भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 181, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 181
* अध्याय २५ *१७१
अहं च भवतो वक्त्रात् कल्पादौ घोररूपधृक्।<br>शूलपाणिर्भविष्यामि क्रोधजस्तव पुत्रकः॥ १००॥कल्पके आदिमें मैं भी आपके मुखसे प्रकट होकर घोर रूप धारणकर हाथमें शूल धारण किये आपका क्रोधज पुत्र बनूँगा॥ १००॥
एवमुक्त्वा महादेवो ब्रह्माणं मुनिसत्तम।<br>अनुगृह्य च मां देवस्तत्रैवान्तरधीयत॥ १०१॥मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार कहकर भगवान् महादेव मुझपर तथा ब्रह्मापर कृपा करके वहींपर अन्तर्धान हो गये। ब्रह्मन्! तबसे लोकमें लिङ्गका पूजन प्रतिष्ठित हो गया। लीन होनेसे वह लिङ्ग कहा जाता है। लिङ्ग ब्रह्मका श्रेष्ठ शरीर है॥ १०१-१०२॥
ततः प्रभृति लोकेषु लिङ्गार्चा सुप्रतिष्ठिता।<br>लिङ्गं तल्लयनाद् ब्रह्मन् ब्रह्मणः परमं वपुः॥ १०२॥<br>एतल्लिङ्गस्य माहात्म्यं भाषितं ते मयानघ।<br>एतद् बुध्यन्ति योगज्ञा न देवा न च दानवाः॥ १०३॥अनघ! मैंने इस लिङ्गका माहात्म्य तुम्हें बताया। इसे न देवता जानते हैं न दानव, केवल योगज्ञ लोग ही जानते हैं। यह शिव नामवाला अव्यक्त परम ज्ञान है। ज्ञानदृष्टिवाले इसीके द्वारा उस सूक्ष्म अचिन्त्य (तत्त्व)-का दर्शन करते हैं। इस लिङ्गस्वरूप देवाधि-देव महादेव भगवान् रुद्रको हम नित्य नमस्कार करते हैं॥ १०३-१०५॥
एतद्वि परमं ज्ञानमव्यक्तं शिवसञ्ज्ञितम्।<br>येन सूक्ष्ममचिन्त्यं तत् पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः॥ १०४॥
तस्मै भगवते नित्यं नमस्कारं प्रकुर्महे।<br>महादेवाय रुद्राय देवदेवाय लिङ्गिने॥ १०५॥
नमो वेदरहस्याय नीलकण्ठाय वै नमः।<br>विभीषणाय शान्ताय स्थाणवे हेतवे नमः॥ १०६॥वेदके रहस्यरूप आपको नमस्कार है, नीलकण्ठको नमस्कार है। विशेष भय* उत्पन्न करनेवाले, शान्त, स्थाणु तथा कारणरूपको नमस्कार है। वामदेव, त्रिलोचन, महिमावान्, ब्रह्म, शंकर, महेश, गिरीश तथा शिवको नमस्कार है। सदा इन्हें नमस्कार करो, मनसे शंकरका ध्यान करो। इससे शीघ्र ही संसारसागरसे पार हो जाओगे॥ १०६-१०८॥
ब्रह्मणे वामदेवाय त्रिनेत्राय महीयसे।<br>शंकराय महेशाय गिरीशाय शिवाय च॥ १०७॥
नमः कुरुष्व सततं ध्यायस्व मनसा हरम्।<br>संसारसागरादस्मादचिरादुत्तरिष्यसि ॥ १०८॥
एवं स वासुदेवेन व्याहृतो मुनिपुङ्गवः।<br>जगाम मनसा देवमीशानं विश्वतोमुखम्॥ १०९॥इस प्रकार वासुदेवके द्वारा कहे जानेपर उन मुनिश्रेष्ठ (मार्कण्डेय)-ने विश्वतोमुख देव ईशान (शंकर)-का ध्यान किया। श्रीकृष्णको विनयपूर्वक प्रणामकर उनकी आज्ञा प्राप्तकर महामुनि (मार्कण्डेय) त्रिशूल धारण करनेवाले देवाधिदेवके अभीष्ट स्थानको चले गये॥ १०९-११०॥
प्रणम्य शिरसा कृष्णमनुज्ञातो महामुनिः।<br>जगाम चेप्सितं देशं देवदेवस्य शूलिनः॥ ११०॥
य इमं श्रावयेन्नित्यं लिङ्गाध्यायमनुत्तमम्।<br>शृणुयाद् वा पठेद् वापि सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ १११॥जो इस श्रेष्ठ लिङ्गाध्यायको सुनेगा, सुनायेगा अथवा पढ़ेगा, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जायगा। विप्रेन्द्रो! वासुदेवके इस श्रेष्ठ तपश्चरणको एक बार भी सुननेवाला मनुष्य पापसे मुक्त हो जाता है अथवा प्रतिदिन इसका निरन्तर जप करनेसे ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है—ऐसा महायोगी प्रभु कृष्णद्वैपायनने कहा है॥ १११-११३॥
श्रुत्वा सकृदपि ह्येतत् तपश्चरणमुत्तमम्।<br>वासुदेवस्य विप्रेन्द्राः पापं मुञ्चति मानवः॥ ११२॥
जपेद् वाहरहर्नित्यं ब्रह्मलोके महीयते।<br>एवमाह महायोगी कृष्णद्वैपायनः प्रभुः॥ ११३॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे पञ्चविंशोऽध्यायः॥ २५॥

इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें पचीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ २५॥


* प्राणीको पापसे विरत करनेके लिये अन्य उपाय न होनेपर भगवान् शंकर भय भी उत्पन्न करते हैं।