संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| * अध्याय ३३ * | १९९ |
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नमस्योऽर्चयितव्यश्च ध्यातव्यो मत्परैर्जनैः।
भविष्यसि न संदेहो मत्प्रसादाद् द्विजातिभिः॥ २६॥
येऽत्र द्रक्ष्यन्ति देवेशं स्नात्वा रुद्रं पिनाकिनम्।
ब्रह्महत्यादिकं पापं तेषामाशु विनश्यति॥ २७॥
प्राणांस्त्यजन्ति ये मर्त्याः पापकर्मरता अपि।
ते यान्ति तत् परं स्थानं नात्र कार्या विचारणा॥ २८॥
धन्यास्तु खलु ते विप्रा मन्दाकिन्यां कृतोदकाः।
अर्चयन्ति महादेवं मध्यमेश्वरमीश्वरम्॥ २९॥
स्नानं दानं तपः श्राद्धं पिण्डनिर्वपणं त्विह।
एकैकशः कृतं विप्राः पुनात्यासप्तमं कुलम्॥ ३०॥
संनिहत्यामुपस्पृश्य राहुग्रस्ते दिवाकरे।
यत् फलं लभते मर्त्यस्तस्माद् दशगुणं त्विह॥ ३१॥
एवमुक्त्वा महायोगी मध्यमेशान्तिके प्रभुः।
उवास सुचिरं कालं पूजयन् वै महेश्वरम्॥ ३२॥ | निस्संदेह मेरी कृपासे आप मेरे भक्त द्विजातियोंके प्रणम्य, आराध्य और ध्येय होंगे। जो यहाँ स्नानकर पिनाकी रुद्र देवेश्वरका दर्शन करेंगे, उनके ब्रह्महत्या आदि सभी पाप शीघ्र ही नष्ट हो जायँगे। जो पापकर्मपरायण भी मनुष्य यहाँ प्राणोंका त्याग करेंगे, वे परम स्थानको प्राप्त करेंगे, इसमें कोई विचार नहीं करना चाहिये॥ २६–२८॥ <br><br>विप्रो! वे निश्चय ही धन्य हैं जो मन्दाकिनीमें स्नानकर ईश्वर महादेव मध्यमेश्वरकी पूजा करते हैं। ब्राह्मणो! यहाँपर एक बार भी किया गया स्नान, दान, तप, श्राद्ध तथा पिण्डदान सात पीढ़ियोंतक कुलको पवित्र कर देता है॥ २९–३०॥ <br><br>सूर्यके राहुसे ग्रस्त किये जानेपर अर्थात् ग्रहणकालमें संनिहती (कुरुक्षेत्र तीर्थ)-में स्नान करनेसे जो फल मनुष्यको प्राप्त होता है, उससे दस गुना अधिक फल यहाँ मन्दाकिनीमें स्नानसे प्राप्त होता है। ऐसा कहकर महायोगी प्रभु (व्यास)-ने महेश्वरकी पूजा करते हुए मध्यमेश्वरके समीपमें ही बहुत समयतक निवास किया॥ ३१–३२॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे द्वात्रिंशोऽध्यायः॥ ३२॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें बत्तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३२॥
तैंतीसवाँ अध्याय
वाराणसी-माहात्म्यके प्रसंगमें व्यासजीका शिष्योंके साथ विभिन्न तीर्थोंमें गमन, ब्रह्मतीर्थका आख्यान, व्यासजीद्वारा विश्वेश्वर लिङ्गका पूजन तथा वहाँ रहते हुए शिवाराधना, एक दिन भिक्षा न मिलनेपर क्रोधाविष्ट व्यासजीका वाराणसीके निवासियोंको शाप देनेके लिये उद्यत होना, उसी समय देवी पार्वतीका प्रकट होना, देवीका व्यासको वाराणसी त्यागनेकी आज्ञा, पुनः स्तुतिसे प्रसन्न देवीके द्वारा चतुर्दशी तथा अष्टमीको वहाँ (वाराणसीमें) रहनेकी अनुमति देना
सूत उवाच
ततः सर्वाणि गुह्यानि तीर्थान्यायतननि च।
जगाम भगवान् व्यासो जैमिनिप्रमुखैर्वृतः॥ १॥
प्रयागं परमं तीर्थं प्रयागादधिकं शुभम्।
विश्वरूपं तथा तीर्थं तालतीर्थमनुत्तमम्॥ २॥
आकाशाख्यं महातीर्थं तीर्थं चैवार्षभं परम्।
| स्वर्णीलं च महातीर्थं गौरीतीर्थमनुत्तमम्॥ ३॥ | **सूतजी बोले—**तदनन्तर जैमिनि आदि प्रमुख शिष्योंसे आवृत भगवान् व्यास सभी गुह्य तीर्थों और देवमन्दिरोंमें गये। द्विजश्रेष्ठो! वे परम तीर्थ प्रयाग, प्रयागसे भी अधिक शुभ तीर्थ विश्वरूप, श्रेष्ठ तालतीर्थ, आकाश नामक महातीर्थ, श्रेष्ठ आर्षभ तीर्थ, स्वर्णील नामक महातीर्थ, श्रेष्ठ गौरीतीर्थ, |
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२०० * कूर्मपुराण *
| प्राजापत्यं तथा तीर्थं स्वर्गद्वारं तथैव च।<br>जम्बुकेश्वरमित्युक्तं धर्माख्यं तीर्थमुत्तमम्॥ ४ ॥<br>गयातीर्थं महातीर्थं तीर्थं चैव महानदी।<br>नारायणं परं तीर्थं वायुतीर्थमनुत्तमम्॥ ५ ॥<br>ज्ञानतीर्थं परं गुह्यं वाराहं तीर्थमुत्तमम्।<br>यमतीर्थं महापुण्यं तीर्थं संवर्तकं शुभम्॥ ६ ॥<br>अग्नितीर्थं द्विजश्रेष्ठाः कलशेश्वरमुत्तमम्।<br>नागतीर्थं सोमतीर्थं सूर्यतीर्थं तथैव च॥ ७ ॥<br>पर्वताख्यं महागुह्यं मणिकर्णमनुत्तमम्।<br>घटोत्कचं तीर्थवरं श्रीतीर्थं च पितामहम्॥ ८ ॥<br>गङ्गातीर्थं तु देवेशं ययातेस्तीर्थमुत्तमम्।<br>कापिलं चैव सोमेशं ब्रह्मतीर्थमनुत्तमम्॥ ९ ॥<br>अत्र लिङ्गं पुरानीय ब्रह्मा स्नातुं यदा गतः।<br>तदानीं स्थापयामास विष्णुस्तल्लिङ्गमेश्वरम्॥ १०॥<br>ततः स्नात्वा समागत्य ब्रह्मा प्रोवाच तं हरिम्।<br>मयानीतंमिदं लिङ्गं कस्मात् स्थापितवानसि॥ ११॥ | प्राजापत्य तीर्थ, स्वर्गद्वार, जम्बुकेश्वर, धर्म (धर्मारण्य) नामवाले उत्तम तीर्थ, गया तीर्थ, महातीर्थ, महानदीतीर्थ, परम नारायण तीर्थ, श्रेष्ठ वायु तीर्थ, परम गुह्य ज्ञानतीर्थ, श्रेष्ठ वाराह तीर्थ, महान् पवित्र यमतीर्थ, शुभ संवर्तक तीर्थ, अग्नितीर्थ, उत्तम कलशेश्वर, नागतीर्थ, सोमतीर्थ, सूर्यतीर्थ, महागुह्य पर्वत नामक तीर्थ, अनुत्तम मणिकर्ण, तीर्थश्रेष्ठ घटोत्कच तीर्थ, श्रीतीर्थ, पितामह तीर्थ, गङ्गातीर्थ, देवेश तीर्थ, उत्तम ययातितीर्थ, कपिल तीर्थ, सोमेश तीर्थ तथा अनुत्तम ब्रह्मतीर्थमें गये॥१-९॥<br>प्राचीन कालमें जब ब्रह्मा यहाँ (ब्रह्मतीर्थमें) लिङ्ग लाकर स्नान करने चले गये, तब विष्णुने उस ईश्वरके लिङ्गको यहाँ स्थापित कर दिया। जब स्नान करके ब्रह्मा आये तो उन्होंने विष्णुसे पूछा—मेरे द्वारा लाये गये इस लिङ्गको आपने क्यों स्थापित कर दिया। इसपर विष्णुने उनसे कहा—मेरी रुद्रमें आपसे भी अधिक दृढ़ भक्ति है, इसलिये मैंने लिङ्गको यहाँ प्रतिष्ठित कर दिया, यह आपके नामसे ही प्रसिद्ध होगा॥ १०-१२॥ | | तमाह विष्णुस्त्वत्तोऽपि रुद्रे भक्तिर्दृढा मम।<br>तस्मात् प्रतिष्ठितं लिङ्गं नाम्ना तव भविष्यति॥ १२॥<br>भूतेश्वरं तथा तीर्थं तीर्थं धर्मसमुद्भवम्।<br>गन्धर्वतीर्थं परमं वाह्येयं तीर्थमुत्तमम्॥ १३॥<br>दौर्वासिकं व्योमतीर्थं चन्द्रतीर्थं द्विजोत्तमाः।<br>चित्राङ्गदेश्वरं पुण्यं पुण्यं विद्याधरेश्वरम्॥ १४॥<br>केदारतीर्थमुग्राख्यं कालञ्जरमनुत्तमम्।<br>सारस्वतं प्रभासं च भद्रकर्णं हृदं शुभम्॥ १५॥<br>लौकिकाख्यं महीतीर्थं तीर्थं चैव महालयम्।<br>हिरण्यगर्भं गोप्रेक्ष्यं तीर्थं चैव वृषध्वजम्॥ १६॥<br>उपशान्तं शिवं चैव व्याघ्रेश्वरमनुत्तमम्।<br>त्रिलोचनं महातीर्थं लोलार्कं चोत्तराह्वयम्॥ १७॥<br>कपालमोचनं तीर्थं ब्रह्महत्याविनाशकम्।<br>शुक्रेश्वरं महापुण्यमानन्दपुरमुत्तमम्॥ १८॥<br>एवमादीनि तीर्थानि प्राधान्यात् कथितानि तु।<br>न शक्यं विस्तराद् वक्तुं तीर्थसंख्या द्विजोत्तमाः॥ १९॥<br>तेषु सर्वेषु तीर्थेषु स्नात्वाभ्यर्च्य पिनाकिनम्।<br>उपोष्य तत्र तत्रासौ पाराशर्यो महामुनिः॥ २०॥ | द्विजोत्तमो! (व्यासजी पुनः आगे कहे जानेवाले तीर्थोंमें गये) भूतेश्वर तीर्थ, धर्मसमुद्भव तीर्थ, परम गन्धर्वतीर्थ, उत्तम वाह्येयतीर्थ, दौर्वासिक तीर्थ, व्योमतीर्थ, चन्द्रतीर्थ, पवित्र चित्राङ्गदेश्वरतीर्थ, पवित्र विद्याधरेश्वर तीर्थ, केदारतीर्थ, उग्र नामक तीर्थ, अनुत्तम कालञ्जर तीर्थ, सारस्वत तीर्थ, प्रभासतीर्थ, भद्रकर्णह्रद नामक शुभ तीर्थ, लौकिक नामक महातीर्थ, महालयतीर्थ, हिरण्यगर्भ तीर्थ, गोप्रेक्ष्य तीर्थ, वृषध्वजतीर्थ, उपशान्त तीर्थ, शिवतीर्थ, अनुत्तम व्याघ्रेश्वरतीर्थ, त्रिलोचनतीर्थ, महातीर्थ, लोलार्क तीर्थ, उत्तर नामक तीर्थ, ब्रह्महत्या-विनाशक कपालमोचन तीर्थ, महापवित्र शुक्रेश्वर तीर्थ और उत्तम आनन्दपुर तीर्थ आदि मुख्य-मुख्य तीर्थोंका वर्णन किया गया है, तीर्थोंकी संख्याका विस्तार नहीं बताया जा सकता। पराशरके पुत्र महामुनि (व्यास) इन सभी तीर्थोंमें स्नानकर पिनाकी (भगवान् शंकर)-की पूजाकर, वहाँ-वहाँ उपवासकर |
| * अध्याय ३३ * | २०१ |
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| तर्पयित्वा पितॄन् देवान् कृत्वा पिण्डप्रदानकम्।<br>जगाम पुनरेवापि यत्र विश्वेश्वरः शिवः॥ २१॥ | देवताओं तथा पितरोंका तर्पणकर और उन्हें पिण्ड-दान कर पुनः वहीं गये, जहाँ विश्वेश्वर शिव स्थित हैं॥ १३—२१॥ |
| स्नात्वाभ्यर्च्य परं लिङ्गं शिष्यैः सह महामुनिः।<br>उवाच शिष्यान् धर्मात्मा स्वान् देशान् गन्तुमर्हथ॥ २२॥ | शिष्योंके साथ धर्मात्मा महामुनिने स्नानकर उस परम (विश्वेश्वर) लिङ्गकी पूजा की और शिष्योंसे कहा—अब आप अपने-अपने स्थानोंको जा सकते हैं। |
| ते प्रणम्य महात्मानं जग्मुः पैलादयो द्विजाः।<br>वासं च तत्र नियतो वाराणस्यां चकार सः॥ २३॥ | द्विजो! महात्मा (व्यास)-को प्रणाम कर वे पैल आदि (शिष्य) चले गये और उन व्यासजीने नियमित-रूपसे वाराणसीमें वास किया। वे शान्त, जितेन्द्रिय, विशुद्धात्मा एवं ब्रह्मचर्य-परायण होकर तीनों संध्याओंमें स्नान करते थे तथा भिक्षाद्वारा प्राप्त आहार करते हुए पिनाकीकी आराधनामें लगे रहते थे॥ २२—२४॥ |
| शान्तो दान्तस्त्रिषवणं स्नात्वाभ्यर्च्य पिनाकिनम्।<br>भैक्षाहारो विशुद्धात्मा ब्रह्मचर्यपरायणः॥ २४॥ | |
| कदाचिद् वसता तत्र व्यासेनामिततेजसा।<br>भ्रममाणेण भिक्षा तु नैव लब्धा द्विजोत्तमाः॥ २५॥ | द्विजोत्तमो! वहाँ रहते हुए एक दिन अमित तेजस्वी व्यासजीको भ्रमण करते रहनेपर भी भिक्षा नहीं प्राप्त हुई। तब उनका शरीर क्रोधाविष्ट हो गया, (उन्होंने विचार किया कि) यहाँ रहनेवाले मनुष्योंके लिये ऐसे विघ्नकी सृष्टि करूँ, जिससे उनकी सिद्धि नष्ट हो जाय, पर तत्क्षण ही शंकरकी अर्धाङ्गिनी साक्षात् महादेवी (पार्वती) मानुष-वेष धारणकर प्रसन्न-मुद्रामें प्रकट हो गयीं। (और बोलीं—)॥ २५—२७॥ |
| ततः क्रोधावृततनुर्नराणामिह वासिनाम्।<br>विघ्नं सृजामि सर्वेषां येन सिद्धिर्विहीयते॥ २६॥ | |
| तत्क्षणे सा महादेवी शंकरार्धशरीरिणी।<br>प्रादुरासीत् स्वयं प्रीत्या वेषं कृत्वा तु मानुषम्॥ २७॥ | |
| भो भो व्यास महाबुद्धे शप्तव्या भवता न हि।<br>गृहाण भिक्षां मत्तस्त्वमुक्तवैवं प्रददौ शिवा॥ २८॥ | हे महाबुद्धिमान् व्यास! आप शाप न दें। आप मुझसे भिक्षा ग्रहण करें। ऐसा कहकर पार्वतींने (उन्हें) भिक्षा दीं॥ २८॥ |
| उवाच च महादेवी क्रोधनस्त्वं भवान् यतः।<br>इह क्षेत्रे न वस्तव्यं कृतघ्नोऽसि त्वया सदा॥ २९॥ | महादेवीने कहा—मुने! आप क्रोधी तथा कृतघ्न हैं, अतः आपको सदा इस क्षेत्रमें नहीं रहना चाहिये। ऐसा कहे जानेपर व्यासजीने ध्यानद्वारा 'ये श्रेष्ठ पार्वती हैं'—ऐसा समझकर प्रणाम किया और श्रेष्ठ स्तुतियोंसे स्तुति कर उनसे कहा—हे शंकरवल्लभे! चतुर्दशी तथा अष्टमीको यहाँ (वाराणसीमें) प्रवेश करने दें। 'ऐसा ही हो' ऐसी आज्ञा देकर देवी अन्तर्धान हो गयीं॥ २९—३१॥ |
| एवमुक्तः स भगवान् ध्यानाज्ज्ञात्वा परां शिवाम्।<br>उवाच प्रणतो भूत्वा स्तुत्वा च प्रवरैः स्तवैः॥ ३०॥ | |
| चतुर्दश्यामथाष्टम्यां प्रवेशं देहि शांकरि।<br>एवमस्त्वित्यनुज्ञाय देवी चान्तरधीयत॥ ३१॥ | |
| एवं स भगवान् व्यासो महायोगी पुरातनः।<br>ज्ञात्वा क्षेत्रगुणान् सर्वान् स्थितस्तस्याथ पार्श्वतः॥ ३२॥ | इस प्रकार महायोगी भगवान् व्यासजी क्षेत्र (वाराणसी)-के सभी गुणों (विशेषताओं)-को समझते हुए उस (वाराणसी)-के पार्श्वभागमें रहने लगे। इस प्रकार व्यासजीको स्थित हुआ जानकर विद्वान् लोग (उस) क्षेत्रका सेवन करते हैं। अतः मनुष्यको सभी प्रयत्नकर वाराणसीमें निवास करना चाहिये॥ ३२-३३॥ |
| एवं व्यासं स्थितं ज्ञात्वा क्षेत्रं सेवन्ति पण्डिताः।<br>तस्मात् सर्वप्रयत्नेन वाराणस्यां वसेन्नरः॥ ३३॥ |
२०२ | * कूर्मपुराण *
| सूत उवाच | सूतजी बोले— जो अविमुक्त (क्षेत्र वाराणसी)-का माहात्म्य पढ़ता है, सुनता है अथवा शान्त द्विजोंको सुनाता है, वह भी परम गतिको प्राप्त करता है। द्विजो! जो स्नान करनेके अनन्तर श्राद्धमें, देवकार्यमें, रात अथवा दिनमें, नदियोंके किनारोंपर अथवा देवमन्दिरोंमें मनको एकाग्र कर दम्भ तथा मात्सर्यसे रहित होकर नमस्कारपूर्वक ईश (शिव)-का जप करता है, उसे परमगति प्राप्त होती है॥ ३४—३६॥ |
| यः पठेविमुक्तस्य माहात्म्यं शृणुयादपि।<br>श्रावयेद् वा द्विजान् शान्तान् सोऽपि याति परां गतिम्॥ ३४॥ | |
| श्राद्धे वा दैविके कार्ये रात्रावहनि वा द्विजाः।<br>नदीनां चैव तीरेषु देवतायतनेषु च॥ ३५॥ | |
| स्नात्वा समाहितमना दम्भमात्सर्यवर्जितः।<br>जपेदीशं नमस्कृत्य स याति परमां गतिम्॥ ३६॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३३॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें तैंतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३३॥
चौंतीसवाँ अध्याय
प्रयागका माहात्म्य, मार्कण्डेय-युधिष्ठिर-संवाद, प्रयागमें संगम-स्नानका फल
| ऋषय ऊचुः | ऋषियोंने कहा— सुव्रत! अविमुक्त (क्षेत्र वाराणसी)-के माहात्म्यका आपने भलीभाँति वर्णन किया। अब इस समय प्रयागका माहात्म्य बतलायें। सूतजी! आप समस्त अर्थोंको जाननेवाले हैं, अब आप वहाँ (प्रयाग)-के जो महान् प्रसिद्ध तीर्थ हैं, उन्हें हमें बताइये॥ १-२॥ |
| माहात्म्यमविमुक्तस्य यथावत् तदुदीरितम्।<br>इदानीं तु प्रयागस्य माहात्म्यं ब्रूहि सुव्रत॥ १॥ | |
| यानि तीर्थानि तत्रैव विश्रुतानि महान्ति वै।<br>इदानीं कथयास्माकं सूत सर्वार्थविद् भवान्॥ २॥ | |
| सूत उवाच | सूतजी बोले— ऋषियो! आप सभी सुनें। मैं विस्तारसे आप लोगोंको प्रयागका माहात्म्य बतलाता हूँ, जहाँ पितामह देव स्थित हैं। (महर्षि) मार्कण्डेयने कुन्तीके पुत्र महात्मा युधिष्ठिरसे जो कुछ कहा था, वही मैं आपलोगोंको बताता हूँ॥ ३-४॥ |
| शृणुध्वमृषयः सर्वे विस्तरेण ब्रवीमि वः।<br>प्रयागस्य च माहात्म्यं यत्र देवः पितामहः॥ ३॥ | |
| मार्कण्डेयेन कथितं कौन्तेयाय महात्मने।<br>यथा युधिष्ठिरायैतत् तद्वक्ष्ये भवतामहम्॥ ४॥ | |
| निहत्य कौरवान् सर्वान् भ्रातृभिः सह पार्थिवः।<br>शोकेन महताविष्टो मुमोह स युधिष्ठिरः॥ ५॥ | भाइयोंके साथ सभी कौरवोंको मारनेके उपरान्त राजा युधिष्ठिर महान् शोकसे आविष्ट होकर मोहसे ग्रस्त हो गये। तदनन्तर थोड़े ही समय बाद महान् तपस्वी मार्कण्डेय मुनि हस्तिनापुरमें आये और राजमहलके द्वारपर खड़े हो गये॥ ५-६॥ |
| अचिरेणाथ कालेन मार्कण्डेयो महातपाः।<br>सम्प्राप्तो हास्तिनपुरं राजद्वारे स तिष्ठति॥ ६॥ | |
| द्वारपालोऽपि तं दृष्ट्वा राज्ञः कथितवान् द्रुतम्।<br>मार्कण्डेयो द्रष्टुमिच्छंस्त्वामास्ते द्वार्यसौ मुनिः॥ ७॥ | उन्हें देखकर द्वारपालने भी शीघ्र जाकर राजा (युधिष्ठिर)-से कहा—आपके दर्शनकी इच्छासे मुनि मार्कण्डेय द्वारपर खड़े हैं। धर्मपुत्र युधिष्ठिर शीघ्र ही तत्परतापूर्वक द्वारपर गये और कहने लगे—महाप्राज्ञ! महामुने! आपका स्वागत है, स्वागत है। आज मेरा जन्म सफल हो गया, आज मेरा कुल तर गया। महामुने! आपके प्रसन्न होनेपर आज मेरे पितृगण संतुष्ट हो गये॥ ७-९॥ |
| त्वरितो धर्मपुत्रस्तु द्वारमेत्याह तत्परम्।<br>स्वागतं ते महाप्राज्ञ स्वागतं ते महामुने॥ ८॥ | |
| अद्य मे सफलं जन्म अद्य मे तारितं कुलम्।<br>अद्य मे पितरस्तुष्टास्त्वयि तुष्टे महामुने॥ ९॥ |
- अध्याय ३४ * | २०३ ---|---
| सिंहासनमुपस्थाप्य पादशौचार्चनादिभिः।<br>युधिष्ठिरो महात्मेति पूजयामास तं मुनिम्॥ १०॥ | महात्मा युधिष्ठिरने उन मुनिको सिंहासनपर बैठाकर पादप्रक्षालन, पूजन इत्यादिके द्वारा उनका सम्मान किया॥ १०॥ |
| मार्कण्डेयस्ततस्तुष्टः प्रोवाच स युधिष्ठिरम्।<br>किमर्थं मुह्यसे विद्वन् सर्वं ज्ञात्वाहमागतः॥ ११॥ | तब प्रसन्न होकर मार्कण्डेयने युधिष्ठिरसे कहा—विद्वन्! आप मोह क्यों कर रहे हैं? सभी कुछ जानकर ही मैं यहाँ आया हूँ। तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने प्रणामकर महामुनिसे कहा—आप संक्षेपमें (कोई उपाय) बतलायें, जिससे मैं पापोंसे मुक्त हो सकूँ॥ ११-१२॥ |
| ततो युधिष्ठिरो राजा प्रणम्याह महामुनिम्।<br>कथय त्वं समासेन येन मुच्येत किल्बिषैः॥ १२॥ | |
| निहता बहवो युद्धे पुंसो निरपराधिनः।<br>अस्माभिः कौरवैः सार्धं प्रसङ्गान्मुनिपुंगव॥ १३॥ | हे मुनिश्रेष्ठ! हमने (युद्धके) प्रसंगवश कौरवोंके साथ अनेक निरपराध मनुष्योंको युद्धमें मारा है, अतः आप वह (कोई उपाय) बतलायें, जिससे हिंसाजनित दोष एवं जन्मान्तरमें किये गये पापों तथा इस पापसे भी मुक्ति मिले॥ १३-१४॥ |
| येन हिंसासमुद्भूताज्जन्मान्तरकृतादपि।<br>मुच्यते पातकादस्मात् तद् भवान् वक्तुमर्हति॥ १४॥ | |
| मार्कण्डेय उवाच<br>शृणु राजन् महाभाग यन्मां पृच्छसि भारत।<br>प्रयागगमनं श्रेष्ठं नराणां पापनाशनम्॥ १५॥ | मार्कण्डेयने कहा—हे राजन् ! भारत! महाभाग! आप जो मुझसे पूछते हैं उसे सुनें—मनुष्योंके लिये पापको नष्ट करने-हेतु प्रयागकी यात्रा करना श्रेष्ठ (उपाय) है। वहाँ सभी देवताओंके ईश्वर महादेव रुद्रदेव और स्वयम्भू भगवान् ब्रह्मा देवताओंके साथ विराजमान हैं॥ १५-१६॥ |
| तत्र देवो महादेवो रुद्रो विश्वामरेश्वरः।<br>समास्ते भगवान् ब्रह्मा स्वयम्भूरपि दैवतैः॥ १६॥ | |
| युधिष्ठिर उवाच<br>भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि प्रयागगमने फलम्।<br>मृतानां का गतिस्तत्र स्नातानामपि किं फलम्॥ १७॥ | युधिष्ठिर बोले—भगवन्! मैं सुनना चाहता हूँ कि प्रयाग जानेका क्या फल है? वहाँ मरनेवालोंकी कौन गति होती है और वहाँ स्नान करनेवालोंको क्या फल मिलता है? जो प्रयागमें निवास करते हैं, उन्हें क्या फल मिलता है, आपको यह सब कुछ ज्ञात है, अतः मुझे वह सब बतायें, आपको नमस्कार है॥ १७-१८॥ |
| ये वसन्ति प्रयागे तु ब्रूहि तेषां तु किं फलम्।<br>भवता विदितं ह्येतत् तन्मे ब्रूहि नमोऽस्तु ते॥ १८॥ | |
| मार्कण्डेय उवाच<br>कथयिष्यामि ते वत्स या चेष्टा यच्च तत्फलम्।<br>पुरा महर्षिभिः सम्यक् कथ्यमानं मया श्रुतम्॥ १९॥ | मार्कण्डेयने कहा—वत्स! प्राचीन कालमें महर्षियोंद्वारा कही गयी (प्रयागकी महिमा) एवं प्रयाग-निवासका फल आदि जो कुछ मैंने सुना है, उसे मैं भलीभाँति आपको बतलाऊँगा। यह प्रजापति-क्षेत्र तीनों लोकोंमें विख्यात है। यहाँपर स्नान करनेवाले स्वर्गलोकमें जाते हैं और जो यहाँ मृत्युको प्राप्त होते हैं, उनका पुनर्जन्म नहीं होता। यहाँ ब्रह्मा आदि देवता मिलकर (प्रयाग-निवासियोंकी) रक्षा करते हैं और सभी पापोंको दूर करनेवाले अन्य भी अनेक तीर्थ यहाँ हैं। मैं सैकड़ों वर्षोंमें भी उनका वर्णन नहीं कर सकता तथापि संक्षेपमें ही प्रयाग (-की महिमा)-का कीर्तन करता हूँ॥ १९–२२॥ |
| एतत् प्रजापतिक्षेत्रं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्।<br>अत्र स्नात्वा दिवं यान्ति ये मृतास्तेऽपुनर्भवाः॥ २०॥ | |
| तत्र ब्रह्मादयो देवा रक्षां कुर्वन्ति संगताः।<br>बहून्यन्यानि तीर्थानि सर्वपापापहानि तु॥ २१॥ | |
| कथितुं नेह शक्नोमि बहुवर्षशतैरपि।<br>संक्षेपेण प्रवक्ष्यामि प्रयागस्येह कीर्तनम्॥ २२॥ |
४. पूर्वविभाग (अध्याय ३४-५१) — प्रयागमाहात्म्य, भुवनकोश, सप्तद्वीप, सूर्यरथ व अवतार
२०४ * कूर्मपुराण *
| षष्टिर्धनुःसहस्राणि यानि रक्षन्ति जाह्नवीम्।<br>यमुनां रक्षति सदा सविता सप्तवाहनः॥ २३॥<br><br>प्रयागे तु विशेषेण स्वयं वसति वासवः।<br>मण्डलं रक्षति हरिः सर्वदेवैश्च सम्मितम्॥ २४॥<br>न्यग्रोधं रक्षते नित्यं शूलपाणिर्महेश्वरः।<br>स्थानं रक्षन्ति वै देवाः सर्वपापहरं शुभम्॥ २५॥ | साठ हजार धनुष जाह्नवी (गङ्गा)-की रक्षा करते हैं और सात अश्वोंको वाहन बनानेवाले सवितादेव सदा यमुनाकी रक्षा करते हैं। प्रयागमें विशेषरूपसे इन्द्र स्वयं निवास करते हैं। समस्त देवोंसे युक्त विष्णु प्रयागमण्डलकी रक्षा करते हैं॥ २३-२४॥<br>(प्रयागके विशाल) वटवृक्षकी रक्षा हाथमें त्रिशूल धारण करनेवाले महेश्वर नित्य करते हैं और सभी पापोंको हरनेवाले इस शुभ स्थानकी रक्षा सभी देवता करते हैं। हे नराधिप! जो लोग अपने कर्मोंसे घिरे हैं तथा जिनका छोटेसे भी छोटा पाप बचा रहता है, वे लोग उस मोक्ष-पदको प्राप्त नहीं करते, किंतु प्रयागका स्मरण करनेवालेका यह सभी कुछ (पाप एवं कर्म) नष्ट हो जाता है॥ २५-२६॥ |
|---|---|
| स्वकर्मणावृतो लोको नैव गच्छति तत्पदम्।<br>स्वल्पं स्वल्पतरं पापं यदा तस्य नराधिप।<br>प्रयागं स्मरमाणस्य सर्वमायाति संक्षयम्॥ २६॥<br>दर्शनात् तस्य तीर्थस्य नाम संकीर्तनादपि।<br>मृत्तिकालम्भनाद् वापि नरः पापात् प्रमुच्यते॥ २७॥<br><br>पञ्च कुण्डानि राजेन्द्र येषां मध्ये तु जाह्नवी।<br>प्रयागं विशतः पुंसः पापं नश्यति तत्क्षणात्॥ २८॥<br><br>योजनानां सहस्रेषु गङ्गां यः स्मरते नरः।<br>अपि दुष्कृतकर्मासौ लभते परमां गतिम्॥ २९॥ | इस (प्रयाग) तीर्थके दर्शन करनेसे, नामका संकीर्तन करनेसे अथवा यहाँकी मिट्टीका स्पर्श करनेसे भी मनुष्य पापसे मुक्त हो जाता है। राजेन्द्र! यहाँ (प्रयागमें) पाँच कुण्ड हैं, जिनके बीचमें जाह्नवी (गङ्गा) स्थित है। प्रयागमें प्रवेश करनेवालेका पाप तत्क्षण ही नष्ट हो जाता है। सहस्रों योजन दूरसे भी जो मनुष्य गङ्गाका स्मरण करता है, वह दुष्कृत करनेवाला होनेपर भी परम गतिको प्राप्त करता है॥ २७—२९॥ |
| कीर्तनान्मुच्यते पापाद् दृष्ट्वा भद्राणि पश्यति।<br>तथोपस्पृश्य राजेन्द्र स्वर्गलोके महीयते॥ ३०॥ | हे राजेन्द्र! (प्रयागका नाम-) कीर्तन करनेसे (मनुष्य) पापसे मुक्त हो जाता है और इसका दर्शन करनेसे (उसे सर्वत्र) मङ्गल-ही-मङ्गल दिखलायी पड़ता है तथा यहाँ आचमन (इसके जलसे स्नान) करनेसे स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त होती है॥ ३०॥ |
| व्याधितो यदि वा दीनः क्रुद्धो वापि भवेन्नरः।<br>गङ्गायमुनमासाद्य त्यजेत् प्राणान् प्रयत्नतः॥ ३१॥<br><br>दीप्तकाञ्चनवर्णाभैर्विमानैर्भानुवर्णिभिः ।<br>ईप्सिताँल्लभते कामान् वदन्ति मुनिपुंगवाः॥ ३२॥<br>सर्वरत्नमयैर्दिव्यैर्नानाध्वजसमाकुलैः ।<br>वराङ्गनासमाकीर्णैर्मोदते शुभलक्षणः॥ ३३॥<br><br>गीतवादित्रनिर्घोषैः प्रसुप्तः प्रतिबुध्यते।<br>यावन्न स्मरते जन्म तावत् स्वर्गे महीयते॥ ३४॥ | कोई मनुष्य व्याधिग्रस्त हो, दीन हो अथवा क्रुद्ध हो, यदि वह प्रयत्नपूर्वक गङ्गा-यमुनाके समीप पहुँचकर प्राण-त्याग करता है तो वह सूर्यके समान उद्दीप्त, स्वर्णिम आभावाले विमानोंसे युक्त होकर अभीष्ट पदार्थोंको प्राप्त करता है—ऐसा श्रेष्ठ मुनिजनोंका कहना है॥ ३१-३२॥<br>वह शुभ लक्षणोंवाला (मनुष्य) सभी रत्नोंसे युक्त अनेक प्रकारकी दिव्य ध्वजाओंसे परिपूर्ण और वराङ्गनाओंसे समन्वित होकर आनन्दित होता है। शयन करनेपर वह गीत और वाद्यकी ध्वनिसे जगाया जाता है, जबतक वह जन्मका स्मरण नहीं करता, तबतक स्वर्गमें प्रतिष्ठित रहता है॥ ३३-३४॥ |
| * अध्याय ३४ * | २०५ |
|---|
| श्लोक (संस्कृत) | अनुवाद (हिन्दी) |
|---|---|
| तस्मात् स्वर्गात् परिभ्रष्टः क्षीणकर्मा नरोत्तम।<br>हिरण्यरत्नसम्पूर्णे समृद्धे जायते कुले॥ ३५ ॥<br><br>तदेव स्मरते तीर्थं स्मरणात् तत्र गच्छति।<br>देशस्थो यदि वारण्ये विदेशे यदि वा गृहे॥ ३६ ॥<br><br>प्रयागं स्मरमाणस्तु यस्तु प्राणान् परित्यजेत्।<br>ब्रह्मलोकमवाप्नोति वदन्ति मुनिपुंगवाः॥ ३७ ॥<br><br>सर्वकामफला वृक्षा मही यत्र हिरण्मयी।<br>ऋषयो मुनयः सिद्धास्तत्र लोके स गच्छति॥ ३८ ॥ | नरोत्तम! (पुण्य) कर्मोंके क्षीण होनेपर स्वर्गसे च्युत होकर वह स्वर्ण तथा रत्नोंसे परिपूर्ण समृद्ध कुलमें जन्म लेता है और इसी तीर्थ (प्रयाग)-का स्मरण करता है। स्मरण होनेपर पुनः वहाँ जाता है। अपने देश, विदेश, अरण्य अथवा घरमें जो प्रयागका स्मरण करते हुए प्राणोंका परित्याग करता है, वह ब्रह्मलोक प्राप्त करता है, ऐसा श्रेष्ठ मुनि कहते हैं। वह उस लोकमें जाता है, जहाँकि सभी वृक्ष इच्छानुसार फल देते हैं, जहाँकी भूमि स्वर्णमयी है और जहाँ ऋषि, मुनि तथा सिद्धजन रहते हैं॥ ३५-३८॥ |
| स्त्रीसहस्राकुले रम्ये मन्दाकिन्यास्तटे शुभे।<br>मोदते मुनिभिः सार्धं स्वकृतेनेह कर्मणा॥ ३९ ॥<br><br>सिद्धचारणगन्धर्वैः पूज्यते दिवि दैवतैः।<br>ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टो जम्बूद्वीपपतिर्भवेत्॥ ४० ॥<br><br>ततः शुभानि कर्माणि चिन्तयानः पुनः पुनः।<br>गुणवान् वित्तसम्पन्नो भवतीह न संशयः।<br>कर्मणा मनसा वाचा सत्यधर्मप्रतिष्ठितः॥ ४१ ॥ | अपने किये कर्मोंके कारण वह सहस्रों स्त्रियोंसे रमणीय मन्दाकिनीके शुभ तटपर मुनियोंके साथ आनन्द प्राप्त करता है। वह स्वर्गमें सिद्ध, चारण, गन्धर्व तथा देवताओंसे पूजित होता है, तदनन्तर स्वर्गसे च्युत होनेपर वह (पुरुष) जम्बूद्वीपका स्वामी होता है। तदुपरान्त वह बार-बार शुभ कर्मोंका चिन्तन करता हुआ गुणवान् तथा धनसम्पन्न हो जाता है और मन, वाणी तथा कर्मसे सत्यधर्मपर प्रतिष्ठित रहता है, इसमें कोई संशय नहीं है॥ ३९-४१॥ |
| गङ्गायमुनयोर्मध्ये यस्तु ग्रामं प्रतीच्छति।<br>सुवर्णमथ मुक्तां वा तथैवान्यान् प्रतिग्रहान्॥ ४२ ॥<br><br>स्वकार्यं पितृकार्यं वा देवताभ्यर्चनेऽपि वा।<br>निष्फलं तस्य तत् तीर्थं यावत् तत्फलमश्नुते॥ ४३ ॥<br><br>अतस्तीर्थे न गृह्णीयात् पुण्येष्वायतनेषु च।<br>निमित्तेषु च सर्वेषु अप्रमत्तो द्विजो भवेत्॥ ४४ ॥ | जो व्यक्ति स्वकार्य, पितृकार्य अथवा देवताकी पूजा करते समय गङ्गा और यमुनाके मध्यमें ग्राम, सुवर्ण, मोती या अन्य कोई पदार्थ प्रतिग्रह (दान)-में लेता है, उसे तीर्थका पुण्य उस समयतक नहीं मिलता है, जबतक वह दानमें लिये हुए पदार्थका भोग करता रहता है*। अतः तीर्थों तथा पवित्र मन्दिरोंमें दान नहीं लेना चाहिये। द्विजको सभी प्रकारके प्रयोजनोंमें सावधान रहना चाहिये॥ ४२-४४॥ |
| कपिलां पाटलावर्णां यस्तु धेनुं प्रयच्छति।<br>स्वर्णशृङ्गीं रौप्यखुरां चैलकण्ठां पयस्विनीम्॥ ४५ ॥<br><br>यावद्रोमाणि तस्या वै सन्ति गात्रेषु सत्तम।<br>तावद्वर्षसहस्राणि रुद्रलोके महीयते॥ ४६ ॥ | श्रेष्ठ (युधिष्ठिर)! जो व्यक्ति (प्रयागमें) कपिल अथवा पाटलवर्णकी, सुवर्णमण्डित सींगवाली, रजतमण्डित खुरोंवाली, वस्त्रसे आच्छादित कण्ठवाली पयस्विनी गायका दान करता है, वह उतने हजार वर्षोंतक रुद्रलोकमें पूजित होता है, जितने उस गायके शरीरमें रोम होते हैं॥ ४५-४६॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे चतुस्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३४॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें चौंतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३४॥
* इसका तात्पर्य यह है कि तीर्थमें निवास अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये ही होता है, अतः लोभरहित होकर अनासक्त-भावसे तीर्थमें निवास करना चाहिये। इसीलिये तीर्थमें यदि कोई लोभवश या आसक्तिवश दान लेता है तो यह प्रतिग्रह लोभको बढ़ायेगा तथा अन्तःकरणकी शुद्धिमें बाधक होगा। अतः दाताके कल्याणमात्रके लिये भले ही दान लिया जाय, पर लोभवश दान नहीं लेना चाहिये। साथ ही जप-तप आदि प्रायश्चित्तद्वारा इसका निराकरण भी करना चाहिये।
२०६ * कूर्मपुराण *
पैंतीसवाँ अध्याय
प्रयाग-माहात्म्य, प्रयागके विभिन्न तीर्थोंकी महिमा, त्रिपथगा गङ्गाका माहात्म्य, गङ्गास्नानका फल
| मार्कण्डेय उवाच<br>कथयिष्यामि ते वत्स तीर्थयात्राविधिक्रमम्।<br>आर्षेण तु विधानेन यथा दृष्टं यथा श्रुतम्॥ १ ॥<br>प्रयागतीर्थयात्रार्थी यः प्रयाति नरः क्वचित्।<br>बलीवर्दं समारूढः शृणु तस्यापि यत्फलम्॥ २ ॥<br><br>नरके वसते घोरे समाः कल्पशतायुतम्।<br>ततो निवर्तते घोरो गवां क्रोधो हि दारुणः।<br>सलिलं च न गृह्णन्ति पितरस्तस्य देहिनः॥ ३ ॥<br><br>यस्तु पुत्रांस्तथा बालान् स्नापयेत् पाययेत् तथा।<br>यथात्मना तथा सर्वान् दानं विप्रेषु दापयेत्॥ ४ ॥<br><br>ऐश्वर्याल्लोभमोहाद् वा गच्छेद् यानेन यो नरः।<br>निष्फलं तस्य तत् तीर्थं तस्माद् यानं विवर्जयेत्॥ ५ ॥<br>गङ्गायमुनयोर्मध्ये यस्तु कन्यां प्रयच्छति।<br>आर्षेण तु विवाहेन यथाविभवविस्तरम्॥ ६ ॥<br><br>न स पश्यति तं घोरं नरकं तेन कर्मणा।<br>उत्तरान् स कुरून् गत्वा मोदते कालमक्षयम्॥ ७ ॥<br>वटमूलं समाश्रित्य यस्तु प्राणान् परित्यजेत्।<br>सर्वलोकानतिक्रम्य रुद्रलोकं स गच्छति॥ ८ ॥<br>तत्र ब्रह्मादयो देवा दिशश्च सदिगीश्वराः।<br>लोकपालाश्च सिद्धाश्च पितरो लोकसम्मताः॥ ९ ॥<br>सनत्कुमारप्रमुखास्तथा ब्रह्मर्षयोऽपरे।<br>नागाः सुपर्णाः सिद्धाश्च तथा नित्यं समासते।<br>हरिश्च भगवानास्ते प्रजापतिपुरस्कृतः॥ १०॥<br><br>गङ्गायमुनयोर्मध्ये पृथिव्या जघनं स्मृतम्।<br>प्रयागं राजशार्दूल त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्॥ ११॥ | मार्कण्डेयने कहा—वत्स! ऋषियोंके द्वारा प्रतिपादित विधानके अनुसार तीर्थयात्राकी विधिके क्रमको मैंने जैसे देखा और सुना, वह तुमसे कहता हूँ॥ १ ॥<br>प्रयागतीर्थकी यात्रा करनेवाला कोई मनुष्य यदि कहीं बैलपर आरूढ़ होकर गमन करता है तो उसका भी फल सुनो— वह व्यक्ति दस हजार कल्पोंतक घोर नरकमें वास करता है, क्योंकि गौका भयंकर दारुण क्रोध इसके बाद ही दूर होता है। बैलको सवारी बनानेवाले मनुष्यके पितर उसका (तर्पण आदिमें दिया) जल ग्रहण नहीं करते हैं। जो अपने सभी पुत्रों एवं बालकोंको अपने ही समान यहाँ (प्रयागमें) स्नान कराता है तथा उन्हें (गङ्गा-यमुनाका) जल पिलाता है और उनके हाथों ब्राह्मणोंको दान कराता है (उसे उत्तम गति प्राप्त होती है)। जो मनुष्य ऐश्वर्य, लोभ या मोहवश यानद्वारा (तीर्थमें) जाता है, उसकी वह तीर्थयात्रा निष्फल होती है, इसलिये (तीर्थयात्रामें) यानका परित्याग करना चाहिये॥ २–५॥<br>जो व्यक्ति गङ्गा-यमुनाके मध्य आर्ष विवाहपद्धतिसे अपने ऐश्वर्यके अनुकूल धनका व्ययकर कन्याका दान करता है, वह उस कर्मके कारण घोर नरकका दर्शन नहीं करता और उत्तर कुरुमें जाकर अनन्त कालतक आनन्दोपभोग करता है॥ ६-७॥<br>(प्रयागमें अक्षय) वटवृक्षके नीचे जाकर जो प्राणोंका परित्याग करता है, वह सभी लोकोंका अतिक्रमण कर रुद्रलोकको जाता है। वहाँ ब्रह्मा आदि देवता, दिक्पालोंसहित दिशाएँ, लोकपाल, सिद्ध, लोकमें मान्य पितर, सनत्कुमार आदि प्रमुख तथा दूसरे ब्रह्मर्षि, नाग, सुपर्ण एवं सिद्धगण तथा भगवान् हरि और प्रजापति प्रभृति नित्य निवास करते हैं॥ ८–१०॥<br>गङ्गा-यमुनाके मध्यको पृथिवीका जघन* कहा गया है। हे राजशार्दूल! प्रयाग तीनों लोकोंमें विख्यात है॥ ११॥ |
* नाभिके नीचेका स्त्रियोंका कोमल भाग जघन है।
| * अध्याय ३५ * | २०७ |
|---|---|
| तत्राभिषेकं यः कुर्यात् संगमे संशितव्रतः।<br>तुल्यं फलमवाप्नोति राजसूयाश्वमेधयोः॥ १२॥ | वहाँ (गङ्गा-यमुनाके) संगमपर जो कठोर व्रत धारणकर अभिषेक—स्नान करता है, वह अश्वमेध तथा राजसूय-यज्ञोंके समान फल प्राप्त करता है॥ १२॥ |
| न मातृवचनात् तात न लोकवचनादपि।<br>मतिरुत्क्रमणीया ते प्रयागगमनं प्रति॥ १३॥ | हे तात! माताके कहने अथवा अन्य लोगोंके कहनेपर भी प्रयाग जानेकी बुद्धिका उत्क्रमण (परित्याग) नहीं करना चाहिये*। हे कुरुनन्दन! यहाँपर प्रमुख दस हजार तीर्थ तथा साठ करोड़ दूसरे तीर्थोंका सांनिध्य है। योगयुक्त सत्त्वगुणी मनीषीकी जो गति होती है, वही गति गङ्गा-यमुनाके संगमपर प्राण त्याग करनेवालेकी होती है। हे युधिष्ठिर! तीनों लोकोंमें विख्यात प्रयागमें जो नहीं पहुँचते, जहाँ-कहीं भी निवास करनेवाले वे लोग इस संसारमें जीवित रहते हुए भी मृतकके तुल्य हैं॥ १३—१६॥ |
| दश तीर्थसहस्त्राणि षष्टिकोट्यस्तथापरे।<br>तेषां सांनिध्यमत्रैव तीर्थानां कुरुनन्दन॥ १४॥ | |
| या गतिर्योगयुक्तस्य सत्त्वस्थस्य मनीषिणः।<br>सा गतिस्त्यजतः प्राणान् गङ्गायमुनसंगमे॥ १५॥ | |
| न ते जीवन्ति लोकेऽस्मिन् यत्र तत्र युधिष्ठिर।<br>ये प्रयागं न सम्प्राप्तास्त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्॥ १६॥ | |
| एवं दृष्ट्वा तु तत् तीर्थं प्रयागं परमं पदम्।<br>मुच्यते सर्वपापेभ्यः शशाङ्क इव राहुणा॥ १७॥ | इस प्रकार परम पदरूप इस प्रयागतीर्थका दर्शनकर मनुष्य सभी पापोंसे उसी प्रकार मुक्त हो जाता है, जैसे चन्द्रमा राहुसे मुक्त हो जाता है। यमुनाके दक्षिण किनारेपर कम्बल और अश्वतर नामक दो नाग स्थित हैं। वहाँ स्नान करने और जल पीनेसे सभी पापोंसे मुक्ति हो जाती है॥ १७-१८॥ |
| कम्बलाश्वतरौ नागौ यमुनादक्षिणे तटे।<br>तत्र स्नात्वा च पीत्वा च मुच्यते सर्वपातकैः॥ १८॥ | |
| तत्र गत्वा नरः स्थानं महादेवस्य धीमतः।<br>आत्मानं तारयेत् पूर्वं दशातीतान् दशापरान्॥ १९॥ | धीमान् महादेवके उस स्थानपर जाकर मनुष्य अपनेको तथा दस पूर्वकी और दस बादकी सभी पीढ़ियोंको तार देता है। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य अश्वमेधका फल प्राप्त करता है तथा महाप्रलयपर्यन्त स्वर्गलोक प्राप्त करता है॥ १९-२०॥ |
| कृत्वाभिषेकं तु नरः सोऽश्वमेधफलं लभेत्।<br>स्वर्गलोकमवाप्नोति यावदाहूतसम्प्लवम्॥ २०॥ | |
| पूर्वपार्श्वे तु गङ्गायास्त्रैलोक्ये ख्यातिमान् नृप।<br>अवटः सर्वसामुद्रः प्रतिष्ठानं च विश्रुतम्॥ २१॥ | हे राजन्! गङ्गाके पूर्वी तटपर तीनों लोकोंमें विख्यात सर्वसामुद्र नामक गहर तथा प्रतिष्ठान प्रसिद्ध है। वहाँ ब्रह्मचर्यपूर्वक तथा क्रोधजयी होकर तीन रात्रि निवास करनेवाला (मनुष्य) सभी पापोंसे निर्मुक्त होकर अश्वमेधका फल प्राप्त करता है। प्रतिष्ठान नामक स्थानके उत्तर तथा भागीरथीकी बायीं ओर तीनों लोकोंमें विख्यात हंसप्रपतन नामक तीर्थ है। उसके स्मरणमात्रसे अश्वमेधका फल प्राप्त होता है और (वहाँ जानेवाला व्यक्ति) जबतक सूर्य एवं चन्द्रमा हैं, तबतक स्वर्गमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥ २१—२४॥ |
| ब्रह्मचारी जितक्रोधस्त्रिरात्रं यदि तिष्ठति।<br>सर्वपापविशुद्धात्मा सोऽश्वमेधफलं लभेत्॥ २२॥ | |
| उत्तरेण प्रतिष्ठानं भागीरथ्यास्तु सव्यतः।<br>हंसप्रपतनं नाम तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्॥ २३॥ | |
| अश्वमेधफलं तत्र स्मृतमात्रात् तु जायते।<br>यावच्चन्द्रश्च सूर्यश्च तावत् स्वर्गे महीयते॥ २४॥ |
* इसका तात्पर्य प्रयागमें निवास करनेसे है न कि माता आदि गुरुजनोंके वचनका उल्लंघन करनेमें।
| २०८ | * कूर्मपुराण * |
|---|
| उर्वशीपुलिने रम्ये विपुले हंसपाण्डुरे।<br>परित्यजति यः प्राणान् शृणु तस्यापि यत् फलम् ॥ २५ ॥<br><br>षष्टिवर्षसहस्त्राणि षष्टिवर्षशतानि च।<br>आस्ते स पितृभिः सार्धं स्वर्गलोके नराधिप ॥ २६ ॥<br><br>अथ संध्यावटे रम्ये ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः।<br>नरः शुचिरुपासीत ब्रह्मलोकमवाप्नुयात् ॥ २७ ॥<br><br>कोटितीर्थं समाश्रित्य यस्तु प्राणान् परित्यजेत्।<br>कोटिवर्षसहस्त्राणि स्वर्गलोके महीयते ॥ २८ ॥<br><br>यत्र गङ्गा महाभागा बहुतीर्थतपोवना।<br>सिद्धक्षेत्रं हि तज्ज्ञेयं नात्र कार्या विचारणा ॥ २९ ॥<br><br>क्षितौ तारयते मर्त्यान् नागांस्तारयतेऽप्यधः।<br>दिवि तारयते देवांस्तेन त्रिपथगा स्मृता ॥ ३० ॥ | जो व्यक्ति उर्वशीके* हंसके समान अति धवल रम्य, विस्तृत तटपर प्राणोंका परित्याग करता है, उसका भी जो फल है, वह सुनो—हे नराधिप! वह व्यक्ति साठ हजार साठ सौ वर्षोंतक पितरोंके साथ स्वर्गलोकमें निवास करता है। रमणीय संध्यावट (प्रयागके वट-विशेष)-के नीचे जो मनुष्य जितेन्द्रिय होकर ब्रह्मचर्यपूर्वक पवित्रतासे उपासना करता है, वह ब्रह्मलोक प्राप्त करता है। जो कोटितीर्थ (प्रयागमें स्थित तीर्थ)-में पहुँचकर प्राणोंका परित्याग करता है, वह हजार करोड़ वर्षोंतक स्वर्गलोकमें पूजित होता है। जहाँ बहुतसे तीर्थों एवं तपोवनोंसे युक्त महाभागा गङ्गा विद्यमान हैं, उस क्षेत्रको सिद्धक्षेत्र जानना चाहिये, इसमें किसी भी प्रकारका विचार (संशय) करना उचित नहीं है। गङ्गा पृथ्वीपर मनुष्योंको तारती है, नीचे पाताल लोकमें नागोंको तारती है और द्युलोकमें देवताओंको तारती है, इसलिये यह त्रिपथगा कही जाती है॥ २५–३०॥ |
| यावदस्थीनि गङ्गायां तिष्ठन्ति पुरुषस्य तु।<br>तावद्वर्षसहस्त्राणि स्वर्गलोके महीयते ॥ ३१ ॥<br><br>तीर्थानां परमं तीर्थं नदीनां परमा नदी।<br>मोक्षदा सर्वभूतानां महापातकिनामपि ॥ ३२ ॥<br><br>सर्वत्र सुलभा गङ्गा त्रिषु स्थानेषु दुर्लभा।<br>गङ्गाद्वारे प्रयागे च गङ्गासागरसंगमे ॥ ३३ ॥<br><br>सर्वेषामेव भूतानां पापोपहतचेतसाम्।<br>गतिमन्वेषमाणानां नास्ति गङ्गासमा गतिः ॥ ३४ ॥ | जितने वर्षतक पुरुषकी अस्थियाँ गङ्गामें रहती हैं, उतने हजार वर्षोंतक वह स्वर्गलोकमें पूजित होता है। (गङ्गा) सभी तीर्थोंमें परम तीर्थ और नदियोंमें श्रेष्ठ नदी है, वह सभी प्राणियों, यहाँतक कि महापातकियोंको भी मोक्ष प्रदान करनेवाली है। गङ्गा (स्नान) सर्वत्र सुलभ होनेपर भी गङ्गाद्वार (हरिद्वार), प्रयाग एवं गङ्गासागर—इन तीन स्थानोंमें दुर्लभ होती है। (उत्तम) गतिकी इच्छा करनेवाले तथा पापसे उपहत चित्तवाले सभी प्राणियोंके लिये गङ्गाके समान और कोई दूसरी गति नहीं है॥ ३१–३४॥ |
| पवित्राणां पवित्रं च मङ्गलानां च मङ्गलम्।<br>माहेश्वरात् परिभ्रष्टा सर्वपापहरा शुभा ॥ ३५ ॥<br><br>कृते युगे तु तीर्थानि त्रेतायां पुष्करं परम्।<br>द्वापरे तु कुरुक्षेत्रं कलौ गङ्गा विशिष्यते ॥ ३६ ॥<br><br>गङ्गामेव निषेवेत प्रयागे तु विशेषतः।<br>नान्यत् कलियुगोद्भूतं मलं हन्तुं सुदुष्कृतम् ॥ ३७ ॥ | यह सभी पवित्र वस्तुओंसे अधिक पवित्र और सभी मङ्गलकारी पदार्थोंसे अधिक माङ्गलिक है। महेश्वर (-के मस्तक)-से होकर इस लोकमें आनेके कारण यह सभी पापोंका हरण करनेवाली और शुभ है। सत्ययुगमें अनेक तीर्थ होते हैं, त्रेताका श्रेष्ठ तीर्थ पुष्कर है, द्वापरका कुरुक्षेत्र है और कलियुगमें गङ्गाकी ही विशेषता है। गङ्गाकी ही सेवा करनी चाहिये, विशेष-रूपसे प्रयागमें गङ्गाकी सेवा करनी चाहिये। कलियुगमें उत्पन्न अत्यन्त कठिन पापको दूर करनेमें कोई अन्य तीर्थ समर्थ नहीं है॥ ३५–३७॥ |
* प्रयाग-संगमके समीप कोई तट-विशेष।
| * अध्याय ३६ * | २०९ |
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| अकामो वा सकामो वा गङ्गायां यो विपद्यते ।<br>स मृतो जायते स्वर्गे नरकं च न पश्यति ॥ ३८ ॥ | इच्छा अथवा अनिच्छापूर्वक जो गङ्गामें मृत्यु प्राप्त करता है, वह मृत व्यक्ति स्वर्ग जाता है और नरकका दर्शन नहीं करता ॥ ३८ ॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें पैंतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ३५ ॥
छत्तीसवॉँ अध्याय
प्रयाग-माहात्म्य, माघमासमें संगमस्नानका फल, त्रिमाघीकी महिमा, प्रयागमें प्राण-त्याग करनेका फल
| मार्कण्डेय उवाच | मार्कण्डेयने कहा— |
|---|---|
| षष्टितीर्थसहस्राणि षष्टितीर्थशतानि च।<br>माघमासे गमिष्यन्ति गङ्गायमुनसंगमम् ॥ १ ॥<br><br>गवां शतसहस्रस्य सम्यग् दत्तस्य यत् फलम्।<br>प्रयागे माघमासे तु त्र्यहं स्नातस्य तत् फलम् ॥ २ ॥<br><br>गङ्गायमुनयोर्मध्ये कार्षाग्निं यस्तु साधयेत्।<br>अहीनाङ्गोऽप्यरोगश्च पञ्चेन्द्रियसमन्वितः ॥ ३ ॥ | (युधिष्ठिर !) गङ्गा और यमुनाके संगमपर माघ महीनेमें साठ हजार साठ सौ तीर्थ जाते हैं। सौ हजार गौओंका भलीभाँति दान करनेका जो फल होता है, वही फल प्रयागमें माघमासमें तीन दिन स्नान करनेका होता है। गङ्गा और यमुनाके संगमपर जो करीषाग्निका* सेवन करता है, वह अहीनाङ्ग (हीन अङ्गसे रहित) अर्थात् सम्पूर्ण अवयवोंसे सम्पन्न, रोगरहित तथा पाँचों इन्द्रियोंसे युक्त होता है ॥ १—३ ॥ |
| यावन्ति रोमकूपाणि तस्य गात्रेषु मानद।<br>तावद्वर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते ॥ ४ ॥<br><br>ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टो जम्बूद्वीपपतिर्भवेत्।<br>स भुक्त्वा विपुलान् भोगॉंस्तत् तीर्थं भजते पुनः॥ ५ ॥ | मान देनेवाले (युधिष्ठिर) ! उस मनुष्यके शरीरमें जितने रोमकूप होते हैं, उतने हजार वर्षोंतक वह स्वर्गलोकमें पूजित होता है। तदनन्तर स्वर्गसे भ्रष्ट होनेपर वह जम्बूद्वीपका स्वामी होता है और विपुल भोगोंका उपभोग करनेके अनन्तर वह पुनः इस तीर्थ (प्रयाग)-को प्राप्त करता है ॥ ४-५ ॥ |
| जलप्रवेशं यः कुर्यात् संगमे लोकविश्रुते।<br>राहुग्रस्तो यथा सोमो विमुक्तः सर्वपातकैः॥ ६ ॥<br><br>सोमलोकमवाप्नोति सोमेन सह मोदते।<br>षष्टिं वर्षसहस्राणि षष्टिं वर्षशतानि च॥ ७ ॥<br><br>स्वर्गतः शक्रलोकेऽसौ मुनिगन्धर्वसेवितः।<br>ततो भ्रष्टस्तु राजेन्द्र समृद्धे जायते कुले ॥ ८ ॥<br><br>अधःशिरास्त्वयोधारामूर्ध्वपादः पिबेन्नरः।<br>शतं वर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते ॥ ९ ॥ | (गङ्गा-यमुनाके) लोक-प्रसिद्ध संगमपर जो जलमें प्रवेश करता है, वह जिस प्रकार राहुसे ग्रस्त चन्द्रमा मुक्त हो जाता है, वैसे ही सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। वह चन्द्रलोकमें जाता है और साठ हजार साठ सौ वर्षोंतक चन्द्रमाके साथ आनन्दोपभोग करता है। हे राजेन्द्र ! तदुपरान्त मुनियों एवं गन्धर्वोंसे सेवित वह स्वर्गलोकसे इन्द्रलोकमें जाता है और वहाँसे भ्रष्ट होनेपर इस लोकमें आकर धनवानोंके कुलमें जन्म लेता है। जो मनुष्य (यहाँ प्रयागमें) पैर ऊपर और सिर नीचे करके लोहेकी धाराका पान (तपस्या-विशेष) करता है, वह सौ हजार वर्षोंतक स्वर्गलोकमें पूजित होता है ॥ ६—९ ॥ |
* करीष—सूखा गोमय। इससे अग्नि बनाकर उसके मध्य तपस्या करना।
२१० * कूर्मपुराण *
तस्माद् भ्रष्टस्तु राजेन्द्र अग्निहोत्री भवेन्नरः।
भुक्त्वा तु विपुलान् भोगांस्तत् तीर्थं भजते पुनः॥ १०॥
यः स्वदेहं विकर्तेद् वा शकुनिभ्यः प्रयच्छति।
विहगैरुपभुक्तस्य शृणु तस्यापि यत्फलम्॥ ११॥
शतं वर्षसहस्राणि सोमलोके महीयते।
ततस्तस्मात् परिभ्रष्टो राजा भवति धार्मिकः॥ १२॥
गुणवान् रूपसम्पन्नो विद्वान् सुप्रियवाक्यवान्।
भुक्त्वा तु विपुलान् भोगांस्तत् तीर्थं भजते पुनः॥ १३॥
उत्तरे यमुनातीरे प्रयागस्य तु दक्षिणे।
ऋणप्रमोचनं नाम तीर्थं तु परमं स्मृतम्॥ १४॥
एकरात्रोषितः स्नात्वा ऋणैस्तत्र प्रमुच्यते।
सूर्यलोकमवाप्नोति अनृणश्च सदा भवेत्॥ १५॥
राजेन्द्र! वहाँसे भ्रष्ट होनेपर वह मनुष्य अग्निहोत्री होता है और विपुल भोगोंका उपभोग करके पुनः इस (प्रयाग) तीर्थका सेवन करता है। जो अपना शरीर काटता^१ है अथवा पक्षियोंको देता है, ऐसे पक्षियोंद्वारा खाये गये (मांसवाले) उस पुरुषको भी जो फल प्राप्त होता है, उसे सुनो— ॥ १०-११॥
वह सौ हजार वर्षोंतक चन्द्रलोकमें पूजित होता है, तदनन्तर वहाँसे च्युत होनेपर धार्मिक, गुणवान्, रूपसम्पन्न, विद्वान् और सुन्दर तथा प्रिय वचन बोलनेवाला राजा होता है एवं विपुल भोगोंको भोगकर पुनः इस तीर्थका सेवन करता है। प्रयागके दक्षिणमें यमुनाके उत्तरी तटपर ऋणप्रमोचन नामका एक श्रेष्ठ तीर्थ कहा गया है। वहाँ स्नानकर एकरात्रिपर्यन्त निवास करनेवाला पुरुष ऋणोंसे मुक्त हो जाता है, सूर्यलोक प्राप्त करता है तथा सदाके लिये ऋणमुक्त हो जाता है॥ १२-१५॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे षट्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३६॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें छत्तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३६॥
सैंतीसवाँ अध्याय
प्रयाग-माहात्म्य, यमुनाकी महिमा, यमुनाके तटवर्ती तीर्थोंका वर्णन, गङ्गामें सभी तीर्थोंकी स्थिति, मार्कण्डेय-युधिष्ठिर-संवादकी समाप्ति
मार्कण्डेय उवाच
तपनस्य सुता देवी त्रिषु लोकेषु विश्रुता।
समागता महाभागा यमुना यत्र निम्नगा॥ १॥
येनैव निःसृता गङ्गा तेनैव यमुना गता।
योजनानां सहस्रेषु कीर्तनात् पापनाशिनी॥ २॥
तत्र स्नात्वा च पीत्वा च यमुनायां युधिष्ठिर।
सर्वपापविनिर्मुक्तः पुनात्यासप्तमं कुलम्।
प्राणांस्त्यजति यस्तत्र स याति परमां गतिम्॥ ३॥
अग्नितीर्थमिति ख्यातं यमुनादक्षिणे तटे।
पश्चिमे धर्मराजस्य तीर्थं त्वनरकं स्मृतम्।
तत्र स्नात्वा दिवं यान्ति ये मृतास्तेऽपुनर्भवाः॥ ४॥
मार्कण्डेयने कहा— (राजन् युधिष्ठिर!) सूर्यकी तीनों लोकोंमें विख्यात पुत्री महाभागा देवी यमुना नदी यहाँपर मिली हैं। जिस मार्गसे गङ्गा प्रवाहित हुई हैं, उस मार्गसे यमुना भी गयी हैं। सहस्रों योजन दूरपर भी (यमुना) नाम लेनेसे पापोंको नष्ट कर देनेवाली है। युधिष्ठिर! इस यमुनामें स्नान करने तथा इसका जल पीनेसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त होकर अपने सात पीढ़ियोंके कुलोंको पवित्र कर देता है। जो यहाँ प्राणोंका परित्याग करता है, वह परम गतिको प्राप्त करता है। यमुनाके दक्षिणी तटपर अग्नितीर्थ नामका एक विख्यात तीर्थ है। यमुनाके पश्चिमी भागमें धर्मराजका 'अनरक'^२ नामक तीर्थ कहा गया है। यहाँ स्नान करनेवाले स्वर्ग जाते हैं और जो यहाँ मृत्युको प्राप्त होते हैं, उनका पुनर्जन्म नहीं होता॥ १-४॥
१-ज्ञानकी पराकाष्ठामें शरीरके प्रति ममताका सर्वथा अभाव हो जाता है। ऐसी स्थितिमें शरीरका काटना या अपने शरीरका मांस पक्षियोंको समर्पित करना (प्राणि-कल्याण-बुद्धिमात्रसे) विशेष तप है। दधीचि, शिवि, जीमूतवाहन आदिके दृष्टान्त द्रष्टव्य हैं।
२-न नरक = अनरक इस तीर्थमें स्नान आदि करनेसे नरकमें नहीं जाना पड़ता, इसलिये इसका नाम 'अनरक' है।
- अध्याय ३७ * | २११ ---|---:
| कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां स्नात्वा संतर्पयेच्छुचिः ।<br>धर्मराजं महापापैर्मुच्यते नात्र संशयः ॥ ५ ॥<br><br>दश तीर्थसहस्राणि त्रिंशत्कोट्यस्तथापराः ।<br>प्रयागे संस्थितानि स्युरेवमाहुर्मनीषिणः ॥ ६ ॥ | यहाँ (अनर्क तीर्थमें) कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको स्नान करके पवित्रतापूर्वक जो धर्मराजका तर्पण करता है, वह निस्संदेह महापापोंसे मुक्त हो जाता है। मनीषी लोगोंका यह कहना है कि प्रयागमें दस हजार (प्रधान) तीर्थ और तीस करोड़ दूसरे (अप्रधान) तीर्थ स्थित हैं॥ ५-६॥ |
| तिस्रः कोट्योऽर्धकोटी च तीर्थानां वायुरब्रवीत् ।<br>दिवि भूम्यन्तरिक्षे च तत्सर्वं जाह्नवी स्मृता ॥ ७ ॥<br><br>यत्र गङ्गा महाभागा स देशस्तत् तपोवनम् ।<br>सिद्धिक्षेत्रं तु तज्ज्ञेयं गङ्गातीरसमाश्रितम् ॥ ८ ॥<br><br>यत्र देवो महादेवो देव्या सह महेश्वरः ।<br>आस्ते वटेश्वरो नित्यं तत् तीर्थं तत् तपोवनम् ॥ ९ ॥<br><br>इदं सत्यं द्विजातीनां साधूनामात्मजस्य च ।<br>सुहृदां च जपेत् कर्णे शिष्यस्यानुगतस्य तु ॥ १० ॥ | वायुने कहा है कि द्युलोक, भूलोक और अन्तरिक्षमें साढ़े तीन करोड़ तीर्थ हैं और जाह्नवी उन सभी तीर्थोंसे युक्त कही गयी है। जहाँ महाभागा गङ्गा होती हैं, वही (पवित्र) देश है और वही तपोवन होता है। गङ्गाके तटपर स्थित उस स्थानको सिद्धिक्षेत्र समझना चाहिये। जहाँ देवीके साथ महादेव महेश्वरदेव वटेश्वर* स्थित हैं, वह स्थान नित्य तीर्थ है और वह तपोवन है। इस सत्यको द्विजातियों, साधुओं, मित्रों, अपने पुत्र तथा अनुगामी शिष्यके कानमें कहना चाहिये॥ ७—१०॥ |
| इदं धन्यमिदं स्वर्ग्यमिदं मेध्यमिदं सुखम् ।<br>इदं पुण्यमिदं रम्यं पावनं धर्म्यमुत्तमम् ॥ ११ ॥<br><br>महर्षीणामिदं गुह्यं सर्वपापप्रमोचनम् ।<br>अत्राधीत्य द्विजोऽध्यायं निर्मलत्वमवाप्नुयात् ॥ १२ ॥<br><br>यश्चेदं शृणुयान्नित्यं तीर्थं पुण्यं सदा शुचिः ।<br>जातिस्मरत्वं लभते नाकपृष्ठे च मोदते ॥ १३ ॥<br><br>प्राप्यन्ते तानि तीर्थानि सद्भिः शिष्टानुदर्शिभिः ।<br>स्नाहि तीर्थेषु कौरव्य न च वक्रमतिर्भव ॥ १४ ॥ | यह (प्रयाग) धन्य है, स्वर्गफलप्रद (स्वर्गरूप फलको देनेवाला) है, यह पवित्र, सुख, पुण्य, रमणीय, पावन और उत्तम धर्मयुक्त है। यह महर्षियोंके लिये गोपनीय रहस्य है। सभी पापोंको नष्ट करनेवाला है। यहाँ द्विज वेदका स्वाध्याय कर निर्मल हो जाता है। जो व्यक्ति नित्य पवित्रतापूर्वक इस पुण्यप्रद तीर्थका वर्णन सुनता है, वह जन्मान्तरकी बातोंको स्मरण करनेवाला हो जाता है और स्वर्गलोकमें आनन्द प्राप्त करता है। शिष्ट मार्गका अनुसरण करनेवाले सज्जन पुरुष ऐसे तीर्थोंमें जाते हैं। कुरुके वंशधर (युधिष्ठिर)! तीर्थोंमें स्नान करो। इस विषयमें विपरीत बुद्धिवाले मत होओ॥ ११—१४॥ |
| एवमुक्त्वा स भगवान् मार्कण्डेयो महामुनिः ।<br>तीर्थानि कथयामास पृथिव्यां यानि कानिचित् ॥ १५ ॥<br><br>भूसमुद्रादिसंस्थानं प्रमाणं ज्योतिषां स्थितम् ।<br>पृष्टः प्रोवाच सकलमुक्त्वाथ प्रययौ मुनिः ॥ १६ ॥ | ऐसा कहकर उन भगवान् मार्कण्डेय महामुनिने (युधिष्ठिरके द्वारा) पूछे जानेपर पृथ्वीमें जो कोई भी तीर्थ थे उन्हें बतलाया और पृथ्वी तथा समुद्र आदिकी स्थिति एवं नक्षत्रोंकी स्थितिका सम्पूर्ण वर्णन कर वे मुनि चले गये॥ १५-१६॥ |
| य इदं कल्यमुत्थाय पठतेऽथ शृणोति वा ।<br>मुच्यते सर्वपापेभ्यो रुद्रलोकं स गच्छति ॥ १७ ॥ | प्रातःकाल उठकर जो इस (प्रयाग-माहात्म्य)-का पाठ करता है अथवा इसे सुनता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर रुद्रलोकमें जाता है॥ १७॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें सैंतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३७॥
* प्रयागमें स्थित विशाल वटवृक्षके नीचे प्रतिष्ठित लिङ्ग वटेश्वर लिङ्ग है।
२१२ * कूर्मपुराण *
अड़तीसवाँ अध्याय
भुवनकोश-वर्णनमें राजा प्रियव्रतके वंशका वर्णन, प्रियव्रतके पुत्र राजा अग्नीध्रके वंशका वर्णन, जम्बू आदि सात द्वीपोंका तथा वर्षोंका वर्णन, जम्बूद्वीपके नौ वर्षोंमें राजा अग्नीध्रके नाभि, किंपुरुष आदि नौ पुत्रोंका आधिपत्य
| श्रीकूर्म उवाच | श्रीकूर्मने कहा— |
|---|---|
| एवमुक्तास्तु मुनयो नैमिषीया महामतिम्।<br>पप्रच्छुरुत्तरं सूतं पृथिव्यादिविनिर्णयम् ॥ १ ॥ | ऐसा कहे जानेपर नैमिषारण्यमें निवास करनेवाले मुनियोंने महाबुद्धिमान् सूतजीसे पृथ्वी आदिके सम्बन्धमें निर्णय पूछा—॥ १ ॥ |
| ऋषय ऊचुः | ऋषियोंने कहा— |
| कथितो भवता सूत सर्गः स्वायम्भुवः शुभः।<br>इदानीं श्रोतुमिच्छामस्त्रैलोक्यस्यास्य मण्डलम् ॥ २ ॥<br>यावन्तः सागरा द्वीपास्तथा वर्षाणि पर्वताः।<br>वनानि सरितः सूर्यग्रहाणां स्थितिरैव च ॥ ३ ॥<br>यदाधारमिदं कृत्स्नं येषां पृथ्वी पुरा त्वियम्।<br>नृपाणां तत्समासेन सूत वक्तुमिहार्हसि ॥ ४ ॥ | हे सूतजी! आपने स्वायम्भुव मन्वन्तरकी शुभ सृष्टिको बतलाया, अब इस समय हम लोग त्रैलोक्य-मण्डलका वर्णन सुनना चाहते हैं। जितने सागर, द्वीप, वर्ष, पर्वत, वन तथा नदियाँ हैं और सूर्य आदि ग्रहोंकी जो स्थिति है, इन सभीका वर्णन करें। हे सूतजी! यह सब कुछ जिसके आधारपर टिका है और प्राचीन कालमें यह पृथ्वी जिन राजाओंके अधिकारमें रही है, उन सभी विषयोंका संक्षेपमें आप वर्णन करें ॥ २–४ ॥ |
| सूत उवाच | सूतजीने कहा— |
| वक्ष्ये देवादिदेवाय विष्णवे प्रभविष्णवे।<br>नमस्कृत्याप्रमेयाय यदुक्तं तेन धीमता ॥ ५ ॥ | देवोंके आदिदेव, अप्रमेय, प्रभविष्णु विष्णुको नमस्कार कर मैं उन धीमान्द्वारा जो कुछ कहा गया है, उसे बताता हूँ—॥ ५ ॥ |
| स्वायम्भुवस्य तु मनोः प्रागुक्तो यः प्रियव्रतः।<br>पुत्रस्तस्याभवन् पुत्राः प्रजापतिसमा दश ॥ ६ ॥<br>अग्नीध्रश्चाग्निबाहुश्च वपुष्मान् द्युतिमांस्तथा।<br>मेधा मेधातिथिर्हव्यः सवनः पुत्र एव च ॥ ७ ॥<br>ज्योतिष्मान् दशमस्तेषां महाबलपराक्रमः।<br>धार्मिको दाननिरतः सर्वभूतानुकम्पकः ॥ ८ ॥<br>मेधाग्निबाहुपुत्रास्तु त्रयो योगपरायणाः।<br>जातिस्मरा महाभागा न राज्ये दधिरे मतिम् ॥ ९ ॥<br>प्रियव्रतोऽभ्यषिञ्चद् वै सप्तद्वीपेषु सप्त तान्।<br>जम्बूद्वीपेश्वरं पुत्रमग्नीध्रमकरोन्नृपः ॥ १० ॥<br>प्लक्षद्वीपेश्वरश्चैव तेन मेधातिथिः कृतः।<br>शाल्मलेशं वपुष्मन्तं नरेन्द्रमभिषिक्तवान् ॥ ११ ॥ | पूर्वमें स्वायम्भुव मनुके जिस प्रियव्रत नामक पुत्रका वर्णन किया गया है उस (प्रियव्रत)-को प्रजापतिके समान दस पुत्र हुए। अग्नीध्र, अग्निबाहु, वपुष्मान्, द्युतिमान्, मेधा, मेधातिथि, हव्य, सवन और पुत्र तथा महान् बलशाली एवं पराक्रमी, धार्मिक, दानपरायण और सभी प्राणियोंपर दया करनेवाला ज्योतिष्मान् नामक दसवाँ पुत्र था। मेधा, अग्निबाहु तथा पुत्र—ये तीनों योगपरायण थे। पूर्वजन्मोंका स्मरण करनेवाले इन महाभाग्यशालियों (विरक्तों)-का मन राज्यकार्यमें नहीं लगा। (अतः) प्रियव्रतने (अपने अन्य) उन सात पुत्रोंको सात द्वीपोंमें अभिषिक्त कर दिया। राजाने अग्नीध्र नामक पुत्रको जम्बूद्वीपका स्वामी बनाया। उन्होंने मेधातिथिको प्लक्षद्वीपका राजा बनाया और वपुष्मान्को शाल्मलि-द्वीपमें राजाके रूपमें अभिषिक्त किया ॥ ६–११ ॥ |
| ज्योतिष्मन्तं कुशद्वीपे राजानं कृतवान् प्रभुः।<br>द्युतिमन्तं च राजानं क्रौञ्चद्वीपे समादिशत् ॥ १२ ॥<br>शाकद्वीपेश्वरं चापि हव्यं चक्रे प्रियव्रतः।<br>पुष्कराधिपतिं चक्रे सवनं च प्रजापतिः ॥ १३ ॥ | प्रभु (प्रियव्रत)-ने ज्योतिष्मान्को कुशद्वीपका राजा बनाया और द्युतिमान्को क्रौञ्चद्वीपका राजा बननेका आदेश दिया। प्रजापति प्रियव्रतने हव्यको शाकद्वीपका स्वामी बनाया और सवनको पुष्करद्वीपका अधिपति बनाया ॥ १२–१३ ॥ |
- अध्याय ३८ * २१३
पुष्करे सवनस्यापि महावीतः सुतोऽभवत्। धातकिश्चैव द्वावेतौ पुत्रौ पुत्रवतां वरौ ॥ १४॥ महावीतं स्मृतं वर्षं तस्य नाम्ना महात्मनः। नाम्ना तु धातकेश्चापि धातकीखण्डमुच्यते ॥ १५॥ शाकद्वीपेश्वरस्याथ हव्यस्याप्यभवन् सुताः। जलदश्च कुमारश्च सुकुमारो मणीचकः। कुसुमोत्तरोऽथ मोदाकिः सप्तमः स्यान्महाद्रुमः ॥ १६॥ जलदं जलदस्याथ वर्षं प्रथममुच्यते। कुमारस्य तु कौमारं तृतीयं सुकुमारकम् ॥ १७॥ मणीचकं चतुर्थं तु पञ्चमं कुसुमोत्तरम्। मोदाकं षष्ठमित्युक्तं सप्तमं तु महाद्रुमम् ॥ १८॥ क्रौञ्चद्वीपेश्वरस्यापि सुता द्युतिमतोऽभवन्। कुशलः प्रथमस्तेषां द्वितीयस्तु मनोहरः ॥ १९॥ उष्णास्तृतीयः सम्प्रोक्तश्चतुर्थः प्रवरः स्मृतः। अन्धकारो मुनिश्चैव दुन्दुभिश्चैव सप्तमः। तेषां स्वनामभिर्देशाः क्रौञ्चद्वीपाश्रयाः शुभाः ॥ २०॥ ज्योतिष्मतः कुशद्वीपे सप्तैवासन् महौजसः। उद्भेदो वेणुमांश्चैवाश्वरथो लम्बनो धृतिः। षष्ठः प्रभाकरश्चापि सप्तमः कपिलः स्मृतः ॥ २१॥ स्वनामचिह्नितान् यत्र तथा वर्षाणि सुव्रताः। ज्ञेयानि सप्त तान्येषु द्वीपेष्वेवं नयो मतः ॥ २२॥ शाल्मलद्वीपनाथस्य सुताश्चासन् वपुष्मतः। श्वेतश्च हरितश्चैव जीमूतो रोहितस्तथा। वैद्युतो मानसश्चैव सप्तमः सुप्रभो मतः ॥ २३॥ प्लक्षद्वीपेश्वरस्यापि सप्त मेधातिथेः सुताः। ज्येष्ठः शान्तभयस्तेषां शिशिरश्च सुखोदयः। आनन्दश्च शिवश्चैव क्षेमकश्च ध्रुवस्तथा ॥ २४॥ प्लक्षद्वीपादिषु ज्ञेयः शाकद्वीपान्तिकेषु वै। वर्णाश्रमविभागेन स्वधर्मो मुक्तये द्विजाः ॥ २५॥ जम्बूद्वीपेश्वरस्यापि पुत्रास्त्वासन् महाबलाः। अग्नीध्रस्य द्विजश्रेष्ठास्तन्नामानि निबोधत ॥ २६॥ नाभिः किंपुरुषश्चैव तथा हरिरिलावृतः। रम्यो हिरणवांश्च कुरुर्भद्राश्वः केतुमालकः ॥ २७॥ जम्बूद्वीपेश्वरो राजा स चाग्नीध्रो महामतिः। विभज्य नवधा तेभ्यो यथान्यायं ददौ पुनः ॥ २८॥
पुष्करमें सवनको भी महावीत तथा धातकि नामक दो पुत्र हुए। पुत्रवानोंके पुत्रोंमें ये दोनों ही पुत्र श्रेष्ठ थे। उन महात्मा (महावीत)-के नामसे उस वर्षको महावीतवर्ष कहा गया है और धातकिके भी नामसे धातकिखण्ड कहा जाता है। शाकद्वीपके राजा हव्यको जलद, कुमार, सुकुमार, मणीचक, कुसुमोत्तर तथा मोदाकि एवं सातवाँ महाद्रुम नामक पुत्र हुआ॥ १४—१६॥
(इन सातों पुत्रोंके राज्यक्षेत्र इनके नामसे एक-एक वर्ष कहलाये—इसीलिये) जलदका जलद नामक प्रथम वर्ष कहा जाता है। कुमारका कौमार नामक वर्ष, इसी प्रकार तीसरा सुकुमारक (वर्ष), चौथा मणीचक, पाँचवाँ कुसुमोत्तर, छठा मोदाक और सातवाँ महाद्रुम नामक वर्ष है। क्रौञ्चद्वीपके राजा द्युतिमान्को भी पुत्र हुए। उनमें कुशल पहला, मनोहर दूसरा, उष्ण तीसरा पुत्र कहा गया है और चौथा पुत्र प्रवर नामसे जाना जाता है। इसी प्रकार अन्धकार (पाँचवाँ), मुनि (छठा) तथा दुन्दुभि सातवाँ पुत्र था। उनके (अपने ही) नामसे प्रसिद्ध सुन्दर देश क्रौञ्चद्वीपमें स्थित हैं। कुशद्वीपमें ज्योतिष्मान्को महान् ओजस्वी सात पुत्र हुए। उद्भेद, वेणुमान्, अश्वरथ, लम्बन, धृति तथा छठा प्रभाकर और सातवाँ कपिल कहा गया है॥ १७—२१॥
हे सुव्रतो! इस (कुशद्वीप)-में उनके नामसे युक्त वर्ष हैं। इसी प्रकार उन अन्य द्वीपोंमें भी स्थिति समझनी चाहिये। शाल्मलद्वीपके स्वामी वपुष्मान्के श्वेत, हरित, जीमूत, रोहित, वैद्युत और मानस तथा सातवें सुप्रभ नामक पुत्र थे। प्लक्षद्वीपके राजा मेधातिथिके भी सात पुत्र हुए। उनमें ज्येष्ठ पुत्र शान्तभय था। इसके अतिरिक्त शिशिर, सुखोदय, आनन्द, शिव, क्षेमक तथा ध्रुव नामक पुत्र थे॥ २२—२४॥
द्विजो! प्लक्षद्वीप आदिसे लेकर शाकद्वीपतक वर्ण और आश्रमके भेदसे स्वधर्म (पालन)-को मुक्तिका साधन समझना चाहिये। हे श्रेष्ठ द्विजो! जम्बूद्वीपके अधिपति अग्नीध्रके भी महान् बलशाली पुत्र थे, उनके नाम सुनो—नाभि, किंपुरुष, हरि, इलावृत, रम्य, हिरण्वान्, कुरु, भद्राश्व तथा केतुमालक नामक नौ पुत्र थे॥ २५—२७॥
जम्बूद्वीपेश्वर महामति उन राजा अग्नीध्रने (जम्बूद्वीपको) नौ भागोंमें बाँटकर न्यायानुसार उन (पुत्रों)-को दे दिया॥ २८॥
२१४ * कूर्मपुराण *
नाभेस्तु दक्षिणं वर्षं हिमाह्वं प्रददौ पुनः।
हेमकूटं ततो वर्षं ददौ किंपुरुषाय तु॥ २९॥
तृतीयं नैषधं वर्षं हरये दत्तवान् पिता।
इलावृताय प्रददौ मेरुमध्यमिलावृतम्॥ ३०॥
नीलाचलाश्रितं वर्षं रम्याय प्रददौ पिता।
श्वेतं यदुत्तरं वर्षं पित्रा दत्तं हिरण्वते॥ ३१॥
यदुत्तरं शृङ्गवतो वर्षं तत् कुरवे ददौ।
मेरोः पूर्वेण यद् वर्षं भद्राश्वाय न्यवेदयत्।
गन्धमादनवर्षं तु केतुमालाय दत्तवान्॥ ३२॥
वर्षेष्वेतेषु तान् पुत्रानभिषिच्य नराधिपः।
संसारकष्टतां ज्ञात्वा तपस्तेपे वनं गतः॥ ३३॥
हिमाह्वयं तु यस्यैतन्नाभेरासीन्महात्मनः।
तस्यार्षभोऽभवत् पुत्रो मरुदेव्यां महाद्युतिः॥ ३४॥
ऋषभाद् भरतो जज्ञे वीरः पुत्रशताग्रजः।
सोऽभिषिच्यर्षभः पुत्रं भरतं पृथिवीपतिः।
वानप्रस्थाश्रमं गत्वा तपस्तेपे यथाविधि॥ ३५॥
तपसा कर्षितोऽत्यर्थं कृशो धमनिसंततः।
ज्ञानयोगरतो भूत्वा महापाशुपतोऽभवत्॥ ३६॥
सुमतिर्भरतस्याभूत् पुत्रः परमधार्मिकः।
सुमतेस्तैजसस्तस्मादिन्द्रद्युम्नो व्यजायत॥ ३७॥
परमेष्ठी सुतस्तस्मात् प्रतीहारस्तदन्वयः।
प्रतिहर्तेति विख्यात उत्पन्नस्तस्य चात्मजः॥ ३८॥
भवस्तस्मादथोग्दीथः प्रस्तावस्तत्सुतोऽभवत्।
पृथुस्ततस्ततो रक्तो रक्तस्यापि गयः सुतः॥ ३९॥
नरो गयस्य तनयस्तस्य पुत्रो विराडभूत्।
तस्य पुत्रो महावीर्यो धीमांस्तस्मादजायत॥ ४०॥
महान्तोऽपि ततश्चाभूद् भौवनस्तत्सुतोऽभवत्।
त्वष्टा त्वष्टुश्च विरजो रजस्तस्याप्यभूत् सुतः॥ ४१॥
(अग्नीध्रने) नाभिको दक्षिण दिशामें स्थित हिम नामक वर्ष प्रदान किया। तदनन्तर किंपुरुषको हेमकूट नामक वर्ष दिया। पिता (अग्नीध्र)-ने हरिको तृतीय नैषध नामक वर्ष प्रदान किया और इलावृतको मेरुके मध्यमें स्थित इलावृत (नामक वर्ष) दिया। पिताने रम्यको नीलाचलयुक्त वर्ष प्रदान किया और जो उत्तरमें स्थित श्वेतवर्ष है, उसे हिरण्वान्को दिया। शृंगवान् पर्वतके उत्तरमें स्थित (उत्तरकुरु नामक) वर्ष कुरुको दिया और मेरुके पूर्वमें स्थित (भद्राश्व नामक) वर्ष भद्राश्वको दिया तथा गन्धमादन नामक वर्ष केतुमालको प्रदान किया॥ २९-३२॥
इन वर्षोंमें अपने पुत्रोंको अभिषिक्त कर राजा (अग्नीध्र) संसारके कष्टको जानकर तपस्या करनेके लिये वनमें चले गये। जिन महात्मा नाभिके पास हिम नामक वर्ष था, उन्हें मरुदेवीसे महान् द्युतिमान् ऋषभ नामक पुत्र हुआ। ऋषभको सौ पुत्रोंमें सबसे ज्येष्ठ भरत नामक वीर पुत्र उत्पन्न हुआ। भरत नामक पुत्रको पृथ्वीके अधिपति के रूपमें अभिषिक्त कर राजा ऋषभ वानप्रस्थाश्रमका आश्रय लेकर यथाविधि तप करने लगे। तपस्यासे अत्यन्त क्षीण होनेके कारण वे इतने कृश हो गये कि उनके शरीरकी नाड़ियाँ दीखती थीं। (तपःपूत वे) ज्ञानयोगपरायण होकर महापाशुपत* हो गये॥ ३३-३६॥
(उन) भरतको भी सुमति नामक परम धार्मिक पुत्र हुआ। सुमतिका पुत्र तैजस और उस (तैजस)-से इन्द्रद्युम्न उत्पन्न हुआ। उस इन्द्रद्युम्नका पुत्र परमेष्ठी हुआ और उस (परमेष्ठी)-का पुत्र प्रतीहार हुआ। उस प्रतीहारका जो पुत्र उत्पन्न हुआ, वह प्रतिहर्ताके नामसे विख्यात हुआ। उससे भव, भवसे उद्गीथ तथा उस (उद्गीथ)-से प्रस्ताव नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई। उस (प्रस्ताव)-से पृथु एवं पृथुसे रक्त उत्पन्न हुआ और रक्तको भी गय नामक पुत्र हुआ। गयका पुत्र नर और उसका पुत्र विराट् हुआ। उस (विराट्)-का पुत्र महावीर्य और उससे धीमान् (नामक पुत्र) उत्पन्न हुआ॥ ३७-४०॥
उस (धीमान्)-से महान्त नामक पुत्र हुआ और उसका पुत्र भौवन हुआ। उस (भौवन)-का त्वष्टा हुआ। उस (त्वष्टा)-से विरज तथा विरजसे रज नामक पुत्र उत्पन्न हुआ॥ ४१॥
* पाशुपत (पशुपति-महादेवको परम ध्येय माननेवाला) व्रत है। इसमें पूर्ण परिनिष्ठित परम विरक्त मनुष्य महापाशुपत कहा जाता है।
- अध्याय ३९ * २१५
| शतजिद् रजसस्तस्य जज्ञे पुत्रशतं द्विजाः।<br>तेषां प्रधानो बलवान् विश्वज्योतिरिति स्मृतः॥ ४२॥ | द्विजो! उस रजस्को शतजित् नामक पुत्र हुआ और उसके सौ पुत्र हुए। उनमें जो प्रधान और बलवान् था, वह विश्वज्योति नामसे प्रसिद्ध हुआ। देव ब्रह्माकी आराधना कर (विश्वज्योतिने) क्षेमक नामके महाबाहु और शत्रुमर्दन तथा धर्मज्ञ राजाको पुत्ररूपमें उत्पन्न किया॥ ४२-४३॥ |
| आराध्य देवं ब्रह्माणं क्षेमकं नाम पार्थिवम्।<br>असूत पुत्रं धर्मज्ञं महाबाहुमरिंदमम्॥ ४३॥ | |
| एते पुरस्ताद् राजानो महासत्त्वा महौजसः।<br>एषां वंशप्रसूतैश्च भुक्तेयं पृथिवी पुरा॥ ४४॥ | पूर्वकालमें ये महासत्त्वसम्पन्न और महान् ओजस्वी राजा थे। इनके वंशमें उत्पन्न लोगोंने प्राचीन कालमें इस पृथिवीका उपभोग किया॥ ४४॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे अष्टात्रिंशोऽध्यायः॥ ३८॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें अड़तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३८॥
उनतालीसवाँ अध्याय
'भू' आदि सात लोकोंका वर्णन, ग्रह-नक्षत्रोंकी स्थितिका वर्णन तथा उनका परिमाप, सूर्यरथका वर्णन, पूर्व आदि दिशाओंमें स्थित इन्द्रादि देवोंकी अमरावती आदि पुरियोंका नाम-निर्देश, सूर्यकी महिमा
| सूत उवाच | सूतजीने कहा— |
|---|---|
| अतः परं प्रवक्ष्यामि संक्षेपेण द्विजोत्तमाः।<br>त्रैलोक्यस्यास्य मानं वो न शक्यं विस्तरेण तु॥ १॥ | हे द्विजोत्तमो! अब मैं आप लोगोंसे संक्षेपमें इस त्रैलोक्यके परिमाणका वर्णन करूँगा, क्योंकि इसका विस्तारसे वर्णन नहीं किया जा सकता। (सृष्टिके आदिमें) भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक तथा सत्यलोक—ये (सातों) लोक अण्डसे उत्पन्न बताये गये हैं॥ १-२॥ |
| भूर्लोकोऽथ भुवर्लोकः स्वर्लोकोऽथ महस्ततः।<br>जनस्तपश्च सत्यं च लोकास्त्वण्डोद्भवा मताः॥ २॥ | |
| सूर्याचन्द्रमसोर्यावत् किरणैरवभासते।<br>तावद् भूर्लोक आख्यातः पुराणे द्विजपुंगवाः॥ ३॥ | द्विजश्रेष्ठो! सूर्य और चन्द्रमाकी किरणोंसे जहाँतकका भाग प्रकाशित होता है, उतने भागको पुराणमें भूलोक कहा गया है। सूर्यके परिमण्डलसे भूलोकका जितना परिमाण है, उतना ही विस्तार भुवर्लोकका भी सूर्यके मण्डलसे है। आकाशमें ऊपरकी ओर जहाँ ध्रुव (तारा) स्थित है, वहाँतकके मण्डलको स्वर्लोक कहा जाता है। वहाँ वायुकी नेमियाँ* हैं। आवह, प्रवह, अनुवह, संवह, विवह तथा उसके ऊपर परावह और उसके ऊपर परिवह नामक वायुकी सात नेमियाँ हैं। भूमिसे एक लाख योजन ऊपर सूर्यका मण्डल स्थित है॥ ३-७॥ |
| यावत्प्रमाणो भूर्लोको विस्तरात् परिमण्डलात्।<br>भुवर्लोकोऽपि तावान् स्यान्मण्डलाद् भास्करस्य तु॥ ४॥ | |
| ऊर्ध्वं यन्मण्डलाद् व्योम ध्रुवो यावद् व्यवस्थितः।<br>स्वर्लोकः स समाख्यातस्तत्र वायोस्तु नेमयः॥ ५॥ | |
| आवहः प्रवहश्चैव तथैवानुवहः परः।<br>संवहो विवहश्चाथ तदूर्ध्वं स्यात् परावहः॥ ६॥ | |
| तथा परिवहश्चोर्ध्वं वायोर्वै सप्त नेमयः।<br>भूमेर्योजनलक्षे तु भानोर्वै मण्डलं स्थितम्॥ ७॥ |
* चक्र (रथके पहिया)-के ऊपर लोहेकी गोलाकार हाल (परिधि) लगी होती है, इसीके कारण चक्र बिखरता नहीं है। इसी गोलाकार हाल (परिधि)-को नेमि कहते हैं।
२१६ * कूर्मपुराण *
| लक्षे दिवाकरस्यापि मण्डलं शशिनः स्मृतम्।<br>नक्षत्रमण्डलं कृत्स्नं तल्लक्षेण प्रकाशते॥ ८ ॥ | सूर्यसे भी एक लाख (योजन) ऊपरके भागमें चन्द्रमाका मण्डल कहा गया है। उससे एक लाख योजनपर स्थित सम्पूर्ण नक्षत्र-मण्डल प्रकाशित होता है॥ ८॥ |
| द्वे लक्षे ह्युत्तरे विप्रा बुधो नक्षत्रमण्डलात्।<br>तावत्प्रमाणभागे तु बुधस्याप्युशना स्थितः॥ ९ ॥ | हे विप्रो! नक्षत्रमण्डलसे उत्तर दो लाख योजनकी दूरीपर बुध है। बुधसे उतने प्रमाणकी दूरीपर शुक्र स्थित है। शुक्रसे उतने ही प्रमाणपर मंगलकी स्थिति है। |
| अङ्गारकोऽपि शुक्रस्य तत्प्रमाणे व्यवस्थितः।<br>लक्षद्वयेन भौमस्य स्थितो देवपुरोहितः॥ १०॥ | मंगलसे दो लाख योजनकी दूरीपर देवताओंके पुरोहित बृहस्पति स्थित हैं। बृहस्पतिसे दो लाख योजन दूर |
| सौरिर्द्विलक्षेण गुरोर्ग्रहाणामथ मण्डलम्।<br>सप्तर्षिमण्डलं तस्माल्लक्षमात्रे प्रकाशते॥ ११॥ | सूर्यपुत्र शनैश्चर स्थित है। यह ग्रहोंका मण्डल है। ग्रहोंके उस मण्डलसे लाख योजनकी दूरीपर सप्तर्षि-मण्डल प्रकाशित होता है। ऋषियोंके मण्डल (सप्तर्षि- |
| ऋषीणां मण्डलादूर्ध्वं लक्षमात्रे स्थितो ध्रुवः।<br>मेढीभूतः समस्तस्य ज्योतिष्चक्रस्य वै ध्रुवः।<br>तत्र धर्मः स भगवान् विष्णुर्नारायणः स्थितः॥ १२॥ | मण्डल)-से एक लाख योजन ऊपर ध्रुव स्थित है। ध्रुव सम्पूर्ण ज्योतिश्चक्रका केन्द्र-रूप है। वहाँ धर्मरूप नारायण भगवान् विष्णु स्थित हैं॥ ९—१२॥ |
| नवयोजनसाहस्रो विष्कम्भः सवितुः स्मृतः।<br>त्रिगुणस्तस्य विस्तारो मण्डलस्य प्रमाणतः॥ १३॥ | सूर्यका व्यास नौ हजार योजन कहा गया है। उसका तीन गुना सूर्यमण्डलका विस्तार है। सूर्यके विस्तारका |
| द्विगुणस्तस्य विस्ताराद् विस्तारः शशिनः स्मृतः।<br>तुल्यस्तयोस्तु स्वर्भानुर्भूत्वाऽधस्तात् प्रसर्पति॥ १४॥ | दो गुना चन्द्रमाका विस्तार कहा गया है। उन दोनोंके तुल्य राहु उन दोनोंके नीचे भ्रमण करता है। पृथ्वीकी |
| उद्धृत्य पृथिवीच्छायां निर्मितो मण्डलाकृतिः।<br>स्वर्भानोस्तु बृहत् स्थानं तृतीयं यत् तमोमयम्॥ १५॥ | छायाको लेकर मण्डलाकारनिर्मित राहुका जो तीसरा बृहत् स्थान है, वह तमोमय है। चन्द्रमाका सोलहवाँ |
| चन्द्रस्य षोडशो भागो भार्गवस्य विधीयते।<br>भार्गवात् पादहीनस्तु विज्ञेयो वै बृहस्पतिः॥ १६॥ | भाग शुक्रका है। शुक्रसे चतुर्थांश कम बृहस्पति (-का विस्तार) जानना चाहिये। बृहस्पतिसे चतुर्थांश कम |
| बृहस्पतेः पादहीनौ वक्रसौरौवुभौ स्मृतौ।<br>विस्तारान्मण्डलाच्चैव पादहीनस्तयोर्बुधः॥ १७॥ | मंगल एवं शनि—इन दोनोंका मण्डल कहा गया है। इन दोनोंके मण्डल तथा विस्तारसे चतुर्थांश कम बुधका |
| तारानक्षत्ररूपाणि वपुष्मन्तीह यानि वै।<br>बुधेन तानि तुल्यानि विस्ताराम्मण्डलात् तथा॥ १८॥ | मण्डल है। तारा और नक्षत्ररूपी* जो शरीरधारी हैं, वे सभी मण्डल एवं विस्तारसे बुधके तुल्य हैं॥ १३—१८॥ |
| तारानक्षत्ररूपाणि हीनानि तु परस्परात्।<br>शतानि पञ्च चत्वारि त्रीणि द्वे चैव योजने॥ १९॥ | जो तारा एवं नक्षत्र-रूप हैं, वे एक-दूसरेसे पाँच, चार, तीन या दो सौ योजन कम विस्तारवाले हैं। सभी |
| सर्वावरनिकृष्टानि तारकामण्डलानि तु।<br>योजनान्यर्धमात्राणि तेभ्यो ह्रस्वं न विद्यते॥ २०॥ | छोटे-बड़े ताराओंका मण्डल (ग्रह-पिण्डोंसे छोटे और एक) योजन या आधे योजन परिमाणवाले हैं, उनसे छोटा कोई विद्यमान नहीं है। उनसे ऊपर दूरगामी जो |
| उपरिष्टात् त्रयस्तेषां ग्रहा ये दूरसर्पिणः।<br>सौरोग्ङ्गिराश्च वक्रश्च ज्ञेया मन्दविचारिणः॥ २१॥ | शनि, बृहस्पति तथा मंगल हैं, उन्हें मन्दगतिसे विचरण करनेवाला समझना चाहिये। उनसे नीचे जो दूसरे सूर्य, |
| तेभ्योऽधस्ताच्च चत्वारः पुनरन्ये महाग्रहाः।<br>सूर्यः सोमो बुधश्चैव भार्गवश्चैव शीघ्रगाः॥ २२॥ | चन्द्रमा, बुध तथा शुक्र—चार महाग्रह हैं, ये शीघ्र गतिवाले हैं॥ १९—२२॥ |
* ज्योतिषमें अश्विनी आदि २७ अथवा 'अभिजत्' नामके नक्षत्रको लेकर २८ नक्षत्र प्रसिद्ध हैं—ये ही आकाशमें नक्षत्र नामसे विद्यमान हैं। इनके अतिरिक्त आकाशमें अगणित ज्योतिष्पिण्ड हैं, वे ही 'तारा' कहे जाते हैं।
- अध्याय ३९ * २१७
| दक्षिणायनमार्गस्थो यदा चरति रश्मिमान्।<br>तदा सर्वग्रहाणां स सूर्योऽधस्तात् प्रसर्पति॥ २३॥<br><br>विस्तीर्णं मण्डलं कृत्वा तस्योर्ध्वं चरते शशी।<br>नक्षत्रमण्डलं कृत्स्नं सोमादूर्ध्वं प्रसर्पति॥ २४॥<br>नक्षत्रेभ्यो बुधश्चोर्ध्वं बुधादूर्ध्वं तु भार्गवः।<br>वक्रस्तु भार्गवादूर्ध्वं वक्रादूर्ध्वं बृहस्पतिः॥ २५॥<br>तस्माच्छनैश्चरोऽप्यूर्ध्वं तस्मात् सप्तर्षिमण्डलम्।<br>ऋषीणां चैव सप्तानां ध्रुवश्चोर्ध्वं व्यवस्थितः॥ २६॥<br>योजनानां सहस्राणि भास्करस्य रथो नव।<br>ईषादण्डस्तथैव स्याद् द्विगुणो द्विजसत्तमाः॥ २७॥<br>सार्धकोटिस्तथा सप्त नियुतान्यधिकानि तु।<br>योजनानां तु तस्याक्षस्तत्र चक्रं प्रतिष्ठितम्॥ २८॥<br>त्रिनाभिमति पञ्चारे षण्णेमिन्यक्षयात्मके।<br>संवत्सरमये कृत्स्नं कालचक्रं प्रतिष्ठितम्॥ २९॥<br>चत्वारिंशत् सहस्राणि द्वितीयोऽक्षो विवस्वतः।<br>पञ्चान्यानि तु सार्धानि स्यन्दनस्य द्विजोत्तमाः॥ ३०॥<br>अक्षप्रमाणमुभयोः प्रमाणं तद् युगार्धयोः।<br>ह्रस्वोऽक्षस्तद्युगार्धेन ध्रुवाधारे रथस्य तु॥ ३१॥<br><br>द्वितीयोऽक्षे तु तच्चक्रं संस्थितं मानसाचले।<br>हयाश्च सप्त छन्दांसि तन्नामानि निबोधत॥ ३२॥<br>गायत्री च बृहत्युष्णिग् जगती पङ्क्तिरेव च।<br>अनुष्टुप् त्रिष्टुबित्युक्ताश्छन्दांसि हरयो हरेः॥ ३३॥<br>मानसोपरि माहेन्द्री प्राच्यां दिशि महापुरी।<br>दक्षिणेन यमस्याथ वरुणस्य तु पश्चिमे॥ ३४॥<br>उत्तरेण तु सोमस्य तन्नामानि निबोधत।<br>अमरावती संयमनी सुखा चैव विभा क्रमात्॥ ३५॥<br>काष्ठां गतो दक्षिणतः क्षिप्तेषुरिव सर्पति।<br>ज्योतिषां चक्रमादाय देवदेवः प्रजापतिः॥ ३६॥ | जब सूर्य दक्षिणायनके मार्गमें विचरण करता है, तब वह (सूर्य) सभी ग्रहोंके निम्न भागोंमें भ्रमण करता है। उसके ऊपर विस्तृत मण्डल बनाकर चन्द्रमा विचरण करता है। सम्पूर्ण नक्षत्र-मण्डल चन्द्रमासे ऊपर भ्रमण करता है॥ २३-२४॥<br><br>नक्षत्रोंसे ऊपर बुध, बुधसे ऊपर शुक्र, शुक्रसे ऊपर मंगल और मंगलसे ऊपर बृहस्पति है। उस बृहस्पतिसे भी ऊपर शनैश्चर, उससे ऊपर सप्तर्षि-मण्डल तथा सप्तर्षि-मण्डलके ऊपर ध्रुव स्थित है॥ २५-२६॥<br><br>हे श्रेष्ठ द्विजो! भास्करका रथ नौ हजार योजनका है। उसका ईषादण्ड¹ उसी प्रकार दो गुना (अर्थात् अठारह हजार योजनका) है। उसका धुरा डेढ़ करोड़ सत्तर लाख योजनका है और उसीमें चक्र (रथका पहिया) प्रतिष्ठित है। तीन नाभि,² पाँच अरे³ और छः नेमियोंवाले⁴ संवत्सरमय उस अक्षय चक्रमें यह सम्पूर्ण कालचक्र प्रतिष्ठित है। द्विजोत्तमो! सूर्यके रथका दूसरा अक्ष (चक्र या धुरा) चालीस तथा साढ़े पाँच हजार योजनका है॥ २७-३०॥<br><br>दोनों ओरके युगार्ध (जूआ)-का प्रमाण उस अक्ष (धुरे)-के परिमाणके बराबर है। धुरेके आधारमें स्थित ह्रस्व अक्ष उस युगार्ध (जूआ)-के बराबर है। द्वितीय अक्षमें स्थित उस (रथ)-का चक्र मानसाचलपर स्थित है। सात छन्द (उस रथके) अश्व हैं। उनके नाम सुनो—॥ ३१-३२॥<br><br>गायत्री, बृहती, उष्णिक्, जगती, पंक्ति, अनुष्टुप् तथा त्रिष्टुप्—ये (सात) छन्द सूर्यके (सात) अश्व कहे गये हैं। मानसाचलपर पूर्व दिशामें महेन्द्रकी महापुरी है। दक्षिणमें यमकी, पश्चिममें वरुणकी, उत्तरमें सोमकी नगरी है, उनके (भी)नाम सुनो—अमरावती, संयमनी, सुखा तथा विभा—ये क्रमसे इन्द्रादिकी महापुरियाँ हैं। दक्षिण दिशामें स्थित देवोंके भी देव प्रजापति (सूर्य) ज्योतिश्चक्रको ग्रहणकर प्रक्षिप्त बाणके समान भ्रमण करते हैं॥ ३३-३६॥ |
१-ईषादण्ड—यह रथका अवयव-विशेष है। यह अवयव-विशेष उन दो लम्बे दण्डोंको समझना चाहिये जो रथके आगे होते हैं। इन्हींके मध्य एक या अपेक्षानुसार एकसे अधिक अश्व जोड़े जाते हैं।
२-नाभि—रथके चक्रके बीचका भाग, जिसमें चारों ओरसे काष्ठ जुड़े रहते हैं।
३-नाभिके चारों ओर जो काष्ठ जुड़े रहते हैं, वे ही 'अर' या 'आर' कहे जाते हैं।
४-नेमि—रथके चक्रके ऊपरवाली लोहेकी परिधि (हाल)।
२१८ * कूर्मपुराण *
| दिवसस्य रविर्मध्ये सर्वकालं व्यवस्थितः।<br>सप्तद्वीपेषु विप्रेन्द्रा निशामध्यस्य सम्मुखम्॥ ३७॥<br><br>उदयास्तमने चैव सर्वकालं तु सम्मुखे।<br>अशेषासु दिशास्वेव तथैव विदिशासु च॥ ३८॥<br><br>कुलालचक्रपर्यन्तो भ्रमनेष यथेश्वरः।<br>करोत्यहस्तथा रात्रिं विमुञ्चन् मेदिनीं द्विजाः॥ ३९॥<br><br>दिवाकरकरैरेतत् पूरितं भुवनत्रयम्।<br>त्रैलोक्यं कथितं सद्भिर्लोकानां मुनिपुंगवाः॥ ४०॥<br><br>आदित्यमूलमखिलं त्रिलोकं नात्र संशयः।<br>भवत्यस्मात् जगत् कृत्स्नं सदेवासुरमानुषम्॥ ४१॥<br><br>रुद्रेन्द्रोपेन्द्रचन्द्राणां विप्रेन्द्राणां दिवौकसाम्।<br>द्युतिर्द्युतिमतां कृत्स्नं यत्तेजः सार्वलौकिकम्॥ ४२॥<br><br>सर्वात्मा सर्वलोकेशो महादेवः प्रजापतिः।<br>सूर्य एव त्रिलोकस्य मूलं परमदैवतम्॥ ४३॥<br><br>द्वादशान्ये तथादित्या देवास्ते येऽधिकारिणः।<br>निर्वहन्ति पदं तस्य तदंशा विष्णुमूर्तयः॥ ४४॥<br><br>सर्वे नमस्यन्ति सहस्त्रभानुं<br>गन्धर्वदेवोरगकिन्नराद्याः ।<br>यजन्ति यज्ञैर्विविधैर्द्विजेन्द्रा-<br>श्छन्दोमयं ब्रह्ममयं पुराणम्॥ ४५॥ | विप्रेन्द्रो! सात द्वीपोंमें दिनके मध्य एवं रात्रिके अर्धभागमें सूर्य सदा सम्मुख रहता है, उदय और अस्तके समय भी सदा सम्मुख रहता है। ये ईश्वर (सूर्य) कुम्हारके चक्रके समान सभी दिशाओं तथा विदिशाओंमें भ्रमण करते हैं। हे द्विजो! पृथ्वीका त्याग करते हुए ये दिन और रात्रिका निर्माण करते हैं। ये तीनों भुवन सूर्यकी किरणोंसे व्याप्त हैं। हे मुनिश्रेष्ठो! विद्वानोंने (समस्त) लोकोंको त्रैलोक्यके नामसे कहा है॥ ३७–४०॥<br><br>सम्पूर्ण त्रिलोकीके मूल सूर्य ही हैं, इसमें संशय नहीं। देवता, असुर तथा मनुष्योंसे युक्त सम्पूर्ण जगत् इन्हींसे उत्पन्न होता है। रुद्र, इन्द्र, उपेन्द्र, चन्द्रमा एवं श्रेष्ठ विप्रों तथा समस्त देवताओंका जो तेज है, द्युतिमानोंका जो प्रकाश है और समस्त लोकोंका जो सम्पूर्ण तेज है, (वह सूर्यका ही तेज है)। सूर्य ही सभी लोकोंके स्वामी, सर्वात्मा, प्रजापति, महान् देव, तीनों लोकोंके मूल और परम देवता हैं। इसी प्रकार अधिकारी-रूपमें जो अन्य बारह आदित्य देवता हैं, वे उन्हीं सूर्यके अंश हैं और विष्णुके मूर्तिरूप हैं। वे उन्हींके पद (कार्य)-को सम्पन्न करते हैं॥ ४१–४४॥<br><br>गन्धर्व, देवता, नाग तथा किन्नर आदि सभी हजारों किरणोंवाले सूर्यको नमस्कार करते हैं। श्रेष्ठ द्विज विविध यज्ञोंके द्वारा छन्दोमय एवं ब्रह्मस्वरूप पुरातन सूर्यदेवका यजन करते हैं॥ ४५॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ३९॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें उनतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३९॥