भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय २५ *१६९
निमेषमात्रेण स मां प्राप्तो योगविदां वरः।<br>व्याजहार स्वयं ब्रह्मा स्मयमानो महाद्युतिः॥ ७१ ॥स्तुत हो रहे काञ्चनके समान आभावाले महायोगी चतुर्मुख देव पुरुषको देखा। क्षणभरमें ही वे योगज्ञानियोंमें श्रेष्ठ, महाद्युति ब्रह्मा मुसकराते हुए स्वयं मेरे पास आये और कहने लगे- ॥ ६७-७१ ॥
कस्त्वं कुतो वा किं चेह तिष्ठसे वद मे प्रभो।<br>अहं कर्ता हि लोकानां स्वयम्भूः प्रपितामहः॥ ७२ ॥प्रभो! मुझे बतलायें कि आप कौन हैं, कहाँसे आये हैं और किस कारणसे यहाँ स्थित हैं। मैं लोकोंका निर्माण करनेवाला स्वयम्भू प्रपितामह (ब्रह्मा) हूँ। उन ब्रह्माके द्वारा ऐसा कहे जानेपर मैंने उनसे (ब्रह्मासे) कहा-मैं पुनः-पुनः लोकोंकी सृष्टि करनेवाला हूँ और मैं ही संहार करनेवाला हूँ। परमेष्ठीकी मायाके कारण इस प्रकारका विवाद बढ़नेपर (हम लोगोंको) यथार्थ स्थितिका ज्ञान करानेके लिये (उस समय) शिवरूप परम लिङ्ग प्रादुर्भूत हुआ। वह लिङ्ग प्रलय-कालीन अग्निके समान अनेक ज्वालामालाओंसे व्याप्त, क्षय एवं वृद्धिसे मुक्त और आदि, मध्य तथा अन्तसे रहित था॥ ७२-७५ ॥
एवमुक्तस्तदा तेन ब्राह्मणामहुवाच ह।<br>अहं कर्तास्मि लोकानां संहर्ता च पुनः पुनः॥ ७३ ॥
एवं विवादे वितते मायया परमेष्ठिनः।<br>प्रबोधार्थं परं लिङ्गं प्रादुर्भूतं शिवात्मकम्॥ ७४ ॥
कालानलसमप्रख्यं ज्वालामालासमाकुलम्।<br>क्षयवृद्धिविनिर्मुक्तमादिमध्यान्तवर्जितम् ॥ ७५ ॥
ततो मामाह भगवानधो गच्छ त्वमाशु वै।<br>अन्तमस्य विजानीम ऊर्ध्वं गच्छेऽहमित्यजः॥ ७६ ॥तब भगवान् शंकरने मुझसे कहा-तुम शीघ्र ही (इस लिङ्गके) नीचेकी ओर जाओ और इसके अन्तका पता लगाओ और ये अजन्मा ब्रह्मा (इसके) ऊपरकी ओर जायें। तदनन्तर शीघ्र ही प्रतिज्ञा करके हम दोनों ऊपर तथा नीचेकी ओर गये, किंतु पितामह तथा मैं सैकड़ों वर्षोंमें भी उसका अन्त नहीं जान सके। तदनन्तर त्रिशूलधारी देवकी मायासे मोहित, भयभीत एवं आश्चर्यचकित हम दोनों उन विश्वरूप ईश्वरका ध्यान करने लगे और परमपद महानाद ओंकारका उच्चारण करते हुए नम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर श्रेष्ठ शम्भुकी स्तुति करने लगे- ॥ ७६-७९ ॥
तदाशु समयं कृत्वा गतावूर्ध्वमधश्च द्वौ।<br>पितामहोऽप्यहं नान्तं ज्ञातवन्तौ समाः शतम्॥ ७७॥
ततो विस्मयमापन्नौ भीतौ देवस्य शूलिनः।<br>मायया मोहितौ तस्य ध्यायन्तौ विश्वमीश्वरम्॥ ७८ ॥
प्रोच्चरन्तौ महानादमोङ्कारं परमं पदम्।<br>प्रह्लाञ्जलिपुटोपेतौ शम्भुं तुष्टुवतुः परम्॥ ७९ ॥
ब्रह्मविष्णू ऊचतुः**ब्रह्मा तथा विष्णुने कहा-**विविध अनादि विकारोंसे मुक्त संसाररूपी रोगके अनादि वैद्यस्वरूप शम्भु, शिव, शान्त, लिङ्गमूर्तिवाले ब्रह्माको नमस्कार है। प्रलयकालीन समुद्रमें स्थित रहनेवाले, सृष्टि और प्रलयके कारणरूप शिव, शान्त, लिङ्गमूर्तिधारी ब्रह्मको नमस्कार है। ज्वालामालाओंसे घिरे हुए शरीरवाले, प्रज्वलित स्तम्भरूप शिव, शान्त, लिङ्गमूर्तिवाले ब्रह्मको नमस्कार है। आदि, मध्य और अन्तसे रहित स्वभावतः निर्मल तेजोरूप शिव, शान्त तथा लिङ्गरूपी मूर्तिको धारण करनेवाले ब्रह्मको नमस्कार है॥ ८०-८३ ॥
अनादिमलसंसाररोगवैद्याय शम्भवे।<br>नमः शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिङ्गमूर्तये॥ ८० ॥
प्रलयार्णवसंस्थाय प्रलयोद्भूतिहेतवे।<br>नमः शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिङ्गमूर्तये॥ ८१ ॥
ज्वालामालावृताङ्गाय ज्वलनस्तम्भरूपिणे।<br>नमः शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिङ्गमूर्तये॥ ८२ ॥
आदिमध्यान्तहीनाय स्वभावामलदीप्तये।<br>नमः शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिङ्गमूर्तये॥ ८३ ॥