संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- अध्याय १८ * | ३४५ ---|---
अन्वारब्धेन सव्येन पाणिना दक्षिणेन तु।
देवर्षींस्तर्पयेद् धीमानुदकाञ्जलिभिः पितॄन्॥ ८७॥
यज्ञोपवीती देवानां निवीती ऋषितर्पणे।
प्राचीनावीती पित्र्ये तु स्वेन तीर्थेन भावतः॥ ८८॥
निष्पीड्य स्नानवस्त्रं तु समाचम्य च वाग्यतः।
स्वैर्मन्त्रैरर्चयेद् देवान् पुष्पैः पत्रैरथाम्बुभिः॥ ८९॥
ब्रह्माणं शंकरं सूर्यं तथैव मधुसूदनम्।
अन्यांश्चाभिमतान् देवान् भक्त्या चाक्रोधनोऽत्वरः॥ ९०॥
प्रदद्याद् वाथ पुष्पाणि सूक्तेन पौरुषेण तु।
आपो वा देवताः सर्वास्तेन सम्यक् समर्चितः॥ ९१॥
ध्यात्वा प्रणवपूर्वं वै दैवतानि समाहितः।
नमस्कारेण पुष्पाणि विन्यसेद् वै पृथक् पृथक्॥ ९२॥
न विष्ण्वाराधनात् पुण्यं विद्यते कर्म वैदिकम्।
तस्मादनादिमध्यान्तं नित्यमाराधयेद्धरिम्॥ ९३॥
तद्विष्णोरिति मन्त्रेण सूक्तेन पुरुषेण तु।
नैताभ्यां सदृशो मन्त्रो वेदेषूक्तश्चतुर्ष्वपि॥ ९४॥
| बुद्धिमान् (आस्तिक अधिकारी व्यक्ति)-को सव्य (बाँयें) हाथसे अन्वारब्ध (सम्बद्ध) दाहिने हाथसे अर्थात् दोनों हाथोंकी अञ्जलिद्वारा जलसे देवताओं, ऋषियों एवं पितरोंका तर्पण करना चाहिये। यज्ञोपवीती¹ अर्थात् सव्य होकर देवताओंका, निवीती² होकर अर्थात् मालाकी तरह कण्ठमें यज्ञोपवीत धारणकर ऋषियोंका और प्राचीनावीती³ अर्थात् अपसव्य होकर भक्तिभावसे (देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंके) अपने-अपने तीर्थोंसे⁴ तर्पण करना चाहिये॥ ८७-८८॥
| स्नानके वस्त्रको⁵ निचोड़कर संयतवाणीसे युक्त होकर आचमन करके तत्तद् मन्त्रोंसे पत्र, पुष्प तथा जलके द्वारा देवताओंका पूजन करना चाहिये। क्रोध और शीघ्रताका सर्वथा परित्यागकर भक्तिपूर्वक ब्रह्मा, शंकर, सूर्य, विष्णु तथा अन्य जो भी अभीष्ट देवता हों, उनकी पूजा करनी चाहिये॥ ८९-९०॥
| पुरुषसूक्तके द्वारा पुष्प अर्पित करना चाहिये। अथवा जल सभी देवताओंका स्वरूप है, अतः उसके द्वारा पूजन करनेसे सभी देवताओंकी भलीभाँति पूजा हो जाती है। एकाग्रमनसे प्रणवका उच्चारण कर देवताओंका ध्यान करना चाहिये। नमस्कारकर पृथक्-पृथक् देवोंपर पुष्प चढ़ाना चाहिये। विष्णुकी आराधनासे अधिक पुण्यप्रद और कोई वैदिक कर्म नहीं है। इसलिये आदि, मध्य और अन्तसे रहित विष्णुकी नित्य आराधना करनी चाहिये॥ ९१-९३॥
| 'तद्विष्णोः०'⁶ इस मन्त्रसे तथा पुरुषसूक्तसे श्रीविष्णुकी आराधना करनी चाहिये। चारों वेदोंमें भी इन दोनों ('तद्विष्णोः०' एवं 'पुरुष सूक्त') मन्त्रोंके सदृश अन्य कोई मन्त्र नहीं कहा गया है॥ ९४॥
१-बाँयें कंधेके ऊपर रखते हुए दाहिने हाथ (दाहिनी भुजा)-के नीचे रखे हुए ब्रह्मसूत्र (जनेऊ)-को उपवीत या यज्ञोपवीत कहते हैं और इस प्रकार ब्रह्मसूत्र धारण करनेवालेको उपवीती या यज्ञोपवीती कहते हैं।
२-मालाकी तरह कण्ठसे सीधे वक्षःस्थलकी ओर लम्बित ब्रह्मसूत्र (जनेऊ)-को निवीत कहते हैं और इस ब्रह्मसूत्र धारण करनेवालेको निवीती कहते हैं।
३-दाहिने कंधेके ऊपर रखते हुए बायें हाथ (बायीं भुजा)-के नीचे रखे हुए ब्रह्मसूत्र (जनेऊ)-को प्राचीनावीत कहते हैं और इस प्रकार ब्रह्मसूत्र धारण करनेवालेको प्राचीनावीती कहते हैं।
४-देवताओंका तर्पण देवतीर्थ (अँगुलियोंके अग्रभाग)-से, ऋषियों-मनुष्योंका तर्पण काय-तीर्थ (कनिष्ठिका अँगुलीके मूल)-से और पितरोंका तर्पण पितृतीर्थ (अङ्गुष्ठ तथा तर्जनी अँगुलीके मूलों)-से करना चाहिये।
५-तर्पणके पूर्व स्नानके वस्त्रोंको सुखानेके लिये निचोड़ना नहीं चाहिये अन्यथा पितर निराश होकर चले जाते हैं। इसीलिये यहाँ तर्पणके अनन्तर स्नानके वस्त्रोंको निचोड़नेकी बात कही गयी है।
६-तद्विष्णोः परमं पदँ सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम् (यजु० ६। ५)।