संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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१६२ * कूर्मपुराण *
| नमो भैरवनादाय कालरूपाय दंष्ट्रिणे।<br>नागयज्ञोपवीताय नमस्ते वह्निरेतसे॥ ६८॥ | भयंकर नाद करनेवाले तथा दाढ़वाले कालस्वरूप आपको नमस्कार है। नागोंको यज्ञोपवीतके रूपमें धारण करनेवाले और अग्निस্বরূপ वीर्यवाले आपको नमस्कार है। गिरीश! आपको नमस्कार है, स्वाहाकार! आपको नमस्कार है, उन्मुक्त अट्टहास करनेवाले आपको नमस्कार है और भीमरूप आपको बार-बार नमस्कार है। कामदेवका विनाश करनेवाले आपको नमस्कार है, कालका मन्थन करनेवाले आपको नमस्कार है, भयानक वेष धारण करनेवाले आपको नमस्कार है और निषङ्ग (तरकस)-धारी हरको नमस्कार है॥ ६८–७०॥ |
| नमोऽस्तु ते गिरीशाय स्वाहाकाराय ते नमः।<br>नमो मुक्ताट्टहासाय भीमाय च नमो नमः॥ ६९॥ | |
| नमस्ते कामनाशाय नमः कालप्रमाथिने।<br>नमो भैरववेषाय हराय च निषङ्गिणे॥ ७०॥ | |
| नमोऽस्तु ते त्र्यम्बकाय नमस्ते कृत्तिवाससे।<br>नमोऽम्बिकाधिपतये पशूनां पतये नमः॥ ७१॥ | तीन आँखोंवाले आपको नमस्कार है, गजचर्म धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। अम्बिकाके स्वामीको नमस्कार है और पशुपतिको नमस्कार है। आकाशरूप आपको और आकाशके अधिपतिको नमस्कार है। नर और नारीका शरीर धारण करनेवाले अर्धनारीश्वर तथा सांख्य और योगका प्रवर्तन करनेवाले आपको नमस्कार है। देवताओंके स्वामी और देवताओंद्वारा आराधित लिङ्गवाले आपको नमस्कार है। कुमारके गुरु (कार्तिकेयके पिता) आपको तथा देवाधिदेव आपको नमस्कार है। यज्ञके अधिपतिको नमस्कार है, ब्रह्मचारीको नमस्कार है। महान् मृगव्याध तथा ब्रह्माधिपतिको नमस्कार है। हंसरूपको नमस्कार है, विश्वरूप तथा मोहित करनेवालेको बार-बार नमस्कार है। योगी, योगसे प्राप्त होने योग्य तथा योग ही जिनकी माया है ऐसे आपको नमस्कार है॥ ७१–७५॥ |
| नमस्ते व्योमरूपाय व्योमाधिपतये नमः।<br>नरनारीशरीराय सांख्ययोगप्रवर्तिने॥ ७२॥ | |
| नमो दैवतनाथाय देवानुगतलिङ्गिने।<br>कुमारगुरवे तुभ्यं देवदेवाय ते नमः॥ ७३॥ | |
| नमो यज्ञाधिपतये नमस्ते ब्रह्मचारिणे।<br>मृगव्याधाय महते ब्रह्माधिपतये नमः॥ ७४॥ | |
| नमो हंसाय विश्वाय मोहनाय नमो नमः।<br>योगिने योगगम्याय योगमायाय ते नमः॥ ७५॥ | |
| नमस्ते प्राणपालाय घण्टानादप्रियाय च।<br>कपालिने नमस्तुभ्यं ज्योतिषां पतये नमः॥ ७६॥ | प्राणोंका पालन करनेवाले (प्राणिमात्रके प्राणरक्षक) और घण्टानादप्रियको नमस्कार है। कपाली आपको नमस्कार है, नक्षत्रोंके स्वामीको नमस्कार है। आपको नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है, पुनः आपको बार-बार नमस्कार है। परमेश्वर! आप मेरी अभीष्ट इच्छाओंको सभी प्रकारसे मुझे प्रदान करें॥ ७६–७७॥ |
| नमो नमो नमस्तुभ्यं भूय एव नमो नमः।<br>मह्यं सर्वात्मना कामान् प्रयच्छ परमेश्वर॥ ७७॥ | |
| एवं हि भक्त्या देवेशमभिष्टूय स माधवः।<br>पपात पादयोर्विप्रा देवदेव्योः स दण्डवत्॥ ७८॥ | विप्रो! इस प्रकार वे माधव भक्तिपूर्वक देवेशकी स्तुतिकर देव और देवी अर्थात् शंकर-पार्वतीके चरणोंमें दण्डवत् गिर पड़े। मेघके समान गम्भीर ध्वनिवाले भगवान् शंकरने केशीको मारनेवाले कृष्णको उठाकर मधुर वचन कहा—॥ ७८–७९॥ |
| उत्थाप्य भगवान् सोमः कृष्णं केशिनिषूदनम्।<br>बभाषे मधुरं वाक्यं मेघगम्भीरनिःस्वनः॥ ७९॥ |