संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- अध्याय २४ * १६३
किमर्थं पुण्डरीकाक्ष तपस्तप्तं त्वयाव्यय।
त्वमेव दाता सर्वेषां कामानां कामिनामिह ॥ ८० ॥
त्वं हि सा परमा मूर्त्तिर्मम नारायणाह्वया।
नानवाप्तं त्वया तात विद्यते पुरुषोत्तम ॥ ८१ ॥
वेत्थ नारायणानन्तमात्मानं परमेश्वरम्।
महादेवं महायोगं स्वेन योगेन केशव ॥ ८२ ॥
श्रुत्वा तद्वचनं कृष्णः प्रहसन् वै वृषध्वजम्।
उवाच वीक्ष्य विश्वेशं देवीं च हिमशैलजाम् ॥ ८३ ॥
ज्ञातं हि भवता सर्वं स्वेन योगेन शंकर।
इच्छाम्यात्मसमं पुत्रं त्वद्भक्तं देहि शंकर ॥ ८४ ॥
तथास्त्वित्याह विश्वात्मा प्रहृष्टमनसा हरः।
देवीमालोक्य गिरिजां केशवं परिषस्वजे ॥ ८५ ॥
ततः सा जगतां माता शंकरार्धशरीरिणी।
व्याजहार हृषीकेशं देवी हिमगिरीन्द्रजा ॥ ८६ ॥
वत्स जाने तवानन्तां निश्चलां सर्वदाच्युत।
अनन्यामीश्वरे भक्तिमात्मन्यपि च केशव ॥ ८७ ॥
त्वं हि नारायणः साक्षात् सर्वात्मा पुरुषोत्तमः।
प्रार्थितो दैवतैः पूर्वं संजातो देवकीसुतः ॥ ८८ ॥
पश्य त्वमात्मनात्मानमात्मीयममलं पदम्।
नावयोर्विद्यते भेद एकं पश्यन्ति सूरयः ॥ ८९ ॥
इमानिमान् वरानिष्टान् मत्तो गृह्णीष्व केशव।
सर्वज्ञत्वं तथैश्वर्यं ज्ञानं तत् पारमेश्वरम्।
ईश्वरे निश्चलां भक्तिमात्मन्यपि परं बलम् ॥ ९० ॥
एवमुक्तस्तया कृष्णो महादेव्या जनार्दनः।
आशिषं शिरसागृह्लाद् देवोऽप्याह महेश्वरः ॥ ९१ ॥
प्रगृह्य कृष्णं भगवानथेशः
करेण देव्या सह देवदेवः।
सम्पूज्यमानो मुनिभिः सुरैश्र्च-
र्जगाम कैलासगिरिं गिरीशः ॥ ९२ ॥
पुण्डरीकाक्ष! अव्यय! आपने तप क्यों किया है। (क्योंकि) आप ही कामना करनेवालोंकी सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं। आप ही मेरी नारायण नामवाली परम मूर्त्ति हैं। पुरुषोत्तम! तात! आपके लिये कुछ भी अप्राप्य नहीं है। केशव! अपने योगद्वारा आप अपनेको नारायण, अनन्त, परमेश्वर, महादेव और महायोगी जानें ॥ ८०-८२ ॥
उनका वह वचन सुनकर हँसते हुए श्रीकृष्णने विश्वेश्वर तथा हिमालय-पुत्री देवी पार्वतीकी ओर देखकर वृषध्वज शंकरसे कहा—प्रभो शंकर! आपको अपने योगद्वारा सब कुछ ज्ञात है। मैं अपने ही समान ऐसा पुत्र चाहता हूँ, जो आपका भक्त हो, श्रीशंकर! आप मुझे प्रदान करें। प्रसन्न-मन होकर विश्वात्मा हरने 'तथास्तु' ऐसा कहकर और देवी पार्वतीकी ओर देखकर केशवका आलिङ्गन किया ॥ ८३-८५ ॥
तदनन्तर शंकरके आधे शरीरमें स्थित, संसारकी माता हिमालय पर्वतकी पुत्री देवी (पार्वती) हृषीकेशसे बोलीं। अच्युत! केशव! वत्स! मैं ईश्वर (शंकर)-में तथा मुझमें भी सर्वदा रहनेवाली आपकी अनन्त, निश्चल और अनन्य भक्तिको जानती हूँ। आप ही साक्षात् नारायण और सर्वात्मा पुरुषोत्तम हैं। पूर्वकालमें देवताओंके द्वारा प्रार्थना किये जानेपर आप देवकीके पुत्रके रूपमें उत्पन्न हुए थे। आप अपने आत्मरूपको तथा अपने निर्मल पदको स्वयं देखें। हम दोनोंमें कोई भेद नहीं है। विद्वान् लोग (हम दोनोंको) एक रूपसे देखते हैं। केशव! आप इन अभीष्ट वरोंको मुझसे ग्रहण करें। आपको सर्वज्ञता, ऐश्वर्य, वह परमेश्वर-सम्बन्धी ज्ञान, शिवमें निश्चल भक्ति तथा अपनेमें श्रेष्ठ बल प्राप्त हो ॥ ८६-९० ॥
उन महादेवीके द्वारा ऐसा कहे जानेपर जनार्दन कृष्णने उनके (वररूपी) आशीर्वादको शिरोधार्य किया। देव महेश्वरने भी कृष्णसे ऐसा ही कहा अर्थात् आशीर्वाद प्रदान किया। तब देवताओं तथा मुनियोंसे पूजित होते हुए देवाधिदेव गिरीश भगवान् शंकर कृष्णका हाथ पकड़कर देवी पार्वतीके साथ कैलास पर्वतपर चले गये ॥ ९१-९२ ॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें चौबीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २४ ॥