भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 180, कुल 506 में से

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पृष्ठ 180

१७० * कूर्मपुराण *


महादेवाय महते ज्योतिषेऽनन्ततेजसे ।<br>नमः शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिङ्गमूर्तये ॥ ८४ ॥<br>प्रधानपुरुषेशाय व्योमरूपाय वेधसे ।<br>नमः शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिङ्गमूर्तये ॥ ८५ ॥<br>निर्विकाराय सत्याय नित्यायामलतेजसे ।<br>नमः शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिङ्गमूर्तये ॥ ८६ ॥<br>वेदान्तसाररूपाय कालरूपाय धीमते ।<br>नमः शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिङ्गमूर्तये ॥ ८७ ॥महादेव, महान्, ज्योतिःस्वरूप, अनन्त तेजस्वी लिङ्गविग्रह शिव, शान्त, ब्रह्मको नमस्कार है। प्रधान पुरुषके भी ईश, व्योमस्वरूप, वेधा (ब्रह्म) और लिङ्गविग्रह शिव, शान्त ब्रह्मको नमस्कार है। निर्विकार, सत्य, नित्य विमल तेजरूप लिङ्गविग्रह शान्त, शिव ब्रह्मको नमस्कार है। वेदान्तसार-स्वरूप, कालरूप, धीमान् लिङ्गमूर्ति शिव, शान्त ब्रह्मको नमस्कार है ॥ ८४-८७ ॥
एवं संस्तूयमानस्तु व्यक्तो भूत्वा महेश्वरः ।<br>भाति देवो महायोगी सूर्यकोटिसमप्रभः ॥ ८८ ॥<br>वक्त्रकोटिसहस्रेण ग्रसमान इवाम्बरम् ।<br>सहस्रहस्तचरणः सूर्यसोमाग्निलोचनः ॥ ८९ ॥<br>पिनाकपाणिर्भगवान् कृत्तिवासास्त्रिशूलभृत् ।<br>व्यालयज्ञोपवीतश्च मेघदुन्दुभिनिःस्वनः ॥ ९० ॥<br>अथोवाच महादेवः प्रीतोऽहं सुरसत्तमौ ।<br>पश्येतं मां महादेवं भयं सर्वं प्रमुच्यताम् ॥ ९१ ॥<br>युवां प्रसूतौ गात्रेभ्यो मम पूर्वं सनातनौ ।<br>अयं मे दक्षिणे पार्श्वे ब्रह्मा लोकपितामहः ।<br>वामपार्श्वे च मे विष्णुः पालको हृदये हरः ॥ ९२ ॥<br>प्रीतोऽहं युवयोः सम्यक् वरं दद्मि यथेप्सितम् ।<br>एवमुक्त्वाथ मां देवो महादेवः स्वयं शिवः ।<br>आलिङ्ग्य देवं ब्रह्माणं प्रसादाभिमुखोऽभवत् ॥ ९३ ॥इस प्रकार स्तुति करते रहनेपर महायोगी महेश्वर देव प्रकट हो गये और हजारों करोड़ मुखसे आकाशको मानो ग्रास बनाते हुए करोड़ों सूर्यके समान सुशोभित होने लगे। हजारों हाथ और पैरवाले, सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्निरूप (तीन) नयनवाले, पिनाकधनुषको हाथमें धारण करनेवाले, चर्माम्बरधारी, त्रिशूलधारी, सर्पका यज्ञोपवीत धारण करनेवाले और मेघ तथा दुन्दुभिके सदृश स्वरवाले भगवान् महादेवने कहा—श्रेष्ठ देवो! मैं प्रसन्न हूँ। मुझ महादेवकी ओर देखो और समस्त भयका परित्याग करो। पूर्वकालमें तुम दोनों सनातन (देव) मेरे शरीरसे उत्पन्न हुए थे। मेरे दक्षिण पार्श्वमें ये लोकपितामह ब्रह्मा, वाम पार्श्वमें पालनकर्ता विष्णु और हृदयमें हर स्थित हैं। मैं तुम दोनोंपर भलीभाँति प्रसन्न हूँ, इसलिये यथेष्ट वर प्रदान करूँगा। ऐसा कहकर महादेव शिव स्वयं मुझे तथा देव ब्रह्माका आलिङ्गन कर अनुग्रह प्रदान करनेके लिये उद्यत हुए ॥ ८८-९३ ॥
ततः प्रहृष्टमनसौ प्रणिपत्य महेश्वरम् ।<br>ऊचतुः प्रेक्ष्य तद्वक्त्रं नारायणपितामहौ ॥ ९४ ॥<br>यदि प्रीतिः समुत्पन्ना यदि देयो वरश्च नौ ।<br>भक्तिर्भवतु नौ नित्यं त्वयि देव महेश्वरे ॥ ९५ ॥<br>ततः स भगवानीशः प्रहसन् परमेश्वरः ।<br>उवाच मां महादेवः प्रीतः प्रीतेन चेतसा ॥ ९६ ॥तदनन्तर प्रसन्न मनवाले नारायण तथा पितामहने महेश्वरको प्रणामकर उनके मुखकी ओर देखते हुए कहा—देव! यदि प्रीति उत्पन्न हुई है और यदि आप हम दोनोंको वर देना चाहते हैं तो (यह वर दें कि) हम दोनोंकी आप महेश्वरमें नित्य भक्ति बनी रहे। तब उन प्रसन्न हुए परम ईश्वर भगवान् ईश महादेवने प्रसन्न मनसे हँसते हुए मुझसे कहा— ॥ ९४-९६ ॥
### देव उवाच<br>प्रलयस्थितिसर्गाणां कर्ता त्वं धरणीपते ।<br>वत्स वत्स हरे विश्वं पालयैतच्चराचरम् ॥ ९७ ॥<br>त्रिधा भिन्नोऽस्म्यहं विष्णो ब्रह्मविष्णुहराख्यया ।<br>सर्गक्षालयगुणैर्निर्गुणोऽपि निरञ्जनः ॥ ९८ ॥<br>सम्मोहं त्यज भो विष्णो पालयैनं पितामहम् ।<br>भविष्यत्येष भगवांस्तव पुत्रः सनातनः ॥ ९९ ॥**देव बोले—**धरणीपते! वत्स हरि! तुम सृष्टि, पालन और प्रलयके कर्ता हो। इस चराचर विश्वका पालन करो। हे विष्णो! मैं निर्गुण तथा निरञ्जन होते हुए भी सृष्टि, रक्षा तथा प्रलयके लिये अपेक्षित गुणोंके द्वारा ब्रह्मा, विष्णु तथा हर नामसे तीन रूपोंमें विभक्त हूँ। विष्णो ! मोहका परित्याग करो, इन पितामहका पालन करो। ये सनातन भगवान् आपके पुत्र होंगे ॥ ९७-९९ ॥
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