संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
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| १६८ | * कूर्मपुराण * |
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| योऽहं तल्लिङ्गमित्याहुर्वेदवादविदो जनाः।<br>ततोऽहमात्ममीशानं पूजयाम्यात्मनैव तु ॥ ५९ ॥<br><br>तस्यैव परमा मूर्तिस्तन्मयोऽहं न संशयः।<br>नावयोर्विद्यते भेदो वेदेष्वेवं विनिश्चयः ॥ ६० ॥<br><br>एष देवो महादेवः सदा संसारभीरुभिः।<br>ध्येयः पूज्यश्च वन्द्यश्च ज्ञेयो लिङ्गे महेश्वरः ॥ ६१ ॥ | वैदिक सिद्धान्तोंको जाननेवाले लोग इस लिङ्गको मेरा ही स्वरूप कहते हैं। इसीलिये मैं स्वयमेव आत्मस्वरूप ईशानका पूजन करता हूँ। मैं उन्हीं (शंकर)-की परम मूर्ति हूँ, मैं शिवस्वरूप ही हूँ, इसमें कोई संदेह नहीं। वेदोंमें ऐसा ही निश्चय किया गया है कि हम दोनोंमें कोई भेद विद्यमान नहीं है। संसारसे भयभीत लोगोंको इन देव महादेवका सदा ध्यान, पूजन और वन्दन करना चाहिये तथा लिङ्गमें महेश्वरको सदा प्रतिष्ठित समझना चाहिये॥ ५९—६१॥ |
| मार्कण्डेय उवाच<br>किं तल्लिङ्गं सुरश्रेष्ठ लिङ्गे सम्पूज्यते च कः।<br>ब्रूहि कृष्ण विशालाक्ष गहनं ह्येतदुत्तमम् ॥ ६२ ॥ | श्रीमार्कण्डेयजीने पूछा—विशाल नेत्रोंवाले देवश्रेष्ठ कृष्ण! आप इस गूढ़ एवं श्रेष्ठ विषयको बतलायें कि लिङ्ग क्या है और लिङ्गमें किसकी पूजा होती है? ॥ ६२ ॥ |
| श्रीभगवानुवाच<br>अव्यक्तं लिङ्गमित्याहुरानन्दं ज्योतिरक्षरम्।<br>वेदा महेश्वरं देवमाहुर्लिङ्गिनमव्ययम् ॥ ६३ ॥<br><br>पुरा चैकार्णवे घोरे नष्टे स्थावरजङ्गमे।<br>प्रबोधार्थं ब्रह्मणो मे प्रादुर्भूतः स्वयं शिवः ॥ ६४ ॥<br><br>तस्मात् कालात् समारभ्य ब्रह्मा चाहं सदैव हि।<br>पूजयावो महादेवं लोकानां हितकाम्यया ॥ ६५ ॥ | श्रीभगवान्ने कहा—ज्योतिःस्वरूप, अक्षर, अव्यक्त आनन्दको लिङ्ग* कहा गया है और वेद महेश्वरदेवको अव्यय तथा लिङ्ग धारण करनेवाला कहते हैं। प्राचीन कालमें जब सर्वत्र जल-ही-जल एकार्णव हो गया और स्थावर-जङ्गम सब नष्ट हो गया, तब ब्रह्मा तथा मुझे प्रबोधित करनेके लिये उसी एकार्णवमें शिवका प्रादुर्भाव हुआ। उसी समयसे लोकोंके कल्याणकी कामनासे ब्रह्मा तथा मैं दोनों ही सदा महादेवकी पूजा करते हैं॥ ६३—६५॥ |
| मार्कण्डेय उवाच<br>कथं लिङ्गमभूत् पूर्वमैश्वरं परमं पदम्।<br>प्रबोधार्थं स्वयं कृष्ण वक्तुमर्हसि साम्प्रतम् ॥ ६६ ॥ | श्रीमार्कण्डेयजी बोले—श्रीकृष्ण! अब आप यह बतलायें कि पूर्वकालमें आप लोगोंको ज्ञान देनेके लिये वह ईश्वरका परम पदरूप लिङ्ग किस प्रकार स्वयं प्रकट हुआ॥ ६६॥ |
| श्रीभगवानुवाच<br>आसीदेकार्णवं घोरमविभागं तमोमयम्।<br>मध्ये चैकार्णवे तस्मिन् शङ्खचक्रगदाधरः ॥ ६७ ॥<br><br>सहस्रशीर्षा भूत्वाहं सहस्राक्षः सहस्रपात्।<br>सहस्रबाहुर्युक्तात्मा शयितोऽहं सनातनः ॥ ६८ ॥<br><br>एतस्मिन्नन्तरे दूरात् पश्यामि ह्यमितप्रभम्।<br>कोटिसूर्यप्रतीकाशं भ्राजमानं श्रियावृतम् ॥ ६९ ॥<br><br>चतुर्वक्त्रं महायोगिन् पुरुषं काञ्चनप्रभम्।<br>कृष्णाजिनधरं देवमृग्यजुःसामभिः स्तुतम् ॥ ७० ॥ | श्रीभगवान्ने कहा—(प्रलयकालमें) विभाग-रहित, तमोमय भयंकर एकमात्र समुद्र (एकार्णव) ही था। उस एकार्णवके मध्यभागमें शंख, चक्र, गदा धारण करनेवाला युक्तात्मा सनातन मैं हजारों सिर, हजारों आँख, हजारों चरण, हजारों बाहुवाला होकर शयन कर रहा था। इसी बीच मैंने दूर स्थित अमित प्रभाववाले, करोड़ों सूर्यके समान प्रकाशमान, शोभासम्पन्न, कृष्णमृगका चर्म धारण किये हुए, ऋक्, यजुः तथा सामवेदद्वारा स्तुत... |
* लिङ्गका अर्थ है कारण। यहाँ प्रसंगानुसार लिङ्गका अर्थ मूल कारण है। मूल कारण परमेश्वर ही हैं। वे ज्योतिःस्वरूप अक्षर एवं आनन्दस्वरूप हैं, इसीलिये यहाँ लिङ्गको ज्योतिःस्वरूप, आनन्दरूप कहा है।