संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय २५ * | १६७ |
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| सम्पूज्य तानृषिगणान् प्रणामेन महाभुजः ।<br>विसर्जयामास हरिर्दत्त्वा तदभिवाञ्छितान् ॥ ४५ ॥ | लम्बी भुजाओंवाले हरिने प्रणामके द्वारा उन ऋषिगणोंकी पूजा करके और उनके मनोरथोंको प्रदान करके उन्हें विदा किया ॥ ४५ ॥ | | तदा मध्याह्नसमये देवदेवः स्वयं हरिः।<br>स्नात्वा शुक्लाम्बरो भानुमुपातिष्ठत् कृताञ्जलिः ॥ ४६ ॥ | तदनन्तर मध्याह्नकालमें स्वयं देवाधिदेव हरिने स्नानकर शुक्ल वस्त्र धारण किये और हाथ जोड़कर सूर्यकी आराधना की। दिवाकर सूर्यकी ओर देखते हुए उन्होंने | | जजाप जाप्यं विधिवत् प्रेक्षमाणो दिवाकरम् ।<br>तर्पयामास देवेशो देवान् मुनिगणान् पितॄन् ॥ ४७ ॥ | विधिपूर्वक मन्त्रोंका जप किया। उन देवेश्वरने देवताओं, मुनिगणों और पितरोंका तर्पण किया ॥ ४६-४७ ॥ | | प्रविश्य देवभवनं मार्कण्डेयेन चैव हि।<br>पूजयामास लिङ्गस्थं भूतेशं भूतिभूषणम् ॥ ४८ ॥ | (मुनि) मार्कण्डेयके साथ देवमन्दिरमें प्रवेशकर उन्होंने लिङ्गमें प्रतिष्ठित भस्मविभूषित भूतेश्वर (श्रीशंकर)-की पूजा की। मनुष्योंके नियामक उन्होंने स्वयं सभी | | समाप्य नियमं सर्वं नियन्तासौ नृणां स्वयम् ।<br>भोजयित्वा मुनिवरं ब्राह्मणानभिपूज्य च ॥ ४९ ॥ | नियमोंको पूर्णकर ब्राह्मणोंकी पूजा की और मुनीश्वर (मार्कण्डेय)-को भोजन कराया। विप्रेन्द्रो! तदुपरान्त | | कृत्वात्मयोगं विप्रेन्द्रा मार्कण्डेयेन चाच्युतः ।<br>कथाः पौराणिकीः पुण्याश्चक्रे पुत्रादिभिर्वृतः ॥ ५० ॥ | पुत्रों आदिसे घिरे हुए अच्युतने आत्मनिष्ठ होकर मार्कण्डेयजीसे पुराणोंकी पुण्यदायिनी कथाको सुना। | | अथैतत् सर्वमखिलं दृष्ट्वा कर्म महामुनिः ।<br>मार्कण्डेयो हसन् कृष्णं बभाषे मधुरं वचः ॥ ५१ ॥ | इन सारे कर्मोंको देखकर महामुनि मार्कण्डेयने श्रीकृष्णसे हँसते हुए मधुर वचन कहा— ॥ ४८-५१ ॥ | | मार्कण्डेय उवाच | मार्कण्डेयजी बोले—(देव!) कर्मोंद्वारा आपकी | | कः समाराध्यते देवो भवता कर्मभिः शुभैः ।<br>ब्रूहि त्वं कर्मभिः पूज्यो योगिनां ध्येय एव च ॥ ५२ ॥ | ही पूजा की जाती है और योगियोंके ध्येय भी आप ही हैं, फिर आप शुभ कर्मोंके द्वारा किस देवताकी आराधना कर रहे हैं, यह मुझे बतलायें। आप ही वे | | त्वं हि तत् परमं ब्रह्म निर्वाणममलं पदम् ।<br>भारावतरणार्थाय जातो वृष्णिकुले प्रभुः ॥ ५३ ॥ | परम ब्रह्म हैं, निर्वाणरूप हैं और निर्मल पद हैं। (पृथ्विका) भार उतारनेके लिये आप प्रभु ही वृष्णिकुलमें अवतरित हुए हैं। सभी पुत्रोंके सुनते हुए ही | | तमब्रवीन्महाबाहुः कृष्णो ब्रह्मविदां वरः ।<br>शृण्वतामेव पुत्राणां सर्वेषां प्रहसन्निव ॥ ५४ ॥ | ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ महाबाहु कृष्णने उनसे (मार्कण्डेयजीसे) हँसते हुए कहा— ॥ ५२-५४ ॥ | | श्रीभगवानुवाच | **श्रीभगवान्ने कहा—**आपने जो कुछ भी कहा, सब | | भवता कथितं सर्वं तथ्यमेव न संशयः ।<br>तथापि देवमीशानं पूजयामि सनातनम् ॥ ५५ ॥ | सत्य ही कहा है, इसमें संशय नहीं है तथापि मैं सनातनदेव ईशान (शंकर)-की पूजा करता हूँ। विप्र! मुझे न तो | | न मे विप्रास्ति कर्तव्यं नानवाप्तं कथञ्चन ।<br>पूजयामि तथापीशं जानन्नेतत् परं शिवम् ॥ ५६ ॥ | कुछ करना है और न मुझे कुछ अप्राप्त है, फिर भी यह जानते हुए भी मैं परम शिव ईशकी पूजा करता हूँ। मायासे | | न वै पश्यन्ति तं देवं मायया मोहिता जनाः ।<br>ततोऽहं स्वात्मनो मूलं ज्ञापयन् पूजयामि तम् ॥ ५७ ॥ | मोहित लोग उन देव (शंकर)-का साक्षात्कार नहीं कर पाते। परंतु मैं अपने मूलका* परिचय देते हुए उनकी पूजा करता हूँ। इस संसारमें लिङ्गार्चनसे अधिक कोई | | न च लिङ्गार्चनात् पुण्यं लोकेऽस्मिन् भीतिनाशनम् ।<br>तथा लिङ्गे हितायैषां लोकानां पूजयेच्छिवम् ॥ ५८ ॥ | पुण्य और भयका नाश करनेवाला (कर्म) नहीं है। अतः इन लोकों (प्राणिमात्र)-के कल्याणके लिये लिङ्गमें शिवकी पूजा करनी चाहिये ॥ ५५-५८ ॥ |
* मेरे भी मूल (सर्वाधिष्ठान) महादेव शंकर ही हैं—यह सबको बतानेके लिये मैं लिङ्गस्वरूप भगवान् शंकरकी पूजा करता हूँ।