भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 175
* अध्याय २५ *१६५
काश्चिद् भूषणवर्याणि स्वाङ्गादादाय सादरम्।<br>भूषयाञ्चक्रिरे कृष्णं कामिन्यो लोकभूषणम्॥ १२॥<br><br>काश्चिद् भूषणवर्याणि समादाय तदङ्गतः।<br>स्वात्मानं भूषयामासुः स्वात्मगैरपि माधवम्॥ १३॥<br><br>काश्चिदागत्य कृष्णस्य समीपं काममोहिताः।<br>चुचुम्बुर्वदनाम्भोजं हरेर्मुग्धमृगेक्षणाः॥ १४॥<br><br>प्रगृह्य काश्चिद् गोविन्दं करेण भवनं स्वकम्।<br>प्रापयामासुर्लोकादिं मायया तस्य मोहिताः॥ १५॥<br><br>तासां स भगवान् कृष्णः कामान् कमलोचनः।<br>बहूनि कृत्वा रूपाणि पूरयामास लीलया॥ १६॥<br><br>एवं वै सुचिरं कालं देवदेवपुरे हरिः।<br>रेमे नारायणः श्रीमान् मायया मोहयज्जगत्॥ १७॥<br><br>गते बहुतिथे काले द्वारवत्यां निवासिनः।<br>बभूवुर्विह्वला भीता गोविन्दविरहे जनाः॥ १८॥<br><br>ततः सुपर्णो बलवान् पूर्वमेव विसर्जितः।<br>कृष्णेन मार्गमाणस्तं हिमवन्तं ययौ गिरिम्॥ १९॥<br><br>अदृष्ट्वा तत्र गोविन्दं प्रणम्य शिरसा मुनिम्।<br>आजगामोपमन्युं तं पुरीं द्वारवतीं पुनः॥ २०॥<br><br>तदन्तरे महादैत्या राक्षसाश्चातिभीषणाः।<br>आजग्मुर्द्वारकां शुभ्रां भीषयन्तः सहस्रशः॥ २१॥<br><br>स तान् सुपर्णो बलवान् कृष्णतुल्यपराक्रमः।<br>हत्वा युद्धेन महता रक्षति स्म पुरीं शुभाम्॥ २२॥<br><br>एतस्मिन्नेव काले तु नारदो भगवानृषिः।<br>दृष्ट्वा कैलासशिखरे कृष्णं द्वारवतीं गतः॥ २३॥<br><br>तं दृष्ट्वा नारदमृषिं सर्वे तत्र निवासिनः।<br>प्रोचुर्नारायणो नाथः कुत्रास्ते भगवान् हरिः॥ २४॥<br><br>स तानुवाच भगवान् कैलासशिखरे हरिः।<br>रमतेऽद्य महायोगिन् तं दृष्ट्वाहमिहागतः॥ २५॥<br><br>तस्योपश्रुत्य वचनं सुपर्णः पततां वरः।<br>जगामाकाशगो विप्राः कैलासं गिरिमुत्तमम्॥ २६॥<br><br>ददर्श देवकीसूनुं भवने रत्नमण्डिते।<br>वरासनस्थं गोविन्दं देवदेवान्तिके हरिम्॥ २७॥<br><br>उपास्यमानममरैर्दिव्यस्त्रीभिः समन्ततः।<br>महादेवगणैः सिद्धैर्योगिभिः परिवारितम्॥ २८॥कुछ कामिनियाँ (कन्याएँ) अपने अङ्गोंसे श्रेष्ठ आभूषणोंको उतारकर उनसे लोकभूषण कृष्णको आदरपूर्वक आभूषित करने लगीं। कुछ उनके अङ्गोंसे श्रेष्ठ आभूषणोंको लेकर अपनेको तथा अपने आभूषणोंसे माधवको सजाने लगीं। कतिपय मुग्ध मृगके समान नयनोंवाली काम-मोहित (कन्याएँ) हरि कृष्णके समीपमें जाकर उनके मुखकमलका स्पर्श करने लगीं। उनकी मायासे मोहित कुछ अप्सराएँ लोकोंके आदि कारण गोविन्दका हाथ पकड़कर उन्हें अपने भवनमें ले गयीं॥ १२-१५॥<br><br>उन कमललोचन भगवान् श्रीकृष्णने बहुतसे रूप धारणकर लीलापूर्वक उनकी अभीष्ट कामनाओंकी पूर्ति की। इस प्रकार श्रीमान् नारायण हरिने संसारको (अपनी) मायासे मोहित करते हुए देवाधिदेव शंकरके नगरमें बहुत समयतक रमण किया॥ १६-१७॥<br><br>बहुत दिन व्यतीत होनेपर द्वारिकापुरीके रहनेवाले लोग गोविन्दके विरहमें भयभीत एवं विह्वल हो गये। तब पहले कृष्णद्वारा छोड़ दिये गये बलवान् गरुड उनको ढूँढ़ते हुए उस हिमालय पर्वतपर गये। वहाँ गोविन्दको न देखकर उन उपमन्युको विनयपूर्वक प्रणामकर पुनः द्वारवतीपुरीमें लौट आये। इसी बीच अत्यन्त भयंकर हजारों महादैत्य तथा राक्षस भय उत्पन्न करते हुए सुन्दर द्वारकामें आ पहुँचे। कृष्णके समान पराक्रमवाले बलवान् सुपर्ण (गरुड)-ने महान् युद्धद्वारा उन्हें मारकर उस शुभ पुरीकी रक्षा की॥ १८-२२॥<br><br>इसी समय भगवान् नारद ऋषि कैलास शिखरपर श्रीकृष्णका दर्शनकर द्वारकापुरीमें गये। उन नारद ऋषिको देखकर वहाँ (द्वारकामें) निवास करनेवाले सभीने पूछा—'नारायण, नाथ, भगवान् हरि कहाँ हैं?' उन्होंने (नारदने) उनसे कहा कि भगवान् हरि कैलास शिखरपर रमण कर रहे हैं, मैं उन महायोगीको देखकर आज यहाँ आया हूँ॥ २३-२५॥<br><br>विप्रो! उनका वचन सुनकर आकाशमें चलनेवाले पक्षियोंमें श्रेष्ठ वे गरुड श्रेष्ठ पर्वत कैलासपर गये। उन्होंने देवकीपुत्र गोविन्द हरिको देवाधिदेव (शंकर)-के समीप रत्नमण्डित भवनमें एक श्रेष्ठ आसनपर विराजमान देखा। (वहाँ) देवता, दिव्य स्त्रियाँ, महादेवके गण, सिद्ध तथा योगीजन चारों ओरसे घेरकर उनकी उपासना कर रहे थे॥ २६-२८॥