संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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३३८ * कूर्मपुराण *
| असामर्थ्ये समुत्पन्ने स्नानमेवं समाचरेत्।<br>ब्राह्मादीनि यथाशक्तो स्नानान्याहुर्मनीषिणः॥ ११॥<br><br>ब्राह्ममाग्नेयमुद्दिष्टं वायव्यं दिव्यमेव च।<br>वारुणं यौगिकं तद्वत् षोढा स्नानं प्रकीर्तितम्॥ १२॥<br><br>ब्राह्मं तु मार्जनं मन्त्रैः कुशैः सोदकबिन्दुभिः।<br>आग्नेयं भस्मना पादमस्तकाद्देहधूलनम्॥ १३॥<br><br>गवां हि रजसा प्रोक्तं वायव्यं स्नानमुत्तमम्।<br>यत्तु सातपवर्षेण स्नानं तद् दिव्यमुच्यते॥ १४॥<br><br>वारुणं चावगाहस्तु मानसं त्वात्मवेदनम्।<br>यौगिकं स्नानमाख्यातं योगो विष्णुविचिन्तनम्॥ १५॥<br><br>आत्मतीर्थमिति ख्यातं सेवितं ब्रह्मवादिभिः।<br>मनःशुचिकरां पुंसां नित्यं तत् स्नानमाचरेत्॥ १६॥<br><br>शक्तश्चेद् वारुणं विद्वान् प्राजापत्यं तथैव च।<br>प्रक्षाल्य दन्तकाष्ठं वै भक्षयित्वा विधानतः॥ १७॥<br><br>आचम्य प्रयतो नित्यं स्नानं प्रातः समाचरेत्।<br>मध्याङ्गुलिसमस्थौल्यं द्वादशाङ्गुलसम्मितम्॥ १८॥<br><br>सत्वचं दन्तकाष्ठं स्यात् तदग्रेण तु धावयेत्।<br>क्षीरवृक्षसमुद्भूतं मालतीसम्भवं शुभम्।<br>अपामार्गं च बिल्वं च करवीरं विशेषतः॥ १९॥<br><br>वर्जयित्वा निन्दितानि गृहीत्वैकं यथोदितम्।<br>परिहृत्य दिनं पापं भक्षयेद् वै विधानवित्॥ २०॥<br><br>नोत्पाटयेद् दन्तकाष्ठं नाङ्गुल्या धावयेत् क्वचित्।<br>प्रक्षाल्य भङ्क्त्वा तज्जह्याच्छुचौ देशे समाहितः॥ २१॥<br><br>स्नात्वा संतर्पयेद् देवानृषीन् पितॄगणांस्तथा।<br>आचम्य मन्त्रवन्नित्यं पुनराचम्य वाग्यतः॥ २२॥ | सामर्थ्य न रहनेपर यही (कपिल-) स्नान करना चाहिये। मनीषियोंने यथाशक्ति किये जानेवाले ब्राह्म आदि स्नानोंको बतलाया है। ब्राह्म, आग्नेय, वायव्य, दिव्य, वारुण तथा यौगिक—ये छः स्नान कहे गये हैं। कुशोंके द्वारा जलबिन्दुओंस मन्त्रोच्चारणपूर्वक मार्जन करना ब्राह्म-स्नान कहलाता है। मस्तकसे पैरोंतक समस्त देहमें भस्मका उपलेपन करना आग्नेय-स्नान है। गायोंकी धूलसे सम्पन्न उत्तम स्नानको वायव्य-स्नान कहा गया है। धूपमें वर्षाके जलसे जो स्नान किया जाता है, वह दिव्य-स्नान कहलाता है। (जलमें) डुबकी लगाकर किया गया स्नान वारुण-स्नान और मनसे आत्मतत्त्वका चिन्तन करना यौगिक-स्नान कहा गया है। विष्णुका चिन्तन ही योग है॥ ११–१५॥<br><br>ब्रह्मवादियोंसे सेवित इस (यौगिक) स्नानको आत्मतीर्थ कहा गया है। यह मनुष्योंके मनको पवित्र बनानेवाला है। इसलिये यह स्नान नित्य करना चाहिये। समर्थ होनेपर विद्वान्को वारुण तथा प्राजापत्य (ब्राह्म)-स्नान करना चाहिये। दन्तकाष्ठको धोकर विधिपूर्वक उसका भक्षण (चर्वण) करना चाहिये॥ १६–१७॥<br><br>(दतुअन करके) आचमनकर (मुख-प्रक्षालनकर) प्रयत्नपूर्वक नित्य प्रातःस्नान करना चाहिये। मध्यमा अंगुलिके समान मोटा और बारह अंगुलके बराबर लंबा छिलके-युक्त दन्तकाष्ठके अग्रभागसे मुखशुद्धि करनी चाहिये। विशेषरूपसे दूधवाले वृक्ष, मालती (चमेली), अपामार्ग, बिल्व तथा करवीर (कनेर)-की लकड़ीका दन्तकाष्ठ शुभ होता है। विधिके ज्ञाताको चाहिये कि दोषपूर्ण (निषिद्ध) दिनको छोड़कर तथा निन्दित काष्ठोंको छोड़कर बताये गये दन्तकाष्ठोंमेंसे किसी एकको ग्रहणकर दन्तधावन करना चाहिये। दन्तकाष्ठको उखाड़ना नहीं चाहिये (अर्थात् किसी छोटे पौधेको पूरा उखाड़कर उससे दन्तधावन नहीं करना चाहिये) और न कभी अँगुलीसे दतुअन करना चाहिये। (मुख) धोनेके उपरान्त उसे (दन्तकाष्ठको) तोड़कर सावधानीसे किसी पवित्र स्थानमें (यथास्थान) त्याग देना चाहिये॥ १८–२१॥<br><br>अनन्तर पवित्र देशमें स्नान करके आचमनपूर्वक देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंको यथाधिकार मन्त्रपूर्वक यथाविधि तृप्त करना चाहिये॥ २२॥ |