भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३४२* कूर्मपुराण *

| ततो मध्याह्नसमये स्नानार्थं मृदमाहरेत्।<br>पुष्पाक्षतान् कुशतिलान् गोमयं शुद्धमेव च॥ ५६ ॥<br><br>नदीषु देवखातेषु तडागेषु सरस्सु च।<br>स्नानं समाचरेन्नित्यं गर्तप्रस्रवणेषु च॥ ५७॥<br><br>परकीयनिपानेषु न स्नायाद् वै कदाचन।<br>पञ्चपिण्डान् समुद्धृत्य स्नायाद् वाऽसम्भवे पुनः॥ ५८ ॥<br><br>मृदैक्या शिरः क्षाल्यं द्वाभ्यां नाभेस्तथोपरि।<br>अधश्च तिसृभिः कायं पादौ षड्भिस्तथैव च॥ ५९॥<br><br>मृत्तिका च समुद्दिष्टा त्वार्द्रामलकमात्रिका।<br>गोमयस्य प्रमाणं तत् तेनाङ्गं लेपयेत् ततः॥ ६०॥ | तदनन्तर मध्याह्न-समयमें स्नानके लिये मिट्टी, पुष्प, अक्षत, कुश, तिल तथा शुद्ध गोबर लाना चाहिये। नदियों (पुराण आदिमें प्रसिद्ध देव, ऋषिनिर्मित), अगाध जलवाले कुण्डों, (जलाशयों), सरोवरों, झरनों तथा बावलियोंमें नित्य स्नान करना चाहिये। दूसरोंके तालाब आदिमें कभी भी स्नान नहीं करना चाहिये। (अन्यत्र स्नान) असम्भव होनेपर (तालाब आदिमेंसे) मिट्टीके पाँच पिण्डोंको निकालकर स्नान करना चाहिये। मिट्टीसे एक बार सिर धोकर दो बार नाभिके ऊपर (-के अङ्गोंको) धोना चाहिये। नीचेका शरीर तीन बार तथा छः बार पाँवोंको धोना चाहिये। आँवलेके बराबर गीली मिट्टी लेनेका विधान है। गोबरका भी इतना ही प्रमाण है। उससे अङ्गोंका लेपन करे॥ ५६–६०॥ | | लेपयित्वा तु तीरस्थस्तल्लिङ्गैरैव मन्त्रतः।<br>प्रक्षाल्याचम्य विधिवत् ततः स्नायात् समाहितः॥ ६१॥ | (नदी आदिके) किनारे बैठकर तल्लिङ्गक* मन्त्रोंके द्वारा (अङ्गोंमें मृत्तिका आदिका यथाविधि) लेपकर विधिपूर्वक प्रक्षालन एवं आचमन करके सावधानी-पूर्वक स्नान करना चाहिये॥ ६१॥ | | अभिमन्त्र्य जलं मन्त्रैस्तल्लिङ्गैर्वारुणैः शुभैः।<br>भावपूतस्तदव्यक्तं ध्यायन् वै विष्णुमव्ययम्॥ ६२॥<br><br>आपो नारायणोद्भूतास्ता एवास्यायनं पुनः।<br>तस्मान्नारायणं देवं स्नानकाले स्मरेद् बुधः॥ ६३॥<br><br>प्रोच्य सोंकारमादित्यं त्रिर्निमज्जेज्जलाशये।<br>आचान्तः पुनराचामेन्मन्त्रेणानेन मन्त्रवित्॥ ६४॥<br><br>अन्तश्चरसि भूतेषु गुहायां विश्वतोमुखः।<br>त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कार आपो ज्योती रसोऽमृतम्॥ ६५॥ | तल्लिङ्गक शुभ वरुण-सम्बन्धी मन्त्रोंके द्वारा जलका अभिमन्त्रणकर पवित्र भावसे उन अव्यक्त अविनाशी विष्णुका ध्यान करे। ‘जल’की उत्पत्ति नारायणसे ही हुई है, पुनः वही जल उन (नारायण)-का अयन (निवास) हुआ, अतः स्नानके समय विद्वान्को चाहिये कि वह नारायणदेवका स्मरण करे। ओंकारके साथ आदित्यका उच्चारण करके जलके भीतर तीन बार डुबकी लगानी चाहिये। आचमन किये रहनेपर भी मन्त्रवेत्ताको पुनः इस मन्त्रसे आचमन करना चाहिये—अन्तश्चरसि भूतेषु गुहायां विश्वतोमुखः। त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कार आपो ज्योती रसोऽमृतम्॥ अर्थात् (हे भगवन्!) सभी ओर मुखवाले आप सभी प्राणियोंके भीतर (हृदयरूपी) गुहामें विचरण करते हैं। आप ही यज्ञ हैं और आप ही वषट्कार, जल, ज्योति, रस तथा अमृतरूप हैं॥ ६२–६५॥ | | द्रुपदां वा त्रिरभ्यसेद् व्याहृतिप्रणवान्विताम्।<br>सावित्रीं वा जपेद् विद्वान् तथा चैवाघमर्षणम्॥ ६६ ॥ | अथवा विद्वान् व्यक्तिको तीन बार द्रुपदा (दो चरणवाली) या व्याहृति अथवा प्रणवसे युक्त गायत्री और अघमर्षण-मन्त्रका जप करना चाहिये॥ ६६॥ |


* स्मार्तकर्मोंमें वे मन्त्र गृह्यसूत्रानुसार विनियुक्त होते हैं, जिनमें स्मार्तकर्म-बोधक शब्द श्रुत हों। यह आवश्यक नहीं होता कि उन मन्त्रोंमें स्मार्तकर्मका प्रतिपादन हो। इसीलिये स्मार्तकर्मके मन्त्र स्मार्तकर्मविषयक नहीं, किंतु स्मार्तकर्मलिङ्गक होते हैं। 'अक्षन्मी०' मन्त्रमें 'अक्षत' शब्द कथञ्चित् श्रुत होनेसे उसका अक्षत चढ़ानेमें विनियोग होता है, वह 'अक्षत' चढ़ाने-रूप कर्मका प्रतिपादक नहीं है, अतएव 'अक्षत'-विषयक नहीं है। मात्र अक्षतलिङ्गक है।