संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ३४० | * कूर्मपुराण * |
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| ॐ खखोल्काय शान्ताय कारणत्रयहेतवे।<br>निवेदयामि चात्मानं नमस्ते ज्ञानरूपिणे।<br>नमस्ते घृणिने तुभ्यं सूर्याय ब्रह्मरूपिणे॥ ३५॥ | मैं ओंकाररूप शान्त, कारणत्रयके^१ हेतुरूप खखोल्क^२ (सूर्य)-के प्रति अपनेको समर्पित करता हूँ। ज्ञानरूपी आप (सूर्य)-को नमस्कार है। ब्रह्मरूपी घृणि^३ सूर्य! आपको नमस्कार है। आप ही परम ब्रह्म, अप्, ज्योति, रस और अमृतस्वरूप हैं। आप ही भूः, भुवः, स्वः, ओंकार तथा समस्त सनातन रुद्र हैं। आप सत्स्वरूप और महान् पुरुष हैं। आप कपर्दीको मैं प्रणाम करता हूँ। आप ही अनेक रूपवाले सत्-असत्-रूप समस्त विश्वको उत्पन्न करते हैं। सूर्यरूप रुद्रको नमस्कार है। मैं आपकी शरणमें आया हूँ। आप प्रचेताको नमस्कार है। मीढुष्टम^४! आपको नमस्कार है। रुद्रके लिये वार-बार नमस्कार है। मैं आपकी शरणमें आया हूँ। आप हिरण्यबाहु तथा हिरण्यपतिको नमस्कार हैं। अम्बिकाके पति तथा उमाके पति आपको नमस्कार है। नीलग्रीवको नमस्कार है तथा आप पिनाकीको नमस्कार है। विलोहित, भर्ग तथा सहस्राक्ष! आपको नमस्कार है॥ ३५–४०॥ |
| त्वमेव ब्रह्म परममापो ज्योती रसोऽमृतम्।<br>भूर्भुवः स्वस्त्वमोङ्कारः सर्वे रुद्राः सनातनाः।<br>पुरुषः सन्महोऽतस्त्वां प्रणमामि कपर्दिनम्॥ ३६॥ | |
| त्वमेव विश्वं बहुधा सदसत् सूयते च यत्।<br>नमो रुद्राय सूर्याय त्वामहं शरणं गतः॥ ३७॥ | |
| प्रचेतसे नमस्तुभ्यं नमो मीढुष्टमाय ते।<br>नमो नमस्ते रुद्राय त्वामहं शरणं गतः॥ ३८॥ | |
| हिरण्यबाहवे तुभ्यं हिरण्यपतये नमः।<br>अम्बिकापतये तुभ्यमुमायाः पतये नमः॥ ३९॥ | |
| नमोऽस्तु नीलग्रीवाय नमस्तुभ्यं पिनाकिने।<br>विलोहिताय भर्गाय सहस्राक्षाय ते नमः॥ ४०॥ | |
| नमो हंसाय ते नित्यमादित्याय नमोऽस्तु ते।<br>नमस्ते वज्रहस्ताय त्र्यम्बकाय नमोऽस्तु ते॥ ४१॥ | आप हंसको नित्य नमस्कार है। आदित्य ! आपको नमस्कार है। वज्रहस्त तथा त्र्यम्बक ! आपको नमस्कार है। मैं आप विरूपाक्ष महान् परमेश्वरकी शरणमें हूँ। सभी देहधारियोंके हिरण्मय गृहमें (हृदयमें) आप अपनेको गुह्यरूपसे प्रतिष्ठित किये हैं। परम ज्योतिरूप, परमगति, विश्वरूप, पशुपति, भीम तथा अर्ध-नारीश्वर-रूपवाले आप ब्रह्माको मैं नमस्कार करता हूँ। प्रकाशमान सूर्यरूप परमेष्ठी रुद्रको नमस्कार है। उग्र तथा सभीके भजनीय^५ आपकी मैं सदा ही शरण ग्रहण करता हूँ॥ ४१–४४॥ |
| प्रपद्ये त्वां विरूपाक्षं महान्तं परमेश्वरम्।<br>हिरण्मयं गृहे गुह्यमात्मानं सर्वदेहिनाम्॥ ४२॥ | |
| नमस्यामि परं ज्योतिर्ब्रह्माणं त्वां परां गतिम्।<br>विश्वं पशुपतिं भीमं नरनारीशरीरिणम्॥ ४३॥ | |
| नमः सूर्याय रुद्राय भास्वते परमेष्ठिने।<br>उग्राय सर्वभक्ताय त्वां प्रपद्ये सदैव हि॥ ४४॥ | |
| एतद् वै सूर्यहृदयं जप्त्वा स्तवमनुत्तमम्।<br>प्रातःकालेऽथ मध्याह्ने नमस्कुर्याद् दिवाकरम्॥ ४५॥ | इस सूर्यहृदय (नामक) उत्तम स्तोत्रका प्रातः-काल तथा मध्याह्नकालमें जपकर दिवाकरको नमस्कार करना चाहिये॥ ४५॥ |
१- यहाँ कारणत्रयसे मन, बुद्धि एवं अहंकार विवक्षित हैं। इन तीनोंको क्रियाशील बनानेमें सूर्य एक महत्त्वपूर्ण कारण हैं।
२- खखोल्क—ख (आकाश) ख (इन्द्रियों)-में क्रमशः सूर्य तथा आत्मारूपसे जो उल्काके समान बाहर-भीतर प्रकाशक-रूपमें विद्यमान हैं, वे खखोल्क हैं। काशीखण्ड ५० वें अध्यायमें खखोल्क नामके सूर्यका वर्णन है। ये काशीमें स्थित हैं।
३-घृणि—सूर्यका नाम है—जिघर्ति दीप्यते इति घृणिः=दीप्तिशाली।
४-मीढुष्टम—शिवका नाम है (श्रीमद्भागवत स्कन्ध ४ अ० ६)। सूर्यमें सभी देवताओंकी भावना एवं उपासनाका विधान होनेसे सूर्यको मीढुष्टम कहा गया है। रुद्र आदिके रूपमें सूर्यके उल्लेखका भी यही कारण है।
५-'सर्वः भक्तः यस्य सः' बहुव्रीहि समास हुआ है। इससे अभिप्राय यह निकलता है कि रुद्र सबके लिये भजनीय हैं।