भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय १८ * ३४३


ततः सम्मार्जनं कुर्यादापो हि ष्ठा मयोभुवः।<br>इदमापः प्र वहत व्याहृतिभिस्तथैव च॥ ६७॥तदनन्तर 'आपो हि ष्ठा मयो- भुवः०'<sup></sup>, 'इदमापः प्र वहत०'<sup></sup> इन मन्त्रों और व्याहृतियोंद्वारा मार्जन करना चाहिये। तदनन्तर 'आपो हि ष्ठा०' इत्यादि मन्त्रोंसे उस जल (स्नानीय नदी आदिके जल)-का अभिमन्त्रण करके जलके भीतर डुबकी लगाकर तीन बार अघमर्षण-मन्त्रका जप करना चाहिये। अथवा त्रिपदा गायत्री-मन्त्र 'तद्विष्णोः परमं पदम्०'<sup></sup>, इस मन्त्र या प्रणवका जप करे अथवा भगवान् विष्णुका स्मरण करे॥ ६७-६९॥
ततोऽभिमन्त्र्य तत् तीर्थमापो हि ष्ठादिमन्त्रकैः।<br>अन्तर्जलगतो मग्नो जपेत् त्रिर्घमर्षणम्॥ ६८॥
त्रिपदां वाथ सावित्रीं तद्विष्णोः परमं पदम्।<br>आवर्तयेद् वा प्रणवं देवं वा संस्मरेद्धरिम्॥ ६९॥
द्रुपदादिव यो मन्त्रो यजुर्वेदे प्रतिष्ठितः।<br>अन्तर्जले त्रिरावर्त्य सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ७०॥यजुर्वेदमें 'द्रुपदादिव०'<sup></sup> इस प्रकारसे जो मन्त्र प्रतिष्ठित है, उसका जलके भीतर तीन बार जप करनेसे सभी पापोंसे मुक्ति हो जाती है। मार्जन करनेके बाद हाथमें जल लेकर मन्त्र (द्रुपदादिव०) जपपूर्वक उस जलको सिरपर रखनेसे (अघमर्षण करनेसे) सम्पूर्ण पापोंसे मुक्ति हो जाती है। जिस प्रकार अश्वमेध-यज्ञ समस्त यज्ञोंके राजाके समान है और समस्त पापोंको दूर करनेवाला है, उसी प्रकार अघमर्षणसूक्त<sup></sup> भी (सभी सूक्तोंका सम्राट् और) सभी पापोंको दूर करनेवाला है॥ ७०-७२॥
अपः पाणौ समादाय जप्त्वा वै मार्जने कृते।<br>विन्यस्य मूर्ध्नि तत् तोयं मुच्यते सर्वपातकैः॥ ७१॥
यथाश्वमेधः क्रतुराट् सर्वपापापनोदनः।<br>तथाघमर्षणं सूक्तं सर्वपापापनोदनम्॥ ७२॥
अथोपतिष्ठेदादित्यं मूर्ध्नि पुष्पान्विताञ्जलिम्।<br>प्रक्षिप्यालोकयेद् देवमुद्वयं तमसस्परि॥ ७३॥इसके बाद सूर्योपस्थान करना चाहिये। (इसकी प्रक्रिया यह है—) पुष्पयुक्त अञ्जलि मस्तकसे लगाकर उस फूलको ऊपर (सूर्य)-की ओर उछालकर उन सूर्यका दर्शन करते हुए 'उद्वयं तमसस्परि'<sup></sup>, 'चित्रं०'<sup></sup>, 'उदु त्यं०'<sup></sup>, 'तच्चक्षुः०'<sup></sup>, 'हंसः शुचिषद'<sup>१०</sup> एवं विशेष-रूपसे सावित्री-मन्त्र और सूर्य-सम्बन्धी अन्य भी पापको नष्ट करनेवाले वैदिक मन्त्रोंके जपके द्वारा सूर्यको प्रसन्न किया जाय, यही सूर्योपस्थान है। इसके अनन्तर गायत्रीमन्त्रका जप करना चाहिये। इस (गायत्रीजपको) ही जपयज्ञ कहा गया है॥ ७३-७५॥
उदु त्यं चित्रमित्येते तच्चक्षुरिति मन्त्रतः।<br>हंसः शुचिषदेतेन सावित्र्या च विशेषतः॥ ७४॥
अन्यैश्च वैदिकैर्मन्त्रैः सौरैः पापप्रणाशनैः।<br>सावित्रीं वै जपेत् पश्चाज्जपयज्ञः स वै स्मृतः॥ ७५॥

१-आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन। महे रणाय चक्षसे॥ (यजु० ११। ५०)
२-इदमापः प्र वहतावद्यं च मलं च यत्। यच्चाभिदुद्रोहानृतं यच्च शेपे अभीरुणम्। आपो मा तस्मादेनसः पवमानश्च मुञ्चतु। (यजु० ६। १७)
३-तद्विष्णोः परमं पदᳵसदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम्॥ (यजु० ६। ५)
४-द्रुपदादिव मुमुचानः स्विन्नः स्नातो मलादिव। पूतं पवित्रेणेवाज्यमापः शुन्धन्तु मैनसः॥ (यजु० २०। २०)
५-ऋतं च सत्यं चाभीद्धात् तपसोऽध्यजायत। ततो रात्र्यजायत ततः समुद्रो अर्णवः।..... मथो स्वः॥ (ऋग्वेद १०। १९०। १-३)
६-उद्वयं तमसस्परि स्वः पश्यन्त उत्तरम्। देवं देवत्रा सूर्यमन्म ज्योतिरुत्तमम्॥ (यजु० २०। २१)
७-उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः। दृशे विश्वाय सूर्यᳵस्वाहा॥ (यजु० ७। ४१)
८-चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः। आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षᳵसूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च स्वाहा॥ (यजु० ७। ४२)
९-तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्। पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतं शृणुयाम।
शरदः शतं प्रब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात्॥ (यजु० ३६। २४)
१०-हंसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत्। नृषद्वरसदृतसद्व्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत्॥ (यजु० १०। २४)