजाः सर्वा ब्रह्मणा सदृशत्विषः।<br>निरामया विशोकाश्च रागद्वेषविवर्जिताः॥ ८ ॥<br><br>सत्यानृते न तत्रास्तां नोत्तमाधममध्यमाः।<br>न वर्णाश्रमधर्माश्च न नद्यो न च पर्वताः॥ ९ ॥<br><br>परेण पुष्करस्याथ समावृत्य स्थितो महान्।<br>स्वादूदकसमुद्रस्तु समन्ताद् द्विजसत्तमाः॥ १० ॥ | उसी (द्वीप)-में विश्वभावन विश्वात्मा ब्रह्मा रहते हैं। मुनिश्रेष्ठो ! वहींपर शिवनारायणका मन्दिर है। यहाँ आधे भागमें हर (एवं आधेमें) अव्यय हरिके रूपमें (अर्थात् हरिहरात्मक रूपमें) महादेव निवास करते हैं। यहाँ ब्रह्मा आदि देवताओं, कुमार (सनत्कुमार) आदि योगियों, गन्धर्वों तथा किंनरों एवं यक्षोंद्वारा ईश्वर कृष्णपिङ्गल पूजित होते हैं। यहाँकी सारी प्रजा स्वस्थ है, ब्रह्माके समान प्रभावान् है और रोग, शोक, राग तथा द्वेषसे रहित है। वहाँ सत्य, असत्य, उत्तम, मध्यम, अधम (-का विभेद) नहीं है। न वर्णाश्रम धर्म है, न नदियाँ हैं और न पर्वत हैं। हे द्विजसत्तमो ! पुष्कर द्वीपके परे उसे चारों ओरसे घेरते हुए महान् स्वादूदक सागर स्थित है॥ ६-१०॥ |
| परेण तस्य महती दृश्यते लोकसंस्थितिः।<br>काञ्चनी द्विगुणा भूमिः सर्वा चैव शिलोपमा॥ ११ ॥<br><br>तस्याः परेण शैलस्तु मर्यादात्मात्ममण्डलः।<br>प्रकाशश्चाप्रकाशश्च लोकालोकः स उच्यते॥ १२ ॥<br><br>योजनानां सहस्राणि दश तस्योच्छ्रयः स्मृतः।<br>तावानेव च विस्तारो लोकालोको महागिरिः॥ १३ ॥ | उसके अनन्तर महती लोकस्थिति दिखलायी पड़ती है। वहाँकी द्विगुणित समस्त भूमि स्वर्णमयी और शिलाके समान है। उसके आगे सूर्यमण्डलकी मर्यादास्वरूप एक मर्यादा पर्वत है। (इसका एक भाग) प्रकाशित (तथा दूसरा) अप्रकाशित रहता है। इसीलिये वह लोकालोक (पर्वत) कहलाता है, लोकालोक नामक इस महान् पर्वतकी ऊँचाई दस हजार योजन कही गयी है और उतना ही इसका विस्तार (फैलाव) भी है॥ ११-१३॥ |