भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 183
  • अध्याय २६ * | १७३ ---|--- ध्यानं होमं तपस्तप्तं ज्ञानं यज्ञादिको विधिः।<br>तेषां विनश्यति क्षिप्रं ये निन्दन्ति पिनाकिनम्॥ १४॥|जो पिनाक धारण करनेवाले शिवकी निन्दा करते हैं, उनका ध्यान, होम, किया गया तप, ज्ञान तथा यज्ञादि सभी विधान शीघ्र ही नष्ट हो जाता है॥ १४॥ यो मां समाश्रयेन्नित्यमेकान्तं भावमाश्रितः।<br>विनिन्द्य देवमीशानं स याति नरकायुतम्॥ १५॥<br><br>तस्मात् सा परिहर्तव्या निन्दा पशुपतौ द्विजाः।<br>कर्मणा मनसा वाचा तद्भक्तेष्वपि यत्नतः॥ १६॥<br><br>ये तु दक्षाध्वरे शप्ता दधीचेन द्विजोत्तमाः।<br>भविष्यन्ति कलौ भक्तैः परिहार्याः प्रयत्नतः॥ १७॥<br><br>द्विषन्तो देवमीशानं युष्माकं वंशसम्भवाः।<br>शप्ताश्च गौतमेनोर्व्यां न सम्भाष्या द्विजोत्तमैः॥ १८॥|जो ईशान (शंकर) देवकी निन्दा कर नित्य अनन्य भावसे मेरा आश्रय ग्रहण करता है, वह दस हजार वर्षोंतक नरकमें रहता है। इसलिये द्विजो! मन, वाणी तथा कर्मसे पशुपति तथा उनके भक्तोंकी भी निन्दाका प्रयत्नपूर्वक परित्याग करना चाहिये। द्विजोत्तमो! दक्ष प्रजापतिके यज्ञमें दधीचने आपके वंशमें उत्पन्न जिन ब्राह्मणोंको देव ईशानसे द्वेष करनेके कारण शाप दिया था, वे सभी कलियुगमें पृथ्वीपर उत्पन्न होंगे। भक्तोंद्वारा प्रयत्नपूर्वक उनका परित्याग करना चाहिये। महर्षि गौतमद्वारा शापप्राप्त लोगोंसे भी श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको बात नहीं करनी चाहिये॥ १५-१८॥ इत्येवमुक्ताः कृष्णेन सर्व एव महर्षयः।<br>ओमित्युक्त्वा ययुस्तूर्णं स्वानि स्थानानि सत्तमाः॥ १९॥<br><br>ततो नारायणः कृष्णो लीलयैव जगन्मयः।<br>संहृत्य स्वकुलं सर्वं ययौ तत् परमं पदम्॥ २०॥|कृष्णद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर वे सभी श्रेष्ठ महर्षि 'ठीक है' ऐसा कहकर शीघ्र ही अपने स्थानोंको चले गये। तदनन्तर जगन्मय नारायण कृष्ण लीलापूर्वक अपने सारे कुलका संहारकर अपने परमधामको पधार गये॥ १९-२०॥ इत्येष वः समासेन राज्ञां वंशोऽनुकीर्तितः।<br>न शक्यो विस्तराद् वक्तुं किं भूयः श्रोतुमिच्छथ॥ २१॥|(सूतजीने ऋषियोंसे कहा—) संक्षेपमें यह राजवंश आप लोगोंको बताया गया, विस्तारपूर्वक इसका वर्णन नहीं हो सकता। अब आप पुनः क्या सुनना चाहते हैं? यः पठेच्छृणुयाद् वापि वंशानां कथनं शुभम्।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तः स्वर्गलोके महीयते॥ २२॥|जो इन वंशोंके शुभ वर्णनको पढ़ता है अथवा सुनता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा स्वर्गलोकमें आदर प्राप्त करता है॥ २१-२२॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे षड्विंशोऽध्यायः॥ २६॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें छब्बीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ २६॥