भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१७४* कूर्मपुराण *

सत्ताईसवाँ अध्याय

व्यासदेवद्वारा अर्जुनको सत्ययुगादि चारों युगोंके धर्मोंका उपदेश, व्यासद्वारा एक वेद-संहिताका चतुर्धा विभाजन, चारों युगोंमें चतुष्पाद धर्मकी विभिन्न स्थितिका निदर्शन तथा कलियुगमें धर्मके ह्रासका प्रतिपादन

ऋषय ऊचुः<br>कृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्चेति चतुर्युगम्।<br>एषां स्वभावं सूताद्य कथयस्व समासतः॥ १ ॥ऋषियोंने कहा—सूतजी! सत्य, त्रेता, द्वापर तथा कलि—ये चार युग हैं, अब (आप) इनके स्वभावका संक्षेपमें वर्णन कीजिये॥ १॥
सूत उवाच<br>गते नारायणे कृष्णे स्वमेव परमं पदम्।<br>पार्थः परमधर्मात्मा पाण्डवः शत्रुतापनः॥ २ ॥<br>कृत्वा चैवोत्तरविधिं शोकेन महतावृत्तः।<br>अपश्यत् पथि गच्छन्तं कृष्णद्वैपायनं मुनिम्॥ ३ ॥<br>शिष्यैः प्रशिष्यैरभितः संवृतं ब्रह्मवादिनम्।<br>पपात दण्डवद् भूमौ त्यक्त्वा शोकं तदार्जुनः॥ ४ ॥<br>उवाच परमप्रीतः कस्माद् देशान्महामुने।<br>इदानीं गच्छसि क्षिप्रं कं वा देशं प्रति प्रभो॥ ५ ॥<br>संदर्शनाद् वै भवतः शोको मे विपुलोगतः।<br>इदानीं मम यत् कार्यं ब्रूहि पद्मदलेक्षण॥ ६ ॥<br>तमुवाच महायोगी कृष्णद्वैपायनः स्वयम्।<br>उपविश्य नदीतीरे शिष्यैः परिवृतो मुनिः॥ ७ ॥सूतजी बोले—नारायण कृष्णके अपने परमधाम चले जानेपर शत्रुओंको पीड़ा पहुँचानेवाले परम धर्मात्मा पाण्डुपुत्र पार्थ (अर्जुन) और्ध्वदैहिक क्रिया करके महान् शोकसे आवृत हो गये। (उन्होंने) मार्गमें जाते हुए ब्रह्मवादी कृष्णद्वैपायन (व्यास) मुनिको शिष्यों, प्रशिष्योंसे चारों ओरसे घिरे हुए देखा। तब शोकका परित्यागकर अर्जुनने भूमिपर दण्डवत् गिरकर प्रणाम किया और परम प्रीतिसे कहा—महामुने! प्रभो! आप कहाँसे आ रहे हैं और किस देशकी ओर इस समय शीघ्रतापूर्वक जा रहे हैं? आपका दर्शन करनेसे ही मेरा महान् शोक दूर हो गया है। कमलपत्रके समान नेत्रवाले (व्यासजी महाराज)! इस समय मेरा जो कर्तव्य हो, उसे आप बतलायें। तब शिष्योंसे घिरे हुए महायोगी कृष्णद्वैपायन मुनिने नदीके किनारे बैठकर स्वयं कहा—॥ २–७॥
व्यास उवाच<br>इदं कलियुगं घोरं सम्प्राप्तं पाण्डुनन्दन।<br>ततो गच्छामि देवस्य वाराणसीं महापुरीम्॥ ८ ॥<br>अस्मिन् कलियुगे घोरे लोकाः पापानुवर्तिनः।<br>भविष्यन्ति महापापा वर्णाश्रमविवर्जिताः॥ ९ ॥<br>नान्यत् पश्यामि जन्तूनां मुक्त्वा वाराणसीं पुरीम्।<br>सर्वपापप्रशमनं प्रायश्चित्तं कलौ युगे॥ १०॥व्यासजी बोले—पाण्डुके पुत्र (अर्जुन)! यह घोर कलियुग आ गया है। इसलिये मैं भगवान् शंकरकी महापुरी वाराणसी जा रहा हूँ। इस भयंकर कलियुगमें लोग पापाचरण करनेवाले, वर्ण तथा आश्रमधर्मसे रहित महान् पापी होंगे। कलियुगमें सभी पापोंका शमन करनेके लिये वाराणसीपुरीके सेवनको छोड़कर अन्य दूसरा कोई प्रायश्चित्त मैं नहीं देखता॥ ८—१०॥
कृतं त्रेता द्वापरं च सर्वेष्वेतेषु वै नराः।<br>भविष्यन्ति महात्मानो धर्मिकाः सत्यवादिनः॥ ११॥<br>त्वं हि लोकेषु विख्यातो धृतिमाञ् जनवत्सलः।<br>पालयाद्य परं धर्मं स्वकीयं मुच्यसे भयात्॥ १२॥<br>एवमुक्तो भगवता पार्थः परपुरञ्जयः।<br>पृष्टवान् प्रणिपत्यासौ युगधर्मान् द्विजोत्तमाः॥ १३॥<br>तस्मै प्रोवाच सकलं मुनिः सत्यवतीसुतः।<br>प्रणम्य देवमीशानं युगधर्मान् सनातनान्॥ १४॥सत्य, त्रेता तथा द्वापर—इन सभी (युगों) में मनुष्य महात्मा, धार्मिक तथा सत्यवादी होते हैं। आप संसारमें प्रजावत्सल तथा धृतिमान्‌के रूपमें विख्यात हैं, अतः अपने परम धर्मका पालन करें, इससे आप भयसे मुक्त हो जायेंगे। द्विजोत्तमो! भगवान् (व्यास)-के द्वारा ऐसा कहनेपर शत्रुके पुरको जीतनेवाले पृथा (कुन्ती)-के पुत्र पार्थ (अर्जुन)-ने इन्हें प्रणामकर युगधर्मोंको पूछा। सत्यवतीके पुत्र व्यासमुनिने भगवान् शंकरको प्रणामकर सम्पूर्ण सनातन युगधर्मोंको उन्हें बतलाया॥ ११–१४॥