भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 185, कुल 506 में से

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पृष्ठ 185
* अध्याय २७ *१७५

| व्यास उवाच | व्यासजी बोले—नरेश्वर! पार्थ! संक्षेपमें युगधर्मोंको तुम्हें बतलाता हूँ, मैं विस्तारसे वर्णन नहीं कर सकता हूँ। पार्थ! विद्वानोंद्वारा पहला कृतयुग कहा गया है, तदनन्तर दूसरा त्रेतायुग, तीसरा द्वापर तथा चौथा कलियुग कहा गया है। कृतयुगमें ध्यान, त्रेतामें ज्ञान, द्वापरमें यज्ञ तथा कलियुगमें एकमात्र दान ही श्रेष्ठ साधन बताया गया है। कृतयुगमें ब्रह्मा देवता होते हैं, इसी प्रकार त्रेतामें भगवान् सूर्य, द्वापरमें देवता विष्णु और कलियुगमें महेश्वर रुद्र ही मुख्य देवता हैं। ब्रह्मा, विष्णु तथा सूर्य—ये सभी कलियुगमें पूजित होते हैं, किंतु पिनाकधारी भगवान् रुद्र चारों युगोंमें पूजे जाते हैं। सर्वप्रथम कृतयुगमें सनातनधर्म चार चरणोंवाला था, त्रेतामें तीन चरणोंवाला तथा द्वापरमें दो चरणोंसे स्थित हुआ, किंतु कलियुगमें तीन चरणोंसे रहित होकर केवल सत्तामात्रसे स्थित रहता है॥ १५—२०॥ | | वक्ष्यामि ते समासेन युगधर्मान् नरेश्वर।<br>न शक्यते मया पार्थ विस्तरेणाभिभाषितुम् ॥ १५ ॥<br>आद्यं कृतयुगं प्रोक्तं ततस्त्रेतायुगं बुधैः।<br>तृतीयं द्वापरं पार्थ चतुर्थं कलिरुच्यते ॥ १६ ॥<br>ध्यानं परं कृतयुगे त्रेतायां ज्ञानमुच्यते।<br>द्वापरे यज्ञमेवाहुर्दानमेव कलौ युगे ॥ १७ ॥<br>ब्रह्मा कृतयुगे देवस्त्रेतायां भगवान् रविः।<br>द्वापरे दैवतं विष्णुः कलौ रुद्रो महेश्वरः ॥ १८ ॥<br>ब्रह्मा विष्णुस्तथा सूर्यः सर्व एव कलिष्वपि।<br>पूज्यते भगवान् रुद्रश्चतुर्ष्वपि पिनाकधृक् ॥ १९ ॥<br>आद्ये कृतयुगे धर्मश्चतुष्पादः सनातनः।<br>त्रेतायुगे त्रिपादः स्याद् द्विपादो द्वापरे स्थितः।<br>त्रिपादहीनस्तिष्ये तु सत्तामात्रेण तिष्ठति ॥ २० ॥ | | | कृते तु मिथुनोत्पत्तिर्वृत्तिः साक्षाद् रसोल्लसा।<br>प्रजास्तृप्ताः सदा सर्वाः सदानन्दाश्च भोगिनः ॥ २१ ॥<br><br>अधमोत्तमत्वं नास्त्यासां निर्विशेषाः पुरञ्जय।<br>तुल्यमायुः सुखं रूपं तासां तस्मिन् कृते युगे ॥ २२ ॥<br><br>विशोकाः सत्त्वबहुला एकान्तबहुलास्तथा।<br>ध्याननिष्ठास्तपोनिष्ठा महादेवपरायणाः ॥ २३ ॥<br><br>ता वै निष्कामचारिण्यो नित्यं मुदितमानसाः।<br>पर्वतोदधिवासिन्यो ह्यनिकेताः परंतप ॥ २४ ॥ | कृतयुगमें स्त्री-पुरुषके संयोगसे उत्पत्ति होती थी और लोगोंकी आजीविका साक्षात् (आनन्द) रससे उल्लसित रहती थी। सारी प्रजाएँ सर्वदा सात्त्विक आनन्दसे तृप्त और भोगसे सम्पन्न रहती थीं। पुरञ्जय! उन प्रजाओंमें उत्तम और अधमका भेद नहीं था, सभी निर्विशेष थे। उस कृतयुगमें प्रजाकी आयु, सुख और रूप समान था। सम्पूर्ण प्रजा शोकसे रहित, सत्त्वगुणके बाहुल्यसे युक्त, एकान्तप्रेमी, ध्याननिष्ठ, तपोनिष्ठ तथा महादेव शंकरकी भक्त थी। परंतप ! वे प्रजाएँ निष्कामकर्म करनेवाली, नित्य प्रसन्न मनवाली और पर्वतों एवं समुद्रके किनारे रहनेवाली थीं, उनका कोई घर नहीं होता था॥ २१—२४॥ | | रसोल्लासा कालयोगात् त्रेताख्ये नश्यते ततः।<br>तस्यां सिद्धौ प्रणष्टायामन्या सिद्धिरवर्तत ॥ २५ ॥<br>अपां सौक्ष्म्ये प्रतिहते तदा मेघात्मना तु वै।<br>मेघेभ्यः स्तनयित्नुभ्यः प्रवृत्तं वृष्टिसर्जनम् ॥ २६ ॥<br>सकृदेव तया वृष्ट्या संयुक्ते पृथिवीतले।<br>प्रादुरासंस्तदा तासां वृक्षा वै गृहसंज्ञिताः ॥ २७ ॥<br>सर्वप्रत्युपयोगस्तु तासां तेभ्यः प्रजायते।<br>वर्तयन्ति स्म तेभ्यस्तास्त्रेतायुगमुखे प्रजाः ॥ २८ ॥ | तदनन्तर कालके प्रभावसे त्रेता नामक युगमें (सत्य-युगका) आनन्दोल्लास नष्ट हो जाता है, (कृतयुगकी) उस सिद्धिका लोप होनेपर अन्य सिद्धि प्रवर्तित होती है। मेघमें जलकी कमी होनेपर मेघ और विद्युत्से वृष्टि उत्पन्न हुई।* पृथ्वीतलपर एक बार ही उस वृष्टिका संयोग होनेसे उन प्रजाओंके लिये गृहसंज्ञक वृक्षोंका प्रादुर्भाव हुआ। उन (वृक्षों)-से ही उनके सब कार्य सम्पन्न होने लगे। त्रेतायुगके प्रारम्भमें वह समस्त प्रजा उनसे ही (अपनी जीविकाका) निर्वाह करती थी॥ २५—२८॥ |


* सत्ययुगमें स्वयं मेघ जलमय होते थे। उनमें इतनी जलकी प्रचुरता होती थी कि किसी अन्यके सहयोगके बिना ही वे वृष्टि करते थे। पर त्रेतायुगमें मेघोंकी जलमयता प्रतिहत हो गयी। फलतः विद्युत्के सहयोगसे ही मेघ वृष्टि कर पाते थे।

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