भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 354, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 354

३४४ * कूर्मपुराण *


विविधानि पवित्राणि गुह्यविद्यास्तथैव च।<br>शतरुद्रीयमथर्वाशिरः सौरांश्च शक्तितः ॥ ७६ ॥<br><br>प्राक्कूलेषु समासीनः कुशेषु प्राङ्मुखः शुचिः।<br>तिष्ठंश्चेदीक्षमाणोऽर्कं जप्यं कुर्यात् समाहितः ॥ ७७ ॥<br><br>स्फाटिकेन्द्राक्षरुरुद्राक्षैः पुत्रजीवसमुद्भवैः।<br>कर्तव्या त्वक्षमाला स्यादुत्तरादुत्तमा स्मृता ॥ ७८ ॥<br>जपकाले न भाषेत नान्यानि प्रेक्षयेद् बुधः।<br>'न कम्पयेच्छिरोग्रीवां दन्तान् नैव प्रकाशयेत् ॥ ७९ ॥<br><br>गुह्यका राक्षसा सिद्धा हरन्ति प्रसभं यतः।<br>एकान्ते सुशुभे देशे तस्माज्जप्यं समाचरेत् ॥ ८० ॥<br>चण्डालाशौचपतितान् दृष्ट्वाचम्य पुनर्जपेत्।<br>तैरेव भाषणं कृत्वा स्नात्वा चैव जपेत् पुनः ॥ ८१ ॥<br><br>आचम्य प्रयतो नित्यं जपेदशुचिदर्शने।<br>सौराम् मन्त्रान् शक्तितो वै पावमानीस्तु कामतः ॥ ८२ ॥<br><br>यदि स्यात् क्लिन्नवासा वै वारिमध्यगतो जपेत्।<br>अन्यथा तु शुचौ भूम्यां दर्भेषु सुसमाहितः ॥ ८३ ॥<br>प्रदक्षिणं समावृत्य नमस्कृत्या ततः क्षितौ।<br>आचम्य च यथाशास्त्रं शक्त्या स्वाध्यायमाचरेत् ॥ ८४ ॥<br><br>ततः संतर्पयेद् देवानृषीन् पितृगणांस्तथा।<br>आदावोंकारमुच्चार्य नमोऽन्ते तर्पयामि वः ॥ ८५ ॥<br><br>देवान् ब्रह्मर्षींश्चैव तर्पयेदक्षतोदकैः।<br>तिलोदकैः पितॄन् भक्त्या स्वसूत्रोक्तविधानतः ॥ ८६ ॥पूर्वाग्र कुशोंपर पूर्वाभिमुख पवित्र होकर बैठना चाहिये और सूर्यका दर्शन करते हुए समाहित-चित्त होकर विविध पवित्र मन्त्रों, गुह्यविद्याओं, शतरुद्रिय, अथर्वशिरस् एवं सूर्यदेवताके मन्त्रोंका जप करना चाहिये। स्फटिक, इन्द्राक्ष (इन्द्र वृक्ष-विशेषके फलकी माला), रुद्राक्ष तथा पुत्रजीवककी (वृक्ष-विशेषके फलकी माला*) अक्षमाला बनानी चाहिये। इनमें पूर्वसे बादवाली माला क्रमशः उत्तम कही गयी है॥ ७६-७८॥<br><br>बुद्धिमान् व्यक्तिको चाहिये कि वह जप करते समय बोले नहीं, दूसरे लोगोंकी ओर न देखे। सिर और गरदनको न हिलाये और न ही दाँतोंको दिखलाये, क्योंकि (ऐसा करनेसे) गुह्यक, राक्षस तथा सिद्ध उस जपके फलका बलात् हरण कर लेते हैं, अतः किसी एकान्त अत्यन्त शुभ स्थानमें जप करना चाहिये ॥ ७९-८० ॥<br><br>चाण्डाल, आशौच-युक्त व्यक्ति तथा पतितको देखनेपर आचमन करके पुनः जप करना चाहिये। इनके साथ बात करनेपर स्नान करनेके बाद ही पुनः जप करना चाहिये। अपवित्र पदार्थके दिख जानेपर आचमन करके प्रयत्नपूर्वक यथाशक्ति नित्य सूर्यसम्बन्धी मन्त्रों और पावमानी मन्त्रोंका इच्छानुसार (मनस्तुष्टिपर्यन्त) जप करना चाहिये। यदि भींगे वस्त्र पहने हों तो जलके मध्य स्थित होकर जप करना चाहिये। अन्यथा पवित्र भूमिमें कुशासनके ऊपर बैठकर एकाग्रतापूर्वक जप करना चाहिये ॥ ८१-८३ ॥<br><br>(जप पूरा करनेके बाद) प्रदक्षिणा करके पृथ्वीपर नमस्कार करके और आचमन करके शास्त्रानुसार यथाशक्ति स्वाध्याय करना चाहिये, तदनन्तर देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंका तर्पण करना चाहिये। प्रारम्भमें ओंकारका उच्चारण कर और अन्तमें 'नमः' लगाकर 'आपका तर्पण करता हूँ' (वः तर्पयामि)-ऐसा कहना चाहिये ॥ ८४-८५ ॥<br><br>देवताओं तथा ब्रह्मर्षियोंका तर्पण अक्षत और जलसे करना चाहिये और अपने गृह्यसूत्रोक्त विधिके अनुसार पितरोंका तर्पण तिल और जलसे भक्तिपूर्वक करना चाहिये ॥ ८६ ॥

* माला-विशेषोंका विस्तृत वर्णन पद्मोत्तरखण्ड अध्याय १०८ में द्रष्टव्य है।