संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
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* अध्याय १८ * ३३७
अठारहवाँ अध्याय
गृहस्थके नित्यकर्मोंका वर्णन, प्रातःस्नानकी महिमा, छः प्रकारके स्नान, संध्योपासनकी महिमा तथा संध्योपासनविधि, सूर्योपस्थानका माहात्म्य, सूर्यहृदयस्तोत्र, अग्निहोत्रकी विधि, तर्पणकी विधि, नित्य किये जानेवाले पञ्चमहायज्ञोंकी महिमा तथा उनका विधान
| ऋषय ऊचुः<br>अहन्यहनि कर्तव्यं ब्राह्मणानां महामुने।<br>तदाचक्ष्वाखिलं कर्म येन मुच्येत बन्धनात् ॥ १ ॥ | ऋषियोंने कहा— महामुने! आप द्विजोंके प्रतिदिन किये जानेवाले उन कर्मोंका सम्पूर्ण-रूपसे वर्णन करें, जिनका अनुष्ठान करनेसे बन्धनसे मुक्ति प्राप्त होती है॥ १॥ |
| व्यास उवाच<br>वक्ष्ये समाहिता यूयं शृणुध्वं गदतो मम।<br>अहन्यहनि कर्तव्यं ब्राह्मणानां क्रमाद् विधिम्॥ २ ॥<br><br>ब्राह्मे मुहूर्ते तूत्थाय धर्ममर्थं च चिन्तयेत्।<br>कायक्लेशं तदुद्भूतं ध्यायीत मनसेश्वरम्॥ ३ ॥<br><br>उषःकालेऽथ सम्प्राप्ते कृत्वा चावश्यकं बुधः।<br>स्नायान्नदीषु शुद्धासु शौचं कृत्वा यथाविधि॥ ४ ॥<br><br>प्रातःस्नानेन पूयन्ते येऽपि पापकृतो जनाः।<br>तस्मात् सर्वप्रयत्नेन प्रातःस्नानं समाचरेत्॥ ५ ॥ | व्यासजी बोले— मैं बतला रहा हूँ। आप लोग ध्यानपूर्वक मेरे द्वारा कहे जा रहे ब्राह्मणोंके प्रतिदिन किये जानेवाले कर्मोंको और उनके विधानको सुनें<sup>१</sup>। ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर धर्म और अर्थ एवं (उनकी सम्पन्नताके लिये) अपेक्षित शारीरिक आयास (क्या कब कैसे करना है आदि)-का चिन्तन करे तथा मनसे ईश्वरका ध्यान करे। बुद्धिमान्को चाहिये कि ऊषाकाल होनेपर आवश्यक कर्मोंको करके विधिपूर्वक शौच आदिसे निवृत्त होकर शुद्ध जलवाली नदियोंमें स्नान करे। प्रातःस्नान करनेसे पाप करनेवाले व्यक्ति भी पवित्र हो जाते हैं। इसलिये सभी प्रकारके प्रयत्नोंसे प्रातःकाल स्नान करना चाहिये॥ २–५॥ |
| प्रातःस्नानं प्रशंसन्ति दृष्टादृष्टकरं शुभम्।<br>ऋषीणामृषिता नित्यं प्रातःस्नानान्न संशयः॥ ६ ॥<br><br>मुखे सुप्तस्य सततं लाला याः संस्रवन्ति हि।<br>ततो नैवाचरेत् कर्म अकृत्वा स्नानमादितः॥ ७ ॥<br><br>अलक्ष्मीः कालकर्णी च दुःस्वप्नं दुर्विचिन्तितम्।<br>प्रातःस्नानेन पापानि पूयन्ते नात्र संशयः॥ ८ ॥<br><br>न च स्नानं विना पुंसां पावनं कर्म सुस्मृतम्।<br>होमे जप्ये विशेषेण तस्मात् स्नानं समाचरेत्॥ ९ ॥<br><br>अशक्तावशिरस्कं वा स्नानमस्य विधीयते।<br>आर्द्रेण वाससा वाथ मार्जनं कापिलं स्मृतम्॥ १०॥ | दृष्ट और अदृष्ट फल देनेवाले प्रातःकालीन शुभ स्नानकी सभी प्रशंसा करते हैं। नित्य प्रातःकाल स्नान करनेसे ही ऋषियोंका ऋषित्व है, इसमें संशय नहीं; क्योंकि सोये व्यक्तिके मुखसे निरन्तर लार बहती रहती है, अतः सर्वप्रथम स्नान किये बिना कोई कर्म नहीं करना चाहिये। प्रातः-स्नानसे अलक्ष्मी, कालकर्णी<sup>२</sup> (अलक्ष्मीविशेष) दुःस्वप्न, बुरे विचार और अन्य पाप दूर हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं। बिना स्नानके मनुष्योंको पवित्र करनेवाला कोई कर्म नहीं बतलाया गया है। अतः होम तथा जपके समय विशेष-रूपसे स्नान करना चाहिये। असमर्थताकी स्थितिमें सिरको छोड़कर स्नान करनेका विधान किया गया है। अथवा भीगे वस्त्रसे शरीरका मार्जन करना चाहिये, इसे कपिलस्नान कहा गया है॥ ६–१०॥ |
१-इस अध्यायमें गृहस्थके प्रायः सभी अनुष्ठानोंका वर्णन है, पर क्रमसे नहीं है। क्रमका ज्ञान गृह्यसूत्र, आह्निकसूत्रावली, नित्यकर्मविधि आदि ग्रन्थोंसे करना चाहिये। इस अध्यायका उद्देश्य सभी कर्मोंका परिचय कराना है। कर्मोंका क्रम बताना उद्देश्य नहीं है।
२-कालकर्णी—अलक्ष्मी (शब्दकल्पद्रुम)।