भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 182, कुल 506 में से

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पृष्ठ 182
१७२* कूर्मपुराण *

छब्बीसवाँ अध्याय

श्रीकृष्णको महेश्वरकी कृपासे साम्ब नामक पुत्रकी प्राप्ति, कंसादिका वध, भृगु आदि महर्षियोंका द्वारकामें आना, भृगु आदि मुनियोंसे श्रीकृष्णद्वारा स्वधामगमनकी बात बताना, शिवसे द्वेष करनेवालोंको नरककी प्राप्तिका वर्णन तथा शिवकी महिमा बताना, नारायणका अपने कुलका संहारकर स्वधामगमन तथा वंश-वर्णनका उपसंहार

सूत उवाच<br>ततो लब्धवरः कृष्णो जाम्बवत्यां महेश्वरात्।<br>अजीजनन्महात्मानं साम्बमात्मजमुत्तमम्॥ १ ॥<br>प्रद्युम्नस्याप्यभूत् पुत्रो ह्यनिरुद्धो महाबलः।<br>तावुभौ गुणसम्पन्नौ कृष्णस्यैवापरे तनू॥ २ ॥<br>हत्वा च कंसं नरकमन्यांश्च शतशोऽसुरान्।<br>विजित्य लीलया शक्रं जित्वा बाणं महासुरम्॥ ३ ॥<br>स्थापयित्वा जगत् कृत्स्नं लोके धर्मांश्च शाश्वतान्।<br>चक्रे नारायणो गन्तुं स्वस्थानं बुद्धिमुत्तमाम्॥ ४ ॥<br>एतस्मिन्नन्तरे विप्रा भृग्वाद्याः कृष्णमीश्वरम्।<br>आजग्मुर्द्वारकां द्रष्टुं कृतकार्यं सनातनम्॥ ५ ॥**सूतजी बोले—**तदनन्तर महेश्वरसे वर प्राप्त किये हुए कृष्णने जाम्बवतीसे महात्मा साम्ब नामक श्रेष्ठ पुत्रको उत्पन्न किया। प्रद्युम्नको भी महाबलवान् अनिरुद्ध नामक पुत्र हुआ। गुणोंसे सम्पन्न वे दोनों कृष्णके ही दूसरे शरीर (-रूप) थे। कंस, नरक तथा अन्य सैकड़ों असुरोंको मारकर लीलापूर्वक इन्द्रको जीतकर तथा महान् असुर बाणको पराजितकर, सम्पूर्ण संसारको प्रतिष्ठितकर और लोकमें शाश्वत धर्मोंकी स्थापनाकर नारायणने अपने धाममें जानेका श्रेष्ठ विचार किया। ब्राह्मणो! इसी बीच भृगु आदि (महर्षि) अवतारके समस्त प्रयोजनोंसे निवृत्त सनातन ईश्वर कृष्णका दर्शन करनेके लिये द्वारकामें आये॥ १—५॥
स तानुवाच विश्वात्मा प्रणिपत्याभिपूज्य च।<br>आसनेषूपविष्टान् वै सह रामेण धीमता॥ ६ ॥<br>गमिष्ये तत् परं स्थानं स्वकीयं विष्णुसंज्ञितम्।<br>कृतानि सर्वकार्याणि प्रसीदध्वं मुनीश्वराः॥ ७ ॥<br>इदं कलियुगं घोरं सम्प्राप्तमधुनाशुभम्।<br>भविष्यन्ति जनाः सर्वे ह्यस्मिन् पापानुवर्तिनः॥ ८ ॥<br>प्रवर्तयध्वं मज्ज्ञानं ब्राह्मणानां हितावहम्।<br>येनेमे कलिजैः पापैर्मुच्यन्ते हि द्विजोत्तमाः॥ ९ ॥विश्वात्मा (कृष्ण)-ने बुद्धिमान् बलरामके साथ आसनोंपर विराजमान भृगु आदि महर्षियोंको प्रणामकर और पूजनकर उनसे कहा—मुनीश्वरो! सभी कार्य किये जा चुके हैं। अब मैं विष्णुसंज्ञक अपने उस परमधामको जाऊँगा, आप लोग प्रसन्न हों। इस समय अशुभ घोर कलियुग आ गया है। इसमें सभी लोग पापाचरण करनेवाले हो जायेंगे। श्रेष्ठ ब्राह्मणो! आप लोग ब्राह्मणोंके लिये कल्याणकारी मेरा ज्ञान प्रवर्तित करें, जिससे ये लोग कलिद्वारा उत्पन्न पापोंसे मुक्त हो सकें॥ ६—९॥
ये मां जनाः संस्मरन्ति कलौ सकृदपि प्रभुम्।<br>तेषां नश्यतु तत् पापं भक्तानां पुरुषोत्तमे॥ १०॥कलियुगमें जो लोग एक बार भी मुझ प्रभुका स्मरण करेंगे, उन पुरुषोत्तमके भक्तोंका पाप नष्ट हो जायगा। द्विजो! जो कलियुगमें भक्तिपूर्वक वैदिक विधि-विधानसे नित्य मेरा पूजन करेंगे, वे मेरे पदको प्राप्त करेंगे॥ १०-११॥
येऽर्चयिष्यन्ति मां भक्त्या नित्यं कलियुगे द्विजाः।<br>विधिना वेददृष्टेन ते गमिष्यन्ति तत् पदम्॥ ११॥
ये ब्राह्मणा वंशजाता युष्माकं वै सहस्त्रशः।<br>तेषां नारायणे भक्तिर्भविष्यति कलौ युगे॥ १२॥<br>परात् परतरं यान्ति नारायणपरायणाः।<br>न ते तत्र गमिष्यन्ति ये द्विषन्ति महेश्वरम्॥ १३॥आप लोगोंके वंशमें जो हजारों ब्राह्मण उत्पन्न होंगे, उनकी कलियुगमें नारायणमें भक्ति होगी। नारायणके भक्तजन परसे परतर स्थानको प्राप्त करते हैं, किंतु जो महेश्वरसे द्वेष रखते हैं, वे वहाँ नहीं जाते॥ १२-१३॥
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