संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- अध्याय १८ * ३४१
| इदं पुत्राय शिष्याय धार्मिकाय द्विजातये ।<br>प्रदेयं सूर्यहृदयं ब्रह्मणा तु प्रदर्शितम् ॥ ४६ ॥<br><br>सर्वपापप्रशमनं वेदसारसमुद्भवम् ।<br>ब्राह्मणानां हितं पुण्यमृषिसङ्घैर्निषेवितम् ॥ ४७ ॥ | ब्रह्माके द्वारा प्रदर्शित, सभी पापोंका शमन करनेवाले, वेदोंके सारसे प्रकट हुए, ब्राह्मणोंके हितकारी, पवित्र और ऋषिसमूहोंद्वारा सेवित इस सूर्यहृदय (स्तोत्र)-का द्विजाति-कुलोत्पन्न धार्मिक पुत्र एवं शिष्यके लिये उपदेश करना चाहिये ॥ ४६-४७ ॥ |
| अथागम्य गृहं विप्रः समाचम्य यथाविधि ।<br>प्रज्वाल्य वह्निं विधिवज्जुहुयाज्जातवेदसम् ॥ ४८ ॥<br><br>ऋत्विक्पुत्रोऽथ पत्नी वा शिष्यो वापि सहोदरः ।<br>प्राप्यानुज्ञां विशेषेण जुहुयुर्वा यथाविधि ॥ ४९ ॥<br><br>पवित्रपाणिः पूतात्मा शुक्लाम्बरधरोत्तरः ।<br>अनन्यमानसो वह्निं जुहुयात् संयतेन्द्रियः ॥ ५० ॥ | तदनन्तर घर आकर ब्राह्मण (द्विज)-को विधिपूर्वक आचमन करके अग्नि प्रज्वलित कर यथाविधि अग्निमें हवन (अग्निहोत्र) करना चाहिये। (अग्न्याधान करनेवाला यजमान द्विजाति यदि किसी अपरिहार्य कारणवश स्वयं अग्निहोत्र नहीं कर सकता है तो उसके प्रतिनिधि-रूपमें) ऋत्विक्का पुत्र (यज्ञोपवीत-संस्कार-सम्पन्न पुत्र), पत्नी, शिष्य (यज्ञोपवीती) अथवा (यज्ञोपवीती) सहोदर भाई भी विशेषरूपसे आज्ञा प्राप्तकर विधिपूर्वक हवन (अग्निहोत्र) कर सकता है। हाथमें पवित्री धारणकर, पवित्रात्मा होकर, शुक्लवर्णका वस्त्र एवं उत्तरीय वस्त्र धारणकर एकाग्रमनसे इन्द्रियोंको संयमित करते हुए अग्निमें हवन करे ॥ ४८-५० ॥ |
| विना दर्भेण यत्कर्म विना सूत्रेण वा पुनः ।<br>राक्षसं तद्भवेत् सर्वं नामुत्रेह फलप्रदम् ॥ ५१ ॥<br><br>दैवतानि नमस्कुर्याद् देयसारान्निवेदयेत् ।<br>दद्यात् पुष्पादिकं तेषां वृद्धांश्चैवाभिवादयेत् ॥ ५२ ॥<br><br>गुरुं चैवाप्युपासीत हितं चास्य समाचरेत् ।<br>वेदाभ्यासं ततः कुर्यात् प्रयत्नाच्छक्तितो द्विजः ॥ ५३ ॥<br><br>जपेदध्यापयेच्छिष्यान् धारयेच्च विचारयेत् ।<br>अवेक्षेत च शास्त्राणि धर्मादीनि द्विजोत्तमः ।<br>वैदिकांश्चैव निगमान् वेदाङ्गानि विशेषतः ॥ ५४ ॥ | बिना कुशके और बिना यज्ञोपवीतके जो भी कर्म किया जाता है, वह सब राक्षसी कर्म होता है, वह न इस लोकमें फल देता है और न परलोकमें ॥ ५१ ॥<br><br>देवताओंको नमस्कार करना चाहिये। उन्हें प्रदान की जानेवाली (शास्त्रविहित) वस्तुओंमें उत्तमोत्तम वस्तुओंको ही निवेदित करना चाहिये। उन्हें (देवताओंको) पुष्प आदि (पदार्थ) समर्पित करना चाहिये और वृद्धजनोंका अभिवादन करना चाहिये। गुरुकी भी उपासना करनी चाहिये, उनका हित करना चाहिये। तदनन्तर द्विजको यथाशक्ति प्रयत्नपूर्वक वेदोंका अभ्यास करना चाहिये। द्विजोत्तमको जप करना चाहिये। शिष्योंको पढ़ाना चाहिये। (पढ़े विषयोंको) धारण करना चाहिये और (उसपर) विचार करना चाहिये। शास्त्रोंका अवलोकन तथा धर्मका—विशेषरूपसे वैदिक तथा वेदसम्मत शास्त्रों और वेदाङ्गोंका चिन्तन करना चाहिये ॥ ५२-५४ ॥ |
| उपेयादीश्वरं चाथ योगक्षेमप्रसिद्धये ।<br>साधयेद् विविधानर्थान् कुटुम्बार्थे ततो द्विजः ॥ ५५ ॥ | अनन्तर योग (अप्राप्तकी प्राप्ति), क्षेम (प्राप्तकी रक्षा)-के लिये ईश्वर (धार्मिक राजा अथवा श्रीमान्)-के समीप जाना चाहिये और द्विजको कुटुम्बके भरण-पोषणके लिये विविध प्रकारकी सम्पत्तियोंका (न्यायपूर्वक) साधन (चिन्तन, अर्जन) करना चाहिये ॥ ५५ ॥ |