संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१२६ * कूर्मपुराण *
| प्रक्षाल्य चरणौ विष्णोर्बलिर्भावसमन्वितः।<br>आचामयित्वा भृङ्गारमादाय स्वर्णनिर्मितम्॥ ५१॥<br>दास्ये तवेदं भवते पदत्रयं<br>प्रीणातु देवो हरिरव्ययाकृतिः।<br>विचिन्त्य देवस्य कराग्रपल्लवे<br>निपातयामास जलं सुशीतलम्॥ ५२॥<br>विचक्रमे पृथिवीमेष एता-<br>मथान्तरिक्षं दिवमादिदेवः।<br>व्यपेतरागं दितिजेश्वरं तं<br>प्रकर्तुकामः शरणं प्रपन्नम्॥ ५३॥<br>आक्रम्य लोकत्रयमीशपादः<br>प्राजापत्याद् ब्रह्मलोकं जगाम।<br>प्रणेमुरादित्यसहस्रकल्पं<br>ये तत्र लोके निवसन्ति सिद्धाः॥ ५४॥ | बलिने भावपूर्वक विष्णुके दोनों चरणोंको धोकर स्वर्णनिर्मित भृङ्गार (टोंटीदार पात्र) लेकर उन्हें आचमन कराया और 'मैं आपको आपके ही तीन पगवाली (भूमि) देता हूँ, इससे अव्यय आकृतिवाले देव हरि प्रसन्न हों' ऐसा संकल्पकर उन देवके कराग्रपल्लवपर सुशीतल जल गिराया। शरणमें आये हुए उस दैत्यराजको आसक्तिरहित बनानेकी इच्छासे उन आदिदेवने पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्युलोकमें पाद-विक्षेप किया। तीनों लोकोंको आक्रान्तकर ईश्वरका चरण प्रजापतिके लोकसे ब्रह्मलोकमें पहुँचा। उस लोकमें निवास करनेवाले जो सिद्धजन थे, उन्होंने हजारों आदित्यके समान (प्रकाशमान) उस चरणको प्रणाम किया॥ ५१-५४॥ |
| अथोपतस्थे भगवाननादिः<br>पितामहस्तोषयामास विष्णुम्।<br>भित्त्वा तदण्डस्य कपालमूर्ध्वं<br>जगाम दिव्यावरणानि भूयः॥ ५५॥<br>अथाण्डभेदात्निपपात शीतलं<br>महाजलं तत् पुण्यकृद्भिश्च जुष्टम्।<br>प्रवर्तते चापि सरिद्वरा तदा<br>गङ्गेत्युक्ता ब्रह्मणा व्योमसंस्था॥ ५६॥ | तदनन्तर अनादि भगवान् पितामहने वहाँ उपस्थित होकर विष्णुको प्रसन्न किया। उस ब्रह्माण्डके ऊपरी कपालको भेदकर पुनः वह चरण दिव्य आवरणोंमें चला गया। उस अण्डका भेदन होनेसे पुण्य करनेवालोंद्वारा सेवित वह शीतल महाजल नीचे गिरा। तभीसे आकाशमें स्थित वह नदियोंमें श्रेष्ठ नदी प्रवर्तित हुई जिसे ब्रह्माने 'गङ्गा' नामसे अभिहित किया॥ ५५-५६॥ |
| गत्वा महान्तं प्रकृतिं प्रधानं<br>ब्रह्माणमेकं पुरुषं स्वबीजम्।<br>अतिष्ठदीशस्य पदं तदव्ययं<br>दृष्ट्वा देवास्तत्र तत्र स्तुवन्ति॥ ५७॥<br>आलोक्य तं पुरुषं विश्वकायं<br>महान् बलिर्भक्तियोगेन विष्णुम्।<br>ननाम नारायणमेकमव्ययं<br>स्वचेतसा यं प्रणमन्ति देवाः॥ ५८॥ | ईश्वरका वह चरण महान्, प्रधान, प्रकृति, स्वबीज-स्वरूप अद्वितीय पुरुष ब्रह्मपर्यन्त पहुँचकर स्थित हो गया। उस अव्यय पदका दर्शनकर विभिन्न स्थानोंके देवता स्तुति करने लगे। उन संसाररूपी शरीरवाले पुरुष विष्णुको देखकर महान् बलिने उन अद्वितीय अव्यय नारायणको अपने भक्तिपूरित चित्तसे प्रणाम किया, जिन्हें सभी देवता प्रणाम करते रहते हैं॥ ५७-५८॥ |
| तमब्रवीद् भगवानादिकर्ता<br>भूत्वा पुनर्वामनो वासुदेवः।<br>ममैव दैत्याधिपतेऽधुनेदं<br>लोकत्रयं भवता भावदत्तम्॥ ५९॥ | आदिकर्ता भगवान् वासुदेवने पुनः वामनरूप धारणकर उस (बलि)-से कहा—दैत्याधिपते! इस समय भक्तिपूर्वक आपके द्वारा दिये गये ये तीनों लोक अब मेरे ही हैं॥ ५९॥ |
| प्रणम्य मूर्ध्ना पुनरेव दैत्यो<br>निपातयामास जलं कराग्रे। | दैत्यने पुनः सिरेसे प्रणामकर हाथोंके अग्रभागमें जल गिराया (और कहा—) अनन्तधाम! त्रिविक्रम! |
- अध्याय १६ * १२७
| दास्ये त्वात्मानमनन्तधाम्ने<br>त्रिविक्रमायामितविक्रमाय ॥ ६०॥<br>प्रगृह्य सूनोरपि सम्प्रदत्तं<br>प्रह्लादसूनोरथ शङ्खपाणिः ।<br>जगाद दैत्यं जगदन्तरात्मा<br>पातालमूलं प्रविशेति भूयः ॥ ६१ ॥<br>समास्यतां भवता तत्र नित्यं<br>भुक्त्वा भोगान् देवतानामलभ्यान् ।<br>ध्यायस्व मां सततं भक्तियोगात्<br>प्रवेक्ष्यसे कल्पदाहे पुनर्माम् ॥ ६२ ॥ | अमित पराक्रमी ! मैं अपने-आपको तुम्हें प्रदान करता हूँ। प्रह्लादके पुत्रके भी पुत्र अर्थात् बलिके द्वारा भलीभाँति दिया हुआ तीनों लोक ग्रहणकर संसारके अन्तरात्मा शङ्खपाणि (भगवान् विष्णु)-ने दैत्यसे पुनः कहा—(अब आप) पातालमूलमें प्रवेश करें। आप वहाँ नित्य रहते हुए देवताओंको भी प्राप्त न होनेवाले भोगोंका उपभोगकर भक्तियोगद्वारा मेरा निरन्तर ध्यान करते रहें। कल्पान्त होनेपर पुनः मुझमें ही (आप) प्रवेश करेंगे ॥ ६०-६२ ॥ |
|---|---|
| उक्त्वैवं दैत्यसिंहं तं विष्णुः सत्यपराक्रमः ।<br>पुरंदराय त्रैलोक्यं ददौ विष्णुरुरुक्रमः ॥ ६३ ॥<br><br>संस्तुवन्ति महायोगं सिद्धा देवर्षिकिन्नराः ।<br>ब्रह्मा शक्रोऽथ भगवान् रुद्रादित्यमरुद्गणाः ॥ ६४ ॥ | उस दैत्यश्रेष्ठसे इस प्रकार कहकर सत्यपराक्रम तथा विशाल डगोंवाले विष्णुने तीनों लोक इन्द्रको दे दिये। सिद्ध, देवता, ऋषि, किन्नर, ब्रह्मा, इन्द्र, भगवान् रुद्र, आदित्य तथा मरुद्गण (उन) महायोगीकी स्तुति करने लगे ॥ ६३-६४ ॥ |
| कृत्वैतदद्भुतं कर्म विष्णुर्वामनरूपधृक् ।<br>पश्यतामेव सर्वेषां तत्रैवान्तरधीयत ॥ ६५ ॥<br><br>सोऽपि दैत्यवरः श्रीमान् पातालं प्राप चोदितः ।<br>प्रह्लादेनासुरवरैर्विष्णुना विष्णुतत्परः ॥ ६६ ॥ | ऐसा अद्भुत कार्य करके वामन-रूप धारण करनेवाले विष्णु सभीके देखते-ही-देखते वहाँ अन्तर्धान हो गये। वह विष्णुपरायण श्रीसम्पन्न दैत्यश्रेष्ठ (बलि) भी विष्णुसे प्रेरित होकर प्रह्लाद एवं अन्य श्रेष्ठ असुरोंके साथ पातालमें चला गया ॥ ६५-६६ ॥ |
| अपृच्छद् विष्णुमाहात्म्यं भक्तियोगमनुत्तमम् ।<br>पूजाविधानं प्रह्लादं तदाहासौ चकार सः ॥ ६७ ॥<br><br>अथ रथचरणासिशङ्खपाणिं<br>सरसिजलोचनमीशमप्रमेयम् ।<br>शरणमुपययौ स भावयोगात्<br>प्रणतगतिं प्रणिधाय कर्मयोगम् ॥ ६८ ॥ | उसने प्रह्लादसे विष्णुका माहात्म्य, श्रेष्ठतम भक्तियोग तथा पूजनका विधान पूछा। तब उनके द्वारा बताये जानेपर उसने वैसा ही किया। तदनन्तर भक्तिपूर्वक कर्मयोगका आचरण कर वह शरणागतोंके आश्रयस्थल, हाथोंमें चक्र, तलवार तथा शंख धारण करनेवाले, कमलके समान नेत्रवाले, अप्रमेय ईश्वरकी शरणमें गया ॥ ६७-६८ ॥ |
| एष वः कथितो विप्रा वामनस्य पराक्रमः ।<br>स देवकार्याणि सदा करोति पुरुषोत्तमः ॥ ६९ ॥ | ब्राह्मणो ! इस प्रकार यह (भगवान्) वामनके पराक्रमको मैंने बतलाया। ये पुरुषोत्तम सदा देवताओंके कार्योंको करते रहते हैं ॥ ६९ ॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें सोलहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १६ ॥
१२८ * कूर्मपुराण *
सत्रहवाँ अध्याय
बलिपुत्र बाणासुरका वृत्तान्त, दक्ष प्रजापतिकी दनु, सुरसा आदि कन्याओंकी संतानोंका वर्णन
| सूत उवाच | **सूतजी बोले—**बलिके महान् बल और पराक्रमवाले सौ पुत्र थे, उनमें प्रधान पुत्रका नाम 'बाण' था, जो द्युतिमान् और अत्यन्त बलवान् था। भगवान् शंकरमें अत्यन्त भक्तिवाले उस राजा (बाण)-ने राज्यका पालन करते हुए त्रिलोकीको अपने वशमें करके इन्द्रको पीड़ित किया। तब इन्द्रादि देवता कृत्तिवासा¹ (शंकर)-के पास जाकर कहने लगे—(भगवन्!) आपका भक्त 'बाण' नामक महान् असुर हमें पीड़ित कर रहा है॥ १-३॥ |
|---|---|
| बलेः पुत्रशतं त्वासीन्महाबलपराक्रमम्।<br>तेषां प्रधानो द्युतिमान् बाणो नाम महाबलः॥ १ ॥<br>सोऽतीव शंकरे भक्तो राजा राज्यमपालयत्।<br>त्रैलोक्यं वशमानीय बाधयामास वासवम्॥ २ ॥<br>ततः शक्रादयो देवा गत्वोचुः कृत्तिवाससम्।<br>त्वदीयो बाधते ह्यस्मान् बाणो नाम महासुरः॥ ३ ॥ | |
| व्याहृतो दैवतैः सर्वैर्देवदेवो महेश्वरः।<br>ददाह बाणस्य पुरं शरेणैकेन लीलया॥ ४ ॥<br>दह्यमाने पुरे तस्मिन् बाणो रुद्रं त्रिशूलिनम्।<br>ययौ शरणमीशानं गोपतिं नीललोहितम्॥ ५ ॥<br>मूर्ध्न्याधाय तल्लिङ्गं शाम्भवं भीतिवर्जितः।<br>निर्गत्य तु पुरात् तस्मात् तुष्टाव परमेश्वरम्॥ ६ ॥ | सभी देवताओंके द्वारा ऐसा कहे जानेपर देवाधिदेव महेश्वरने एक बाणसे लीलापूर्वक 'बाण' के नगरको दग्ध कर दिया। उस नगरके जलनेपर बाण त्रिशूलधारी, गोपति (वृषवाहन) नीललोहित ईशान रुद्रकी शरणमें गया॥ ४-५॥<br>शम्भुके लिंगको सिरपर धारणकर वह निर्भयतापूर्वक अपने नगरसे बाहर निकल गया और परमेश्वर (शंकर)-की स्तुति करने लगा। स्तुति करनेपर नीललोहित, शंकर भगवान् ईशने स्नेहवश उस बाणासुरको गणपतिका पद प्रदान किया॥ ६-७॥ |
| संस्तुतो भगवानीशः शंकरो नीललोहितः।<br>गाणपत्येन बाणं तं योजयामास भावतः॥ ७ ॥ | |
| अथाभवन् दनोः पुत्रास्ताराद्या ह्यतिभीषणाः।<br>तारस्तथा शम्बरश्च कपिलः शंकरस्तथा।<br>स्वर्भानुर्वृषपर्वा च प्राधान्येन प्रकीर्तिताः॥ ८ ॥<br>सुरसायाः सहस्रं तु सर्पाणामभवद् द्विजाः।<br>अनेकExternal/अनेकशिरसां तद्वत् खेचराणां महात्मनाम्॥ ९ ॥<br>अरिष्टा जनयामास गन्धर्वाणां सहस्त्रकम्।<br>अनन्ताद्या महानागाः काद्रवेयाः प्रकीर्तिताः॥ १०॥ | दनुके² तार आदि अत्यन्त भीषण पुत्र हुए। उनमें तार, शम्बर, कपिल, शंकर, स्वर्भानु तथा वृषपर्वा प्रधान कहे गये हैं। द्विजो! दक्षप्रजापतिकी कन्या सुरसाके अनेक फणोंवाले हजार सर्प पुत्ररूपमें हुए। इसी प्रकार अरिष्टाने हजारों आकाशचारी महात्मा गन्धर्वोंको उत्पन्न किया। अनन्त आदि महानाग कद्रूके पुत्र कहे गये हैं॥ ८-१०॥ |
| ताम्रा च जनयामास षट् कन्या द्विजपुंगवाः।<br>शुकीं श्येनीं च भासीं च सुग्रीवां गृध्रिकां शुचिम्॥ ११ ॥<br>गास्तथा जनयामास सुरभिर्महिषीस्तथा।<br>इरा वृक्षलतावल्लीस्तृणजातींश्च सर्वशः॥ १२॥ | द्विजश्रेष्ठो! ताम्राने छः कन्याओंको जन्म दिया, जो शुकी, श्येनी, भासी, सुग्रीवा, गृध्रिका तथा शुचि नामवाली हैं। सुरभिने गौओं तथा महिषियों (भैंसों)-को उत्पन्न किया। इरा ने सभी प्रकारके वृक्ष, लता, वल्ली तथा तृण-जातिवालोंको जन्म दिया। द्विजसत्तमो! खसाने यक्षों तथा राक्षसोंको, मुनिने अप्सराओंको और क्रोधवशाने राक्षसोंको उत्पन्न किया॥ ११-१३॥ |
| खसा वै यक्षरक्षांसि मुनिरप्सरसस्तथा।<br>रक्षोगणं क्रोधवशा जनयामास सत्तमाः॥ १३॥ |
१-कृत्ति (व्याघ्रचर्म)-को वसन (वस्त्र)-रूपमें धारण करनेवाले।
२-'दनु' दक्षप्रजापतिकी कन्या है। इसका विवाह कश्यपसे हुआ था।
| * अध्याय १८ * | १२९ |
|---|
| विनतायाश्च पुत्रौ द्वौ प्रख्यातौ गरुडारुणौ।<br>तयोश्च गरुडो धीमान् तपस्तप्त्वा सुदुश्चरम्।<br>प्रसादाच्छूलिनः प्राप्तो वाहनत्वं हरेः स्वयम् ॥ १४॥<br><br>आराध्य तपसा रुद्रं महादेवं तथारुणः।<br>सारथ्ये कल्पितः पूर्वं प्रीतेनार्कस्य शम्भुना ॥ १५॥ | विनताके दो विख्यात पुत्र हुए—गरुड तथा अरुण। उनमेंसे बुद्धिमान् गरुडने दुस्तर तप करके भगवान् शंकरकी कृपासे साक्षात् हरिके वाहन होनेका सौभाग्य प्राप्त किया। इसी प्रकार पूर्वकालमें अरुणने महादेव रुद्रकी तपस्याद्वारा आराधना की, इससे महादेवने प्रसन्न होकर उसे सूर्यका सारथी बना दिया ॥ १४-१५॥ |
| एते कश्यपदायादाः कीर्तिताः स्थाणुजङ्गमाः।<br>वैवस्वतेऽन्तरे ह्यस्मिञ्छृण्वतां पापनाशनाः ॥ १६॥ | इस वैवस्वत मन्वन्तरमें स्थावर तथा जंगम-रूप ये (महर्षि) कश्यपके वंशज कहे गये हैं। इनका वर्णन सुननेवालोंके पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ १६॥ |
| सप्तविंशत् सुताः प्रोक्ताः सोमपत्न्यश्च सुव्रताः।<br>अरिष्टनेमिपत्नीनामपत्यानीह षोडश ॥ १७॥<br><br>बहुपुत्रस्य विदुषश्चतस्रो विद्युतः स्मृताः।<br>तद्वदङ्गिरसः पुत्रा ऋषयो ब्रह्मसत्कृताः ॥ १८॥<br><br>कृशाश्वस्य तु देवर्षेर्देवप्रहरणाः सुताः।<br>एते युगसहस्रान्ते जायन्ते पुनरेव हि।<br>मन्वन्तरेषु नियतं तुल्यैः कार्यैः स्वनामभिः ॥ १९॥ | शोभन व्रतवाले द्विजो ! (दक्षक) सत्ताईस कन्याएँ चन्द्रमाकी पत्नियाँ कही गयी हैं। अरिष्टनेमिकी पत्नियोंकी सोलह संतानें हुईं। विद्वान् बहुपुत्रके चार विद्युत् नाम-वाले पुत्र कहे गये हैं। इसी प्रकार अङ्गिराके पुत्र ब्रह्मा-द्वारा सम्मान-प्राप्त श्रेष्ठ ऋषि थे। देवर्षि कृशाश्वके पुत्र देवप्रहरण अर्थात् देवोंके शस्त्र थे। हजार युगोंका अन्त होनेपर विभिन्न मन्वन्तरोंमें ये अपने नामोंके समान कार्योंके साथ निश्चितरूपसे पुनः उत्पन्न होते हैं ॥ १७—१९॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें सत्रहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १७ ॥
अठारहवाँ अध्याय
महर्षि कश्यप तथा पुलस्त्य आदि ऋषियोंके वंशका वर्णन, रावण तथा कुम्भकर्ण आदिकी उत्पत्ति, वसिष्ठके वंश-वर्णनमें व्यास, शुकदेव आदिकी उत्पत्तिकी कथा, भगवान् शंकरका ही शुकदेवके रूपमें आविर्भूत होना
| सूत उवाच<br>एतानुत्पाद्य पुत्रांस्तु प्रजासंतानकारणात्।<br>कश्यपो गोत्रकामस्तु चचार सुमहत् तपः ॥ १॥<br>तस्य वै तपतोऽत्यर्थं प्रादुर्भूतौ सुताविमौ।<br>वत्सरश्चासितश्चैव तावुभौ ब्रह्मवादिनौ ॥ २॥<br>वत्सरान्नध्रुवो जज्ञे रैभ्यश्च सुमहाद्यशाः।<br>रैभ्यस्य जज्ञिरे रैभ्याः पुत्रा द्युतिमतां वराः ॥ ३॥<br>च्यवनस्य सुता पत्नी नैध्रुवस्य महात्मनः।<br>सुमेधा जनयामास पुत्रान् वै कुण्डपायिनः ॥ ४॥<br>असितस्यैकपर्णायां बर्हिष्ठः समजायत।<br>नाम्ना वै देवलः पुत्रो योगाचार्यो महातपाः ॥ ५॥ | सूतजी बोले— प्रजाकी अभिवृद्धिके लिये इन पुत्रोंको उत्पन्न कर पुत्राभिलाषी कश्यप अत्यन्त महान् तप करने लगे। कठोर तप कर रहे उनके 'वत्सर' तथा 'असित' नामके दो पुत्र हुए। वे दोनों ही ब्रह्मवादी थे। वत्सरसे नैध्रुव और रैभ्य नामके महान् यशस्वी पुत्र उत्पन्न हुए। रैभ्यके तेजस्वियोंमें श्रेष्ठ रैभ्य नामक पुत्र हुआ। च्यवन ऋषिकी (सुमेधा नामवाली) पुत्री महात्मा नैध्रुवकी पत्नी थी। सुमेधाने 'कुण्डपायी' पुत्रोंको उत्पन्न किया। असितकी एकपर्णा नामक पत्नीने बर्हिष्ठ पुत्रको उत्पन्न किया जो देवल नामवाले थे, वे योगके आचार्य, |
१३० * कूर्मपुराण *
| शाण्डिल्यानां परः श्रीमान् सर्वतत्त्वार्थवित् सुधीः ।<br>प्रसादात् पार्वतीशस्य योगमुत्तममाप्तवान् ॥ ६ ॥ | महान् तपस्वी शाण्डिल्योंमें श्रेष्ठ, श्रीमान्, सभी तत्त्वार्थोंको जाननेवाले तथा विद्वान् थे। पार्वतीके पति भगवान् शंकरकी कृपासे उन्होंने श्रेष्ठ योग प्राप्त किया ॥ १-६ ॥ |
| शाण्डिल्या नैध्रुवा रैभ्यास्त्रयः पक्षास्तु काश्यपाः ।<br>नरप्रकृतयो विप्राः पुलस्त्यस्य वदामि वः ॥ ७ ॥ | शाण्डिल्य, नैध्रुव तथा रैभ्य—ये तीनों शाखाएँ कश्यपवंशीय और मानव प्रकृतिवाली हैं। ब्राह्मणो! आपको अब पुलस्त्य ऋषिके वंशको बताता हूँ। विप्रो! |
| तृणबिन्दोः सुता विप्रा नाम्ना त्विलविला स्मृता ।<br>पुलस्त्याय स राजर्षिस्तां कन्यां प्रत्यपादयत् ॥ ८ ॥ | तृणबिन्दु की एक पुत्री थी जो इलविला नामसे प्रसिद्ध थी। उन राजर्षिने वह कन्या पुलस्त्यको प्रदान की। उस |
| ऋषिस्त्वैलविलिस्तस्यां विश्रवाः समपद्यत ।<br>तस्य पत्न्यश्चतस्रस्तु पौलस्त्यकुलवर्धिकाः ॥ ९ ॥ | इलविलासे विश्रवा ऋषि उत्पन्न हुए। उनकी पुष्पोत्कटा, राका, कैकसी तथा देववर्णिनी नामकी चार पत्नियाँ थीं, जो पुलस्त्यके वंशको बढ़ानेवाली तथा रूप और लावण्यसे सम्पन्न थीं। अब आप उनकी संतानोंको सुनें— ॥ ७-१० ॥ |
| पुष्पोत्कटा च राका च कैकसी देववर्णिनी ।<br>रूपलावण्यसम्पन्नास्तासां वै शृणुत प्रजाः ॥ १० ॥ | |
| ज्येष्ठं वैश्रवणं तस्य सुषुवे देवरूपिणी ।<br>कैकसी जनयत् पुत्रं रावणं राक्षसाधिपम् ॥ ११ ॥ | उनकी देवरूपिणी (देववर्णिनी) (नामक पत्नी)-ने ज्येष्ठ वैश्रवण (कुबेर)-को जन्म दिया। कैकसीने राक्षसोंके अधिपति रावण नामक पुत्र और इसी प्रकार |
| कुम्भकर्णं शूर्पणखां तथैव च विभीषणम् ।<br>पुष्पोत्कटा व्यजनयत् पुत्रान् विश्रवसः शुभान् ॥ १२ ॥ | कुम्भकर्ण, शूर्पणखा तथा विभीषणको जन्म दिया। पुष्पोत्कटाने भी महोदर, प्रहस्त, महापार्श्व और खर नामक विश्रवाके शुभ पुत्रों और कुम्भीनसी नामक कन्याको जन्म दिया। अब आप राकाकी संतान सुनें— ॥ ११-१३ ॥ |
| महोदरं प्रहस्तं च महापार्श्वं खरं तथा ।<br>कुम्भीनसीं तथा कन्यां राकायां शृणुत प्रजाः ॥ १३ ॥ | |
| त्रिशिरा दूषणश्चैव विद्युज्जिह्वो महाबलः ।<br>इत्येते क्रूरकर्माणः पौलस्त्या राक्षसा दश ।<br>सर्वे तपोबलोत्कृष्टा रुद्रभक्ताः सुभीषणाः ॥ १४ ॥ | त्रिशिरा, दूषण तथा महाबली विद्युज्जिह्व—ये राकाके पुत्र थे। पुलस्त्यके ये सभी दस राक्षस-पुत्र क्रूर कर्म करनेवाले, अत्यन्त भयंकर, उत्कट तपोबलवाले और रुद्रके भक्त थे। मृग, व्याल, दाढ़ोंवाले (प्राणी), भूत, पिशाच, सर्प, शूकर तथा हाथी—ये सभी पुलह (ऋषि)-के पुत्र हैं। उस वैवस्वत मन्वन्तरमें (महर्षि) क्रतुको संतानहीन कहा गया है। प्रजापति कश्यप मरीचिके पुत्र थे। भृगुके भी शुक्र नामक पुत्र हुए जो दैत्योंके आचार्य, महान् तपस्वी, स्वाध्याय तथा योगपरायण, अत्यन्त तेजस्वी और शंकरके भक्त थे। श्रेष्ठ ब्राह्मणो! अत्रिकी बहुत-सी पत्नियाँ थीं। वे पतिव्रता तथा आपसमें बहनें थीं। हमने सुना है कि वे घृताचीसे उत्पन्न कृशाश्वकी पुत्रियाँ थीं ॥ १४-१८ ॥ |
| पुलहस्य मृगाः पुत्राः सर्वे व्यालाश्च दंष्ट्रिणः ।<br>भूताः पिशाचाः सर्पाश्च शूकरा हस्तिनस्तथा ॥ १५ ॥ | |
| अनपत्यः क्रतुस्तस्मिन् स्मृतो वैवस्वतेऽन्तरे ।<br>मरीचेः कश्यपः पुत्रः स्वयमेव प्रजापतिः ॥ १६ ॥ | |
| भृगोरप्यभवच्छुक्रो दैत्याचार्यो महातपाः ।<br>स्वाध्याययोगनिरतो हरभक्तो महाद्युतिः ॥ १७ ॥ | |
| अत्रेः पत्न्योऽभवन् बह्व्यः सोदर्यास्ताः पतिव्रताः ।<br>कृशाश्वस्य तु विप्रेन्द्रा घृताच्यामिति मे श्रुतम् ॥ १८ ॥ | |
| स तासु जनयामास स्वस्त्यात्रेयान् महौजसः ।<br>वेदवेदाङ्गनिरतांस्तपसा हतकिल्बिषान् ॥ १९ ॥ | उन्होंने उन पत्नियोंसे महान् ओजस्वी, वेद-वेदाङ्ग-परायण और तपस्याद्वारा अपने पापोंको नष्ट करनेवाले कल्याणकारी आत्रेयों (स्वस्त्यात्रेयों)-को उत्पन्न किया। नारदने देवी अरुन्धतीको वसिष्ठके लिये प्रदान किया। दक्षके शापसे नारद मुनि ऊर्ध्वरेता हो गये ॥ १९-२० ॥ |
| नारदस्तु वसिष्ठाय ददौ देवीमरुन्धतीम् ।<br>ऊर्ध्वरेतास्तत्र मुनिः शापाद् दक्षस्य नारदः ॥ २० ॥ |
- अध्याय १९ * । १३१
हर्यश्वेषु तु नष्टेषु मायया नारदस्य तु।
शशाप नारदं दक्षः क्रोधसंरक्तलोचनः॥ २१ ॥
नारदकी मायासे हर्यश्वोंके नष्ट हो जानेपर क्रोधसे लाल आँखोंवाले दक्षने नारदको (इस प्रकार) शाप दिया— ॥ २१ ॥
यस्मान्मम सुताः सर्वे भवतो मायया द्विज।
क्षयं नीतास्त्वशेषेण निरपत्यो भविष्यसि॥ २२॥
'द्विज! चूँकि आपकी मायासे मेरे सभी पुत्र सभी प्रकारसे विनाशको प्राप्त हो गये, अतः आप भी संतानरहित होंगे।'
अरुन्धत्यां वसिष्ठस्तु शक्तिमुत्पादयत् सुतम्।
शक्तेः पराशरः श्रीमान् सर्वज्ञस्तपतां वरः॥ २३॥
वसिष्ठने अरुन्धतीसे शक्ति नामक पुत्र उत्पन्न किया। शक्तिके पराशर हुए जो श्रीसम्पन्न, सर्वज्ञ तथा तपस्वियोंमें श्रेष्ठ थे।
आराध्य देवदेवेशमीशानं त्रिपुरान्तकम्।
लेभे त्वप्रतिमं पुत्रं कृष्णद्वैपायनं प्रभुम्॥ २४॥
उन्होंने त्रिपुरका नाश करनेवाले देवाधिदेव शंकरकी आराधनाकर कृष्णद्वैपायन नामवाले अप्रतिम एवं शक्तिसम्पन्न पुत्रको प्राप्त किया॥ २२—२४॥
द्वैपायनाच्छुको जज्ञे भगवानैव शंकरः।
अंशांशेनावतीर्योर्व्यां स्वं प्राप परमं पदम्॥ २५॥
भगवान् शंकर ही शुक नामसे द्वैपायनके पुत्र हुए। पृथ्वीपर अपने अंशांशरूपसे उत्पन्न होकर (पुनः) अपने परम पदको प्राप्त हुए।
शुकस्याप्यभवन् पुत्राः पञ्चात्यन्ततपस्विनः।
भूरिश्रवाः प्रभुः शम्भुः कृष्णो गौरश्च पञ्चमः।
कन्या कीर्तिमती चैव योगमाता धृतव्रता॥ २६॥
शुकके महान् तपस्वी पाँच पुत्र हुए, वे भूरिश्रवा, प्रभु, शम्भु, कृष्ण तथा पाँचवें गौर नामवाले थे। साथ ही कीर्तिमती नामकी एक कन्या भी हुई, जो योगमाता और व्रतपरायणा थी॥ २५-२६॥
एतेऽत्र वंश्याः कथिता ब्राह्मणा ब्रह्मवादिनाम्।
अत ऊर्ध्वं निबोधध्वं कश्यपाद्राजसंततिम्॥ २७॥
इन ब्रह्मवादी ब्राह्मणोंके वंशजोंका यह वर्णन किया गया, अब आगे कश्यपसे उत्पन्न क्षत्रिय संतानोंका वर्णन सुनो— ॥ २७॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षत्साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे अष्टादशोऽध्यायः॥ १८॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें अठारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १८॥
उन्नीसवाँ अध्याय
सूर्यवंश-वर्णनमें वैवस्वत मनुकी संतानोंका वर्णन, युवनाश्वको गौतमका उपदेश, महातपस्वी राजा वसुमनाकी कथा, वसुमनाके अश्वमेध-यज्ञमें ऋषियों तथा देवताओंका आगमन, ऋषियोंद्वारा तपस्याकी आज्ञा प्राप्तकर वसुमनाका हिमालयमें जाकर तप करना और अन्तमें उसे शिवपदकी प्राप्ति
सूत उवाच
सूतजी बोले—
अदितिः सुषुवे पुत्रमादित्यं कश्यपात् प्रभुम्।
तस्यादित्यस्य चैवासीद् भार्याणां तु चतुष्टयम्।
संज्ञा राज्ञी प्रभा छाया पुत्रांस्तासां निबोधत॥ १॥
अदितिने कश्यपसे शक्तिशाली 'आदित्य' नामक पुत्रको उत्पन्न किया। उस आदित्यकी संज्ञा, राज्ञी, प्रभा तथा छाया नामवाली चार पत्नियाँ थीं। उनके पुत्रोंको सुनो—
संज्ञा त्वाष्ट्री च सुषुवे सूर्यन्मनुमनुत्तमम्।
यमं च यमुनां चैव राज्ञी रैवतमेव च॥ २॥
त्वष्टा (विश्वकर्मा)-की पुत्री संज्ञाने सूर्यसे श्रेष्ठ मनु, यम और यमुनाको उत्पन्न किया और राज्ञीने रैवतको उत्पन्न किया।
प्रभा प्रभातमादित्याच्छाया सावर्णिमात्मजम्।
शनिं च तपतीं चैव विष्टिं चैव यथाक्रमम्॥ ३॥
प्रभाने आदित्यसे प्रभातको उत्पन्न किया। छायाने क्रमशः सावर्णि, शनि, तपती और विष्टि नामक संतानोंको जन्म दिया॥ १—३॥
| १३२ | * कूर्मपुराण * |
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| मनोस्तु प्रथमस्यासन् नव पुत्रास्तु संयमाः।<br>इक्ष्वाकुर्नभगश्चैव धृष्टः शर्यातिरेव च॥ ४ ॥<br>नरिष्यन्तश्च नाभागो हारिष्टः कारुषकस्तथा।<br>पृषध्रश्च महातेजा नवैते शक्रसंनिभाः॥ ५ ॥<br>इला ज्येष्ठा वरिष्ठा च सोमवंशविवृद्धये।<br>बुधस्य गत्वा भवनं सोमपुत्रेण संगता॥ ६ ॥ | प्रथम मनुके नौ पुत्र थे जो इक्ष्वाकु, नभग, धृष्ट, शर्याति, नरिष्यन्त, नाभाग, अरिष्ट, कारुषक तथा पृषध्र नामवाले थे। ये नवों पुत्र इन्द्रियजयी, महान् तेजसे सम्पन्न तथा इन्द्रके समान थे॥ ४-५॥<br>(मनुकी) ज्येष्ठ एवं वरिष्ठ (पुत्री) इलाने* सोमवंशकी अभिवृद्धिके लिये बुधके भवनमें जाकर सोमपुत्र (बुध)-के साथ संगति की और हमने सुना है कि उस | | असूत सौम्यजं देवी पुरूरवसमुत्तमम्।<br>पितॄणां तृप्तिकर्तारं बुधादिति हि नः श्रुतम्॥ ७ ॥ | देवीने बुधसे श्रेष्ठ पुरूरवाको उत्पन्न किया। वह पितरोंको तृप्ति प्रदान करनेवाला था। (पुत्र प्राप्त करनेके उपरान्त इलाको) विशुद्ध पुरुषत्वकी प्राप्ति हुई जो | | सम्प्राप्य पुंस्त्वममलं सुद्युम्न इति विश्रुतः।<br>इला पुत्रत्रयं लेभे पुनः स्त्रीत्वमविन्दत॥ ८ ॥ | सुद्युम्न नामसे विख्यात हुआ। (पुरुषरूपमें) इलाने उत्कल, गय तथा विनताश्व नामक तीन पुत्रोंको प्राप्त | | उत्कलश्च गयश्चैव विनताश्वस्तथैव च।<br>सर्वे तेऽप्रतिमप्रख्याः प्रपन्नाः कमलोद्भवम्॥ ९ ॥<br>इक्ष्वाकोश्चाभवद् वीरो विकुक्षिर्नाम पार्थिवः।<br>ज्येष्ठः पुत्रशतस्यापि दश पञ्च च तत्सुताः॥ १० ॥ | किया, तदनन्तर वह पुनः स्त्री हो गयी, वे सभी अतुलनीय कीर्तिमान् तथा ब्रह्मपरायण थे॥ ६-९॥<br>मनुके ज्येष्ठ पुत्र इक्ष्वाकुसे विकुक्षि नामक वीर राजा हुए। विकुक्षि सौ पुत्रोंमें ज्येष्ठ थे। उनके पंद्रह पुत्र | | तेषां ज्येष्ठः ककुत्स्थोऽभूत् काकुत्स्थो हि सुयोधनः।<br>सुयोधनात् पृथुः श्रीमान् विश्वकश्च पृथोः सुतः॥ ११ ॥ | हुए। उनमें ककुत्स्थ सबसे बड़े थे। ककुत्स्थका पुत्र सुयोधन था। सुयोधनसे श्रीमान् पृथु उत्पन्न हुए और विश्वक पृथुके पुत्र थे। विश्वकसे बुद्धिमान् आर्द्रक हुए | | विश्वकादार्द्रको धीमान् युवनाश्वस्तु तत्सुतः।<br>स गोकर्णमनुप्राप्य युवनाश्वः प्रतापवान्॥ १२ ॥ | और उनके पुत्र युवनाश्व हुए। प्रतापी वे युवनाश्व गोकर्ण तीर्थमें गये॥ १०-१२॥ | | दृष्ट्वा तु गौतमं विप्रं तपन्तममलप्रभम्।<br>प्रणम्य दण्डवद् भूमौ पुत्रकामो महीपतिः।<br>अपृच्छत् कर्मणा केन धार्मिकं प्राप्नुयात् सुतम्॥ १३॥ | वहाँ तप कर रहे अग्नि-सदृश विप्र गौतमका दर्शन-कर पुत्र-प्राप्तिकी इच्छासे युवनाश्वने भूमिमें दण्डवत् प्रणाम किया और उनसे (गौतमसे) पूछा- (भगवन्!) किस कर्मके द्वारा धर्मात्मा पुत्रको प्राप्त किया जा सकता है—॥ १३॥ | | गौतम उवाच | गौतमने कहा— आदि और अन्तसे रहित, अनामय, | | आराध्य पूर्वपुरुषं नारायणमनामयम्।<br>अनादिनिधनं देवं धार्मिकं प्राप्नुयात् सुतम्॥ १४ ॥<br>यस्य पुत्रः स्वयं ब्रह्मा पौत्रः स्यान्नीललोहितः।<br>तमादिकृष्णामीशानमाराध्याप्नोति सत्सुतम्॥ १५ ॥<br>न यस्य भगवान् ब्रह्मा प्रभावं वेत्ति तत्त्वतः।<br>तमाराध्य हृषीकेशं प्राप्नुयाद्धार्मिकं सुतम्॥ १६॥<br>स गौतमवचः श्रुत्वा युवनाश्वो महीपतिः।<br>आराधयन्महायोगं वासुदेवं सनातनम्॥ १७ ॥ | पूर्वपुरुष नारायणदेवकी आराधनासे धर्मात्मा पुत्रकी प्राप्ति होती है। जिनके पुत्र स्वयं ब्रह्मा हैं और (जिनके) पौत्र नीललोहित शंकर हैं, उन आदिकृष्ण ईशानकी आराधनासे (मनुष्य) सत्पुत्र प्राप्त करता है। भगवान् ब्रह्मा भी जिनके प्रभावको तत्त्वतः नहीं जानते हैं, उन हृषीकेशकी आराधनासे धार्मिक पुत्रको प्राप्त करना चाहिये॥ १४-१६॥<br>गौतमके वचनको सुनकर उस पृथिवीपति युवनाश्वने महायोगी सनातन वासुदेवकी आराधना प्रारम्भ की॥ १७॥ |
* राजा सुद्युम्नकी कथामें 'इला' की उत्पत्तिका वर्णन है।
- अध्याय १९ * १३३
तस्य पुत्रोऽभवद् वीरः श्रावस्तिरिति विश्रुतः।
निर्मिता येन श्रावस्तिर्गौडदेशे महापुरी॥ १८॥
(आराधनाके फलस्वरूप) उसका वीर पुत्र हुआ जो 'श्रावस्ति' इस नामसे विख्यात हुआ। उसने गौडदेशमें श्रावस्ति नामक महापुरीका निर्माण किया॥ १८॥
तस्माच्च बृहदश्वोऽभूत् तस्मात् कुवलयाश्वकः।
धुन्धुमारत्वमगमद् धुन्धुं हत्वा महासुरम्॥ १९॥
धुन्धुमारस्य तनयास्त्रयः प्रोक्ता द्विजोत्तमाः।
दृढाश्वश्चैव दण्डाश्वः कपिलाश्वस्तथैव च॥ २०॥
दृढाश्वस्य प्रमोदस्त्व हर्यश्वस्तस्य चात्मजः।
हर्यश्वस्य निकुम्भस्तु निकुम्भात् संहताश्वकः॥ २१॥
कृशाश्वश्च रणाश्वश्च संहताश्वस्य वै सुतौ।
युवनाश्वो रणाश्वस्य शक्रतुल्यबलो युधि॥ २२॥
उससे (श्रावस्तिसे) बृहदश्व उत्पन्न हुए और उससे कुवलयाश्वक उत्पन्न हुए। धुन्धु नामक महान् असुरको मारनेके कारण वे धुन्धुमारके नामसे प्रसिद्ध हुए। श्रेष्ठ द्विजो! धुन्धुमारके तीन पुत्र कहे गये हैं—दृढाश्व, दण्डाश्व तथा कपिलाश्व। दृढाश्वका प्रमोद और प्रमोदका पुत्र हर्यश्व था। हर्यश्वका पुत्र निकुम्भ था और निकुम्भसे संहताश्वक उत्पन्न हुआ। संहताश्वकके कृशाश्व तथा रणाश्व—ये दो पुत्र हुए। रणाश्वका युद्धमें इन्द्रके तुल्य बलशाली युवनाश्व नामक पुत्र हुआ॥ १९—२२॥
कृत्वा तु वारुणीमिष्टिम्मृषीणां वै प्रसादतः।
लेभे त्वप्रतिमं पुत्रं विष्णुभक्तमनुत्तमम्।
मान्धातारं महाप्राज्ञं सर्वशस्त्रभृतां वरम्॥ २३॥
मान्धातुः पुरुकुत्सोऽभूदम्बरीषश्च वीर्यवान्।
मुचुकुन्दश्च पुण्यात्मा सर्वे शक्रसमा युधि॥ २४॥
अम्बरीषस्य दायादो युवनाश्वोऽपरः स्मृतः।
हरितो युवनाश्वस्य हरितस्तत्सुतोऽभवत्॥ २५॥
युवनाश्वने ऋषियोंकी कृपासे वारुणी नामक यागका (वारुणी नामकी इष्टिका) अनुष्ठान करके अप्रतिम महान् बुद्धिमान्, शस्त्रधारियोंमें सर्वश्रेष्ठ तथा उत्तम विष्णुभक्त मान्धाता नामक पुत्रको प्राप्त किया। मान्धाताके पुरुकुत्स, वीर्यवान् अम्बरीष तथा पुण्यात्मा मुचुकुन्द नामक पुत्र हुए। युद्धमें वे सभी इन्द्रके समान थे। अम्बरीषका पुत्र दूसरा युवनाश्व* कहलाता है। युवनाश्वका पुत्र हरित और उसका पुत्र हारित हुआ॥ २३—२५॥
पुरुकुत्सस्य दायादस्त्रसदस्युर्महायशाः।
नर्मदायां समुत्पन्नः सम्भूतिस्तत्सुतोऽभवत्॥ २६॥
विष्णुवृद्धः सुतस्तस्य त्वनरण्योऽभवत् परः।
बृहदश्वोऽनरण्यस्य हर्यश्वस्तत्सुतोऽभवत्॥ २७॥
सोऽतीव धार्मिको राजा कर्दमस्य प्रजापतेः।
प्रसादाद्धार्मिकं पुत्रं लेभे सूर्यपरायणम्॥ २८॥
स तु सूर्य्यं समभ्यर्च्य राजा वसुमनाः शुभम्।
लेभे त्वप्रतिमं पुत्रं त्रिधन्वानमरिंदमम्॥ २९॥
अयजच्चाश्वमेधेन शत्रून् जित्वा द्विजोत्तमाः।
स्वाध्यायवान् दानशीलस्तितिक्षुर्धर्मतत्परः॥ ३०॥
पुरुकुत्सका नर्मदा (नामक पत्नी)-से महायशस्वी त्रसदस्यु नामक पुत्र उत्पन्न हुआ और उसका पुत्र सम्भूति हुआ। उसका (सम्भूतिका) विष्णुवृद्ध तथा दूसरा अनरण्य नामक पुत्र हुआ। अनरण्यका बृहदश्व और उसका पुत्र हर्यश्व हुआ। यही हर्यश्व अत्यन्त धार्मिक राजारूपमें विख्यात हुआ। इसने कर्दम प्रजापतिकी कृपासे धार्मिक सूर्यभक्त (वसुमना नामक) पुत्रको प्राप्त किया। इस वसुमना नामक राजाने सूर्यकी आराधनासे शत्रुओंका दमन करनेवाले अप्रतिम कल्याणकारी त्रिधन्वा नामक पुत्रको प्राप्त किया। श्रेष्ठ द्विजो! स्वाध्यायनिरत, दानशील, सहिष्णु तथा धर्मपरायण (उस) राजाने शत्रुओंको जीतकर अश्वमेध नामक यज्ञ किया॥ २६—३०॥
ऋषयस्तु समाजग्मुर्यज्ञवाटं महात्मनः।
वसिष्ठकश्यपमुखा देवाश्चेन्द्रपुरोगमाः॥ ३१॥
तान् प्रणम्य महाराजः पप्रच्छ विनयान्वितः।
समाप्य विधिवद् यज्ञं वसिष्ठादीन् द्विजोत्तमान्॥ ३२॥
उस महात्माके यज्ञस्थलमें वसिष्ठ तथा कश्यप आदि प्रमुख ऋषिगण तथा इन्द्र आदि देवता आये। विधिपूर्वक यज्ञ पूर्ण करके उन वसिष्ठ आदि द्विजोत्तमोंको प्रणामकर महाराज (वसुमना)-ने विनयपूर्वक उनसे पूछा—॥ ३१-३२॥
* इस वंशवर्णनके अनुसार यह तीसरा युवनाश्व है। पहला आर्द्रकका पुत्र, दूसरा रणाश्वका पुत्र और तीसरा यह अम्बरीषका पुत्र।
| १३४ | * कूर्मपुराण * |
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| वसुमना उवाच | वसुमनाने कहा—श्रेष्ठ ब्राह्मणो! आप सब कुछ | | किंस्विच्छ्रेयस्करतरं लोकेऽस्मिन् ब्राह्मणर्षभाः। | जाननेवाले हैं। मुझे यह बतलाइये कि इस संसारमें यज्ञ, | | यज्ञस्तपो वा संन्यासो ब्रूत मे सर्ववेदिनः॥ ३३॥ | तप अथवा संन्यासमें कौन अधिक श्रेयस्कर है?॥ ३३॥ | | वसिष्ठ उवाच | वसिष्ठ बोले—आत्मवान्को चाहिये कि वह वेदोंका | | अधीत्य वेदान् विधिवत् पुत्रानुत्पाद्य धर्मतः। | विधिवत् अध्ययन करके धर्मपूर्वक पुत्रोंको उत्पन्न करे | | इष्ट्वा यज्ञेश्वरं यज्ञैर्गच्छेद् वनमथात्मवान् ॥ ३४ ॥ | और यज्ञोंद्वारा यज्ञेश्वरका यजनकर वनमें जाय॥ ३४॥ | | पुलस्त्य उवाच | पुलस्त्यने कहा—सर्वप्रथम श्रेष्ठ देवोंकी यज्ञद्वारा | | आराध्य तपसा देवं योगिनं परमेष्ठिनम्। | अर्चना करके और तपस्याद्वारा योगी देव परमेश्वरकी आराधना करके विधिपूर्वक संन्यास ग्रहण करना | | प्रव्रजेद् विधिवद् यज्ञैरिष्ट्वा पूर्वं सुरोत्तमान् ॥ ३५ ॥ | चाहिये॥ ३५॥ | | पुलह उवाच | पुलह बोले—जिन्हें अद्वितीय, पुराणपुरुष तथा | | यमाहुरेकं पुरुषं पुराणं परमेश्वरम्। | परमेश्वर कहा गया है, उन सहस्रकिरण (सूर्य)-की | | तमाराध्य सहस्रांशुं तपसा मोक्षमाप्नुयात् ॥ ३६ ॥ | तपस्याद्वारा आराधना करके मोक्ष प्राप्त करना चाहिये॥ ३६॥ | | जमदग्निरुवाच | जमदग्निने कहा—जिन भगवान् ईश्वरने अजन्मा | | अजस्य नाभावध्येकमीश्वरेण समर्पितम्। | (ब्रह्मा)-की नाभिमें अद्वितीय बीज (जगत्कारण ब्रह्मा)-को स्थापित किया, उन देवकी तपस्याद्वारा आराधना की | | बीजं भगवता येन स देवस्तपसेज्यते॥ ३७॥ | जानी चाहिये॥ ३७॥ | | विश्वामित्र उवाच | विश्वामित्रने कहा—जो अग्निस্বরূপ, सर्वात्मक, | | योऽग्निः सर्वात्मकोऽनन्तः स्वयम्भूविश्वतोमुखः। | अनन्त, स्वयम्भू तथा सर्वतोमुख हैं, वे रुद्र उग्र | | स रुद्रस्तपसोग्रेण पूज्यते नेतैर्र्मखैः॥ ३८॥ | तपस्याद्वारा पूजनीय हैं न कि अन्य किसी दूसरे यज्ञ आदि साधनोंद्वारा॥ ३८॥ | | भरद्वाज उवाच | भरद्वाज बोले—यज्ञोंद्वारा जिन सनातन अग्निदेवकी | | यो यज्ञैरिज्यते देवो जातवेदाः सनातनः। | पूजा की जाती है, वे सभी देवताओंके विग्रहरूप | | स सर्वदैवततनुः पूज्यते तपसेश्वरः॥ ३९॥ | परमेश्वर ही तपके द्वारा पूजित होते हैं॥ ३९॥ | | अत्रिरुवाच | अत्रि बोले—वे महेश्वर अत्यन्त महान् तपके | | यतः सर्वमिदं जातं यस्यापत्यं प्रजापतिः। | द्वारा पूजे जाते हैं, जिनसे यह सब उत्पन्न हुआ है और | | तपः सुमहदास्थाय पूज्यते स महेश्वरः ॥ ४० ॥ | प्रजापति जिनकी संतान हैं॥ ४०॥ | | गौतम उवाच | गौतमने कहा—जिससे प्रधान अर्थात् पुरुष और | | यतः प्रधानपुरुषौ यस्य शक्तिमयं जगत्। | प्रकृति उत्पन्न हुए हैं और जिनकी शक्तिसे यह जगत् (उत्पन्न) हुआ है, वे सनातन देवाधिदेव तपस्याद्वारा | | स देवदेवस्तपसा पूजनीयः सनातनः ॥ ४१ ॥ | पूजनीय हैं॥ ४१॥ | | कश्यप उवाच | कश्यपने कहा—तपद्वारा आराधना करनेसे वे | | सहस्रनयनो देवः साक्षी स तु प्रजापतिः। | हजारों नेत्रवाले, साक्षी, महायोगी, प्रजापति प्रभु प्रसन्न | | प्रसीदति महायोगी पूजितस्तपसा परः॥ ४२॥ | होते हैं॥ ४२॥ | | ऋतुरुवाच | ऋतु बोले—अध्ययनरूपी यज्ञ पूर्ण कर पुत्र प्राप्त | | प्राप्ताध्ययनयज्ञस्य लब्धपुत्रस्य चैव हि। | कर लेनेवाले पुरुषके लिये तपस्याके अतिरिक्त कोई | | नान्तरेण तपः कश्चिद्धर्मः शास्त्रेषु दृश्यते ॥ ४३ ॥ | और दूसरा धर्म शास्त्रोंमें दिखायी नहीं देता ॥ ४३ ॥ |
- अध्याय १९ * | १३५ ---|---
इत्याकर्ण्य स राजर्षिस्तान् प्रणम्यातिहृष्टधीः।
विसर्जयित्वा सम्पूज्य त्रिधन्वानमथाब्रवीत्॥ ४४॥
आराधयिष्ये तपसा देवमेकाक्षराह्वयम्।
प्राणं बृहन्तं पुरुषमादित्यान्तरसंस्थितम्॥ ४५॥
त्वं तु धर्मरतो नित्यं पालयैतदतन्द्रितः।
चातुर्वर्ण्यसमायुक्तमशेषं क्षितिमण्डलम्॥ ४६॥
एवमुक्त्वा स तद्राज्यं निधायात्मभवे नृपः।
जगामारण्यमनघस्तपश्कर्तुमनुत्तमम् ॥ ४७॥
हिमवच्छिखरे रम्ये देवदारुवने शुभे।
कन्दमूलफलाहारो मुन्यन्नैरयजत् सुरान्॥ ४८॥
संवत्सरशतं साग्रं तपोनिर्धूतकल्मषः।
जजाप मनसा देवीं सावित्रीं वेदमातरम्॥ ४९॥
तस्यैवं जपतो देवः स्वयम्भूः परमेश्वरः।
हिरण्यगर्भो विश्वात्मा तं देशमगमत् स्वयम्॥ ५०॥
दृष्ट्वा देवं समायान्तं ब्रह्माणं विश्वतोमुखम्।
ननाम शिरसा तस्य पादयोर्नाम कीर्तयन्॥ ५१॥
नमो देवाधिदेवाय ब्रह्मणे परमात्मने।
हिरण्यमूर्तये तुभ्यं सहस्राक्षाय वेधसे॥ ५२॥
नमो धात्रे विधात्रे च नमो वेदात्ममूर्तये।
सांख्ययोगाधिगम्याय नमस्ते ज्ञानमूर्तये॥ ५३॥
नमस्त्रिमूर्तये तुभ्यं स्रष्ट्रे सर्वार्थवेदिने।
पुरुषाय पुराणाय योगिनां गुरवे नमः॥ ५४॥
ततः प्रसन्नो भगवान् विरिञ्चो विश्वभावनः।
वरं वरय भद्रं ते वरदोऽस्मीत्यभाषत॥ ५५॥
राजोवाच
जपेयं देवदेवेश गायत्रीं वेदमातरम्।
भूयो वर्षशतं साग्रं तावदायुर्र्भवेन्मम॥ ५६॥
बाढमित्याह विश्वात्मा समालोक्य नराधिपम्।
स्पृष्ट्वा कराभ्यां सुप्रीतस्तत्रैवान्तरधीयत॥ ५७॥
|
ऐसा सुनकर अत्यन्त प्रसन्न मनवाले उस वसुमना राजर्षिने उन द्विजश्रेष्ठोंको प्रणाम किया और पूजनकर उन्हें बिदा किया। तदनन्तर (उसने अपने पुत्र) त्रिधन्वासे (इस प्रकार) कहा—तपद्वारा मैं सूर्यमण्डलके मध्यमें स्थित, प्राणरूप अद्वितीय अक्षर नामक ब्रह्म पुरुषकी आराधना करूँगा। तुम धर्ममें निरत होकर चातुर्वर्ण्यसे समन्वित इस सम्पूर्ण पृथ्वीमण्डलका आलस्यरहित होकर पालन करो॥ ४४—४६॥
ऐसा कहकर वह अनघ राजा वसुमना अपने पुत्र (त्रिधन्वा)-को राज्य सौंपकर सर्वोत्तम तपस्या करनेके लिये वनमें चला गया। ये वसुमना राजा हिमालयके शिखरपर स्थित रमणीय शुभ देवदारु वनमें रहते हुए कन्दमूल एवं फलोंका आहार करते हुए मुनियोंके अन्न (नीवार आदि)-से देवताओंकी प्रसन्नताके लिये यज्ञ (आराधना) करने लगे। तपस्याद्वारा नष्ट हुए पापोंवाले उन्होंने सौ वर्षोंसे भी अधिक समयतक वेदमाता देवी सावित्रीका मानसिक जप किया। उनके इस प्रकार जप करते रहनेपर ही स्वयम्भू देव परमेश्वर हिरण्यगर्भ विश्वात्मा स्वयं उस स्थानपर गये। विश्वतोमुख ब्रह्मदेवको आते हुए देखकर उन्होंने अपना नाम बोलते हुए उनके चरणोंमें सिरसे प्रणाम किया और इस प्रकार कहा— ॥ ४७–५१॥
देवाधिदेव परमात्मा ब्रह्मको नमस्कार है। सहस्र नेत्रोंवाले हिरण्यमूर्ति आप वेधाको नमस्कार है। धाता और विधाताको नमस्कार है, वेदात्ममूर्तिको नमस्कार है। सांख्य तथा योगद्वारा ज्ञात होनेवाले ज्ञान-मूर्तिको नमस्कार है। सभी अर्थोंके ज्ञाता, सृष्टिकर्ता, त्रिमूर्तिरूप आपको नमस्कार है। योगियोंके गुरु पुराणपुरुषको नमस्कार है॥ ५२–५४॥
तब प्रसन्न होकर विश्वभावन भगवान् ब्रह्माने कहा—'वर माँगो, तुम्हारा कल्याण हो, मैं तुम्हें वर दूँगा'॥ ५५॥
**राजाने कहा—**देवदेवेश! मैं पुनः सौ वर्षसे अधिक समयतक इस वेदमाता गायत्रीका जप कर सकूँ, इसके लिये उतनी ही मेरी आयु हो। राजाको देखकर विश्वात्माने 'बहुत अच्छा' ऐसा कहा और प्रसन्न होकर हाथोंसे (राजाका) स्पर्शकर वे वहीं अन्तर्धान हो गये॥ ५६-५७॥
| १३६ | * कूर्मपुराण * |
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| सोऽपि लब्धवरः श्रीमान् जजापातिप्रसन्नधीः।<br>शान्तस्त्रिषवणस्नायी कन्दमूलफलाशनः ॥ ५८ ॥ | वर-प्राप्त वह श्रीमान् (राजा) भी तीनों समयोंमें स्नान करते हुए तथा कन्दमूल एवं फलोंका आहार करते हुए अत्यन्त प्रसन्न-मनसे शान्तिपूर्वक जप करने लगे। |
| तस्य पूर्णे वर्षशते भगवानुग्रदीधितिः।<br>प्रादुरासीन्महायोगी भानोर्मण्डलमध्यतः॥ ५९॥ | उनके (जप करते हुए) सौ वर्ष पूरा होनेपर सूर्यमण्डलके मध्यसे प्रज्वलित किरणोंवाले महायोगी भगवान् प्रकट हुए। |
| तं दृष्ट्वा वेदविदुषं मण्डलस्थं सनातनम्।<br>स्वयम्भुवमनाद्यन्तं ब्रह्माणं विस्मयं गतः॥ ६० ॥ | मण्डलमें स्थित उन सनातन, स्वयम्भू, अनादि, अनन्त तथा वेदज्ञ ब्रह्माको देखकर वे राजा आश्चर्यचकित हुए। |
| तुष्टाव वैदिकैर्मन्त्रैः सावित्र्या च विशेषतः।<br>क्षणादपश्यत् पुरुषं तमेव परमेश्वरम् ॥ ६१ ॥ | उन्होंने वैदिक मन्त्रों तथा विशेषरूपसे गायत्री (मन्त्र)-द्वारा उनकी स्तुति की। क्षणभरमें ही उन्होंने उन परमेश्वर पुरुषको |
| चतुर्मुखं जटामौलिमष्टहस्तं त्रिलोचनम्।<br>चन्द्रावयवलक्ष्माणं नरनारीतनुं हरम्॥ ६२ ॥ | चार मुखवाले, जटा तथा मुकुटधारी, आठ हाथ तथा तीन नेत्रवाले, चन्द्रकलाओंसे चिह्नित अर्धनारीश्वर शरीरवाले, |
| भासयन्तं जगत् कृत्स्नं नीलकण्ठं स्वरश्मिभिः।<br>रक्ताम्बरधरं रक्तं रक्तमाल्यानुलेपनम्॥ ६३॥ | अपनी किरणोंद्वारा सम्पूर्ण जगत्को प्रकाशित करते हुए, रक्तवस्त्र धारण किये, रक्तवर्णवाले तथा रक्तमाला और रक्त अनुलेपन धारण किये नीलकण्ठ हरके रूपमें देखा ॥ ५८-६३ ॥ |
| तद्भावभावितो दृष्ट्वा सद्भावेन परेण हि।<br>ननाम शिरसा रुद्रं सावित्र्यानेन चैव हि॥ ६४ ॥ | उन्हें देखकर उन्हींके भावसे भावित होकर परम सद्भावसे राजाने सिरसे रुद्रको प्रणाम किया और सावित्री-मन्त्र तथा इस स्तोत्रसे स्तुति की। |
| नमस्ते नीलकण्ठाय भास्वते परमेष्ठिने।<br>त्रयीमयाय रुद्राय कालरूपाय हेतवे ॥ ६५ ॥ | वेदत्रयीरूप, रुद्र, कालरूप, कारणस्वरूप भासमान परमेष्ठी नीलकण्ठको नमस्कार है ॥ ६४-६५ ॥ |
| तदा प्राह महादेवो राजानं प्रीतमानसः।<br>इमानि मे रहस्यानि नामानि शृणु चानघ॥ ६६॥ | तब प्रसन्न मनवाले महादेवने राजासे कहा— हे निष्पाप ! मेरे इन गोपनीय नामोंको सुनो। |
| सर्ववेदेषु गीतानि संसारशमनानि तु।<br>नमस्कुरुष्व नृपते एभिर्मां सततं शुचिः॥ ६७ ॥ | ये सभी वेदोंमें वर्णित हैं तथा संसार (सागर)-का नाश करनेवाले हैं। राजन् ! पवित्र होकर इन नामोंसे मुझे निरन्तर नमस्कार करो। |
| अध्यायं शतरुद्रीयं यजुषां सारमुद्धृतम्।<br>जपस्वानन्यचेतस्को मय्यासक्तमना नृप॥ ६८ ॥ | राजन् ! यजुर्वेदसे साररूपमें उद्धृत शतरुद्रीका अनन्यमन होकर मुझमें मन लगाकर जप करो। |
| ब्रह्मचारी मिताहारो भस्मनिष्ठः समाहितः।<br>जपेदामरणाद् रुद्रं स याति परमं पदम्॥ ६९ ॥ | जो ब्रह्मचर्य धारणकर, संयमित आहार ग्रहणकर, भस्मका लेपकर एकाग्रतापूर्वक मरणपर्यन्त रुद्रका जप करता है, वह परम पद प्राप्त करता है। |
| इत्युक्त्वा भगवान् रुद्रो भक्तानुग्रहकाम्यया।<br>पुनः संवत्सरशतं राज्ञे ह्यायुरकल्पयत् ॥ ७० ॥ | ऐसा कहकर भक्तपर अनुग्रह करनेकी इच्छासे भगवान् रुद्रने राजाकी आयु पुनः सौ वर्षोंतक कर दी ॥ ६६-७० ॥ |
| दत्त्वास्मै तत् परं ज्ञानं वैराग्यं परमेश्वरः।<br>क्षणादन्तर्दधे रुद्रस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ७१ ॥ | राजा वसुमनाको परम ज्ञान और वैराग्य प्रदानकर परमेश्वर रुद्र क्षणभरमें ही अन्तर्धान हो गये। यह एक आश्चर्य ही हुआ। |
| राजापि तपसा रुद्रं जजापानन्यमानसः।<br>भस्मच्छन्नस्त्रिषवणं स्नात्वा शान्तः समाहितः ॥ ७२ ॥ | राजाने भी तीनों कालोंमें स्नानकर, भस्म धारणकर, शान्त और एकाग्रतापूर्वक अनन्य-मनसे तपस्याद्वारा रुद्रका जप किया। |
| जपतस्तस्य नृपतेः पूर्णे वर्षशते पुनः।<br>योगप्रवृत्तिरभवत् कालात् कालात्मकं परम्॥ ७३ ॥ | जप करते हुए उन राजाके पुनः सौ वर्ष पूरे हो जानेपर उसमें योगकी प्रवृत्ति हुई और यथासमय उन्होंने श्रेष्ठ |
- अध्याय २० * | १३७ ---|---
विवेश तद् वेदसारं स्थानं वै परमेष्ठिनः।
भानोः स मण्डलं शुभ्रं ततो यातो महेश्वरम्॥ ७४॥
यः पठेच्छृणुयाद् वापि राज्ञश्चरितमुत्तमम्।
सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मलोके महीयते॥ ७५॥ | कालात्मक परमेष्ठीके उस वेदसार नामक स्थानको प्राप्त किया जो सूर्यका शुभ्र मण्डल है। तदनन्तर वे महेश्वरको प्राप्त हुए॥ ७१—७४॥
राजाके इस उत्तम चरितको जो पढ़ता है अथवा सुनता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥ ७५॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे एकोनविंशोऽध्यायः॥ १९॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें उन्नीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १९॥
बीसवाँ अध्याय
इक्ष्वाकु-वंश-वर्णनके प्रसंगमें श्रीराम-कथाका प्रतिपादन, श्रीरामद्वारा सेतु-बन्धन और रामेश्वर-लिंगकी स्थापना, शंकर-पार्वतीका प्रकट होकर रामेश्वर-लिंगके माहात्म्यको बतलाना, श्रीरामको लव-कुश-पुत्रोंकी प्राप्ति तथा इक्ष्वाकु-वंशके अन्तिम राजाओंका वंश-वर्णन
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| त्रिधन्वा राजपुत्रस्तु धर्मेणापालयन्महीम्। | |
| तस्य पुत्रोऽभवद् विद्वांस्त्रय्यारुण इति स्मृतः॥ १॥ | |
| तस्य सत्यव्रतो नाम कुमारोऽभून्महाबलः। | |
| भार्या सत्यधना नाम हरिश्चन्द्रमजीजनत्॥ २॥ | |
| हरिश्चन्द्रस्य पुत्रोऽभूद् रोहितो नाम वीर्यवान्। | |
| हरितो रोहितस्याथ धुन्धुस्तस्य सुतोऽभवत्॥ ३॥ | |
| विजयश्च सुदेवश्च धुन्धुपुत्रौ बभूवतुः। | |
| विजयस्याभवत् पुत्रः कारुको नाम वीर्यवान्॥ ४॥ | |
| कारुकस्य वृकः पुत्रस्तस्माद् बाहुरजायत। | |
| सगरस्तस्य पुत्रोऽभूद् राजा परमधार्मिकः॥ ५॥ | |
| द्वे भार्ये सगरस्यापि प्रभा भानुमती तथा। | |
| ताभ्यामाराधितः प्रादादौर्वाग्निवर्रमुत्तमम्॥ ६॥ | |
| एकं भानुमती पुत्रमगृह्णादसमञ्जसम्। | |
| प्रभा षष्टिसहस्रं तु पुत्राणां जगृहे शुभा॥ ७॥ | |
| असमञ्जस्य तनयो ह्यंशुमान् नाम पार्थिवः। | |
| तस्य पुत्रो दिलीपस्तु दिलीपात् तु भगीरथः॥ ८॥ | |
| येन भागीरथी गङ्गा तपः कृत्वावतारिता। | |
| प्रसादाद् देवदेवस्य महादेवस्य धीमतः॥ ९॥ | |
| भगीरथस्य तपसा देवः प्रीतमना हरः। | |
| बभार शिरसा गङ्गां सोमान्ते सोमभूषणः॥ १०॥ | राजपुत्र त्रिधन्वाने पृथ्वीका धर्मपूर्वक पालन किया। उसका एक विद्वान् पुत्र हुआ जो त्रय्यारुण नामसे प्रसिद्ध हुआ। उसको (त्रय्यारुणको) सत्यव्रत नामका महान् बलवान् पुत्र हुआ। सत्यधना नामक उसकी पत्नीने हरिश्चन्द्रको जन्म दिया। हरिश्चन्द्रको रोहित नामवाला पराक्रमी पुत्र हुआ। रोहितका हरित और उसका पुत्र धुन्धु हुआ। धुन्धुके विजय और सुदेव—ये दो पुत्र हुए। विजयका कारुक नामका वीर पुत्र हुआ। कारुकका पुत्र वृक और उससे बाहु (नामक पुत्र) उत्पन्न हुआ। उस बाहुका पुत्र सगर हुआ जो परम धार्मिक था। सगरकी दो पत्नियाँ थीं—प्रभा और भानुमती। और्वाग्निने उन दोनोंसे पूजित होकर उन्हें श्रेष्ठ वर प्रदान किया॥ १–६॥<br><br>(वरके फलस्वरूप) भानुमतीने असमञ्जस नामक पुत्रको ग्रहण किया और कल्याणी प्रभाने साठ हजार पुत्रोंको प्राप्त किया। असमञ्जसके पुत्र अंशुमान् नामक राजा थे, उनके पुत्र दिलीप तथा दिलीपसे भगीरथ हुए, जिन्होंने तपस्या करके देवाधिदेव धीमान् महादेवकी कृपासे भागीरथी गङ्गाको (पृथ्वीपर) अवतारित किया॥ ७–९॥<br><br>भगीरथकी तपस्यासे प्रसन्न हुए मनवाले चन्द्रभूषण देव हरने अपने सिरपर स्थित चन्द्रमाके अग्रभागमें गङ्गाको धारण किया॥ १०॥ |
| १३८ | * कूर्मपुराण * |
|---|
| भगीरथसुतश्चापि श्रुतो नाम बभूव ह।<br>नाभागस्तस्य दायादः सिन्धुद्वीपस्ततोऽभवत् ॥ ११ ॥<br>अयुतायुः सुतस्तस्य ऋतुपर्णस्तु तत्सुतः।<br>ऋतुपर्णस्य पुत्रोऽभूत् सुदासो नाम धार्मिकः।<br>सौदासस्तस्य तनयः ख्यातः कल्माषपादकः ॥ १२ ॥<br>वसिष्ठस्तु महातेजाः क्षेत्रे कल्माषपादके।<br>अश्मकं जनयामास तमिक्ष्वाकुकुलध्वजम् ॥ १३ ॥<br>अश्मकस्योत्कलायां तु नकुलो नाम पार्थिवः।<br>स हि रामभयाद् राजा वनं प्राप सुदुःखितः ॥ १४ ॥<br>विभ्रत् स नारीकवचं तस्माच्छतरथोऽभवत्।<br>तस्माद् बिलिबिश्रिः श्रीमान् वृद्धशर्मा च तत्सुतः ॥ १५ ॥<br>तस्माद् विश्वसहस्तस्मात् खट्वाङ्ग इति विश्रुतः।<br>दीर्घबाहुः सुतस्तस्य रघुस्तस्मादजायत ॥ १६ ॥<br>रघोरजः समुत्पन्नो राजा दशरथस्ततः।<br>रामो दाशरथिर्वीरो धर्मज्ञो लोकविश्रुतः ॥ १७ ॥<br><br>भरतो लक्ष्मणश्चैव शत्रुघ्नश्च महाबलः।<br>सर्वे शक्रसमा युद्धे विष्णुशक्तिसमन्विताः।<br>जज्ञे रावणनाशार्थं विष्णुरंशेन विश्वकृत् ॥ १८ ॥<br>रामस्य सुभगा भार्या जनकस्यात्मजा शुभा।<br>सीता त्रिलोकविख्याता शीलौदार्यगुणान्विता ॥ १९ ॥<br><br>तपसा तोषिता देवी जनकेन गिरीन्द्रजा।<br>प्रायच्छज्जानकीं सीतां राममेवाश्रिता पतिम् ॥ २० ॥<br>प्रीतश्च भगवानीशस्त्रिशूली नीललोहितः।<br>प्रददौ शत्रुनाशार्थं जनकायाद्भुतं धनुः ॥ २१ ॥<br>स राजा जनको विद्वान् दातुकामः सुतामिमाम्।<br>अघोषयदमित्रघ्नो लोकेऽस्मिन् द्विजपुंगवाः ॥ २२ ॥<br>इदं धनुः समादातुं यः शक्नोति जगत्त्रये।<br>देवो वा दानवो वापि स सीतां लब्धुमर्हति ॥ २३ ॥ | भगीरथका भी श्रुत नामक पुत्र हुआ और उसका पुत्र हुआ नाभाग। उससे सिन्धुद्वीप हुआ। उस सिन्धुद्वीपका पुत्र अयुतायु और उसका पुत्र ऋतुपर्ण हुआ। ऋतुपर्णका सुदास नामका धार्मिक पुत्र हुआ। उसका पुत्र सौदास हुआ जो कल्माषपाद नामसे विख्यात हुआ॥ ११-१२॥<br>कल्माषपादके क्षेत्रमें महातेजस्वी वसिष्ठने इक्ष्वाकु-वंशके पताकारूप अश्मक नामक पुत्रको उत्पन्न कराया।<br>अश्मककी उत्कला नामक पत्नीसे नकुल नामक राजा उत्पन्न हुआ। वह राजा परशुरामके भयसे अत्यन्त दुःखित होकर वन चला गया। उसने ‘नारी-कवच’* धारण कर रखा था। उस (नकुल)-से शतरथ हुआ और उससे श्रीमान् बिलिबिश्रि उत्पन्न हुआ। उसका पुत्र वृद्धशर्मा था। उस वृद्धशर्मासे विश्वसह और उसका पुत्र खट्वाङ्ग नामसे विख्यात हुआ। उसका पुत्र दीर्घबाहु और उससे रघु उत्पन्न हुआ॥ १३-१६॥<br>रघुका अज उत्पन्न हुआ और उससे राजा दशरथ हुए। दशरथके पुत्र राम वीर, धर्मज्ञ और लोकमें प्रसिद्ध हुए। दशरथके ही पुत्र भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न भी थे। ये सभी महान् बलशाली, युद्धमें इन्द्रके समान और विष्णुकी शक्तिसे सम्पन्न थे। रावणका विनाश करनेके लिये विश्वकर्ता विष्णु ही इन लोगोंके रूपमें अंशरूपसे प्रकट हुए थे॥ १७-१८॥<br>रामकी सौभाग्यशालिनी कल्याणी पत्नी जनककी पुत्री सीता थीं। वे शील एवं उदारता आदि गुणोंसे सम्पन्न और तीनों लोकोंमें विख्यात थीं। जनकके द्वारा तपस्यासे संतुष्ट की गयी गिरिराजपुत्री पार्वतींने उन्हें जानकी सीताको प्रदान किया। सीताने रामको ही पति बनाया॥ १९-२०॥<br>त्रिशूल धारण करनेवाले, नीललोहित भगवान् ईश (शंकर)-ने प्रसन्न होकर शत्रुओंके विनाशके लिये जनकको अद्भुत धनुष प्रदान किया था। श्रेष्ठ द्विजो! उस विद्वान् शत्रुनाशक राजा जनकने इस कन्याका दान करनेकी इच्छासे संसारमें यह घोषणा करवायी कि देवता या दानव जो कोई भी इस धनुषको उठानेमें समर्थ होगा, वह सीताको प्राप्त कर सकता है॥ २१-२३॥ |
* परशुरामद्वारा पृथ्वीके क्षत्रियशून्य किये जानेके समय स्त्रियोंके मध्य रहकर नकुलने अपनी रक्षा की थी, इसलिये उसे 'नारी-कवच' कहा जाता है।
* अध्याय २० * । १३९
| विज्ञाय रामो बलवान् जनकस्य गृहं प्रभुः ।<br>भञ्जयामास चादाय गत्वासौ लीलयैव हि ॥ २४ ॥<br><br>उद्बवाह च तां कन्यां पार्वतीमिव शंकरः ।<br>रामः परमधर्मात्मा सेनामिव च षण्मुखः ॥ २५ ॥<br>ततो बहुतिथे काले राजा दशरथः स्वयम् ।<br>रामं ज्येष्ठं सुतं वीरं राजानं कर्तुमारभत् ॥ २६ ॥<br><br>तस्याथ पत्नी सुभगा कैकेयी चारुभाषिणी ।<br>निवारयामास पतिं प्राह सम्भ्रान्तमानसा ॥ २७ ॥<br><br>मत्सुतं भरतं वीरं राजानं कर्तुमर्हसि ।<br>पूर्वमेव वरो यस्माद् दत्तो मे भवता यतः ॥ २८ ॥<br>स तस्या वचनं श्रुत्वा राजा दुःखितमानसः ।<br>बाढमित्यब्रवीद् वाक्यं तथा रामोऽपि धर्मवित् ॥ २९ ॥<br><br>प्रणम्याथ पितुः पादौ लक्ष्मणेन सहाच्युतः ।<br>ययौ वनं सपत्नीकः कृत्वा समयमात्मवान् ॥ ३० ॥<br><br>संवत्सराणां चत्वारि दश चैव महाबलः ।<br>उवास तत्र मतिमान् लक्ष्मणेन सह प्रभुः ॥ ३१ ॥<br><br>कदाचिद् वसतोऽरण्ये रावणो नाम राक्षसः ।<br>परिव्राजकवेषेण सीतां हृत्वा ययौ पुरीम् ॥ ३२ ॥<br><br>अदृष्ट्वा लक्ष्मणो रामः सीतामाकुलितेन्द्रियौ ।<br>दुःखशोकाभिसंतप्तौ बभूवतुररिंदमौ ॥ ३३ ॥<br>ततः कदाचित् कपिना सुग्रीवेण द्विजोत्तमाः ।<br>वानराणामभूत् सख्यं रामस्याक्लिष्टकर्मणः ॥ ३४ ॥<br>सुग्रीवस्यानुगो वीरो हनुमान् नाम वानरः ।<br>वायुपुत्रो महातेजा रामस्यासीत् प्रियः सदा ॥ ३५ ॥<br>स कृत्वा परमं धैर्यं रामाय कृतनिश्चयः ।<br>आनयिष्यामि तां सीतामित्युक्त्वा विचचार ह ॥ ३६ ॥<br>महीं सागरपर्यन्तां सीतादर्शनतत्परः ।<br>जगाम रावणपुरीं लङ्कां सागरसंस्थिताम् ॥ ३७ ॥<br>तत्राथ निर्जने देशे वृक्षमूले शुचिस्मिताम् ।<br>अपश्यदमलां सीतां राक्षसीभिः समावृताम् ॥ ३८ ॥<br>अश्रुपूर्णेक्षणां हृद्यां संस्मरन्तीमनिन्दिताम् ।<br>राममिन्दीवरश्यामं लक्ष्मणं चात्मसंस्थितम् ॥ ३९ ॥ | ऐसा जानकर बलवान् प्रभु रामने जनकके घर जाकर उस धनुषको उठाकर खेल-खेलमें ही तोड़ डाला। तदनन्तर परम धर्मात्मा रामने उस कन्याका उसी प्रकार पाणिग्रहण किया, जैसे शंकरने पार्वतीका और कार्तिकेयने सेना (देवसेना)-का पाणिग्रहण किया ॥ २४-२५ ॥<br><br>तदनन्तर बहुत दिन बीत जानेपर राजा दशरथने स्वयं अपने बड़े पुत्र वीर रामको युवराज बनानेका कार्य आरम्भ किया। तब उनकी सौभाग्यशालिनी मधुरभाषिणी कैकेयी नामक पत्नीने भ्रान्तमन होकर पतिको (रामके राज्याभिषेकसे) रोका और कहा कि मेरे वीर पुत्र भरतको राजा बनायें, क्योंकि आपने पहले मुझे वर दे रखा है ॥ २६-२८ ॥<br><br>उसका वचन सुनकर उस राजाने अत्यन्त दुःखित-मनसे कहा—‘अच्छा, ऐसा ही हो’। तब धर्मको जाननेवाले आत्मवान् अच्युत राम भी पिताके चरणोंमें प्रणामकर (वनवासकी) प्रतिज्ञा कर लक्ष्मणके साथ सपत्नीक वनको चले गये। बुद्धिमान् तथा महाबलवान् प्रभु (श्रीराम) भी चौदह वर्षतक लक्ष्मणके साथ वहाँ (वनमें) रहे। वनमें निवास करते समय कभी रावण नामका राक्षस संन्यासीका वेष धारणकर सीताका हरण कर लिया और उन्हें अपनी पुरी (लंका)-में ले गया ॥ २९-३२ ॥<br><br>शत्रुनाशक राम और लक्ष्मण सीताको न देखकर दुःख एवं शोकसे अत्यन्त संतप्त हो गये और उनकी इन्द्रियाँ व्याकुल हो गयीं ॥ ३३ ॥<br><br>द्विजोत्तमो ! यथासमय अक्लिष्टकर्मा रामकी कपि सुग्रीव तथा वानरोंसे मित्रता हो गयी। वायुपुत्र महातेजस्वी वीर हनुमान् नामक वानर सुग्रीवके अनुगामी और सदा रामके प्रिय थे। वे परम धैर्य धारणकर 'उन सीताको लाऊँगा' इस प्रकार रामसे प्रतिज्ञापूर्वक कहकर सीताको देखनेके लिये तत्पर हो गये तथा सागरपर्यन्त सारी पृथ्वीपर विचरण करने लगे। (इस प्रकार सीताको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते) सागरमें बसी हुई रावणकी पुरी लंकामें गये। वहाँ उन्होंने राक्षसियोंसे घिरी हुई पवित्र, अश्रुपूर्ण आँखोंवाली, अनिन्दित, रमणीय तथा पवित्र सीताको निर्जन देशमें एक वृक्षके नीचे स्थित देखा। वहाँ भगवती सीता नीलकमलके समान श्यामवर्णवाले राम तथा आत्मसंयमी लक्ष्मणका स्मरण कर रही थीं ॥ ३४-३९ ॥ |
१४० * कूर्मपुराण *
निवेद्यित्वा चात्मानं सीतायै रहसि स्वयम्।
असंशयाय प्रददावस्यै रामाङ्गुलीयकम्॥ ४०॥
दृष्ट्वाङ्गुलीयकं सीता पत्युः परमशोभनम्।
मेने समागतं रामं प्रीतिविस्फारितेक्षणा॥ ४१॥
समाश्वास्य तदा सीतां दृष्ट्वा रामस्य चान्तिकम्।
नयिष्ये त्वां महाबाहुरुक्त्वा रामं ययौ पुनः॥ ४२॥
निवेद्यित्वा रामाय सीतादर्शनमात्मवान्।
तस्थौ रामेण पुरतो लक्ष्मणेन च पूजितः॥ ४३॥
ततः स रामो बलवान् सार्धं हनुमता स्वयम्।
लक्ष्मणेन च युद्धाय बुद्धिं चक्रे हि रक्षसाम्॥ ४४॥
कृत्वाथ वानरशतैर्लङ्कामार्गं महोदधेः।
सेतुं परमधर्मात्मा रावणं हतवान् प्रभुः॥ ४५॥
सपत्नीकं च ससुतं सभ्रातृकमरिंदमः।
आनयामास तां सीतां वायुपुत्रसहायवान्॥ ४६॥
सेतुमध्ये महादेवमीशानं कृत्तिवाससम्।
स्थापयामास लिङ्गस्थं पूजयामास राघवः॥ ४७॥
तस्य देवो महादेवः पार्वत्या सह शंकरः।
प्रत्यक्षमेव भगवान् दत्तवान् वरमुत्तमम्॥ ४८॥
यत् त्वया स्थापितं लिङ्गं द्रक्ष्यन्तीह द्विजातयः।
महापातकसंयुक्तास्तेषां पापं विनश्यतु॥ ४९॥
अन्यानि चैव पापानि स्नातस्यात्र महोदधौ।
दर्शनादेव लिङ्गस्य नाशं यान्ति न संशयः॥ ५०॥
यावत् स्थास्यन्ति गिरयो यावदेषा च मेदिनी।
यावत् सेतुश्च तावच्च स्थास्याम्यत्र तिरोहितः॥ ५१॥
स्नानं दानं जपः श्राद्धं भविष्यत्यक्षयं कृतम्।
स्मरणादेव लिङ्गस्य दिनपापं प्रणश्यति॥ ५२॥
इत्युक्त्वा भगवाञ्छम्भुः परिष्वज्य तु राघवम्।
सनन्दी सगणो रुद्रस्तत्रैवान्तरधीयत॥ ५३॥
रामोऽपि पालयामास राज्यं धर्मपरायणः।
अभिषिक्तो महातेजा भरतेन महाबलः॥ ५४॥
एकान्तमें सीताको स्वयं अपना परिचय देकर उनका संदेह मिटानेके लिये उन्होंने (श्रीहनुमान्ने) रामकी अंगूठी उन्हें प्रदान की॥ ४०॥
पतिकी परम सुन्दर अँगूठीको देखकर प्रीतिके कारण विस्फारित नेत्रोंवाली सीताने रामको (ही) आया हुआ माना। तब सीताको देखकर उन्होंने आश्वासन दिया और कहा—'मैं आपको रामके पास ले चलूँगा।' ऐसा कहकर महाबाहु (हनुमान्) पुनः रामके पास चले आये। आत्मवान् (हनुमान्) रामसे सीता-दर्शनकी बात बताकर सामने खड़े हो गये। राम-लक्ष्मणने उनको साधुवादसे सत्कृत किया॥ ४१–४३॥
तदनन्तर बलवान् रामने हनुमान् तथा लक्ष्मणके साथ राक्षसोंसे स्वयं युद्ध करनेका निश्चय किया। और सैकड़ों वानरोंद्वारा महासमुद्रमें लंका जानेके लिये मार्गके रूपमें पुलका निर्माण किया गया तथा उसी पुलके सहारे महासमुद्रको पारकर शत्रुहन्ता परम धर्मात्मा प्रभु (श्रीराम)-ने वायुपुत्र हनुमान्की सहायतासे पत्नियों, पुत्रों तथा भाइयोंसहित रावणको मार डाला और भगवती सीताको वापस ले आये॥ ४४–४६॥
राघवने सेतुके मध्यमें चर्माम्बर धारण करनेवाले महादेव ईशानकी लिङ्गरूपमें प्रतिष्ठाकर उनकी पूजा की। (इस रामेश्वर-प्रतिष्ठाके समय) पार्वतीसहित महादेव भगवान् शंकरदेवने प्रत्यक्ष रूपमें श्रेष्ठ वर प्रदान करते हुए श्रीरामसे कहा—'जो द्विजाति तुम्हारे द्वारा स्थापित इस (रामेश्वर) लिंगका दर्शन करेंगे उनके बड़े-से-बड़े पाप नष्ट हो जायँगे। महासमुद्रमें स्नान करनेवालेके अन्य जो भी पाप (अर्थात् उपपातक आदि) हैं वे इस लिंगके दर्शनमात्रसे ही नष्ट हो जायँगे, इसमें संदेह नहीं है। जबतक पर्वत स्थित रहेंगे, जबतक यह पृथ्वी रहेगी और जबतक यह सेतु रहेगा, तबतक मैं गुप्तरूपसे यहाँ प्रतिष्ठित रहूँगा। यहाँ किया गया स्नान, दान, जप तथा श्राद्ध अक्षय होगा। इस (रामेश्वर) लिंगके स्मरण करने मात्रसे ही दिनभरका पाप नष्ट हो जायगा॥ ४७–५२॥
ऐसा कहकर भगवान् शम्भुने रघुवंशी रामका आलिंगन किया और नन्दी तथा अपने गणोंके साथ वे रुद्र (शम्भु) वहीं अन्तर्धान हो गये। भरतके द्वारा अभिषिक्त होकर महाबली, महातेजस्वी तथा धर्मपरायण रामने भी राज्यका पालन किया॥ ५३-५४॥
- अध्याय २१ * | १४१ ---|---
विशेष रूपसे उन्होंने सभी ब्राह्मणोंकी पूजा की और अश्वमेध यज्ञके द्वारा यज्ञहन्ता* ईश्वर शंकरकी अर्चना की॥ ५५॥ | विशेषाद्ब्राह्मणान् सर्वान् पूजयामास चेश्वरम्।<br>यज्ञेन यज्ञहन्तारमश्वमेधेन शंकरम्॥ ५५॥ रामके ‘कुश’ नामसे विख्यात तथा सुन्दर महान् भाग्यशाली, सभी तत्त्वार्थोंको जाननेवाले बुद्धिमान् ‘लव’ नामसे विख्यात दो पुत्र हुए। कुशसे अतिथि उत्पन्न हुआ और उसका पुत्र निषध हुआ। निषधका पुत्र नल और उसका पुत्र नभस हुआ। नभससे पुण्डरीक नामवाला पुत्र हुआ और क्षेमधन्वा उसका पुत्र था। उस क्षेमधन्वाका देवानीक नामक वीर एवं प्रतापी पुत्र हुआ। उस (देवानीक)-का पुत्र अहीनगु और उसका पुत्र सहस्वान् हुआ। उससे चन्द्रावलोक तथा उसका पुत्र तारापीड हुआ। तारापीडसे चन्द्रगिरि तथा चन्द्रगिरिका भानुवित्त हुआ। उस (भानुवित्त)-से श्रुतायु नामक पुत्र हुआ। ये सभी इक्ष्वाकुके वंशज हैं। द्विजोत्तमो ! संक्षेपमें इनमें प्रधान-प्रधान (राजाओं)-को बताया गया है॥ ५६-६०॥ | रामस्य तनयो जज्ञे कुश इत्यभिविश्रुतः।<br>लवश्च सुमहाभागः सर्वतत्त्वार्थवित् सुधीः॥ ५६॥<br><br>अतिथिस्तु कुशाज्जज्ञे निषधस्तत्सुतोऽभवत्।<br>नलस्तु निषधस्याभून्नभस्तस्मादजायत॥ ५७॥<br><br>नभसः पुण्डरीकाख्यः क्षेमधन्वा च तत्सुतः।<br>तस्य पुत्रोऽभवद् वीरो देवानीकः प्रतापवान्॥ ५८॥<br><br>अहीनगुस्तस्य सुतो सहस्वांस्तत्सुतोऽभवत्।<br>तस्माच्चन्द्रावलोकस्तु तारापीडस्तु तत्सुतः॥ ५९॥<br><br>तारापीडाच्चन्द्रगिरिर्भानुवित्तस्ततोऽभवत् ।<br>श्रुतायुरभवत् तस्मादेते इक्ष्वाकुवंशजाः।<br>सर्वे प्राधान्यतः प्रोक्ताः समासेन द्विजोत्तमाः॥ ६०॥ जो इस श्रेष्ठ इक्ष्वाकुवंशके वर्णनको सुनेगा, वह सभी पापोंसे निर्मुक्त होकर स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होगा॥ ६१॥ | य इमं शृणुयान्नित्यमिक्ष्वाकोर्वंशमुत्तमम्।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो स्वर्गलोके महीयते॥ ६१॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे विंशोऽध्यायः॥ २०॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें बीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ २०॥
इक्कीसवाँ अध्याय
चन्द्रवंशके राजाओंका वृत्तान्त, यदुवंश-वर्णनमें कार्तवीर्यार्जुनके पाँच पुत्रोंका आख्यान, परम विष्णुभक्त राजा जयध्वजकी कथा, विदेह दानवका पराक्रम तथा जयध्वजद्वारा विष्णुके अनुग्रहसे उसका वध, विश्वामित्रद्वारा विष्णुकी आराधनाका जयध्वजको उपदेश करना और जयध्वजको विष्णुका दर्शन
| रोमहर्षण उवाच | रोमहर्षणने कहा—इलाका पुत्र राजा पुरूरवा राज्यका पालन करने लगा। उसको इन्द्रके समान तेजस्वी आयु, मायू, अमावायु, वीर्यवान् विश्वायु, शतायु तथा श्रुतायु नामवाले छः पुत्र हुए। ये उर्वशीके दिव्य पुत्र थे॥ १-२॥ |
|---|---|
| ऐलः पुरूरवाश्चाथ राजा राज्यमपालयत्।<br>तस्य पुत्रा बभूवुर्हि षडिन्द्रसमतेजसः॥ १॥<br>आयुर्मायुरमावायुर्विश्वायुश्चैव वीर्यवान्।<br>शतायुश्च श्रुतायुश्च दिव्याश्चैवोर्वशीसुताः॥ २॥ | |
| आयुषस्तनया वीराः पञ्चैवासन् महौजसः।<br>स्वर्भानुतनुयायां वै प्रभायामिति नः श्रुतम्॥ ३॥<br>नहुषः प्रथमस्तेषां धर्मज्ञो लोकविश्रुतः।<br>नहुषस्य तु दायादाः षडिन्द्रोपमतेजसः॥ ४॥ | हमने सुना है कि आयुको स्वर्भानु (राहु)-की कन्या प्रभासे पाँच महान् ओजस्वी पुत्र हुए थे। उनमें नहुष प्रथम (पुत्र) था, जो धर्मज्ञ और लोकमें विख्यात था। |
* भगवान् शंकरने दक्षके यज्ञका विध्वंस कराया था इसलिये उनको यज्ञहन्ता कहा जाता है।
| १४२ | * कूर्मपुराण * |
|---|
| उत्पन्नाः पितृकन्यायां विरजायां महाबलाः।<br>यतिर्ययातिः संयातिरायतिः पञ्चकोऽश्वकः ॥ ५ ॥ | पितरोंकी कन्या विरजासे नहुषको यति, ययाति, संयाति, आयति तथा पाँचवें अश्वक नामवाले इन्द्रके समान तेजस्वी महाबलशाली पाँच पुत्र उत्पन्न हुए। इन पाँचोंमेंसे ययाति महान् बलशाली और पराक्रमी था। उसने शुक्राचार्यकी पुत्री देवयानी तथा वृषपर्वाकी असुर-वंशमें उत्पन्न शर्मिष्ठा नामकी कन्याको पत्नीरूपमें प्राप्त किया ॥ ३–६ ॥ |
| तेषां ययातिः पञ्चानां महाबलपराक्रमः।<br>देवयानीमुशनसः सुतां भार्यामवाप सः।<br>शर्मिष्ठामासुरीं चैव तनयां वृषपर्वणः ॥ ६ ॥<br>यदुं च तुर्वसुं चैव देवयानी व्यजायत।<br>द्रुह्युं चानुं च पूरुं च शर्मिष्ठा चाप्यजीजनत् ॥ ७ ॥ | देवयानीने यदु तथा तुर्वसुको जन्म दिया। इसी प्रकार शर्मिष्ठाने भी द्रुह्यु, अनु तथा पूरुको उत्पन्न किया। उस (ययाति)–ने अनिन्दित ज्येष्ठ पुत्र यदुका अतिक्रमणकर पिताके वचनका पालन करनेवाले छोटे पुत्र पूरुको ही (राजपदपर) अभिषिक्त किया ॥ ७–८ ॥ |
| सोऽभ्यषिञ्चदतिक्रम्य ज्येष्ठं यदुमनिन्दितम्।<br>पूरुमेव कनीयांसं पितुर्वचनपालकम् ॥ ८ ॥<br>दिशि दक्षिणपूर्वस्यां तुर्वसुं पुत्रमादिशत्।<br>दक्षिणापरयो राजा यदुं ज्येष्ठं न्ययोजयत्।<br>प्रतीच्यामुत्तरायां च द्रुह्युं चानुमकल्पयत् ॥ ९ ॥ | राजा ययातिने दक्षिण-पूर्व दिशामें तुर्वसु नामक पुत्रको, दक्षिण-पश्चिम दिशामें ज्येष्ठ पुत्र यदुको, पश्चिममें द्रुह्युको और उत्तर दिशामें अनुको (राजाके रूपमें) नियुक्त किया। उन्होंने इस सम्पूर्ण पृथ्वीका धर्मपूर्वक पालन किया। महायशस्वी राजा (ययाति) भी पत्नीसहित वन चले गये। यदुके भी देवपुत्रोंके समान सहस्रजित्, क्रोष्टु, नील, अजित तथा रघु नामक पाँच पुत्र हुए, उनमें सहस्रजित् सबसे बड़ा था ॥ ९–११ ॥ |
| तैरियं पृथिवी सर्वा धर्मतः परिपालिता।<br>राजापि दारसहितो वनं प्राप महायशाः ॥ १० ॥ | |
| यदोरप्यभवन् पुत्राः पञ्च देवसुतोपमाः।<br>सहस्रजित् तथा ज्येष्ठः क्रोष्टुर्नीलोऽजितो रघुः ॥ ११ ॥ | |
| सहस्रजित्सुतस्तद्वच्छतजिन्नाम पार्थिवः।<br>सुताः शतजितोऽप्यासंस्त्रयः परमधार्मिकाः ॥ १२ ॥<br>हैहयश्च हयश्चैव राजा वेणुहयः परः।<br>हैहयस्याभवत् पुत्रो धर्म इत्यभिविश्रुतः ॥ १३ ॥ | सहस्रजित्का उसीके समान शतजित् नामका पुत्र राजा था। शतजित्के भी हैहय, हय और वेणुहय नामक परम धार्मिक तीन पुत्र थे। हैहयका पुत्र 'धर्म' नामसे विख्यात हुआ ॥ १२–१३ ॥ |
| तस्य पुत्रोऽभवद् विप्रा धर्मनेत्रः प्रतापवान्।<br>धर्मनेत्रस्य कीर्तिस्तु संजितस्तत्सुतोऽभवत् ॥ १४ ॥ | विप्रो ! उसका (धर्मका) धर्मनेत्र नामवाला प्रतापी पुत्र हुआ। धर्मनेत्रका कीर्ति और उसका पुत्र संजित हुआ। संजितका महिष्मान् हुआ और उसका पुत्र भद्रश्रेण्य था। भद्रश्रेण्यका दुर्दम नामका पुत्र राजा था। दुर्दमका धनक नामवाला बुद्धिमान् और वीर्यवान् पुत्र था। धनकके लोकमें सम्मानित चार पुत्र हुए—कृतवीर्य, कृताग्नि, कृतवर्मा तथा चौथा कृतौजा। कृतवीर्यका पुत्र अर्जुन हुआ। वह हजार बाहुओंवाला, द्युतिमान् तथा धनुर्वेद जाननेवालोंमें श्रेष्ठ था। जमदग्निके पुत्र जनार्दन परशुराम उस (सहस्रार्जुन)–के लिये मृत्युरूप हुए। (अर्थात् परशुरामके द्वारा वह मारा गया) ॥ १४–१८ ॥ |
| महिष्मान् संजितस्याभूद् भद्रश्रेण्यस्तदन्वयः।<br>भद्रश्रेण्यस्य दायादो दुर्दम्रो नाम पार्थिवः ॥ १५ ॥ | |
| दुर्दमस्य सुतो धीमान् धनको नाम वीर्यवान्।<br>धनकस्य तु दायादाश्चत्वारो लोकसम्मिताः ॥ १६ ॥ | |
| कृतवीर्यः कृताग्निश्च कृतवर्मा तथैव च।<br>कृतौजाश्च चतुर्थोऽभूत् कार्तवीर्योऽर्जुनोऽभवत् ॥ १७ ॥ | |
| सहस्रबाहुर्धृतिमान् धनुर्वेदविदां वरः।<br>तस्य रामोऽभवन्मृत्युर्जामदग्न्यो जनार्दनः ॥ १८ ॥ | |
| तस्य पुत्रशतान्यासन् पञ्च तत्र महारथाः।<br>कृतास्त्रा बलिनः शूरा धर्मात्मानो मनस्विनः ॥ १९ ॥ | उस (सहस्रबाहु)–के सौ पुत्र थे, जिनमें पाँच पुत्र महारथी, अस्त्र-सम्पन्न, बली, शूर, धर्मात्मा तथा मनस्वी थे ॥ १९ ॥ |
- अध्याय २१ * । १४३
| शूरश्च शूरसेनश्च धृष्णः कृष्णस्तथैव च।<br>जयध्वजश्च बलवान् नारायणपरो नृपः ॥ २० ॥<br>शूरसेनादयः सर्वे चत्वारः प्रथितौजसः।<br>रुद्रभक्ता महात्मानः पूजयन्ति स्म शंकरम् ॥ २१ ॥<br>जयध्वजस्तु मतिमान् देवं नारायणं हरिम्।<br>जगाम शरणं विष्णुं दैवतं धर्मतत्परः ॥ २२ ॥<br>तमूचुरितरे पुत्रा नायं धर्मस्तवानघ।<br>ईश्वराराधनरतः पितास्माकमभूदिति ॥ २३ ॥ | शूर, शूरसेन, धृष्ण, कृष्ण तथा पाँचवाँ पुत्र राजा जयध्वज बलवान् तथा नारायणका भक्त था। शूरसेन आदि चार पुत्र महात्मा एवं अति तेजस्वी और रुद्रके भक्त थे। वे सभी शंकरकी पूजा करते थे। धर्मपरायण एवं बुद्धिमान् जयध्वज नारायण देव हरि विष्णु देवताकी शरणमें गया। अन्य पुत्रों (उसके चार भाइयों)-ने उससे कहा—अनघ! यह तुम्हारा धर्म नहीं है। हमारे पिता शंकरकी आराधना करते थे ॥ २०—२३ ॥ |
| तानब्रवीन्महातेजा एष धर्मः परो मम।<br>विष्णोरंशेन सम्भूता राजानो यन्महीतले ॥ २४ ॥<br>राज्यं पालयतावश्यं भगवान् पुरुषोत्तमः।<br>पूजनीयो यतो विष्णुः पालको जगतो हरिः ॥ २५ ॥<br>सात्त्विकी राजसी चैव तामसी च स्वयम्भुवः।<br>तिस्रस्तु मूर्तयः प्रोक्ताः सृष्टिस्थित्यन्तहेतवः ॥ २६ ॥<br>सत्त्वात्मा भगवान् विष्णुः संस्थापयति सर्वदा।<br>सृजेद् ब्रह्मा रजोमूर्तिः संहरेत् तामसो हरः ॥ २७ ॥<br>तस्मान्महीपतीनां तु राज्यं पालयतामयम्।<br>आराध्यो भगवान् विष्णुः केशवः केशिमर्दनः ॥ २८ ॥ | इसपर महातेजस्वी (जयध्वज)-ने उनसे कहा—यही मेरा श्रेष्ठ धर्म है। पृथ्वीपर जो भी राजा हुए हैं, वे सभी विष्णुके अंशसे उत्पन्न हुए हैं। राज्यका परिपालन करनेवालोंको चाहिये कि भगवान् पुरुषोत्तमकी अवश्य आराधना करें। क्योंकि हरि विष्णु संसारके पालनकर्ता हैं। स्वयम्भू (विष्णु)-की सात्त्विकी, राजसी तथा तामसी—ये तीन मूर्तियाँ कही गयी हैं, जो क्रमशः सृष्टि, पालन तथा संहार करनेवाली हैं। सत्त्वगुणसम्पन्न भगवान् विष्णु नित्य पालन करते हैं। रजोमूर्ति ब्रह्मा सृष्टि करते हैं और तमोगुणात्मक हर संहार करते हैं। अतएव राज्यका पालन करनेवाले राजाओंके लिये केशीका मर्दन करनेवाले केशव भगवान् विष्णु आराधनीय हैं॥ २४—२८॥ |
| निशम्य तस्य वचनं भ्रातरोऽन्ये मनस्विनः।<br>प्रोचुः संहारकृद् रुद्रः पूजनीयो मुमुक्षुभिः ॥ २९ ॥<br>अयं हि भगवान् रुद्रः सर्वं जगदिदं शिवः।<br>तमोगुणं समाश्रित्य कल्पान्ते संहरेत् प्रभुः ॥ ३० ॥<br>या सा घोरतरा मूर्तिरस्य तेजोमयी परा।<br>संहरेद् विद्यया सर्वं संसारं शूलभृत् तया ॥ ३१ ॥ | उस (जयध्वज)-का वचन सुनकर उसके दूसरे मनस्वी भाइयोंने कहा—मुक्तिप्राप्तिकी इच्छा करनेवालोंके लिये संहार करनेवाले रुद्र ही पूजनीय हैं। ये ही कल्याणकारी प्रभु भगवान् रुद्र कल्पान्तमें तमोगुणका आश्रय लेकर इस सम्पूर्ण जगत्का संहार करते हैं। इनकी जो अति घोर तेजोमयी परा मूर्ति है, वही विद्या (ज्ञान-विवेक)-स्वरूप है। शक्ति-रूपमें उसीके द्वारा त्रिशूल धारण करनेवाले शंकर सम्पूर्ण संसारका संहार करते हैं ॥ २९—३१ ॥ |
| ततस्तानब्रवीद् राजा विचिन्त्यासौ जयध्वजः।<br>सत्त्वेन मुच्यते जन्तुः सत्त्वात्मा भगवान् हरिः ॥ ३२ ॥ | तब वह राजा जयध्वज कुछ विचार करके उनसे बोला—सत्त्वगुणद्वारा ही प्राणी मुक्त होता है और वे भगवान् सत्त्वात्मक हैं ॥ ३२ ॥ |
| तमूचुर्भ्रातरो रुद्रः सेवितः सात्त्विकैर्जनैः।<br>मोचयेत् सत्त्वसंयुक्तः पूजयेशं ततो हरम् ॥ ३३ ॥ | इसपर भाइयोंने उससे कहा—सात्त्विकजनोंके द्वारा सेवित रुद्र सत्त्वगुणसे सम्पन्न होकर मुक्त करते हैं, अतः ईश्वर हरकी पूजा करो। |
| अथाब्रवीद् राजपुत्रः प्रहसन् वै जयध्वजः।<br>स्वधर्मो मुक्तये पन्था नान्यो मुनिभिरिष्यते ॥ ३४ ॥ | तब राजपुत्र जयध्वजने हँसते हुए कहा—मुक्तिके लिये स्वधर्म-पालन ही एकमात्र मार्ग है। मुनिलोग अन्य (धर्म)-की इच्छा नहीं करते ॥ ३३-३४ ॥ |
| १४४ | * कूर्मपुराण * |
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| तथा च वैष्णवी शक्तिर्नृपाणां देवता सदा।<br>आराधनं परो धर्मो मुरारेरमितौजसः॥ ३५॥<br><br>तमब्रवीद् राजपुत्रः कृष्णो मतिमतां वरः।<br>यदर्जुनोऽस्मज्जनकः स्वधर्मं कृतवानिति॥ ३६॥<br><br><br>एवं विवादे वितते शूरसेनोऽब्रवीद् वचः।<br>प्रमाणमृषयो ह्यत्र ब्रूयुस्ते यत् तथैव तत्॥ ३७॥<br>ततस्ते राजशार्दूलाः पप्रच्छुर्ब्रह्मवादिनः।<br>गत्वा सर्वे सुसंरब्धाः सप्तर्षीणां तदाश्रमम्॥ ३८॥<br>तानब्रुवंस्ते मुनयो वसिष्ठाद्या यथार्थतः।<br>या यस्याभिमता पुंसः सा हि तस्यैव देवता॥ ३९॥<br><br>किन्तु कार्यविशेषेण पूजिताश्चेष्टदा नृणाम्।<br>विशेषात् सर्वदा नायं नियमो ह्यन्यथा नृपाः॥ ४०॥<br><br>नृपाणां दैवतं विष्णुस्तथैव च पुरंदरः।<br>विप्राणामग्निरादित्यो ब्रह्मा चैव पिनाकधृक्॥ ४१॥<br><br>देवानां दैवतं विष्णुर्दानवानां त्रिशूलभृत्।<br>गन्धर्वाणां तथा सोमो यक्षाणामपि कथ्यते॥ ४२॥<br>विद्याधराणां वाग्देवी साध्यानां भगवान् रविः।<br>रक्षसां शंकरो रुद्रः किंनराणां च पार्वती॥ ४३॥<br>ऋषीणां दैवतं ब्रह्मा महादेवश्च शूलभृत्।<br>मनूनां स्यादुमा देवी तथा विष्णुः सभास्करः॥ ४४॥<br>गृहस्थानां च सर्वे स्युर्ब्रह्मा वै ब्रह्मचारिणाम्।<br>वैखानसानामर्कः स्याद् यतीनां च महेश्वरः॥ ४५॥<br>भूतानां भगवान् रुद्रः कूष्माण्डानां विनायकः।<br>सर्वेषां भगवान् ब्रह्मा देवदेवः प्रजापतिः॥ ४६॥<br>इत्येवं भगवान् ब्रह्मा स्वयं देवोऽभ्यभाषत।<br>तस्माज्जयध्वजो नूनं विष्ण्वाराधनमर्हति॥ ४७॥<br><br>तान् प्रणम्याथ ते जग्मुः पुरीं परमशोभनाम्।<br>पालयाञ्चक्रिरे पृथ्वीं जित्वा सर्वरिपून् रणे॥ ४८॥ | साथ ही राजाओंके लिये वैष्णवी शक्ति ही सदा देवता-रूप है। अमित तेजस्वी मुरारिकी आराधना करना परम धर्म है॥ ३५॥<br>तब बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ राजपुत्र कृष्ण (जयध्वजके भाई)-ने उससे (जयध्वजसे) कहा—हम लोगोंके पिता अर्जुनने (सहस्रार्जुन या कार्तवीर्यार्जुनने) जिसे स्वधर्म माना है (वही हम लोगोंको भी मान्य होना चाहिये)। इस प्रकार विवादके बढ़ जानेपर शूरसेन (जयध्वजके दूसरे भाई)-ने यह बात कही—इस विषयमें ऋषि ही प्रमाण हैं, अतः वे जैसा कहेंगे, हम लोगोंको वैसा ही करना चाहिये॥ ३६-३७॥<br>तदनन्तर वे सभी राजश्रेष्ठ तैयार होकर सप्तर्षियोंके आश्रममें गये और (उन) ब्रह्मवादियोंसे पूछा—वसिष्ठ आदि उन मुनियोंने तत्त्वकी बात बताते हुए उनसे कहा—जिस पुरुषको जो देवता अभिमत हो, वही उसका अभीष्ट देवता है। किंतु किसी विशेष कार्यसे पूजित (तत्तद्-देवता) मनुष्योंको अभीष्ट फल प्रदान करते हैं। राजाओ! विशेष अर्थात् किसी उद्देश्यसे की जानेवाली पूजा सदा नहीं की जाती, क्योंकि कामनापरक आराधनाके नियम दूसरे प्रकारके होते हैं (वे सदा सब स्थितियोंमें पालनीय नहीं हो सकते)। राजाओंके देवता विष्णु और इन्द्र हैं। ब्राह्मणोंके देवता अग्नि, सूर्य, ब्रह्मा तथा पिनाकधारी शिव हैं। देवताओंके देवता विष्णु और दानवोंके त्रिशूलधारी शिव हैं। गन्धर्वों और यक्षोंके देवता सोम कहे गये हैं॥ ३८–४२॥<br>विद्याधरोंके देवता वाग्देवी तथा साध्योंके भगवान् सूर्य हैं। राक्षसोंके शंकर रुद्र और किंनरोंकी देवता पार्वती हैं। ऋषियोंके देवता ब्रह्मा और त्रिशूलधारी महादेव हैं। मनुष्योंके देवता उमा देवी, विष्णु तथा सूर्य हैं। गृहस्थोंके लिये सभी देवता (पूज्य) हैं। ब्रह्मचारियोंके देवता ब्रह्मा, वैखानसोंके सूर्य तथा संन्यासियोंके महेश्वर देवता हैं। भूतोंके भगवान् रुद्र, कूष्माण्डोंके विनायक और देवाधि-देव प्रजापति भगवान् ब्रह्मा सभीके देवता हैं॥ ४३–४६॥<br>(सप्तर्षियोंने कहा) स्वयं भगवान् ब्रह्माने ही यह कहा है, इसलिये निश्चित ही जयध्वज विष्णुकी आराधना करनेके योग्य हैं। तब वे सभी उन्हें प्रणामकर परम सुन्दर अपनी पुरीको चले गये और युद्धमें सभी शत्रुओंको जीतकर पृथ्वीका पालन करने लगे॥ ४७-४८॥ |
| * अध्याय २१ * | १४५ |
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| ततः कदाचिद् विप्रेन्द्रा विदेहो नाम दानवः ।<br>भीषणः सर्वसत्त्वानां पुरीं तेषां समाययौ ॥ ४९ ॥<br><br>दंष्ट्राकरालो दीप्तात्मा युगान्तदहनोपमः ।<br>शूलमादाय सूर्याभं नादयन् वै दिशो दश ॥ ५० ॥<br><br>तन्नादश्रवणान्मर्त्यास्तत्र ये निवसन्ति ते ।<br>तत्यजुर्जीवितं त्वन्ये दुद्रुवुर्भयविह्वलाः ॥ ५१ ॥<br><br>ततः सर्वे सुसंयत्ताः कार्तवीर्यात्मजास्तदा ।<br>युयुधुर्दानवं शक्तिगिरिकूटासिमुद्गरैः ॥ ५२ ॥<br><br>तान् सर्वान् दानवो विप्राः शूलेन प्रहसन्निव ।<br>वारयामास घोरात्मा कल्पान्ते भैरवो यथा ॥ ५३ ॥<br><br>शूरसेनादयः पञ्च राजानस्तु महाबलाः ।<br>युद्धाय कृतसंरम्भा विदेहं त्वभिदुद्रुवुः ॥ ५४ ॥<br><br>शूरोऽस्त्रं प्राहिणोद् रौद्रं शूरसेनस्तु वारुणम् ।<br>प्राजापत्यं तथा कृष्णो वायव्यं धृष्ण एव च ॥ ५५ ॥<br><br>जयध्वजश्च कौबेरमैन्द्रमाग्नेयमेव च ।<br>भञ्जयामास शूलेन तान्यस्त्राणि स दानवः ॥ ५६ ॥<br><br>ततः कृष्णो महावीर्यो गदामादाय भीषणाम् ।<br>स्पृष्ट्वा मन्त्रेण तरसा चिक्षेप च ननाद च ॥ ५७ ॥<br><br>सम्प्राप्य सा गदाऽस्योरो विदेहस्य शिलोपमम् ।<br>न दानवं चालयितुं शशाकान्तकसंनिभम् ॥ ५८ ॥<br><br>दुद्रुवुस्ते भयग्रस्ता दृष्ट्वा तस्यातिपौरुषम् ।<br>जयध्वजस्तु मतिमान् सस्मार जगतः पतिम् ॥ ५९ ॥<br><br>विष्णुं ग्रसिष्णुं लोकादिमप्रमेयमनामयम् ।<br>त्रातारं पुरुषं पूर्वं श्रीपतिं पीतवाससम् ॥ ६० ॥<br><br>ततः प्रादुरभूच्चक्रं सूर्यायुतसमप्रभम् ।<br>आदेशाद् वासुदेवस्य भक्तानुग्रहकारणात् ॥ ६१ ॥<br><br>जग्राह जगतां योनिं स्मृत्वा नारायणं नृपः ।<br>प्राहिणोद् वै विदेहाय दानवेभ्यो यथा हरिः ॥ ६२ ॥<br><br>सम्प्राप्य तस्य घोरस्य स्कन्धदेशं सुदर्शनम् ।<br>पृथिव्यां पातयामास शिरोऽद्रिशिखराकृति ॥ ६३ ॥<br><br>तस्मिन् हते देवरिपौ शूराद्या भ्रातरो नृपाः ।<br>समाययुः पुरीं रम्यां भ्रातरं चाप्यपूजयन् ॥ ६४ ॥<br><br>श्रुत्वाजगाम भगवान् जयध्वजपराक्रमम् ।<br>कार्तवीर्यसुतं द्रष्टुं विश्वामित्रो महामुनिः ॥ ६५ ॥ | विप्रेन्द्रो ! तदनन्तर किसी दिन सभी प्राणियोंके लिये भयंकर विदेह नामका दानव उनकी पुरीमें चला आया। भयंकर दाढ़ोंवाला, प्रलयकालीन अग्निके समान उद्दीप्त (वह दानव) सूर्यके समान चमकते हुए शूलको लेकर दसों दिशाओंमें गरजने लगा। उसकी (भयंकर) गर्जनाको सुनकर वहाँ रहनेवाले कुछ मनुष्योंने प्राण त्याग दिये और दूसरे भयसे विह्वल होकर भाग पड़े ॥ ४९–५१ ॥<br><br>तब कार्तवीर्यके सभी पुत्र सावधान होकर शक्ति (सेना), पर्वतशिला, तलवार तथा मुद्गरोंसे उस दानवके साथ युद्ध करने लगे। ब्राह्मणो! उस भयंकर दानवने शूलसे उन सभीका हँसते हुए वैसे ही निवारण कर दिया जैसे प्रलयकालमें भैरव करते हैं। तब महाबली शूरसेन आदि वे पाँच राजा युद्धके लिये तैयारी कर विदेह दानवपर टूट पड़े ॥ ५२–५४ ॥<br><br>शूरने रौद्रास्त्र, शूरसेनने वारुणास्त्र, कृष्णने प्राजापत्यास्त्र, धृष्णने वायव्यास्त्र और जयध्वजने कौबेर, ऐन्द्र तथा आग्नेयास्त्र चलाया, किंतु उस दानवने शूलसे उन सभी अस्त्रोंको तोड़ डाला। तब महावीर्यशाली कृष्णने भीषण गदा लेकर मन्त्रसे उसे अभिमन्त्रित कर वेगपूर्वक फेंका और गर्जना की। वह गदा उस विदेहकी पत्थरके समान छातीपर लगकर भी यमराज-तुल्य उस दानवको विचलित करनेमें समर्थ न हो सकी ॥ ५५–५८ ॥<br><br>उसके महान् पौरुषको देखकर भयग्रस्त हो वे सभी भागने लगे। तब बुद्धिमान् जयध्वजने अप्रमेय, अनामय, लोकादि, ग्रसिष्णु, त्राणकर्ता, पूर्वपुरुष, श्रीपति और पीताम्बरधारी जगत्पति विष्णुका स्मरण किया। स्मरण करते ही भक्तपर अनुग्रह करनेके लिये वासुदेवकी आज्ञासे दस हजार सूर्योंके समान प्रकाशमान चक्र प्रकट हुआ। राजा (जयध्वज)-ने जगद्योनि नारायणका ध्यानकर उस चक्रको ग्रहण किया और विदेह (दानव)-पर उसी प्रकार चलाया जैसे विष्णु दानवोंपर चलाते हैं ॥ ५९–६२ ॥<br><br>सुदर्शनचक्र उस भयंकर दानवके कंधेपर लगा और उसने उसके पर्वत-शिखरके समान सिरको पृथ्वीपर गिरा दिया। देवताओंके शत्रु उस (विदेह दानव)-के मारे जानेपर राजा शूर आदि सभी भाई अपनी रमणीय पुरीमें चले आये और उन्होंने भाई (जयध्वज)-की पूजा की। महामुनि भगवान् विश्वामित्र जयध्वजके पराक्रमको सुनकर उस कीर्तवीर्यपुत्रको देखने आये ॥ ६३–६५ ॥ |