संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय १८ * | ३३९ |
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| सम्मार्ज्य मन्त्रैरात्मानं कुशैः सोदकबिन्दुभिः।<br>आपो हि ष्ठा व्याहृतिभिः सावित्र्या वारुणैः शुभैः॥ २३॥<br><br>ओङ्कारव्याहृतियुतां गायत्रीं वेदमातरम्।<br>जप्त्वा जलाञ्जलिं दद्याद् भास्करं प्रति तन्मनाः॥ २४॥<br><br>प्राक्कूलेषु समासीनो दर्भेषु सुसमाहितः।<br>प्राणायामत्रयं कृत्वा ध्यायेत् संध्यामिति श्रुतिः॥ २५॥ | तदनन्तर पुनः आचमन करे और संयतवाणीवाला होकर 'आपो हि ष्ठा' इत्यादि मन्त्र, व्याहृतियों, गायत्रीमन्त्र तथा वरुण-सम्बन्धी शुभ मन्त्रोंका पाठ करते हुए जलबिन्दुओंसे युक्त कुशोंके द्वारा अपना मार्जन करे। ओंकार एवं व्याहृतियोंसे युक्त वेदमाता गायत्री (-मन्त्र)-का जप करके तन्मय होकर सूर्यको जलाञ्जलि देनी चाहिये। तदनन्तर पूर्वकी ओर बिछे हुए कुशासनपर सावधानीपूर्वक बैठकर तीन प्राणायाम करके संध्याका ध्यान करना चाहिये। ऐसा श्रुतिका विधान है॥ २३-२५॥ | | या संध्या सा जगत्सूतिर्मायातीता हि निष्कला।<br>ऐश्वरी तु पराशक्तिस्तत्त्वत्रयसमुद्भवा॥ २६॥<br><br>ध्यात्वार्कमण्डलगतां सावित्रीं वै जपन् बुधः।<br>प्राङ्मुखः सततं विप्रः संध्योपासनमाचरेत्॥ २७॥<br><br>संध्याहीनोऽशुचिर्नित्यमनर्हः सर्वकर्मसु।<br>यदन्यत् कुरुते किञ्चिन्न तस्य फलमाप्नुयात्॥ २८॥<br><br>अनन्यचेतसः शान्ता ब्राह्मणा वेदपारगाः।<br>उपास्य विधिवत् संध्यां प्राप्ताः पूर्वं परां गतिम्॥ २९॥<br><br>योऽन्यत्र कुरुते यत्नं धर्मकार्ये द्विजोत्तमः।<br>विहाय संध्याप्रणतिं स याति नरकायुतम्॥ ३०॥<br><br>तस्मात् सर्वप्रयत्नेन संध्योपासनमाचरेत्।<br>उपासितो भवेत् तेन देवो योगतनुः परः॥ ३१॥ | जो संध्या है वही जगत्को उत्पन्न करनेवाली है, मायातीत है, निष्कल है और तीन तत्त्वोंसे उत्पन्न होनेवाली ईश्वरकी पराशक्ति है। विद्वान् ब्राह्मण (द्विज)-को पूर्वाभिमुख होकर सूर्यमण्डलमें प्रतिष्ठित सावित्री (गायत्रीमन्त्र)-का ध्यानपूर्वक जप करते हुए संध्योपासना करनी चाहिये। संध्यासे हीन व्यक्ति (द्विज) नित्य अपवित्र और सभी कर्मोंको करनेके लिये अयोग्य होता है। वह जो भी कार्य करता है, उसका उसे कोई फल प्राप्त नहीं होता। पूर्वकालमें वेदके पारंगत शान्त ब्राह्मणोंने अनन्य-मनसे संध्योपासना करके परम गतिको प्राप्त किया था। जो द्विजोत्तम संध्यावन्दनको छोड़कर दूसरे धार्मिक कार्योंके लिये प्रयत्न करता है, वह सहस्रों नरकोंमें जाता है। इसलिये सभी प्रयत्नोंसे संध्योपासना करनी चाहिये। उस उपासनासे योगविग्रह परमदेवकी उपासना हो जाती है॥ २६-३१॥ | | सहस्रपरमां नित्यं शतमध्यां दशावराम्।<br>सावित्रीं वै जपेद् विद्वान् प्राङ्मुखः प्रयतः स्थितः॥ ३२॥<br><br>अथोपतिष्ठेदादित्यमुदयन्तं समाहितः।<br>मन्त्रैस्तु विविधैः सौरैर्ऋग्यजुःसामसम्भवैः॥ ३३॥<br><br>उपस्थाय महायोगं देवदेवं दिवाकरम्।<br>कुर्वीत प्रणतिं भूमौ मूर्ध्ना तेनैव मन्त्रतः॥ ३४॥ | विद्वान् व्यक्तिको नित्य पूर्वाभिमुख होकर सावित्री (-मन्त्र)-का सावधानीपूर्वक जप करना चाहिये। हजार बारका जप उत्कृष्ट, सौ बार किया गया जप मध्यम तथा दस बारका जप निम्नकोटिका होता है। इसके बाद खड़े होकर ध्यान लगाकर उदित होते हुए सूर्यकी ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेदमें वर्णित सूर्य-सम्बन्धी विविध मन्त्रोंद्वारा उपासना करनी चाहिये। महायोगरूप देवाधिदेव दिवाकरका उपस्थान करके उसी मन्त्रद्वारा भूमिपर मस्तक झुकाकर प्रणाम करना चाहिये और निम्नलिखित मन्त्रोंसे प्रार्थना करनी चाहिये—॥ ३२-३४॥ |