संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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१६४ | * कूर्मपुराण *
पचीसवाँ अध्याय
श्रीकृष्णका कैलास पर्वतपर विहार करना, श्रीकृष्णको द्वारका बुलानेके लिये गरुडका कैलासपर जाना, श्रीकृष्णका द्वारका-आगमन, द्वारकामें श्रीकृष्णका स्वागत तथा उनका दर्शन करनेके लिये देवताओं तथा मार्कण्डेय आदि मुनियोंका आना, कृष्णके द्वारा महर्षि मार्कण्डेयको शिव-तत्त्व तथा लिङ्ग-तत्त्वका माहात्म्य बतलाना तथा स्वयं शिवका पूजन करना, ब्रह्मा-विष्णुद्वारा शिवके महालिङ्गका दर्शन तथा लिङ्गस्तुति, लिङ्गार्चनका प्रवर्तन
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
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| प्रविश्य मेरुशिखरं कैलासं कनकप्रभम्।<br>रराम भगवान् सोमः केशवेन महेश्वरः॥ १ ॥ | मेरु शिखरके स्वर्णिम कैलास पर्वतपर पहुँचकर महेश्वर भगवान् शंकर केशव (श्रीकृष्ण)-के साथ विहार करने लगे। कैलास पर्वतपर निवास करनेवालोंने उन देवाधिदेव, अच्युत, महात्मा श्रीकृष्णको देखकर उनकी पूजा की। उन्होंने चार भुजावाले, उदार अङ्गोंवाले, प्रलयकालीन मेघके समान प्रभाववाले, मुकुटधारी, हाथमें धनुष धारण किये, श्रीवत्ससे सुशोभित वक्षःस्थलवाले, दीर्घ भुजावाले, विशाल नेत्रोंवाले, पीताम्बर धारण किये, वक्षःस्थलपर उत्तम वैजयन्तीकी माला धारण किये, शोभासे सुशोभित दिव्य अति कोमल, युवावस्थावाले, कमल (वर्ण)-के समान (रक्त) चरण एवं नेत्रवाले, अत्यन्त सुन्दर, मुसकराते हुए अच्छी गति प्रदान करनेवाले अच्युत (श्रीकृष्ण)-की पूजा की॥ १-५॥ |
| अपश्यंस्तं महात्मानं कैलासगिरिवासिनः।<br>पूजयाञ्चक्रिरे कृष्णं देवदेवमथाच्युतम्॥ २ ॥ | |
| चतुर्बाहुमुदाराङ्गं कालमेघसमप्रभम्।<br>किरीटिनं शार्ङ्गपाणिं श्रीवत्साङ्कितवक्षसम्॥ ३ ॥ | |
| दीर्घबाहुं विशालाक्षं पीतवाससमच्युतम्।<br>दधानमुरसा मालां वैजयन्तीमनुत्तमाम्॥ ४ ॥ | |
| भ्राजमानं श्रिया दिव्यं युवानमतिकोमलम्।<br>पद्माङ्घ्रिनयनं चारु सुस्मितं सुगतिप्रदम्॥ ५ ॥ | |
| कदाचित् तत्र लीलार्थं देवकीनन्दवर्धनः।<br>भ्राजमानः श्रिया कृष्णश्चचार गिरिकन्दरे॥ ६ ॥ | वहाँ किसी समय माता देवकीके आनन्दको बढ़ानेवाले शोभासम्पन्न श्रीकृष्ण लीलाके निमित्त कैलास पर्वतकी गुहामें विचरण करने लगे। सभी प्रमुख गन्धर्वों, अप्सराओं, नागकन्याओं, सिद्धों, यक्षों तथा गन्धर्वोंने वहाँ उन जगन्मय (श्रीकृष्ण)-को देखा और परम आश्चर्यचकित होकर वे आनन्दसे प्रफुल्लित नेत्रवाले हो गये तथा उन महात्माके मस्तकपर पुष्पोंकी वर्षा करने लगे। दिव्य गन्धर्वोंकी कन्याएँ तथा उसी प्रकार श्रेष्ठ अप्सराएँ कृष्णको देखकर अव्यवस्थित वस्त्राभूषणवाली होकर उनकी कामना करने लगीं। गायनमें पारंगत कुछ सुन्दरियाँ काममोहित होकर देवकीपुत्रकी ओर देखकर विविध प्रकारके गीत गाने लगीं॥ ६-१०॥ |
| गन्धर्वाप्सरसां मुख्या नागकन्याश्च कृत्स्नशः।<br>सिद्धा यक्षाश्च गन्धर्वास्तत्र तत्र जगन्मयम्॥ ७ ॥ | |
| दृष्ट्वाश्चर्यं परं गत्वा हर्षादुत्फुल्ललोचनाः।<br>मुमुचुः पुष्पवर्षाणि तस्य मूर्ध्नि महात्मनः॥ ८ ॥ | |
| गन्धर्वकन्यका दिव्यास्तद्वदप्सरसां वराः।<br>दृष्ट्वा चकमिरे कृष्णं स्रस्तवस्त्रविभूषणाः॥ ९ ॥ | |
| काश्चिद् गायन्ति विविधां गीतिं गीतविशारदाः।<br>सम्प्रेक्ष्य देवकीसूनुं सुन्दर्यः काममोहिताः॥ १०॥ | |
| काश्चिद्विलासबहुला नृत्यन्ति स्म तदग्रतः।<br>सम्प्रेक्ष्य संस्थिताः काश्चित् पपुस्तद्वदनामृतम्॥ ११ ॥ | कुछ अत्यन्त विलासप्रिय (कन्याएँ) उनके आगे नृत्य करने लगीं और कुछ वहीं स्थित होकर उनकी ओर देखकर उनके वदनामृतका पान करने लगीं॥ ११॥ |