संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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प्रणम्य दण्डवद् भूमौ सुपर्णः शंकरं शिवम्। निवेदयामास हरेः प्रवृत्तिं द्वारके पुरे॥ २९॥
ततः प्रणम्य शिरसा शंकरं नीललोहितम्। आजगाम पुरीं कृष्णः सोऽनुज्ञातो हरेण तु॥ ३०॥
आरुह्य कश्यपसुतं स्त्रीगणैरभिपूजितः। वचोभिरमृतास्वादैर्मानितो मधुसूदनः॥ ३१॥
वीक्ष्य यान्तममित्रघ्नं गन्धर्वाप्सरसां वराः। अन्वगच्छन् महायोगिन् शङ्खचक्रगदाधरम्॥ ३२॥
विसर्जयित्वा विश्वात्मा सर्वा एवाङ्गना हरिः। ययौ स तूर्णं गोविन्दो दिव्यां द्वारवतीं पुरीम्॥ ३३॥
गते मुररिपौ नैव कामिन्यो मुनिपुङ्गवाः। निशेव चन्द्ररहिता विना तेन चकाशिरे॥ ३४॥
श्रुत्वा पौरजनास्तूर्णं कृष्णागमनमुत्तमम्। मण्डयाञ्चक्रिरे दिव्यां पुरीं द्वारवतीं शुभाम्॥ ३५॥
पताकाभिर्विशालाभिर्ध्वजै रत्नपरिष्कृतैः। लाजादिभिः पुरीं रम्यां भूषयाञ्चक्रिरे तदा॥ ३६॥
अवादयन्त विविधान् वादित्रान् मधुरस्वनान्। शङ्खान् सहस्त्रशो दध्मुर्वीणावादान् वितेनिरे॥ ३७॥
प्रविष्टमात्रे गोविन्दे पुरीं द्वारवतीं शुभाम्। अगायन् मधुरं गानं स्त्रियो यौवनशालिनः॥ ३८॥
दृष्ट्वा ननृतुरीशानं स्थिताः प्रासादमूर्धसु। मुमुचुः पुष्पवर्षाणि वसुदेवसुतोपरि॥ ३९॥
प्रविश्य भवनं कृष्ण आशीर्वादाभिवर्धितः। वरासने महायोगी भाति देवीभिरन्वितः॥ ४०॥
सुरम्ये मण्डपे शुभ्रे शङ्खाद्यैः परिवारितः। आत्मजैरभितो मुख्यैः स्त्रीसहस्त्रैश्च संवृतः॥ ४१॥
तत्रासनवरे रम्ये जाम्बवत्या सहाच्युतः। भ्राजते मालया देवो यथा देव्या समन्वितः॥ ४२॥
आजग्मुर्देवगन्धर्वा द्रष्टुं लोकादिमव्ययम्। महर्षयः पूर्वजाता मार्कण्डेयादयो द्विजाः॥ ४३॥
ततः स भगवान् कृष्णो मार्कण्डेयं समागतम्। ननामोत्थाय शिरसा स्वासनं च ददौ हरिः॥ ४४॥
गरुडने कल्याणकारी शंकरको भूमिपर दण्डवत् प्रणाम किया और द्वारकापुरीका समाचार हरिसे निवेदन किया। तदनन्तर नीललोहित शंकरको विनयपूर्वक प्रणामकर और उन हरकी आज्ञा प्राप्तकर स्त्रीसमूहोंद्वारा पूजित और अमृतके समान मधुर स्वादुयुक्त वचनोंसे सत्कृत वे मधुसूदन श्रीकृष्ण कश्यपपुत्र गरुडपर आरूढ होकर अपनी पुरीको चले। शंख, चक्र तथा गदाधारी शत्रुहन्ता महायोगीको जाते हुए देखकर गन्धर्व तथा श्रेष्ठ अप्सराओंने उनका अनुगमन किया। विश्वात्मा गोविन्द हरि उन सभी अङ्गनाओंको विदाकर शीघ्र ही उस दिव्य पुरी द्वारवतीको गये॥ २९–३३॥
मुनिश्रेष्ठो! उन मुरारिके चले जानेपर वे कामिनियाँ चन्द्रमारहित रात्रिके समान शोभाहीन हो गयीं। पुरवासियोंने श्रीकृष्णके आगमनके शुभ समाचारको सुनकर शीघ्र दिव्य एवं मङ्गलमयी द्वारवती पुरीको सुसज्जित किया। श्रीकृष्णके आगमनसे अति प्रसन्न द्वारकावासियोंने विशाल पताकाओं और रत्नोंसे जटित ध्वजों तथा लाजा आदि माङ्गलिक वस्तुओंसे सुन्दर पुरीको सजा दिया। मधुर स्वरवाले विविध वाद्यों, हजारों शंखों तथा वीणाओंको वे लोग बजाने लगे। गोविन्दके शुभपुरी द्वारवतीमें प्रवेश करते ही युवती स्त्रियाँ मधुर स्वरमें गान करने लगीं। उन ईशान (कृष्ण)-को देखकर वे नृत्य करने लगीं और महलोंके ऊपर स्थित स्त्रियाँ वसुदेवपुत्र श्रीकृष्णके ऊपर फूल बरसाने लगीं॥ ३४–३९॥
भवनमें प्रवेशकर महायोगी कृष्ण आशीर्वादोंसे अभिनन्दित होते हुए अत्यन्त रमणीय शुक्लवर्णके मण्डपमें स्थित एक श्रेष्ठ आसनपर अपनी पत्नियोंके साथ सुशोभित हुए। वे चारों ओरसे शङ्ख आदि प्रमुख पुत्रों तथा हजारों स्त्रियोंसे घिरे हुए थे॥ ४०-४१॥
वैजयन्ती मालासे विभूषित उस रमणीय श्रेष्ठ आसनपर अच्युत श्रीकृष्ण जाम्बवतीके साथ उसी प्रकार सुशोभित हुए जैसे देवी उमाके साथ महादेव। ब्राह्मणो! उन अव्यय तथा लोकोंके आदि कारण (श्रीकृष्ण)-का दर्शन करनेके लिये देवता, गन्धर्व और पूर्वज मार्कण्डेय आदि महर्षि वहाँ आये। तब उन भगवान् श्रीकृष्ण हरिने मार्कण्डेयजीको आया देखकर आसनसे उठकर विनयपूर्वक प्रणाम किया और उन्हें आसन दिया॥ ४२-४४॥